आरोग्य-प्रकाशअनिद्रा-उन्माद-पागलपन तथा भूतोन्माद

अनिद्रा, उन्माद (पागलपन) तथा भूतोन्माद

6 मिनट का पाठ

वात, पित्त, कफ विकृत होकर शारीरिक रोग पैदा करते हैं, वैसे ही सत्व, रज, तम तीनों से मानसिक रोग होते हैं। इनमें सत्व से रोग नहीं होते, रज और तम की वृद्धि से मन के रोग होते हैं। मानसिक आवेशों में काम, क्रोध और लोभ तीन प्रबल आवेश हैं। इनमें एक के अत्यधिक बढ़ने से मनुष्य पागल हो जाता है। शारीरिक रोगों में वात वृद्धि में पित्तवर्धक दवा सेवन से वात वृद्धि कम हो जाती है, वैसे ही कामवासना की अधिक वृद्धि से उन्माद होने पर विपरीतधर्मी क्रोध या लोभ की वृद्धि से कामवासना शान्त होकर रोगी स्वस्थ हो जाता है। अत्यधिक क्रोध के कारण उन्माद में कामवासना या लोभ भाव वृद्धि से रोग शान्त हो जाता है। अत्यधिक लोभ के कारण उन्माद होने पर कामवासना या क्रोध भाव से रोगी को लाभ होता है।

भारतवर्ष में अज्ञानतावश भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस, पितर आदि देवता के आवेश से भी पागल जैसी हालत हो जाती है। ये सब मानसिक शक्ति की दुर्बलता से होते हैं। पाश्चात्य शिक्षा से शिक्षितों में भी भयानक मानसिक विकार देखे जाते हैं। वे देवी-देवता को नहीं मानते फिर भी मानसिक तनाव से पीड़ित होते हैं। इसमें कई पागल हो जाते हैं। मानसिक रोगी की औषधि द्वारा चिकित्सा के साथ दैवी चिकित्सा भी लाभ करती है। महाशक्ति दुर्गा का आराधन और हनुमानजी की स्तुति से रोगी को शान्ति मिलती है। मूर्ख और व्यवसायी भूत-प्रेत झाड़ने वालों से बचना चाहिए। ये लोग अवैज्ञानिक विधि से रोगियों के स्वास्थ्य और धन को नष्ट करते हैं। यह रोग शिक्षित कहे जानेवाले लोगों में भी विशेष रूप से पाया जाता है। शारीरिक परिश्रम बिल्कुल न करने तथा दिमागी काम अत्यधिक करनेवाले मनुष्य इस रोग के शिकार विशेष बनते हैं। प्रायः ३० से ५० वर्ष की अवस्था के बीच में पागलपन का रोग हो जाता है। पागलपन के रोगी को कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान नहीं रहता। रोगी खुद नहीं समझ सकता कि वह पागल है, परन्तु उसकी बातचीत से पागलपन प्रकट होता है। पागलपन के रोगी को निद्रा बिल्कुल नहीं आती। यदि कुछ समय तक नींद आती हो या आने लगे, तो शुभ लक्षण समझना चाहिए।

अत्यन्त मानसिक चिन्ता, दुःख, शोक, भय, कार्य में दिन-रात अत्यन्त लिप्त रहना, गाँजा, भाँग, शराब आदि का अधिक व्यवहार करना, अति स्त्री-प्रसंग, माथे में चोट लगना, पुराना आतशक आदि कारणों से पागलपन का रोग उत्पन्न होता है। धतूरा खाकर मरने से बचे हुए आदमी प्रायः पागल हो जाते हैं।

चिकित्सा

देखा गया है कि पूर्ण पागलपन का रोगी बहुत कठिनता से ठीक होता है। इसलिए उत्तम यही है कि रोगी को किसी उत्तम जलवायु वाले अच्छे पागलखाने में भर्ती करा दिया जाय। निम्नलिखित अवस्था में दवा का प्रयोग भी लाभ पहुँचायेगा :

दिमाग ठीक काम न करे, भूल पर भूल होती जाय, बहुत जरूरी कामों में भी भूल हो, चित्त अस्थिर, चंचलता के कारण किसी काम में जी न लगे, आलस्यभाव, नींद न आवे या बहुत कम आवे, चिन्ताओं का प्रवाह जारी रहे आदि। ऐसी अवस्थावाले नये रोगी की शुरू में चिकित्सा करना सफल हो सकता है। दवा का प्रयोग और उत्तम जलवायु के सेवन के साथ ही साथ जिस कारण से रोग उत्पन्न हो गया हो, उसे तत्काल ठीक कर देना चाहिए। अधिक दिमागी परिश्रम करने के कारण यदि पागलपन के लक्षण प्रकट होने लगे हों, तो रोगी को बिना विलम्ब उस स्थान से हटा देना चाहिए। प्रेम के कारण उन्माद हो, तो प्रेमी का सम्मिलन होना आवश्यक है। कामोन्माद होने पर कामशान्ति विधेय है। जिस कारण से रोग पैदा हो गया हो, उसे छोड़ना प्रधान कर्त्तव्य है। रोगी की सेवा में एक ऐसे चतुर आदमी का रहना जरूरी है, जो बराबर रोगी को सान्त्वना देता रहे।

(१) सारस्वत चूर्ण -- कूठ, असगन्ध, सेंधा नमक, अजमोद, सफेद जीरा, स्याह जीरा, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, पाठा और शंखपुष्पी -- इन ११ दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम और वच २२१.३६ ग्राम -- सबों का चूर्ण करके ब्राह्मी के रस की तीन भावना दें। यह चूर्ण ३ ग्राम शहद और १.५ ग्राम घी के साथ चाटने से उन्माद में बहुत फायदा होता है। शास्त्र में इसकी प्रशंसा लिखी है। जिन लड़कों की बुद्धि पढ़ने-लिखने में कमजोर होती है, वे इसके खाने से तेज दिमागवाले हो जाते हैं। -- भा० प्र०

चन्द्रावलेह -- सि० यो० सं० पेज ९९ देखें। सर्पगन्धा चूर्ण योग -- सि० यो० सं० पेज २०२ देखें।

(२) ब्राह्मी घृत -- गाय का घी ९३३ ग्राम, ब्राह्मी का रस ३.७३ किलो और वच, कूठ, शंखाहुली तीनों का कल्क २३३ ग्राम। इन सबको लोहे की कड़ाही में डालकर पकाएँ। जब घी मात्र शेष रह जाय, तब उतारकर छान लें। इसका नाम 'ब्राह्मीघृत' है। ११.६६ ग्राम यह घृत कुछ समय तक नियमित रूप से सेवन करने से उन्माद में बहुत फायदा होता है। मृगी, स्वरभंग आदि ठीक होते हैं तथा बुद्धि, मेधा और स्मृति बढ़ती है।

(३) वैद्यनाथधाम के जंगल में धनबरुआ या धवलबरुआ (सर्पगन्धा) नाम की एक जड़ी होती है। यह जड़ी बिहार और यू०पी० दोनों राज्यों के हिमालय की तराई में बहुत होती है। सर्पगन्धा इसका प्रसिद्ध नाम है। बंगाल में छोटी चाँदर के नाम से यह मशहूर है। इस जड़ी का चूर्ण ३ ग्राम ५८.३२ ग्राम गुलाबजल में दिन भर भिगोकर सोते समय पी जाएँ। दिमागी दोष के कारण नींद न आती हो या कम आती हो, तो उसके लिए यह सर्वोत्तम है। Potassium bromide में नींद लाने के गुण के साथ और अनेक दुर्गुण हैं, परन्तु इस जड़ी में दुर्गुण बिल्कुल नहीं हैं। यह निद्रा की निर्दोष दवा है। उन्माद के रोगी को भी नींद लाने की शक्ति इस जड़ी में देखी गई है। नींद आने से पागलपन में निश्चय ही फायदा होता है। पागलपन की इससे अच्छी दवा दूसरी नहीं है। हिस्टीरिया और न्यूरेस्थीनिया (भ्रम रोग) में भी बहुत लाभदायक है। ब्लड-प्रेशर देखकर दवा दें -- ब्लड-प्रेशर कम हो तो इसका प्रयोग न करें।

(४) ब्राह्मी की ताजी पत्तियाँ ३ ग्राम (सूखी १ ग्राम), १५ कालीमिर्च मिलाकर पीसें और जल के साथ पी जाएँ। इससे दिमाग ठीक होता है। ११.६६ ग्राम ब्राह्मी के रस में ११.६६ ग्राम शहद मिलाकर पीने से भी दिमाग दुरुस्त होता है।

(५) वच का चूर्ण १ ग्राम शहद में मिलाकर चाटें। इससे बुद्धि ठीक होगी। वच का चूर्ण अधिक खाने से कै होने का भय रहता है।

(६) बकरी का मूत्र २३.२ से ४६.४ ग्राम तक जरा-सी भूनी हींग मिलाकर पीने से उन्माद में शान्ति आती है।

(७) सिर के बाल को उस्तरे से अच्छी तरह मुँडाकर निरन्तर नारायण तेल की मालिश करें। इससे दिमाग ठीक होता है।

(८) ताजा शंखपुष्पी का रस या सूखी हुई शंखपुष्पी के चूर्ण से भी निद्रा आती है; मेधा बढ़ती है।

पथ्यापथ्य

पुष्टिकर विटामिन-प्रधान भोजन और उचित व्यायाम करना चाहिए। पहले ही लिखा जा चुका है कि रोगी के पास एक चतुर मनुष्य का रहना बहुत जरूरी है। उसका अभिप्राय यह है कि उन्माद मानसिक रोग है और उसके लिए मानसिक भोजन भी होना जरूरी है; जैसे उत्तम ज्ञान, सांसारिक अनुभव, श्रेष्ठ पुरुषों की गाथाएँ आदि सुमधुर वाक्यों का सुनाना अमृत समान है। मानस रोगों में ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि द्वारा चिकित्सा का विधान है।