तुलनात्मक मान
3 मिनट का पाठ
आयुर्वेद-शास्त्र में मागधमान को श्रेष्ठ माना गया है। उसके बाँट उपलब्ध न होने के कारण प्रायः वैद्य अंग्रेजी राज्य में प्रचलित बाँटों का ही व्यवहार करते रहे हैं। किन्तु पिछले कुछ वर्षों से हमारी राष्ट्रीय सरकार ने अंग्रेजी बाँटों का प्रचलन भी कानूनन बन्द कर दिया है और उनके स्थान पर मेट्रिक (दाशमिक) प्रणाली चालू की है। आजकल यही सर्वत्र राज्यानुमोदित एवं प्रचलित है। व्यवहार की सुविधा के लिए इसका तुलनात्मक विवरण नीचे दिया गया है।
घन पदार्थों का तुलनात्मक मान
पाठ-संशोधन टिप्पणी: OCR में मूल तालिका के कई स्तम्भ और इकाइयों के नाम छूट गए हैं। जिन पंक्तियों का सम्बन्ध स्पष्ट है, वे नीचे दी गई हैं। शेष संख्याओं को अनुमान से किसी इकाई से नहीं जोड़ा गया है।
- १ रत्ती = १२१.५० मि.ग्रा.
- २ रत्ती = २४३ मि.ग्रा.
- १/२ सेर = ४६७ ग्राम।
- ३/४ सेर = ७०० ग्राम।
मूल स्कैन से पुष्टि योग्य शेष मान
इन मानों के सामने मूल पारम्परिक इकाइयों के नाम OCR में स्पष्ट नहीं हैं:
- ९७२ मि.ग्रा.; साथ में ‘१ ग्राम’ का पाठ भी है।
- ‘२ ग्राम’ और ‘६ ग्राम’ के पाठ; सम्बन्धित पंक्तियाँ स्पष्ट नहीं हैं।
- ५.८३ ग्राम; ११.६६ ग्राम; २३.२ ग्राम; २९ ग्राम।
- ५८.३२ ग्राम; ११६.६४ ग्राम; २३३ ग्राम; ९३३ ग्राम।
- १.८७ कि.ग्रा.; ३.७३ कि.ग्रा.; ५.६ कि.ग्रा.; ९.३३ कि.ग्रा.; ३७ कि.ग्रा.
द्रव पदार्थों के मान
निम्न मान उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे सम्बन्धित इकाइयों के नाम छूट गए हैं:
- ३.५ मि.लि.
- ७ मि.लि.
- १४ मि.लि.
- २८ मि.लि.
इसके बाद ‘२५ मिलिमीटर’ का एक असम्बद्ध पाठ मिलता है। उसका सही पाठ और तालिका से सम्बन्ध मूल स्कैन से सत्यापित करना आवश्यक है।
परिमाण ग्रहण करने के नियम
पाठ-संशोधन टिप्पणी: इस अनुच्छेद की आरम्भिक मान-सीमा OCR में टूट गई है। नीचे उपलब्ध नियमों को व्यवस्थित किया गया है; छूटी हुई सीमा नहीं जोड़ी गई है।
जहाँ द्रव्यों को योग में लिखे वजन में ही लेने का निर्देश हो, वहाँ द्रव और आर्द्र पदार्थों को दुगुना नहीं लेना चाहिए। किन्हीं द्रव्यों का मान प्रस्थ में लिखा हो तो शुष्क पदार्थों को लिखे हुए वजन में ही लें, पर द्रव और आर्द्र (गीले) पदार्थों को दुगुने वजन में लें।
किसी योग में द्रव्यों का वजन तुला-परिमाण में लेना लिखा हो तो द्रव, आर्द्र और शुष्क — तीनों प्रकार के द्रव्यों को समान परिमाण में लेना चाहिए। द्रव और आर्द्र को दुगुना नहीं लेना चाहिए।
सदा ताजे ग्रहण किए जाने वाले द्रव्य
वासा (अडूसा), नीम, पटोलपत्र, केवड़ा, खरेंटी, कुष्माण्ड (कुम्हड़ा), शतावरी, पुनर्नवा, कुड़े की छाल, असगन्ध, गन्धप्रसारणी, नागबला, पियाबाँसा, गुग्गुलु, हींग, हरड़, इन्द्रायनमूल, सौंफ, विदारीकन्द और अदरक को सदा ताजा (आर्द्र) ही प्रयोग में लेना चाहिए। इन्हें योग में लिखे परिमाण में ही लें; इनका परिमाण दुगुना न करें।
इनके अतिरिक्त सभी औषधियाँ सब कार्यों में नवीन और सूखी ही प्रयोग में लेनी चाहिए। कोई औषधि सूखी न मिले और उसके स्थान पर गीली औषधि लेनी पड़े तो वजन में दुगुनी लें।
पुराने ग्रहण किए जाने वाले द्रव्य
वायविडंग, पिप्पली (पीपल), गुड़, धनिया, मधु और घृत — ये द्रव्य एक वर्ष या उससे अधिक पुराने ही प्रयोग में लेने चाहिए।