गठिया वात (सन्धिवात और आमवात)
4 मिनट का पाठ
हाथ-पैर की सन्धि अथवा जोड़ों में यह रोग उत्पन्न होता है और दो-चार या प्रत्येक सन्धि में भयानक वेदना होती है। रोग आरम्भ होते ही बुखार आता है तथा जोड़ों में दर्द और फूलना आरम्भ हो जाता है। रोगी चलने-फिरने में असमर्थ हो जाता है। लाचार हो चारपाई पर पड़े रहने को बाध्य हो जाता है। रोगी रोग के कारण करवट लेने में भी महान दुःख पाता है। पैरों में विशेष कष्ट होता है। दुर्गन्धयुक्त पसीना, प्यास, कब्जियत, सिर-दर्द आदि लक्षण वर्तमान रहते हैं। कम्प देकर बुखार आता है। शुरू-शुरू में १०४-१०५ डिग्री तक बुखार हो जाता है। दो-तीन सप्ताह बाद रोग आराम होने लग जाता है। यदि ठीक चिकित्सा की जाय, तो यह रोग आराम हो जाता है; नहीं तो पुराना आकार धारण कर लेता है। रोग पुराना होने पर ज्वर चला जाता है और दर्द भी कम हो जाता है; परन्तु जोड़ों पर सूजन अधिक हो जाती है।
कारण
पानी में भीगना, ठंड लगना, भीगे वस्त्र धारण करना आदि कारणों से यह रोग उत्पन्न होता है; परन्तु गठियावात का प्रधान कारण आतशक और सूजाक का होना है। इतने दिनों की चिकित्सा में मैंने बिना आतशक और सूजाक के कारण गठियावात का होना प्रायः नहीं देखा। आतशक और सूजाक का जहर जब शरीर में फैल जाता है, तब गठिया उत्पन्न होती है। आममल संचित होते-होते जब पुराना हो जाता है तब भी आमवात हो जाता है। आमवात के रोग में शरीर के जोड़ों में तो दर्द होता ही है, विशेषता यह है कि आमवात समस्त शरीर में वेदना करता है और साथ में शोथ भी अवश्य होता है। यह वृद्धावस्था में अधिक होता है।
चिकित्सा
नूतन सन्धिवात में ज्वर आदि उपद्रवों के साथ ही चिकित्सा की जाती है। बाज़-बाज़ समय रोगी को निमोनिया भी हो जाता है। उस हालत में प्रथम निमोनिया की चिकित्सा करके फिर मूल रोग की चिकित्सा करनी चाहिए।
वातव्याधि की दवा से लाभ न होने पर रक्त शुद्ध होने की दवा का प्रयोग करना शास्त्र की आज्ञा है। अनुभव से देखा गया है कि बिना रक्त शुद्ध हुए इस रोग में लाभ नहीं होता। लेखक को दुर्भाग्यवश प्रायः ऐसे ही रोगी प्राप्त हुए हैं, जिनके शरीर में आतशक या सूजाक का विष वर्तमान था और जो आतशक और सूजाक की चिकित्सा से पूर्ण आरोग्य हो गये। ऐसे रोगियों की चिकित्सा में भी खून साफ करना आवश्यक है। बीच-बीच में जुलाब देकर रोगी का कोष्ठ शुद्ध कर देना चाहिए।
(१) अमीर रस, जो आतशक के प्रकरण में लिखा जायगा, इस रोग की रामबाण दवा है। आतशक या सूजाक के कारण उत्पन्न होने वाले गठियावात की इससे उत्तम दवा और दूसरी नहीं है। बहुत बार का परीक्षित है।
(२) उशवा और चोपचीनी का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से गठियावात में लाभ होता है। उशवा असली होना चाहिए।
सुरंजान मीठी, सोंठ, एलुआ और हरड़ की छाल -- इन ४ दवाओं का चूर्ण ४८६ से ७२९ मि.ग्रा. तक गर्म जल के साथ देने से गठिया तथा आमवात में बहुत लाभ करता है।
(३) सुरंजान शीरीं (मीठा) का चूर्ण ३ से ६ ग्राम तक गर्म पानी से देना चाहिए।
गोरख नाम का वृक्ष विन्ध्याचल-मिर्जापुर के समीप होता है, उसकी छाल का काढ़ा आमवात में बहुत लाभकारी है। बहुत परीक्षित है।
(४) योगराज गुग्गुल को रास्नादि क्वाथ के साथ बहुत दिनों तक सेवन करने से यह रोग निर्मूल हो जाता है। जो लोग बारम्बार गठियावात से दुःखी होते हैं, उनके लिए यह योग सर्वश्रेष्ठ है। इसका दो-तीन मास तक सेवन करना चाहिए।
(५) माजूम कुचला -- सि० यो० सं० पृष्ठ ११६ में देखें।
(६) घीक्वार में गेहूँ का आटा गूँधकर वटक बनाकर घी में भून लें; उसका चूर्ण बनाकर देशी खाण्ड मिलाकर ५८ ग्राम मात्रा में लें। बहुत लाभकारी है।
पथ्यापथ्य
वातव्याधि मात्र में स्निग्ध और पुष्टिकर आहार करना चाहिए। उड़द की दाल, मांस का रस, घी, तेल आदि पदार्थ लाभदायक हैं। चावल आदि वायुवर्धक चीजें खाने से नुकसान होता है। ज्वर आदि उपद्रव होने पर दूध आदि हल्का पथ्य विधेय है।