आरोग्य-प्रकाशरोगों के तीन प्रकरण

रोगों के तीन कारण

23 मिनट का पाठ

स्वास्थ्य - प्रकरण में पूर्ण स्वास्थ्य और आरोग्य के जिन लक्षणों पर हमने विचार किया, वस्तुतः उनसे उल्टी स्थिति को ही रोग कहना चाहिए । 'रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोग्यता' - - अर्थात् दोष (वात-पित्त-कफ) की विषमता ही रोग है और दोषों की साम्यावस्था ही आरोग्य है ।

आयुर्वेद - शास्त्र में जिस प्रकार पूर्ण स्वास्थ्य के तीन उपस्तंभ बताये गये हैं, उसी प्रकार रोगों के भी तीन ही आयतन (कारण) कहे गये हैं:-

'श्रीप्यायतनानि इति-हृत्य सात्म्येन्द्रियार्थसंयोग. प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति' ।

अर्थात् रोग होने के तीन मुख्य कारण हैं : ( १) इन्द्रियों का उनके विषयों से असात्म्य संयोग, (२) प्रज्ञापराध यानी बुद्धि की भूलें ओर (३) परिणाम अर्थात् काल इन्द्रियों विषयों के असात्म्य-संयोग का, वाग्भट के निम्न श्लोक में सुबोध दिग्दर्शन है :-

कालार्थंकर्मणां योगो हीनमिथ्यातिमात्रकाः ।

सम्यक् योगश्च विज्ञेयो रोगारोग्यैककारणम् ॥

काल अर्थात् ऋतुयें, वायु, दिन-रात, और दैनिक कार्यों का समय; अर्थ यानी इन्द्रियों के विषय अर्थात् इन्द्रियों के भोग्य पदार्थ; कर्म यानी कर्म इन्द्रियों की क्रियायें या शरीर, मन और वाणी की चेष्टायें-- इन तीनों के संयोग और उपयोग में न्यूनता, आधिक्य या विपरीतता, रोग का कारण हैं और तीनों का सम्यक् उपयोग-- आरोग्य का हेतु है ।

काल, अर्थ और कर्म तीनों के संयोग में परस्पर हीन, अति या विपरीत न हो, और तीनों के उपयोग में व्यावहारिक न्यूनाधिक्य या विरोधाभास न हो-- इस सहज सत्य का ध्यान रखकर स्वाभाविक आचरण करने वाला व्यक्ति सर्वथा नीरोग रहकर शतायु हो सकता है ।

उक्त श्लोक में योग शब्द का अपना विशिष्ट अर्थ है । योग की वैदिक परिभाषा 'योगः चित्तवृत्तिनिरोधः' अथवा गीता की योग-व्याख्या 'योगः कर्मसु कौशलम्' -- इन दोनों अर्थों से भिन्न यहाँ योग का अभिप्राय व्यवहार या संयोग से है ।

काल का योगायोग

काल के कई अर्थ हैं । एक तो काल परमात्मा का स्वरूप है । वह एक परात्पर शक्ति है । अर्थ और कर्म में उस परमात्मस्वरूप काल से असंयोग करने वाला अथवा काल के अर्थ के विपरीत कार्य करने वाला या हीन और अति करने वाला व्यक्ति नीरोग नहीं रह सकता ।

इसके अतिरिक्त रोगारोग्य के उपरोक्त साधन में काल से मुख्यतः चार अभिप्राय हैं । (१) ग्रीष्म; वर्षा और शीत आदि ऋतुकाल, (२) बाल्य, युवा और जरा आदि आयुकाल, (३) प्रातः, मध्यान्ह, सायं और रात्रि आदि प्रहर-काल, और (४) भोजन, निद्रा, शौच आदि दैनिक कार्यों का क्रिया-काल । इन चारों प्रकार के कालों में व्यावहारिक हीनता, अति या विपरीतता -- रोग की उत्पत्ति के निश्चित कारण होते हैं ।

काल के ये ऋतु हीन, मिथ्या और अतियोग भी दो प्रकार के होते हैं-- एक तो ईश्वरीय या प्राकृतिक कारण से, दूसरे मनुष्य की अपनी भूलों से, अज्ञानता से या जानबूझ कर भी अवहेलना करने से ।

ऋतुकाल का योगायोग

ग्रीष्मऋतु का काल जाने पर भी उचित मात्रा में गर्मी न पड़े, या शीत ऋतु में ठंडा न हो अथवा वर्षाऋतु में पानी न बरसे तो यह ऋतुकाल का प्राकृतिक हीन-योग हुआ जो सभी जीवों के लिए रोग का कारण है ।

इसी प्रकार गर्मी की ऋतु आते ही ठंडे स्थानों में चले जाना, अथवा अन्य भौतिक साधनों (खश की टट्टियाँ या कूलर आदि) से निर्मित कृत्रिम ठंडक के ही वातावरण में निरन्तर रहना और ऋतु अनुकूल गर्मी का स्पर्श ही न होने देना यह ग्रीष्मकाल का हीन- योग करना है । ऐसे ही शीतऋतु में चौबीस घण्टे हीटर लगाये रहना या अग्नि के निकट रहना, अथवा शरीर को सम्पूर्णतः ढक लेने वाले पश्चिमी ढंग के वस्त्र निरन्तर पहने रहना और शीत का बिल्कुल ही उपभोग न करना -- शीतकाल का हीन योग है । यही बात वर्षा के लिए है । वर्षाऋतु में पानी से इतना बचना कि एक बूंद भी शरीर को न छू जावे -- यह वर्षाकाल का हीन योग करना है । भारतवर्ष में ऋतुकाल के यह मनुष्य-कृत हीन योग कहे जायेंगे जो निश्चित रोगोत्पत्ति के हेतु हैं ।

ऋतुकाल का मिथ्या और अतियोग भी इसी प्रकार समझ लेना चाहिए । ऋतु के प्राकृतिक भाद के प्रतिकूल अर्थात् बिलकुल उल्टी स्थिति को मिथ्या योग कहा जायगा । जैसे ग्रीष्मऋतु की प्रकृति उष्णता है । उसके विपरीत गर्मी में जाड़ा पड़े या पानी बरसे तो यह ग्रीष्मकाल का ईश्वरीय मिथ्यायोग है । व्यवहार में उल्टा चलना जैसे गर्मी में शीत की भाँति आग तापना, या गर्म कपड़े पहनना, अथवा शीत में महीन मलमल के वस्त्र पहन कर घूमना, या वर्षाऋतु में गर्मी सर्दी जैसा आहार विहार करना जैसा कि प्रायः तपस्या करने वाले करते हैं, तो यह ऋतुकाल का मनुष्य-कृत मिथ्या योग है, जो रोग का कारण बनता है ।

प्रकृति-प्रकोपवश किसी ऋतु में उसके प्रभाव की अत्यधिक तीव्रता होना जैसे गर्मी में तीव्रतम गर्मी पड़े, शीत में अत्यधिक ठंड हो, और वर्षा में असीम जलवृष्टि हो, तो ऋतुकाल का दैवकृत अतियोग कहा जायगा । ऋतु-प्रभाव से बचाव की नितान्त उपेक्षा करना - जैसे कड़ाके की धूप और लू में कोई बिना छाता, नंगे पैर और खुले बदन घूमे तो यह ग्रीष्म का मनुष्य-कृत अतियोग है । इसी प्रकार शीत और वर्षा की सर्वथा अवहेलना करके असात्म्य आहार-विहार करना अतियोग है जो आरोग्य का नाशक है । रोग आने का मार्ग है ।

आयुकाल का योगायोग

बाल्यावस्था, युवावस्था और बुढ़ापा - मनुष्य जीवन के यह तीन आयुकाल हैं । बाल्यकाल के कार्य हैं खेलना कूदना, खाना-पीना और निर्द्वन्द्व रहना, फिर उचित आयु से ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्याध्ययन करना । बाल्यकाल की कुछ स्वाभाविक प्रवृत्तियां होती हैं, उनमें न्यूनाधिक्य या विपरीतता ही असात्म्य योग है ।

बाल्यकाल में दूध-दही-मक्खन आदि मधुर पौष्टिक पदार्थ बच्चे की खाना चाहिए । इनका बिल्कुल न खिलाना हीन योग, बहुत अधिक खिलाना अतियोग और इनकी अपेक्षा बच्चों को चाय-काफी आदि हानिकारक पदार्थ खिलाना पिलाना मिथ्या योग हैं । चंचलता शिशु का स्वभाव है, यदि वह बिल्कुल न होने देना और बच्चा झा-रींझा तथा उदास हो तो हीन योग, अत्यधिक चंचल हो तो अतियोग और उसके विपरीत गंभीर हो तो मिथ्या योग होता है। इन अयोगों का प्रभाव निश्चित रूप से बालक के स्वास्थ्य पर परिलक्षित होत है । बच्चे को कपड़ों में बहुत ढँकना और ऋतु-प्रभाव का स्पर्श न होने देन भी अयोग है ।

योवन - काल की प्रवृत्ति खूब तन्दुरुस्त रह कर, सन्तोषपूर्वक अर्थ-संग्रह व्यवसाय, गृहस्थी का पालन, सन्तति प्राप्त्यर्थ समय-समय पर उचित परिमा में स्त्री-संभोग, गृहस्थी का सुख भोगना, भोग्य सामग्री का संचय करना आदि है। जो कार्य करने के हैं, उन्हें बिलकुल न करना ही हीन योग है, हर प्रवृत्ति अति करना अतियोग और प्रवृत्ति के विपरीत करना मिथ्या योग है । युब अवस्था में स्वाभाविक तेजस्विता न होना यौवनकाल का हीन योग है, अत्यधिक तेजस्वी (उद्दंड) होना अति योग है और यौवन काल में बाल्यावस्था जैसे लक्ष या बुढ़ापे जैसी शिथिलता होना मिथ्या योग है ।

वृद्ध-अवस्था काल में स्वयमेव इन्द्रियाँ शिथिल और शारीरिक शक्ति क्षी हो जाती है । इस आयुकाल में संन्यस्त (रिटायर्ड) जीवन बिताना उचित हो है । त्याग और सेवाभाव में मगन होकर भगवद् भजन तथा सार्वजनिक औ सामाजिक सेवा के काम करना बुढ़ापे की सर्वोत्तम प्रवृत्ति है । इसके विपरीत बुढ़ापे में भी तृष्णा, लोभ और कामवश सांसारिक कार्यों में लिप्त रहना ओ शक्ति न होते हुए भी परिश्रम करना असात्म्य है ।

सारांश यह है कि आहार-विहार और आवरण में, जिस आयुकाल में जि प्रकार का व्यवहार उचित है, उसमें कमी करना हीन योग, अधिकता कर अति योग और उल्टा करना मिथ्या योग है ।

आयुकाल का हीन- मिथ्या - अतियोग इस प्रकार समझना चाहिए शैशवावस्था में समुचित विकास का न होना हीनयोग, बाल्यावस्था में ही यौवन का उभार होना अतियोग और युवावस्था में बुढ़ापा आना मिथ्या योग है । ये सभी स्थितियाँ रोग के लक्षण हैं ।

प्रहरकाल का योगायोग

वैसे तो चार प्रहर दिन में होते हैं और चार ही प्रहर रात्रि में होते हैं, तथापि संक्षेप में यहाँ हम दिन, संध्या और रात्रि -- यह तीन ही प्रहर-

काल मान लें तो इनके नियमित प्रभाव, स्थिति और कार्य-व्यवहार में असात्म्य, रोग का कारण है । तीनों प्रहर कालों में वायु, पित्त और कफ की भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ होती हैं, उन अवस्थाओं में न्यूनाधिक्य अथवा प्रतिकूलता अस्वास्थ्य का निश्चित कारण है ।

सामान्यत: दिन का काल-कार्य करने के लिए, संध्याकाल चित्तवृत्तियों को शान्त एवं प्रसन्न बनाकर आराधना करने के लिए और रात्रि का काल पूर्ण विश्राम के लिए है । कोई दिन में सोवे और रात में जागकर काम करे तो यह प्रहर- काल का दुरुपयोग ही हुआ। सूर्योदय से सूर्यास्त तक बारह घण्टे के दिन में बिलकुल हाथ-पैर न चलाना हीन योग, शक्ति के बाहर लगातार परिश्रम और काम करना अतियोग तथा सुबह से शाम तक सोते रहना मिथ्यायोग है । इसी प्रकार सूर्यास्त से सूर्योदय तक वारह घण्टे की रात्रि में बहुत थोड़ा सोना हीन योग, बहुत अधिक सोना अतियोग ( अवस्थानुसार ७-८ घंटा सोना चाहिए) और बिलकुल न सोकर अहोरात्र जागरण करना मिथ्या योग है ।

संध्याकाल - वस्तुतः दिन और रात्रि के संधिकाल को संध्या कहते हैं । रात्रि का अन्त और दिवस का प्रारंभ भी सन्धिकाल है । इन दोनों संधिकालों में शान्त और प्रसन्न रहने की अपेक्षा, आलस्य में रहना, अधिक व्यस्त रहना, चिन्तन, अध्ययन या मैथुन आदि अशांत बनानेवाले कार्य करना - यह संध्याकाल का असात्म्य योग है । इसी प्रकार प्रहर कालों के प्रभाव से बिलकुल बचना हीनयोग, अतिकरण अतियोग और विपरीत कार्य का ग्रहण मिथ्या योग है ।

क्रियाकाल का योगायोग

प्रौचादि से निवृत्त होने, भोजन करने, सोने और अन्य दैनिक कार्य करने के निश्चित समय को क्रिया-काल कहा जाता है । जितनी भी शरीर की क्रियाएँ हैं, उनका नियत समय पर उचित ढंग से पालन होना ही चाहिए। क्योंकि उनका व्यतिक्रम रोग-कारक होता है । शौच के समय पर शौच न जाना, भोजन के समय भोजन न करना, काम के समय काम न करना और सोने के समय नहीं सोना । इसमें अति करना या उल्टा सीधा करना । सब रोगी होने के

परीक्षा के दिनों में रात-दिन

जैसे आजकल हमारे विद्यार्थी युवक केवल पहले से ही नियमित पढ़ते रहें एक कर देते हैं और जाग जाग कर पढ़ते हैं ।

तो उन्हें समय का यह मिथ्या योग न करना पड़े । प्रायः लोग आधी रात तक का समय मित्र गोष्ठियों में, सिनेमा क्लब या अन्य अनावश्यक कार्यों में बिता देते हैं, फिर सुबह देर तक सोते रहते हैं । ऐसे लोगों के समस्त क्रियाकाल अस्तव्यस्त रहते हैं, फलतः वे किसी न किसी रोग के शिकार बन जाते हैं ।

जिस क्रिया के हेतु जो समय उचित और नियत है, उसके उपयोग में या उस क्रिया में न तो हीनता करनी चाहिए, न अति करनी चाहिए और न ही प्रतिकूल आचरण करना चाहिए -- यही क्रिया-काल, एवं काल और क्रिया के संयोग का सम्यक् उपयोग है; जो कि स्वाभाविक आरोग्य का देने वाला है ।

अर्थ का योगायोग

रोगारोग्य के कारण-सूचक उक्त श्लोक में अर्थ का मतलब इंद्रियों का भोग्य विषय है । हमारे शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और उनके पाँच विभिन्न कार्य और विषय हैं । नेत्रेन्द्रिय (आँखों) का कार्य देखना है, और दिखाई देने

श्रवणेन्द्रिय (कानों) का कार्य है और वाली वस्तु उनका विषय है । सुनना-सुनाई देने वाला शब्द या स्वर उनका विषय है । गंध लेना घ्राणेन्द्रिय (नाक) का कार्य है और गंध उसका विषय है । विविध रसों का स्वाद - ज्ञान करना रसनेन्द्रिय (जीभ) का कार्य है और रस उसका विषय है । स्पर्श- ज्ञान करना त्वगिन्द्रिय (त्वचा - चमड़ी) का कार्य है और उससे स्पर्श होने वाला पदार्थ शीत, उष्ण, नर्म, कठिन आदि उसका विषय हैं ।

इन्द्रियों के उपभोग पदार्थ-विषयों में हीन, मिथ्या और अति स्थिति और इन्द्रियों की क्रियाओं में हीन, मिथ्या या अति आचरण ये दोनों ही अवस्था रोग के निश्चित कारण हैं ।

आधुनिक काल में पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरणवश हमारे देश में इन्द्रियों के कर्म और अर्थ ( विषयों) में सर्वाधिक असात्म्य व्यवहार बढ़ रहा है । उसी का परिणाम है कि रोग बढ़ रहे हैं । असम जागरण, सिनेमा आदि का अति दर्शन और अनावश्यक अधिक पढ़ाई आदि से नेत्र विकृति बढ़ रही है । तेज गंधवाले इत्र-तेल, स्नो-क्रीम आदि के बहुप्रयोग से प्राणेन्द्रिय का दुरुपयोग हो रहा है । स्वादवश रसनेन्द्रिय ( जीभ ) के असात्म्य योग का तो कहना ही क्या ?

आँखों से स्वाभाविक निरीक्षण का काम लेना चाहिए । अर्थात् मनोनुकूल दृश्य, प्राकृतिक दृश्य, साधु-पुरुष और काम-काज की उपयोगी वस्तुओं को उचित स्थिति और स्वरूप में देखना चाहिए । एकदम आंखें बन्द किये रहना और कुछ देखना ही नहीं, नेत्रेन्द्रिय का हीन योग है। सूर्य या विद्युत आदि अति तेज प्रकाश या सिनेमा आदि दृश्य अधिक समय तक निरन्तर देखना अथवा किसी भी वस्तु को अपलक देखना -- नेत्रेन्द्रिय का अतियोग है । बहुत महीन अक्षरों को आँख गढ़ाकर पढ़ना अथवा बहुत पास या अतिदूर की वस्तु को देखना, भयानक, रौद्र वीभत्स, विकृत दृश्य अथवा अनिच्छित वस्तुओं को देखना - - नेत्रेन्द्रिय का मिथ्या योग है ।

जिस वस्तु या दृश्य पर हमारी दृष्टि पड़ रही है, उससे यदि हमारी आँखों पर खिंचाव पड़ रहा है अथवा वह आँखों के लिये कष्टदायक है, अरुचिकर है, चौंधियाने वाला है, सहज दिखाई नहीं पड़ रहा, या जिसके देखने से भय लग रहा है या घृणा हो रही है; फिर भी देख रहे हैं तो वह निश्चित ही नेत्रेन्द्रिय तथा उसके विषय का असात्म्य संयोग है ।

अत्यन्त तीव्र स्वर, जैसे बिजली की कड़क तोप चलाने या बम फटने का , ध्वनि, आतिशबाजी के धमाके और नगाड़ा आदि घोर शब्दवाले वाद्य का स्वर कानों में पड़ना—–कर्णेन्द्रिय का अतियोग है । इसी कारण लोग बम की भीषण आवाज से बहरे हो जाते हैं । कानों में कोई शब्द ही न पड़ने देना, उसका हीन

अप्रिय, अनिच्छित और निन्दात्मक वाक्य आदि सुनना कर्णेन्द्रिय का मिथ्या योग है ।

इसी प्रकार, अत्यन्त तीक्ष्ण, उग्र सुगंध या नाक बहानेवाले द्रव्यों का सूंघना घ्राणेन्द्रिय (नाक) का अतियोग है । नाक को सदा बन्द किये रहना और उससे गंध का आभास ही न करना उसका हीन योग है । अपवित्र, सड़ी हुई, मैली वस्तु, मुर्दा, विष और अन्य दुर्गन्धित पदार्थों की गंध को सूंघना नाक का मिथ्या योग है ।

रसनेन्द्रिय अर्थात् जीभ वस्तुतः हमारे पेट की सतर्क पहरेदार है । जब भी हम कोई असात्म्य या हानिकर चीज खायेंगे तो वह हमें तुरन्त टोक देगी । जीभ से किसी स्वाद का स्पर्श या ज्ञान न होने देना, उसका हीन योग हैं । अत्यधिक स्वादिष्ट पदार्थों का बहुत प्रयोग करना जिह्वा का अतियोग हैं । प्रतिकूल पदार्थ खाना, अधिक चटपटे मसाले और जीभ को जलाने वाले पदार्थों का बहसेवन अथवा किसी एक ही रस का अतिसेवन करना जीभ का मिथ्या योग है । जो वस्तु जीभ को जलावे, ऐंठा दे या कड़वाहट उत्पन्न करे, उसका उपयोग जिह्वा का मिथ्या योग है ।

किसी भी वस्तु के ठंडे, गर्म या शीतोष्ण, मृदु, कठिन आदि प्रभाव का ज्ञान हमें तभी होता है जब वह हमारी त्वचा से स्पर्श होती है। त्वचा से किसी प्रकार का स्पर्श कतई न होने देना या स्पर्शानुभूति न होना उसका हीन योग है । अत्यन्त शीत या अत्यन्त उष्ण पदार्थों का स्पर्श जैसे बहुत गर्म या बर्फ के जल से स्नान, अत्यधिक ठंडे या अत्यधिक गर्म तेल से मालिश आदि त्वचा का अतियोग है । विष, अग्नि, बिजली, शस्त्र, कठिन वस्तुओं आदि अहितकर वस्तुओं का स्पर्श त्वचा का मिथ्या योग हैं ।

स्पर्शनेन्द्रिय का प्रभाव समग्र इन्द्रियों पर तत्काल पड़ता है । किसी वस्तु के त्वचा से छूते ही सारी इन्द्रियाँ उसकी ओर आकर्षित हो जाती हैं । कतिपय विद्वान मैथुन क्रिया को भी स्पर्शनेन्द्रिय का विषय मानते हैं । स्त्री-पुरुष के संयोग का आनन्द स्पर्श से होता है; परन्तु उसका अति या मिथ्या सेवन रोगों का निश्चित हेतु है ।

संक्षेप में किसी भी इन्द्रिय का उसके उपभोग्य विषय के साथ असात्म्य संयोग चाहे वह चेष्टा से हो अथवा आकस्मिक हो, निश्चित रूप से रोग का कारण है ।

कर्म का योगायोग

मन, वाणी और शरीर -- ये तीन प्रधान कर्मेन्द्रियाँ हैं । इनके स्वाभाविक कार्य में हीनता अति और मिथ्यायोग भी रोगी होने के निश्चित कारण हैं । इन तीनों के सहयोग में असात्म्य अवस्था भी रोग का कारण है, क्योंकि तीनों - का परस्पर अटूट सम्बन्ध है । शास्त्रों में कहा है :-

यन्मनसा ध्यायति, तद्वाचा वदति,

यद्वाचा वदति, तत्कर्मणा करोति ।

कर्मेन्द्रियों की स्वाभाविक स्थिति यह है कि जो बात मन में होगी या उठेगी उसको ही वाणी कहेगी और जिसको वाणी कहेगी, वही शरीर करेगा । इसके विपरीत मन में कुछ और हो, वाणी में कुछ और हो और कर्म उससे भिन्न कुछ दूसरा ही हो, तो यही असात्म्य संयोग है जिससे मानसिक द्वन्द्व बढ़ता है और रोग उत्पन्न होते हैं । स्पष्ट है कि मन-वाणी और कर्म के असात्म्य से मानसिक सन्तुलन नष्ट होता है ।

सबसे प्रधान कर्मेन्द्रिय मन है । मन का विषय है चिन्तन या सोच विचार । मन को एकदम बुझा-बुझा सा उदासीन रखना और उससे कुछ सोचने विचारने का काम ही न लेना उसका हीन उपयोग है । सांसारिक विषयों का अत्यधिक चिन्तन करना, मन को निरन्तर व्यस्त बनाना, अधिक चिन्तित रहना, निरन्तर काम वासना या अर्थ ( द्रव्य) का ही मन में ध्यान रखना आदि मन का अति योग है । जो मन वस्तुतः अच्छी, कल्याणकर और नैतिक बातें सोचने के लिये है, उसको काम, भय, क्रोध, शोक, लोभ, ईर्ष्या, अभिमान, मिथ्या दर्शन दूसरों की बुराई अथवा ऐसी बातें सोचने में लगाना जो वाणी और शरीर को सामर्थ्य के बाहर है तो यह सब मन का मिथ्या योग है ।

वाणी तो मनुष्य का भूषण ही है । उसके सदुपयोग या दुरुपयोग से मनुष्य अनेक सुखों और दुखों को वरण करता है । वाणी से अत्यन्त धीरे बोलना या मौन रहना उसका हीन योग है । बहुत जोर से बोलना, चिल्लाना या देर तक आलाप करना, वाणी का अतियोग है । सदा ही दुष्टतापूर्ण बोलना, असत्य, कटु, अप्रिय, प्रसंग- विपरीत और रूखा बोलना- यह वाणी के मिथ्या योग हैं ।

वाणी का संयम बड़ा सुखकर और स्वास्थ्य-रक्षक होता है । एक बार महात्मा गान्धी एक सभा में स्वाभाविक स्वर में बोल रहे थे । सभा खादी कार्य-कर्ताओं की थी । कार्यकर्ताओं की आवाज आई - 'कुछ जोर से बोलिये, सुनाई -- नहीं पड़ता ! ’——गाँधीजी तो बड़े नियम-संयमी थे । उन्होंने तुरन्त कहा - 'मुझे अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना है । - बहुत बोलने या जोर से बोलने से शक्ति का अपव्यय होता है । क्योंकि वह वाणी का असात्म्य प्रयोग है ।

हमारा शरीर कर्मेन्द्रियों का समूह है । हाथ-पैरों से ही हम विभिन्न कार्य करते हैं । हाथ-पैरों को एकदम निकम्मा बनाए रखना, शरीर का हीन योग है । हाथों से बहुत काम करना, निरन्तर चलाना, अत्यधिक परिश्रम करना और शक्ति से अधिक बोझा ढोना -- यह सब शरीर का अतियोग है । मल-मूत्र, छींक, जंभाई आदि वेगों को रोकना या बलात् निकालना, विषमस्थान से गिरना, (ऊंचे से कूदना ), विषम - ऊबड़-खाबड़ स्थान में घूमना या भागना, विषम प्राणायाम और व्यायाम करना, तथा विषम नृत्य आदि करना यह सब शरीर के मिथ्या योग हैं ।

शरीर और अन्य कर्मेन्द्रियों के सदुपयोग पर बहुत स्वास्थ्य निर्भर करता है । किसी भी अंग से एक ही प्रकार का परिश्रम निरन्तर बहुत देर तक करते रहना, उस अंग का दुरुपयोग ही है । आज का शिक्षित वर्ग पढ़ने-लिखने और बोलने या भाषण देने में ही अधिक लगा रहता है । एक ही प्रकार से कर्मेन्द्रिय-प्रयोग करते रहने से शिक्षित वर्ग अधिकतर स्वस्थ नहीं रहता। एक बार आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि 'देश को विचारों की अपेक्षा काम की अधिक आव-श्यकता है । ' - इस कथन का यही अभिप्राय है कि सभी कर्मेन्द्रियों का सानुपात सम्यक् उपयोग किया जाय । केवल सोचते रहने या केवल वाणी से उपदेश देते रहने की अपेक्षा, थोड़ा सोचना, थोड़ा बोलना और अधिक करना तब काम चलता है । सम्यक उपयोग का अर्थ ही सहा है कि किमी0 एका अंटा घर अतिभार न पड़े और हर शरीरांग का कुछ न कुछ उपयोग उचित रीति से होता रहे ।

सम्यक् योग

आयुर्वेदोक्त सम्यक् योग का सिद्धान्त किसी विषय या वस्तु के भोग या कार्य का नितान्त निषेध नहीं करता । बल्कि यह सभी योग विषयों को भोगने के लिए प्रेरित करके सुखों की एक उचित सीमा का निर्धारण अवश्य करता है । सम्यक् योग का सिद्धान्त कहता है कि प्रत्येक विषय का उपभोग करो, परन्तु उसमें अति न करो, विपरीतता न करो । विषयों का उपभोग न करने को भी तो सम्यक् योग का सिद्धान्त दोष मानता है ।

प्रज्ञापराध

इन्द्रियों के साथ उनके उपभोग्य विषयों का असात्म्य संयोग, रोगों का प्रथम कारण है । दूसरा कारण है— प्रज्ञापराध । इन्द्रिय-विषयों का असात्म्य संयोग दो प्रकार से होता है; एक तो देवी या प्राकृतिक कारणों से आकस्मिक, दूसरा मनुष्य के प्रज्ञापराध के आचरणवश । इसलिए प्रज्ञापराध रोगों का अधिक बड़ा कारण हुआ । आयुर्वेद में कहा भी है । 'प्रज्ञापराधं हि मूलं रोगाणाम् ।' अर्थात् रोगों की जड़ प्रज्ञापराध ही है ।

प्रज्ञापराध का मतलब अन्त:करण द्वारा (मानसिक) अपराध करना जैसा कि चरक महर्षि ने कहा है--

धीधृतिस्मृति विभ्रष्टः कार्य कर्म करोति यः

प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम् ।

अर्थात् -- धी, बुद्धि, घृतिः धैर्य स्मृति-आत्मज्ञान से भ्रष्ट होकर जो कर्म किया जाता है उसका नाम प्रज्ञापराध है, जो सब तरह के रोग पैदा करता है ।

वर्तमान समय में देखा जा रहा है कि बुद्धि जो निर्णय करती है वह स्वार्थ मूलक निर्णय करती है; स्वार्थी व्यक्ति कहता कुछ है ओर करता कुछ है । इस कपट आचरण से अन्तरात्मा कुपित होकर उस व्यक्ति को दण्ड देती है । तब मन में अनेक तरह के दुष्ट भाव पैदा होते हैं--

ईर्ष्याशोकभयक्रोध रागद्वेषादयश्च ये ।

मनोविकाराः येऽप्यक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः ॥

ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, राग द्वेष आदि जो मनोविकार हैं वे सब प्रज्ञापराध से पैदा होते हैं ।

समस्त संसार में ऊपर कहे मनोविकार बहुत अधिक मात्रा में पाये जाते हैं । मरोप, अमेरिका आदि देश कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं । वहाँ के निवासी भी धनप्राप्ति के लिये सब कुछ करते हैं । भारतवासियों में भी ईर्ष्या भावना बहुत है । भाई-भाई को बड़ा होते देखकर प्रसन्नता के स्थान में ईर्ष्या करता है । प्रसन्नता की जगह शोक करते हैं । निर्भय के स्थान में भय ही भय है । क्षमा के स्थान में क्रोध है । समस्त भूमण्डल में राग और द्वेष दो भाव बड़े प्रबल हैं । सभी मानसिक विकारों में राग द्वेष अवश्य रहता है । ये सभी प्रज्ञाप-1 राध मूलक हैं जब बुद्धि विकृत हो जाती है तो व्यक्ति और समाज की धृति याने धैर्य भ्रष्ट हो जाता है । सर्दी, बुखार, दस्त आदि सामान्य बीमारी एक दो दिन के उपवास से शान्त होती है, वहाँ वर्तमान समय का व्यक्ति पैसा खर्च करके तेज दवा डाक्टर से लेता है इन तेज दवाओं के सेवन से रोग परम्परा चलती है--यह धैर्य न होने का दोष है । इसी प्रकार स्मृति अर्थात् आत्मस्मृति का भ्रष्ट होना भी प्रज्ञापराध है ।

कबहूं मन विश्राम न मान्यो-

निशि दिन भ्रमत विसार सहज सुख जहं तहं इन्द्रिन तान्यो ।

तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में कहा है

परिणाम

रोगों के आयुर्वेदोक्त तीन मुख्य कारणों में तीसरा कारण "परिणाम" है । परिणाम का अभिप्राय काल या समय अथवा उसका प्रभाव है । ऊपर कहे हुए इन्द्रिय विषयों के प्रयोग का जो कालानुबन्ध प्रभाव है - वही परिणाम है ।

षड् ऋतुयें तथा दिन रात के तीन-तीन विभाग यह समय के घटक हैं । इन ऋतुओं और समयों में दोषों की विभिन्न स्थिति से जो स्वाभाविक रोग होते हैं, वे परिणाम कारणजन्य रोग कहे जाते हैं । कालक्रम के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले रोग भी परिणामज रोग हैं । आयु काल के स्वाभाविक रोग जैसे - वृद्धावस्था

एक विशेष वात यह है कि परिणाम से उत्पन्न होनेवाले रोगों से बचाव का उपक्रम पहले से ही किया जा सकता है, क्योंकि वे प्रायः पूर्व निश्चित होते हैं। शरद, वर्षा, ग्रीष्म आदि ऋतुओं में प्रधानतः क्या विकार हो सकते हैं अथवा इन ऋतुओं की विकृति का क्या परिणाम हो सकता है इसका पूर्व ज्ञान होना आवश्यक है । ज्ञान होने से उन विकार - प्रभावों से बचने के लिए पहले से ही सावधान होना चाहिए । यदि परिणामज रोगों के प्रति पूर्व से ही बचाव की चेष्टा न की जावे, तो, उनसे बचा नहीं जा सकता । आयुर्वेद का मत है कि काल परिणाम से, जरा और मृत्यु ( ये भी काल हैं) के कारण से जो रोग उत्पन्न होते हैं, वे स्वाभाविक होते हैं, आयुर्वेद में स्वाभाविक रोगों से निबटने के लिए रसायन नामक अंग की रचना की गयी है ।

संक्रामक रोग

एक से दूसरे व्यक्ति को लग जाने वाले रोगों को संक्रामक रोग (छूत की बीमारियाँ) कहा जाता है । श्वास-प्रश्वास से, कफ-थूक से साथ-साथ भोजन करने से, एक बिस्तर पर सोने से, जूठा जल पीने या जूठा भोजन करने से और सहवास से संक्रामक रोगों के कीटाणु, एक से दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश पाकर रोग उत्पन्न करते हैं ।

तथापि यह आनुभविक सत्य है कि संक्रामक रोगों के कीटाणु शरीर में अनुकूल भूमिका पाकर ही अपनी सृष्टि कर पाते हैं । पूर्ण रोग निरोध क्षमता-सम्पन्न स्वस्थ शरीर पर रोगों के कीटाणु भी अहितकर प्रभाव नहीं कर पाते । जैसे कोई भी बीज अनुकूल भूमि में ही पनपता है, वैसे ही रोगों के कीटाणु निर्बल और अस्वस्थ शरीर में ही पनपते और प्रभावकर होते हैं ।

आयुर्वेद में संक्रामक रोगों के संक्रमण का उल्लेख करते हुए लिखा है :

प्रसंगाद गात्रसंस्पर्शान्निःश्वासात् सहभोजनात् ।

सहशय्यासनाच्चापि, वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ॥

अर्थात् रोगी व्यक्ति के अंगों को स्पर्श करने से, उसकी निश्वास से, उसके और रोगी के वस्त्रादि व्यवहार करने से — रोग पीड़ित व्यक्ति के रोगाणुओं का संक्रमण - स्वस्थ व्यक्तियों में - हो जाता है ।

कीटाणुयुक्त गन्दा जल पीने, सड़ी-गली चीजें खाने और गन्दे वायुमण्डल में रहने से भी संक्रामक रोग फैलते हैं । :

संक्रामक रोगों के मुख्यत: चार प्रकार हैं :-

(१) वायु द्वारा कीटाणु-संक्रमण से होने वाले,

(२) जीवाणुयुक्त गंदा जल पीने से होने वाले,

(३) कीटवंश से फैलने वाले,

(४) मनुष्यों के परस्पर संपर्क से होने वाले ।