आरोग्य-प्रकाशहिस्टीरिया

हिस्टीरिया (Hysteria)

7 मिनट का पाठ

यह रोग कोमल स्वभाववाली स्त्रियों को प्रायः होता है। पुरुष स्वभावतः ही कठिन स्वभाव के होते हैं। परन्तु पुरुषों में भी कोई-कोई कोमल स्वभाव के होते हैं। कोमल स्वभाववाले पुरुष को भी हिस्टीरिया रोग का होना सम्भव है।

यह रोग प्रायः उन जवान लड़कियों को होता है, जिनके मन में पूर्ण विश्वास होता है कि हमारी रक्षा करनेवाले या सहानुभूति रखनेवाले अवश्य हैं। यदि हिस्टीरिया वाले रोगी के मन में यह विश्वास बैठ जाय कि उसकी रक्षा करनेवाला या सहानुभूति रखनेवाला जब कोई नहीं है, तो यह रोग तत्क्षण जाता रहे।

जिन जवान स्त्रियों की संभोग-इच्छा तृप्त नहीं होती, उनको ही अधिकतर हिस्टीरिया होती है। इसके अलावा चिन्ता, शोक, भय, पारिवारिक कष्ट, आकस्मिक मानसिक आघात, गर्भाशयमूलक रोग, मासिक धर्म की गड़बड़ी, अजीर्ण आदि कारणों से भी यह रोग पैदा हो जाता है। कहीं-कहीं पति-विद्वेष के कारण भी हिस्टीरिया होती देखी गई है।

लक्षण

हिस्टीरिया रोग का खास ऐसा कोई निश्चित लक्षण नहीं है, जिससे रोग की पहचान बिना संदेह हो सके। किसी रोगी को कोई लक्षण होता है, तो किसी को कोई। एक रोगी में जो लक्षण होते हैं, वे दूसरे में बिल्कुल भिन्न प्रकार के होते हैं। संक्षेप में यह कहा जाय, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिस्टीरिया में किसी भी रोग के लक्षण हो सकते हैं, लेकिन वास्तव में कोई रोग नहीं होता। आज के मनोवैज्ञानिक इस रोग को रोगी द्वारा झूठे ही पैदा हुआ मानते हैं।

हिस्टीरिया का दिमाग से घनिष्ठ सम्बन्ध है। दिमाग अधिक परेशान हुआ, तो रोग प्रबल रूप से प्रकट होगा और दिमाग की परेशानी मामूली हुई तो रोग भी मामूली हालत में होगा। इसलिए रोग परीक्षा करते समय दिमाग पर खास दृष्टि रखनी चाहिए। जो मनुष्य मानसिक स्थिति को अच्छी तरह समझता है, वही इस रोग की परीक्षा और चिकित्सा करने का अधिकारी है। हिस्टीरिया में किसी भी इन्द्रिय में विकार पैदा हो सकता है। परन्तु रोग आराम होते ही उस इन्द्रिय-विकार का कुछ भी प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। दिमाग ज्ञान और चेतना का केन्द्र है। दिमाग की गड़बड़ी के कारण ही ज्ञानेन्द्रियों में गड़बड़ी पैदा होती है। इसी कारण हिस्टीरिया-रोग में देखने, सूँघने, सुनने, बोलने या छूने में विकार पैदा हो जाता है। किसी हिस्टीरिया रोग में बगल की दृष्टि मारी जाती है, तो किसी में सामने देखने की दृष्टि में फर्क हो जाता है। कोई ऊँचा सुनने लगता है, तो कोई बिलकुल ही नहीं सुनता। किसी के बोलने में फर्क हो जाता है, तो किसी की बोली ही बंद हो जाती है। किसी को छूने की शक्ति मारी जाने के कारण चींटी काटने या सुई चुभाने पर भी कुछ मालूम नहीं देता। किसी रोगी की घ्राण-शक्ति मारी जाती है और किसी रोगी की स्वाद-शक्ति लोप हो जाती है। स्नायुमण्डल के विकार के कारण किसी-किसी रोगी में लकवा के लक्षण भी पैदा हो जाते हैं।

हिस्टीरिया में अक्सर वैसे लक्षण पैदा होते हैं, जिनको रोगी ने तन्दुरुस्त हालत में अधिकतर देखा या सुना है। हिस्टीरिया के लक्षण रोगानुसार नहीं, बल्कि रोगी की इच्छानुसार होते हैं। रोगी की मानसिक स्थिति की रोग के लक्षणों में प्रधानता होती है। रोगी की मानसिक स्थिति ठीक होते ही सब लक्षण जाते रहते हैं, उनका कुछ भी प्रभाव शरीर पर नहीं देखा जाता।

हिस्टीरिया का प्रधान लक्षण मूर्च्छा या बेहोशी का दौरा है। यह दौरा २४ घण्टे से लेकर ४८ घण्टे तक निरन्तर होता देखा गया है। बहुत-से रोगियों में बार-बार और जल्दी-जल्दी दौरा होता है। ऐसी अवस्था में होश आते ही कुछ समय के बाद रोगी फिर मूर्च्छित हो जाता है। बेहोशी की हालत में रोगी के दाँत बैठ जाते हैं और शरीर अकड़ जाता है। रोगी हाथ-पैर पटकता है और कभी-कभी मृगी रोग की तरह मुँह से फेन भी आ जाता है। परन्तु हिस्टीरिया रोग में मृगी-रोग की तरह शरीर का नीलापन या आँखों की पुतली नहीं फिरती। मृगी-रोग की तरह इस रोग में एकदम अज्ञानावस्था नहीं होती, रोगी को दौरे की अवस्था में भी कुछ-न-कुछ ज्ञान बना ही रहता है। बेचैनी, चित्तभ्रम, घबराहट, अनिद्रा आदि मानसिक अशान्ति के लक्षण भी होते हैं। मूर्च्छा हिस्टीरिया का निश्चित लक्षण नहीं है, बहुत-से हिस्टीरिया के रोगियों को मूर्च्छा नहीं होती।

चिकित्सा

जैसा कि रोग के लक्षण में कहा गया है कि यह रोग कोमल स्वभाव के मनुष्यों को ही होता है, इसलिए रोगी का दृढ़ संकल्पशील बनना ही इसकी प्रधान चिकित्सा है। रोगी जिस संरक्षक पर निर्भर करता हो, उसके संरक्षण से हटाकर दूसरे के संरक्षण में दे देना उचित है।

बहुत सावधानी से रोगी के मन में यह विश्वास दिला देना चाहिए कि रोगी को खुद ही अपनी देखभाल करनी होगी, संरक्षक कोई नहीं है।

बड़े घरों के बाल-बच्चों का लालन-पालन अत्यन्त रखवाली के साथ नौकर लोग करते हैं, जिससे वे बड़े होने पर भी स्वावलम्बी न होकर परावलम्बी ही बने रहते हैं। इस प्रकार के लोग जरा-सी विपत्ति आ जाने पर बेहद घबराकर इस रोग के जाल में फँस जाते हैं। इनकी दशा बड़ी दयनीय हो जाती है। इन पर क्रोध न करके दयापूर्वक उपचार करना विधेय है। एक ऐसे चतुर उपचारक की इस रोग में आवश्यकता है, जो प्रेमपूर्वक रोगी के स्वभाव को दृढ़ स्वभाववाला बनाए। अनुभवी वैद्य की ही चिकित्सा होनी चाहिए; क्योंकि इस रोग में दवा से अधिक वैद्य का विश्वास लाभ करता है। रोग का मूल कारण जानकर चिकित्सा होनी चाहिए।

कामवासना की अतृप्ति से रोग हुआ हो, तो उसकी पूर्ति का प्रबन्ध करना विधेय है। मन्दाग्नि के कारण रोग हुआ हो, तो उसकी चिकित्सा होनी चाहिए। मूल कारण पर ध्यान रखकर चिकित्सा करने से अवश्य सफलता मिलती है।

खाने के लिए अश्वगन्धारिष्ट, दशमूलारिष्ट, सारस्वतारिष्ट, चिन्तामणि चतुर्मुख रस, लीलाविलास रस, ब्राह्मी घृत, मकरध्वज, स्वर्णभस्म, मोती पिष्टी, लौहभस्म आदि अवस्थानुसार देना चाहिए।

मूर्च्छा के समय मूर्च्छा रोग में लिखा उपचार करना चाहिए। उससे लाभ न हो, तो रोगी को छोड़कर सब लोगों को वहाँ से हट जाना चाहिए। इससे बहुत जल्द रोगी अपने-आप होश में आ जायगा।

(१) हिस्टीरिया-नाशक अनुभूत योग -- मकरध्वज, कस्तूरी और शुद्ध मनःशिला -- तीनों समभाग लेकर पान के रस में घोंटकर गोला-सा बनाकर सुखा लेना चाहिए। फिर एरण्ड के पत्तों में लपेटकर धान के ढेर में १५ दिन दबाकर रखना चाहिए। इसकी १२१.५० मि.ग्रा. खुराक शहद के साथ रोगी को चटा देनी चाहिए। यह हिस्टीरिया रोग में बहुत फायदा करता है।

(२) अपतन्त्रकारी बटी -- घी में सेंकी हुई हींग, कपूर, गाँजा प्रत्येक ११.६६ ग्राम, खुरासानी अजवायन के बीज या पत्ती २३.२ ग्राम, तगर (यूनानी असारून) २३.२ ग्राम -- सबको बारीक चूर्ण कर जटामांसी के फाण्ट के साथ घोंटें। फिर २३२ मि.ग्रा. की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। यह हिस्टीरिया-रोग की सबसे अच्छी दवा है। इसकी १-२ गोली दिन में दो-तीन बार आवश्यकतानुसार मांस्यादि काढ़ा के साथ देने से आश्चर्यजनक लाभ होता है। -- सि० यो० सं०

मांस्यादि क्वाथ

जटामांसी ११.६६ ग्राम, असगन्ध ३ ग्राम, खुरासानी अजवायन १.५ ग्राम -- इनको जौकुट कर ११६.६४ ग्राम जल में पकाकर ४६.४ ग्राम रहने पर कपड़े से छान लें। इसी का नाम 'मांस्यादि क्वाथ' है। हिस्टीरिया, बालकों के आक्षेप तथा निद्रानाश आदि में इसको अनुपान रूप से देना अत्यन्त लाभदायक है। यकृत्-रोग में लिखित अगदक्षार भोजन के बाद देना बहुत लाभकारी है। -- सि० यो० सं०

पथ्यापथ्य

हलका और बलकारक भोजन देना चाहिए। दूध में चीनी की जगह शहद डालना लाभदायक है। दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए वीर रस-प्रधान कथा और बड़े लोगों का जीवन-चरित्र पढ़ना चाहिए। सुबह-शाम स्वच्छ हवा में भ्रमण करना चाहिए। फलों का खाना लाभदायक है।