आरोग्य-प्रकाशसूतिका रोग

सूतिका रोग

5 मिनट का पाठ

बच्चा होने के बाद कई स्त्रियों को सूतिका रोग हो जाता है। इसमें हाथ-पैरों में जलन, आँखों में जलन, ज्वरभाव, मन्दाग्नि, दुर्बलता आदि लक्षण प्रकट होते हैं। इसके लिए २४३ मि.ग्रा. स्वर्ण वसन्तमालती दशमूल के काढ़े के साथ सेवन कराएँ, निश्चय ही फायदा होगा। नीचे लिखी सौभाग्य वटी भी लाभदायक है।

चिकित्सा

(१) प्रतापलंकेश्वर रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष (वत्सनाभ) — प्रत्येक ११.६६ ग्राम, कालीमिर्च ३५ ग्राम, अभ्रक भस्म ११.६६ ग्राम, लौह भस्म ४६.४ ग्राम, शंख भस्म ९३ ग्राम, जंगली उपलों (कंडों) की भस्म १८६.६ ग्राम — सबको महीन पीसकर जल से २४३ से ३६४ मि.ग्रा. प्रमाण की वटी बना लें या चूर्ण ही रखें। दिन में २-३ बार अदरक का रस और शहद या तुलसी-रस और शहद के साथ देने से यह प्रसूता के सब प्रकार के ज्वर, उन्माद, खाँसी, सिरदर्द, वमन, अफारा, धनुर्वात, शूल, अतिसार आदि उपद्रवों को अतिशीघ्र नष्ट करता है। गर्भाशय में रुके हुए दोष इसके सेवन से दूर होते हैं। प्रसूता की यह सर्वोत्तम दवा है। — यो० र०

(२) बिहारी सौभाग्य वटी -- शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध सिंगिया विष, लौंग, त्रिकटु, कूठ, नागरमोथा, भुनी हुई हींग, बड़ी इलायची, जायफल, कायफल, त्रिफला, जीरा, काला जीरा, सज्जीक्षार, यवक्षार, सेंधा नमक, काला नमक, सांभर नमक, समुद्र नमक और सौवर्चल नमक — इन २७ दवाओं को समभाग लेकर पहले पारा और गन्धक की कज्जली करके फिर शेष २५ दवाओं का चूर्ण मिलाकर निर्गुण्डी, गमा, अपामार्ग, अदरक और पान के रस की एक-एक भावना देकर चने के बराबर गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ स्त्री-रोग में लाभदायक हैं; विशेष करके प्रसूत-रोग में दशमूल काढ़े के साथ सेवन करने से अत्यन्त लाभ पहुँचाती हैं। सौभाग्य वटी का यह शास्त्रोक्त नुस्खा नहीं है (शास्त्रोक्त सौभाग्य वटी सन्निपात में दी जाती है); यह बिहार प्रान्त में प्रचलित सौभाग्य वटी का नुस्खा है।

(३) दशमूलारिष्ट -- शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, गोखरू, बेल, गनियार (अरणी), सोनापाठा, गम्भारी, पाढ़र (पाटला) — इनकी जड़ प्रत्येक २९१.३२ ग्राम; चित्रकमूल, पुष्करमूल — प्रत्येक १४६ ग्राम; लोध्र, गिलोय १.१७ किलो, आँवला ९३३ ग्राम, जवासा ७०० ग्राम; खदिरसार, विजयसार, हरड़ — प्रत्येक ४६७ ग्राम; कूठ, मजीठ, देवदारु, वायविडंग, मुलेठी, भारंगी, कैथ का गूदा, बहेड़ा, पुनर्नवा (साँठी), चव्य, जटामांसी, प्रियंगु के फूल, सारिवा (अनन्तमूल), काला जीरा, निशोथ, रेणुका, रास्ना, पीपल, सुपारी, कचूर, हल्दी, सोआ या सौंफ, पद्मकाष्ठ, नागकेशर, नागरमोथा, इन्द्रजौ, काकड़ासिंगी, जीवक, ऋषभक (अभाव में विदारीकन्द), मेदा, महामेदा (अभाव में शतावर), काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में असगन्ध), ऋद्धि, वृद्धि (अभाव में वाराहीकन्द) — प्रत्येक ११६.६४ ग्राम लेकर जौकुटकर आठ गुने जल में पकावें। चौथाई जल शेष रहने पर छान लें।

इसके बाद ३.७३ किलो मुनक्का को चौगुने जल में पकाकर तीन-चौथाई भाग शेष रहने पर छान लें। उपर्युक्त दोनों क्वाथों को एकत्र कर उसमें शहद १.८७ किलो, गुड़ २३.३३ किलो, धाय के फूल १.७५ किलो; कंकोल, सुगन्धवाला, सफेद चन्दन, जायफल, लवंग, दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपात, नागकेशर, पीपल — प्रत्येक ११६.६४ ग्राम; कस्तूरी ५ ग्राम (३.७५ ग्राम — कस्तूरी दवा छानने के बाद कपड़े की पोटली में बाँधकर या रेक्टीफाइड स्पिरिट मिलाकर डालनी चाहिए) — इन सब द्रव्यों को क्वाथ में मिलाकर मिट्टी या सीमेण्ट के बने हुए अच्छे पात्र में यथाविधि सन्धान करें। एक महीने बाद छानकर प्रयोग में लावें। यह प्रसूत, संग्रहणी, अरुचि, कास, श्वास, क्षय, वात रोग, मन्दाग्नि आदि की उत्तम दवा है। स्त्रियों के बच्चा पैदा होने के बाद इस अरिष्ट का सेवन करने से प्रसव-जन्य उपद्रव नष्ट होकर तेज, बल और वीर्य की वृद्धि होती है। यह कृश मनुष्यों को भी पुष्ट और बलवान बनाता है। — भै० र०

(४) सुपारी पाक -- सुपारी ४६७ ग्राम, घृत ४६७ ग्राम, मिश्री या चीनी २.९२ किलो, दूध ५.६ किलो, आँवला, शतावर ४६७ ग्राम; नागकेशर, नागरमोथा, सफेद चन्दन, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, आँवला, चिरौंजी, कुटज-छाल, लज्जालु, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, सफेद जीरा, स्याह जीरा, सिंघाड़ा, वंशलोचन, जावित्री, जायफल, लौंग, धनिया, बड़ी इलायची के दाने — प्रत्येक का महीन चूर्ण १४.६६ ग्राम लें।

बनाने की विधि -- सुपारी को बारीक कपड़छान चूर्ण करके अथवा दूध में पीसकर बाद में दूध में डालकर पकावें। जब खोआ के सदृश गाढ़ा हो जाय तब घी में भून लें। बाद में अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिला लें। चीनी की चाशनी बनाकर उसमें उपर्युक्त द्रव्य मिलाकर पाक बना लें। इसको नित्य प्रति २३.२ ग्राम से ४६.४ ग्राम तक अवस्थानुसार सेवन करने से प्रमेह, जीर्ण ज्वर, अम्लपित्त, खून का गिरना, मन्दाग्नि, प्रदर आदि रोग समूल नष्ट होते हैं। यह अग्नि, बल, वीर्य तथा कांतिवर्द्धक है। यह स्त्रियों के लिए बहुत उत्तम पुष्टई है। इसके सेवन से प्रदर आदि रोग नष्ट होकर गर्भ की प्राप्ति होती है। दुबली-पतली स्त्रियाँ इसके सेवन से हृष्ट-पुष्ट हो जाती हैं।

(५) फल घृत -- मजीठ, मुलेठी, कूठ, हर्रे, बहेड़ा, आँवला, चोबचीनी, अजवायन, हल्दी, दारूहल्दी, घी में सेंकी हुई हींग, कुटकी, नीलोत्पल, श्वेत कमल, लाल चन्दन, सफेद चन्दन, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुनक्का, असगन्ध, खरेटी, लाख — प्रत्येक ११.६६ ग्राम (काकोली, क्षीरकाकोली दो बार आने से २३.२ ग्राम लें)। सबको कूट-छानकर चूर्ण बना जल के साथ पीसकर कल्क बना लें। गाय का घी १.१७ किलो, शतावरी का स्वरस तथा गाय का दूध ५.७२ किलो डालकर पकावें। जब घी मात्र शेष रहे तब छानकर बोतल में भरकर रख दें।

मात्रा -- ५.८३ से ११.६६ ग्राम तक मिश्री मिलाकर दें। ऊपर से गाय का दूध पिलावें।

गुण -- जिस स्त्री का बार-बार गर्भ गिरता हो, अल्पायु सन्तान होती हो, सन्तान न होती हो, लड़की-ही-लड़की होती हो, रजोदोष हो, उन सबमें लाभ होता है।

नोट -- इसमें लक्ष्मणा-मूल डालने से विशेष लाभ होता है। जीवित-वत्सा गौ का घी और दूध लेना चाहिए। लकड़ी के स्थान में जंगली उपलों (कंडों) की अग्नि से घृत-पाक करना चाहिए।

पथ्यापथ्य

स्वास्थ्यकर नियमों का पालन और पर्दे की प्रथा का उन्मूलन परम हितकारी है।