आरोग्य-प्रकाशपक्षाघात (लकवा) रोग

पक्षाघात (लकवा) रोग

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वातव्याधि का यह महारोग मनुष्य को निकम्मा कर देता है। यह दो तरह का होता है -- स्थान-विशेष का पक्षाघात और सर्वाङ्ग का पक्षाघात। मुख का आधा भाग, कमर, मूत्राशय, पैर आदि के एक स्थान में रोग होने को स्थान-विशेष का पक्षाघात और समस्त शरीर में रोग होने पर सर्वाङ्ग का पक्षाघात कहा जाता है। किसी अंग का स्पर्श-ज्ञान-रहित और बेवश होने का नाम ही पक्षाघात है। प्रायः शरीर का ठीक आधा भाग अर्थात् एक आँख, एक नाक, एक कान और एक हाथ-पैर विवश हो जाता है। इस विवश भाग से मनुष्य अपनी इच्छानुसार कुछ भी काम नहीं ले सकता। पक्षाघात शब्द का यथार्थ मतलब भी यही है और इसी प्रकार का पक्षाघात अधिक देखने में भी आता है।

पक्षाघात का आक्रमण सहसा होता है, जिससे रोगी हठात् मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। यह मूर्च्छा बहुत प्रयत्न करने से भी जल्दी दूर नहीं होती; बहुत देर तक बनी रहती है। मूर्च्छा दूर होने पर भी रोगी की बोलने की शक्ति मारी जाती है। रोगी चुपचाप पड़ा कराहता रहता है। यह अवस्था ५ से १२ दिन तक बनी रहती है। फिर रोगी के बेवश अंगों में कुछ शक्ति का संचार होने लगता है तथा कुछ काल बाद बेवश अंगों में कुछ कार्य करने की भी शक्ति आ जाती है और इसी प्रकार की हालत में मनुष्य जीवन-यापन करता है। १५ दिन, महीना या वर्ष-दो वर्ष बाद पक्षाघात का फिर से आक्रमण होते देखा गया है। इस आक्रमण में प्रायः रोगी मर जाता है।

कारण

दिमाग को ढंकने वाली झिल्ली का प्रदाह, मेरुदण्ड की मज्जा का प्रदाह या सूख जाना, पारा, सीसा आदि का खाना, हिस्टीरिया, मूर्च्छा और मिरगी आदि रोगों को बहुकाल पर्यन्त भोगना, खास करके ब्लड प्रेशर यानी रक्त का दबाव बढ़ जाना आदि कारणों से पक्षाघात उत्पन्न होता है।

चिकित्सा

प्रथम ५-७ दिन तक किसी प्रकार की दवा न देकर रोगी को ऐसे ही रखना चाहिए। जब रोगी में कुछ शक्ति आ जाय, तब पहले जुलाब देना चाहिए। जुलाब के लिए रेंडी का तेल उचित है, दूसरा रूक्ष जुलाब ठीक नहीं रहता। फिर वातनाशक तेलों का मर्दन और वातघ्न औषधियों का सेवन कराना चाहिए। रसराज रस का सेवन और माषादि तेल का मर्दन इस रोग में अत्यन्त लाभ करता है। समयानुसार योगराज गुग्गुल, एरण्ड पाक, कुचले की गोलियाँ आदि भी दी जाती हैं।

(१) रसराज रस -- रससिन्दूर ४६.२ ग्राम, अभ्रक भस्म ११.६६ ग्राम, स्वर्ण भस्म २३.२ ग्राम, मोतीपिष्टी ५.८३ ग्राम और प्रवालपिष्टी ५.८३ ग्राम को एक जगह घीक्वार (घृतकुमारी) के रस में खरल करें। फिर लौह भस्म, चाँदी-भस्म, वंग भस्म, असगन्ध, लौंग, जावित्री, जायफल और क्षीरकाकोली (अभाव में शतावरी) -- इन आठ वस्तुओं का प्रत्येक ५.८३ ग्राम लें और मकोय के रस तथा घृतकुमारी के रस में घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। इसको दूध और चीनी के शर्बत के साथ सेवन करने से पक्षाघात, अर्दित, हनुस्तम्भ, मस्तकभ्रम आदि आराम होते हैं। यह बल-वीर्यवर्धक तथा उत्तम वाजीकरण है। -- भै० र०

(२) निरामिष महामाष तेल -- तिल का तेल ३.७३ किलो को खूब औंटाकर संस्कार कर लें। फिर असगन्ध, कपूरकचरी (शठी), देवदारु, खरेटी (बला), रास्ना, प्रसारणी, कूठ, फालसा, भारङ्गी, कुम्हड़ा, भुईकुम्हड़ा, पुनर्नवा, बिजौरा नीम्बू, जौ, स्याह जीरा, हींग, सौंफ, शतावरी, गोखरू, पीपलामूल, चित्रक, सेंधा नमक और जीवनीयगण -- इन सब दवाओं को समभाग मिलाकर ९३३ ग्राम का कल्क करके तैल में डालें। ७.४७ किलो दशमूल को ६० किलो जल में पकाएँ। जब १५ किलो जल शेष रह जाय तब उक्त तैल में डालकर पकाएँ। फिर बढ़िया माष (उड़द) ७.४७ किलो को ६० किलो जल में औंटाएँ और जब १५ किलो जल शेष रहे तब तैल में डालकर पकाएँ। इसी प्रकार १५ किलो दूध भी तैल में डालकर पकाएँ। पकते-पकते जब तैलमात्र शेष रह जाय, तब गर्मागर्म ही छानकर बोतलों में भर दें। बहुत-से वैद्य तैल को ठंडा होने पर छानते हैं, परन्तु ऐसा होने पर तैल बहुत-सा कल्क में ही रह जाता है। यह 'महामाष तेल' -- पक्षाघात, हनुस्तम्भ, अर्दित, अपतन्त्रक आदि कठिन रोगों में लाभ पहुँचाता है। इस तेल में अंगों को सजीव करने की अद्भुत शक्ति है। निरन्तर बहुत दिन मर्दन होना चाहिए। कठिन वात-रोग में भी यह फायदा करता है। -- भै० र०

(३) कल्याणावलेह -- हल्दी, वच, कूठ, पीपल, सोंठ, अजमोद, स्याह जीरा, मुलैठी और सेंधा नमक -- इन ९ दवाओं का चूर्ण ६ ग्राम घी में मिलाकर चाटने से पक्षाघात के कारण जो बोलने में तोतलापन (तुतलाहट) होता है, वह अच्छा हो जाता है। हमने इसका बहुत प्रयोग किया है। यह कभी लाभ करता है और कभी नहीं। इसका सेवन गाने वालों की आवाज में भी मधुरता लाता है। नारायण तेल, प्रसारणी तेल आदि भी इस रोग में लाभ पहुँचाते हैं।

(४) खञ्जनकारि रस -- सि० यो० सं० पृष्ठ १०९ में देखें।