आरोग्य-प्रकाशस्त्रीरोग, प्रदर-प्रसूति-आर्तव कष्ट

स्त्री-रोग (प्रदर, प्रसूति, आर्त्तव-कष्ट)

14 मिनट का पाठ

बालिका को १३ से १८ वर्ष के भीतर मासिक धर्म होने लगता है। इस अवस्था में माहवारी न हो तो काले तिलों को कूटकर काढ़ा बनावें, उसमें गुड़ डालकर पीवें; या काला तिल, लिसोड़ा और कलौंजी का काढ़ा गुड़ डालकर पीवें तो मासिक धर्म होने लगता है। कभी-कभी युवावस्था में भी माहवारी बन्द हो जाती है। उसमें ऊपर वाली दवा दें। योगरत्नाकर-कार ने प्रथम श्लोक में ही लिखा है — मासिक न होता हो तो प्रतिदिन मछली खानी चाहिए। कांजी, तिल, उड़द, मट्ठा तथा दही का सेवन करना चाहिए। शरीर में रक्ताल्पता होने से मासिक धर्म नहीं होता। उसमें ऊपर लिखे भोजन के अलावा नवायस लौह या नवायस मण्डूर प्रतिदिन ६ ग्राम देने से लाभ होता है। शारीरिक परिश्रम कम करनेवाली स्त्रियों को माहवारी में दर्द होता है। इस कष्टार्तव में ११.६६ ग्राम अशोक की छाल ११६.६४ या २३३ ग्राम दूध में समभाग पानी मिलाकर औंटावें; जब दूध मात्र रह जाय तो छानकर पीवें। इससे मासिक धर्म सम्बन्धी सभी शिकायतें ठीक हो जाती हैं।

जल्दी-जल्दी या अधिक सन्तान होने से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर होता है। इसलिए २ या ३ सन्तान के बाद ब्रह्मचर्य से रहना सर्वश्रेष्ठ है। यदि वर्तमान कामुक वातावरण में ब्रह्मचर्य से रहना संभव न हो तो परिवार नियोजन केन्द्र में जाकर यथार्थ परामर्श से गृहस्थी चलानी चाहिए। गर्भ निवारण के लिए आयुर्वेद में बहुत दवाएँ हैं। उनमें सरल योग यह है कि संभोग से पूर्व सेंधा नमक का टुकड़ा सरसों के तेल से भिगोकर जनन मार्ग में रख लें तो शुक्राणु नष्ट हो जाते हैं, कोई विकृति नहीं होती। वर्तमान समय में जनसंख्या की वृद्धि से राष्ट्र की उन्नति में भयानक बाधाएँ उपस्थित हैं। सन्तान दुर्बल, रोगी और निस्तेज होने का प्रधान कारण पुष्टिकर भोजन का अभाव है। सब तरह से सन्तति-निग्रह अत्यावश्यक हो गया है।

किसी को उचित उम्र में भी सन्तान न हो तो असगन्ध का क्षीरपाक पीने से सन्तान हो जाती है। लक्ष्मणा वनस्पति के मूल के सेवन से भी संतान होती है। पुत्र न होकर कन्या ही कन्या हो तो फलघृत का सेवन करना बहुत अच्छा है। स्त्री-पुरुष दोनों को लेना चाहिए।

गर्भावस्था में वमन होने की बीमारी बहुत कष्ट देती है। वमन रोगों में लिखी दवा से लाभ न हो तो सुदर्शन चूर्ण या कुटज-छाल ११.६६ ग्राम को चाय की तरह फाण्ट बनाकर एक-एक चम्मच लें। ये दोनों दवाएँ बहुत कड़वी हैं — खाने में बहुत खराब लगने पर भी गर्भावस्था का वमन बन्द कर देती हैं। मीठी दवाओं में द्राक्षारिष्ट का ११.६६ ग्राम की मात्रा में भोजनोपरान्त सेवन रामबाण दवा है। गर्भावस्था में कभी-कभी रक्त गिरने लगता है, उसमें पूर्ण विश्राम के साथ रक्तपित्त या रक्तप्रदर की दवा से लाभ हो जाता है। बार-बार गर्भपात होता हो तो रक्त परीक्षण कराना चाहिए। रक्त में उपदंश के कीटाणु पाए जाएँ तो उपदंश की चिकित्सा से तथा रक्तशोधक दवा से लाभ हो जाता है। प्रसव के लिए जो बन्द मकान चुना जाता है वह माता और सन्तान के लिए हानिप्रद है; प्रसवगृह हवादार तो हो लेकिन अस्पताल जैसा खुला न हो। प्राचीन आयुर्वेद में लिखा प्रसवगृह हो — स्वच्छ हो, प्रसूता पर सीधा हवा का झोंका न लगे। उसमें अग्नि जलाकर धुआँ करते हैं, यह भी अच्छा नहीं है। प्रथम प्रसव में नगरवासी महिलाओं को प्रसव के समय बहुत कष्ट होता है। पीपलामूल, दालचीनी और सिनकोना — समभाग लेकर ३६४ मि.ग्रा. चूर्ण की पुड़िया ३-३ घण्टे से देने से शीघ्र प्रसव हो जाता है; सिनकोना से ही कुनैन बनता है, इसलिए सिनकोना न मिले तो कुनैन भी डाल सकते हैं। मूढ़गर्भ हो तो अस्पताल ले जाना उचित है। घर में ही प्रसव हो तो होशियार दाई से प्रसव करावें। नाल काटने के शस्त्र को गर्म पानी में खूब उबालकर स्वच्छ हाथ की सहायता से नाल काटें। जरा-सी भी गन्दगी माता के प्राण ले लेती है। प्रसव के बाद माता को पूर्ण विश्राम करना चाहिए, २४ घण्टे तो लेटे ही रहना चाहिए। प्रसवोत्तर आँवल (अपरा) गिरने के बाद अर्गट (ERGOT) १.२२ से २.४३ ग्राम तक फाण्ट बनाकर देने से रक्तस्राव नहीं होता, गर्भाशय पूर्व स्थिति में आ जाता है। अर्गट गेहूँ, मकई, ज्वार आदि अन्न में होने वाला एक प्रकार का रोग (कवक/फंगस) है। १२.५ से २५ मि.मी. लम्बा, ललाई लिए भूरे रंग का, कुछ वक्र, साधारण त्रिकोण, विशेष दुर्गन्धयुक्त, कड़वा, अप्रिय स्वाद वाला होता है। अंग्रेजी दवा बेचने वालों के यहाँ मिलता है। (द्रव्यगुण विज्ञान, यादवजी)। प्रसव के बाद खाने के लिए केवल दूध दें, दूध न मिले तो हल्का भोजन दें। साथ में दशमूल का काढ़ा अवश्य पिलावें जिससे प्रसूत रोग होने का डर नहीं होता। कुछ समय बाद सौंठ-पाक या सोंठ का मोदक, अजवायन या गोंद का मोदक दें। इससे माता को पूर्ण स्वास्थ्य लाभ होता है। प्रसव अवस्था में अनियमितता होने से प्रसूत रोग (सूतिका रोग) हो जाता है, जिसमें मन्द ज्वर, हाथ-पैर की जलन, खाँसी, रक्ताल्पता, दस्त, मूर्च्छा आदि होते हैं। इसके लिए स्वर्णवसन्तमालती १२१.५० मि.ग्रा., सितोपलादि चूर्ण ३ ग्राम को मधु के साथ दें तथा दशमूलारिष्ट या दशमूल का काढ़ा दें; प्रतापलङ्केश्वर भी इसकी उत्तम दवा है।

स्त्रियों का प्रधान रोग प्रदर है। योनिमार्ग से लाल या सफेद पानी जैसा पदार्थ बराबर गिरता रहता है, इससे स्वास्थ्य और सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। रक्तप्रदर की दवाएँ आगे लिखी जाती हैं; श्वेत-प्रदर में प्रमेह की दवाओं से लाभ होता है। चन्द्रप्रभा वटी का सेवन गिलोय या हल्दी के स्वरस से किया जाय तो शीघ्र लाभ होता है। प्रदर रोग अत्यधिक उग्र हो तो वट, पीपल, गूलर, पाकर की अन्तश्छाल के क्वाथ से उत्तरबस्ति देकर जात्यादि तेल का पिचु (रुई का फोहा) रखने से लाभ होता है। सख्त परदा-प्रथा तथा अस्वच्छता के कारण स्त्रियों को ये रोग पैदा होते हैं।

मासिक धर्म का ठीक नियमानुसार न होना ही स्त्रियों का प्रधान रोग है। मासिक धर्म प्रायः १३ वर्ष की अवस्था से आरम्भ होकर ५० वर्ष की अवस्था तक ठीक प्रति महीने ३ से ५ दिन तक होता है। स्त्री के गर्भवती होने से यह बन्द हो जाता है। कितनी ही स्त्रियों को बालक पैदा होने पर फिर सिर्फ गर्भधारण के लिए ही मासिक धर्म होता है। मासिक धर्म का रुकना या बड़े कष्ट के साथ होना, दो-तीन महीने में होना या १५-२० दिन में ही होना, अधिक रक्त गिरना या कम रक्त गिरना आदि उपद्रव होने से स्त्रियों का स्वास्थ्य गिर जाता है और अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मासिक धर्म नियमित रूप से न होना खुद ही एक बहुत बड़ी बीमारी है। फिर श्वेत या रक्त प्रदर का होना निश्चित है। किसी को प्रदर रोग होने के बाद मासिक धर्म में गड़बड़ी हो जाती है और किसी को मासिक धर्म की अनियमितता के बाद प्रदर रोग हो जाता है।

स्त्री के लिए प्रदर की बीमारी बहुत खराब बीमारी है, क्योंकि वह जल्द अच्छी नहीं होती। प्रदर रोग में स्त्री की योनि से रात-दिन सफेद या लाल रंग का लसदार जल गिरता रहता है। योनि सदा आर्द्र रहती है। प्रदर होने पर स्वास्थ्य और सौन्दर्य बहुत शीघ्र नष्ट हो जाता है, शरीर में खून कम हो जाता है एवं अजीर्ण, कब्जियत, सिरदर्द, ज्वर आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रायः शहर में रहने वाली और अमीर घर की स्त्रियों को स्त्री-रोग बहुत होते हैं। आलस्य में दिन भर निकम्मे बैठना होता है, इससे अनेक रोग शीघ्र उत्पन्न हो जाते हैं। पर्दे के भीतर स्त्रियों को बन्द रखने की प्रथा तो इतनी निन्दनीय है कि वह लिखी नहीं जा सकती। सख्त पर्दे के रिवाज वाले कुटुम्बों में जब रोगी स्त्री को देखने का अवसर आता है, तब उस दयनीय दशा को देखकर रोमांच हो जाता है। बाहर भ्रमण का शरीर पर कैसा उत्तम प्रभाव पड़ता है इसका उदाहरण कलकत्ते में नियमित गंगा स्नान करने वाली स्त्रियों से दिया जा सकता है। जो नित्य प्रातःकाल गंगा स्नान करती हैं, उनका एक-दो मील का भ्रमण अनायास ही हो जाता है। ऐसी स्त्रियाँ अवस्था में अधिक होने पर भी नीरोग और बलवती होती हैं। इसलिए शुद्ध हवा में भ्रमण, कपड़े धोना, खाना बनाना, चरखा कातना, घर साफ रखना आदि काम प्रत्येक बुद्धिमती स्त्री को करना चाहिए। पर्दे की प्रथा के विरुद्ध कार्य करना प्रत्येक भारतवासी का बड़ा ही पुनीत कर्म होगा। इससे लाखों बहनों का जीवन नरक से स्वर्ग तुल्य हो जायगा।

चिकित्सा

मासिक धर्म के समय अधिक खून गिरने पर रक्तप्रदर की तरह या खूनी बवासीर की तरह चिकित्सा करनी चाहिए। अड़ूसे का स्वरस या कुड़े (कुटज) की छाल का काढ़ा पिलाने से खून गिरना बन्द हो जाता है। अशोक छाल २३.२ ग्राम, ४६७ ग्राम दूध और ४६७ ग्राम जल में डालकर औंटाएँ। जब दूध मात्र बाकी रह जाय, तब उचित मात्रा में पिलाएँ। इससे रक्तप्रदर में शान्ति होगी। शरीर में रक्त कम होने पर, गर्भाशय का मुँह बन्द होने पर अथवा स्त्री का शरीर अधिक मोटा होने से मासिक धर्म बिल्कुल बन्द हो जाता है। शरीर दुर्बल होने पर शारीरिक रक्तवृद्धि की दवा और पुष्टिकारक भोजन देना विधेय है। गर्भाशय का मुख बन्द होने पर शल्य-चिकित्सा का विधान है। शरीर अति स्थूल होने पर परिश्रम, उपवास आदि करना तथा त्रिफला का सेवन करना लाभकारी है। बाँस के पत्ते ११६.६४ ग्राम और सोआ (सौंफ का भेद) ११६.६४ ग्राम को २.८ किलो पानी में औंटाएँ। ७०० ग्राम पानी शेष रहने पर छानकर ११६.६४ ग्राम पुराना गुड़ मिला दें। ऋतु के समय २९ ग्राम करके दिन में ४ बार पिलावें। इससे रुका हुआ मासिक धर्म जारी हो जाता है। अधिक न पिलावें, नहीं तो ज्यादा खून गिरने लगेगा। त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) ३ ग्राम और भारंगी ३ ग्राम — इनका काढ़ा पुराना गुड़ मिलाकर पिलाने से भी मासिक धर्म फिर होने लगता है। श्वेत या रक्त-प्रदर में दवा सेवन के साथ जननेन्द्रिय को धोने का प्रबन्ध जरूर होना चाहिए। दवा सेवन के साथ-साथ योनि को दो बार या एक बार प्रतिदिन धोने से निश्चय फायदा होता है। त्रिफला का काढ़ा या डिटोल, वट, पीपल, गूलर, पाकर इनकी अन्तश्छाल का काढ़ा बनाकर डूस (पिचकारी) की सहायता से धोना बहुत लाभकारी है।

(१) दार्व्यादि क्वाथ -- दारूहल्दी, रसोत, अडूसे की जड़ की छाल, मोथा, चिरायता, बेलगिरी, भिलावा (यदि भिलावा रोगी को सहन न हो तो लाल चन्दन) और कमल — इन आठ दवाओं का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से श्वेत और रक्त प्रदर रोग नष्ट होता है।

(२) पुष्यानुग चूर्ण -- पाठा, जामुन की गुठली की गिरी, आम की गुठली की गिरी, पाषाणभेद, रसोत, अम्बष्ठा, मोचरस, मजीठ, कुटज की छाल, केशर, अतीस, नागरमोथा, बेलगिरी, लोध्र, गेरू, कायफल, मिर्च, सोंठ, मुनक्का, लाल चन्दन, श्योनाक-छाल, इन्द्रजौ, अनन्तमूल, धाय के फूल, मुलेठी, अर्जुन की छाल — इन २६ दवाइयों को समभाग लेकर चूर्ण करें। १.५ से ३ ग्राम तक की मात्रा में शहद के साथ चाटकर ऊपर से चावल का धोवन पिएँ। यह प्रदर रोग, योनिशूल, खूनी दस्त और बवासीर की उत्तम परीक्षित दवा है। इस योग में अम्बष्ठा नाम की दवा सुलभ नहीं है, अतः उसके अभाव में लक्ष्मणा या श्वेत कण्टकारी मूल या पाठा लेना चाहिए। — च० सं०

(३) लाल कमल की जड़, लाल कपास की जड़, कनेर की जड़, लाल अड़हुल (गुड़हल) की जड़, मौलसरी की जड़, गन्धमार्जार, जीरा और लाल चन्दन — इन सबको चावल के पानी के संयोग से पीसकर ५.८३ ग्राम लेने से रक्तमूत्र, योनिशूल, कटिशूल और कुक्षिशूल आराम होते हैं।

(४) रजःप्रवर्तनी वटी -- शुद्ध हींग, सुहागे का लावा, हीरा कसीस, एलुवा (मुसब्बर) — इनको समभाग लेकर घृतकुमारी (ग्वारपाठा) के रस में घोंटकर ३६४.५० मि.ग्रा. के प्रमाण की गोलियाँ बना लें। इसके सेवन से मासिक धर्म की रुकावट, कष्ट से रज का गिरना, मासिक होने के समय कमर, पेडू, जंघा आदि में दर्द प्रभृति रोग निर्मूल हो जाते हैं। मासिक धर्म होने के एक सप्ताह पूर्व इस दवा का उलट कम्बल के क्वाथ के साथ प्रयोग करने से विशेष लाभ होता है। — भै० र० (वेलादि वटी और रजोदोषहरी वटी के लिए सिद्धयोग संग्रह पृष्ठ १४१ देखें।)

(५) अशोक घृत -- १.८७ किलो ताजा गो-घृत को खूब औटाएँ। फिर १.८७ किलो अशोक की छाल का ७.४७ किलो जल में काढ़ा कर १.८७ किलो जल शेष रखें। इसी प्रकार जीरा १.८७ किलो का काढ़ा १.८७ किलो, अरवा चावल का धोवन १.८७ किलो, बकरी का दूध १.८७ किलो, केशराज (भृंगराज / जलभांगरा) का रस १.८७ किलो तथा जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि, वृद्धि, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती, चिरौंजी, फालसा, रसोत, मुलेठी, अशोक की जड़, मुनक्का, शतावरी और चौलाई की जड़ — इन १८ दवाइयों में प्रत्येक ४६.४ ग्राम लेकर कल्क करें। फिर सबको एकत्र मिलाकर पकाएँ। पाक शेष होने पर ९३३ ग्राम चीनी मिला लें। ६ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक सेवन करने से प्रदर रोग निश्चय ही आराम होता है और साथ ही प्रदर-रोग-जनित विविध उपद्रव भी दूर होते हैं। परीक्षित है। — भै० र०

(६) अशोकारिष्ट -- अशोक की छाल ५.८३ किलो (एक तुला) का ६० किलो जल में काढ़ा कर १५ किलो शेष रखें। गुड़ ११.६६ किलो, धाय का फूल ९३३ ग्राम; जीरा स्याह, मोथा, सोंठ, दारूहल्दी, नीलोत्पल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, आम की गुठली, जीरा, अडूसे की जड़ की छाल और सफेद चन्दन — ये १२ दवाइयाँ प्रत्येक ५८.३२ ग्राम। सबको एक भाण्ड में डालकर एक महीना रखें। फिर छानकर बोतल में भर लें। २९ ग्राम भोजन के बाद सेवन करें। इससे रक्तप्रदर निश्चय ही आराम होता है। — भै० र०

(७) प्रदरारि लौह -- कुरैया (कुटज की छाल) ११.६ किलो को ६० किलो पानी में औटाएँ, ७.५ किलो शेष रहने पर छान लें। उस पानी को फिर जलाएँ। जब गाढ़ा हो जाय, तब मजीठ, मोचरस, पाठा, बेलगिरी, मोथा, धाय के फूल, अतीस, अभ्रक भस्म और लौह भस्म — ये ९ दवाइयाँ प्रत्येक ९३ ग्राम डालकर ३-३ ग्राम की गोलियाँ बना लें। गोली खाकर ऊपर से कुश-मूल को जल में पीसकर पी लें। इससे प्रदर, कुक्षिशूल और कटिशूल निश्चय आराम होंगे। — भै० र०

(८) प्रदरान्तक रस -- शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, वंग भस्म, रौप्य (चाँदी) भस्म, खर्पर भस्म (अभाव में यशद भस्म) एवं कपर्दक भस्म — प्रत्येक ६-६ ग्राम, लौह भस्म ३५ ग्राम। इन सबको लेकर घृतकुमारी के रस में १ दिन घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यह सब प्रकार के प्रदर रोग की उत्तम दवा है।

मात्रा -- १-१ गोली दिन में दो बार चावल के धोवन के साथ अथवा रोगानुसार अन्य अनुपान के साथ लें। — भै० र०

(९) सोमनाथ रस -- लौह भस्म २३.२ ग्राम; शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, छोटी इलायची, तेजपत्ता, हल्दी, दारूहल्दी, जामुन की गुठली, खस, गोखरू, वायविडंग, जीरा, पाठा, आँवला, अनार का छिलका, सुहागा, सफेद चन्दन, गुग्गुल, लोध्र, शाल की छाल, अर्जुन-छाल, रसोत — प्रत्येक ११.६६ ग्राम। इन सबका महीन चूर्ण करके बकरी के दूध से ४८६ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ सोमरोग, सब तरह के प्रदर, योनिशूल, बहुमूत्र आदि में लाभदायक हैं। यह सोमनाथ रस हमारा अनुभव किया हुआ है। प्रदर और बहुमूत्र में यह अच्छा लाभ करता है। — भै० र०

नोट

रक्तप्रदर में सुबह-शाम प्रदरारि लौह और भोजन के बाद अशोकारिष्ट लेना लाभदायक है या समभाग राल और लाख का चूर्ण १.५ ग्राम सुबह-शाम जल के साथ लेना उपकारी है। श्वेत प्रदर में सुबह-शाम चन्द्रप्रभा वटी और भोजन के बाद अशोकारिष्ट लेना बहुत फायदेमंद है। माजूफल और बड़ी इलायची का चूर्ण १० ग्राम चावल के धोवन से सुबह-शाम लेना भी लाभकारी है। रोगी को कब्जियत न रहनी चाहिए।