दूषित जल से फैलने वाले रोग
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दूषित और कीटाणुयुक्त जल पीने के काम में लेने की अज्ञानता से हमारे देश में कई भयंकर संक्रामक रोग होते और फैलते हैं । जिनमें हैजा और प्रवाहिका-पेचिस ये दो सर्वाधिक घातक रोग हैं ।
हैजा (कॉलरा)
वैद्यक शास्त्र के मतानुसार हैजा का प्रारंभ अति भोजन से होता है । प्रायः देखा जाता है कि हैजा का अधिक प्रकोप अत्यधिक सड़ी गर्मी पड़ने पर और वर्षा के प्रारंभ में ही होता है । यह सभी जानते हैं कि अधिक गर्मी के दिनों में मामूली भोजन भी नहीं पच पाता और बजीर्णकारक हो जाता है, उस पर भी कोई अधिक भोजन कर ले तो अजीर्ण होगा ही, यही अपचन हैजा की उत्पत्ति का कारण बनता है ।
आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि हैजा का रोग एक विशेष जाति के कीटाणुओं से फैलता है । ये कीटाणु तालाब या कुओं के पानी में होते हैं । उनका पानी पीने वालों को हैजा हो जाता है ।
इस प्रकार हैजा दो प्रकार का होता है; एक अपचन-जन्य और दूसरा कीटाणु जन्य । प्रबल अपचन से हुए सामान्य हैजा में भी कं-दस्त आदि हैजे के सभी लक्षण होते हैं; परन्तु हैजे की सभी अवस्थायें प्रकट होने पर भी अपचन जन्य हैजा से रोगी मरता नहीं ।
कीटाणु जन्य हैजा अत्यन्त घातक और महा संक्रामक होता है । जहाँ यह रोग प्रारंभ होता है, बड़ी भयंकरता के साथ फैलता है और गाँव का गांव साफ कर देता है । तत्काल उचित चिकित्सा न हुई तो ६ से १० घण्टे में ही रोगी की मृत्यु हो जाती है । कीटाणु जन्य हैजा में दस्त और उल्टी के लिए रोगी को जोर बिलकुल नहीं लगाना पड़ता । बिना इच्छा और बिना कष्ट के अपने आप ही लगातार दस्त और उल्टियाँ होती हैं । शरीर की उष्णता एकदम कम हो जाती है । एक दो ही कै-दस्त होने से रोगी अत्यन्त अशक्त हो जाता है । इस प्रकार का हैजा प्रायः रात्रि के तीसरे प्रहर में आरंभ होता है ।
एक तीसरे प्रकार का हैजा भी यदा-कदा देखा जाता है जिसे डाक्टरी में 'ड्राई कालरा' और वैद्यक में 'अलसक' कहते हैं । इसमें उल्टी और दस्त नहीं होते । शेष सब लक्षण हैजा के समान ही होते हैं । पेट में भयानक दर्द, पेशाब न उतरना, प्यास कमजोरी, हाथ-पैरों में ऐंठन और पेट फूलना आदि लक्षण इसमें भी होते हैं और यह भी कीटाणु जनित हैजा की ही भाँति भयानक एवं प्राण-घातक होता है ।
हैजा की प्राथमिक अवस्था में मामूली पतले दस्तों के साथ कमजोरी अवगत होती हैं । उल्टी भी मालूम होती है । जब पूर्ण वेग के साथ दस्त और उल्टी हो, हाथ-पैरों में खिचाव, प्यास, बेचैनी, आँखों का भीतर घसना आदि लक्षण हों तो हैजा की पूर्ण विकसित अवस्था समझनी चाहिए । इसके बाद शीतांग अवस्था आती है, जिसमें रोगी का शरीर अत्यन्त ठण्डा हो जाता है । नाड़ी छूट जाती हैं । ललाट पर अधिक पसीना आता है । दस्त और प्यास की अधिकता से उल्टियाँ ज्यादा होती है । इस अवस्था में रोगी की शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है ।
वस्तुत: हैजा में अत्यधिक दस्त और उल्टियां होने से शरीर का जलीय पदार्थ सब बाहर निकल जाता है । शरीर में जल का अंश न्यून हो जाने से रक्त इतना गाढ़ा हो जाता है कि शरीर में उसका परिभ्रमण कम हो करके बन्द हो जाता है, इसी से शरीर की उष्णता नष्ट हो जाती हैं- सहसा देह निर्जीव हो जाती है । हैजा की सर्वोत्तम चिकित्सा यही है कि जलीय अंश के अभाव में गाढ़े हुए रक्त को फिर से पतला किया जाय । इसीलिए हैजा में हाथ की धमनी द्वारा रक्त में नमक का पानी ( सलाइन) पहुँचाकर खून को पतला किया जाता है ।
सबसे अधिक बुद्धिमानी यह है कि सावधान रहकर हैजे से बचाव किया जाय । सबसे पहली बात यह है कि हैजा का संक्रमण उन लोगों पर तत्काल होता है जिनका दिल कमजोर हो । अतएव हैजा के दिनों में भयभीत न होकर हृदय को बहुत मजबूत रखना चाहिए । नहीं तो जहाँ हैजा फैला हो, उस स्थान को तुरन्त छोड़ देना चाहिए ।
प्रायः सभी संक्रामक रोगों के कीटाणु, मनुष्य शरीर में अपने अनुकूल स्थिति पाकर ही प्रभाव कर पाते हैं । हैजा के कीटाणु भी सहाय्य सामग्री और स्थिति के बिना कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकते । कच्चे और सड़े फलों का खाना, बासी भोजन करना, गंदा पानी पीना, बाजारु च ट-मिठाई, मादक द्रव्यों का अति सेवन, रात्रि जागरण और विशेष कर ऋतु परिवर्तन के समय आहार-बिहार में असंयम यथा दूषित वायुमण्डल में निवास -- ये सब हैजा के सहायक कारण हैं ।
हैजा से बचाव के लिए सर्वोपरि महत्त्वपूर्ण पेय जल है । हैजा के दिनों में भूलकर भी कच्चा पानी नहीं पीना चाहिए । पानी को खूब उबालकर, उबले पानी से ही धोये बर्तन में उस उष्ण जल को ठंडा करें और भलीभाँति ढक कर रक्खे, वही पानी पीने और भोजन बनाने के काम में लावें । कुआं, तालाब या नदी का पानी भरसक तो पीने के काम में लेना ही न चाहिए । लेना पड़े तो अवश्य उबालकर ही प्रयोग करना चाहिए । नलों का पानी शुद्ध होकर ही आता है, इसलिए वह हानिकर नहीं ।
जहाँ हैजा फैलना शुरू हो वहाँ तुरन्त हैजे का टीका लगवा लेना चाहिए । भीड़-भाड़ के मेलों में हैजा प्रायः फैलता ही है । इसलिए ऐसे अवसरों और स्थलों पर अवश्य टीका लगवा कर जाना चाहिए ।
हैजे के दिनों में ही नित्य सुबह दो-चार बूंद अर्क कपूर पानी में पी लेना हितकर होता है । भोजन एकदम हल्का और ताजा ही करना चाहिए । हरी सब्जियाँ इन दिनों नहीं खाना चाहिए और भोजन में प्याज, पुदीना की चटनी और नीबू अवश्य लेना चाहिए ।
यदि घर में किसी को हैजा हो जाय तो घबराना नहीं चाहिए; धेयं और सावधानी से काम लेना चाहिए । साथ ही चिन्ताजनक स्थिति होने के पूर्व ही रोगी को निकट के अस्पताल में पहुँचा देना चाहिए । इतना बचाव रखना चाहिए कि रोगी के कपड़े मलमूत्र और के से घर के अन्य लोगों का स्पर्श न हो । यदि माता को हैजा हो जावे तो उसका दूध बच्चे को नहीं पिलाना चाहिए । रोगी के मलमूत्र और के को फिनाइल मिलाकर दूर फिकवा देना चाहिए या गड्डा खोदकर भूमि में गाढ़ देना चाहिए । रोगी के कपड़े नदी, तालाब, कुंआ या अन्य सार्वजनिक उपयोग में आने वाले स्थान पर कदापि नहीं धोना चाहिए ।
हैजा के काल में आहार-विहार के अतिरिक्त स्वच्छता पर भी बहुत ध्यान देना चाहिए । मकान में और आस-पास मुहल्लों में जो जगहे नीची सीलनदार या दुर्गन्धपूर्ण हो उन सब पर चूना या राख अवश्य डालना चाहिए ।
प्रवाहिका ( पेचिस )
जल-संवाहित कीटाणुओं से उत्पन्न होने वाले रोगों में प्रवाहिका (पेचिश) भी एक भारतव्यापी रोग हैं और यह हमारे देश में बहुतायत से होता है ।
प्रवाहिका रोगी के मल से सने कपड़े नदी-तालाब या कुएं पर धोने से इसके कीटाणु पानी में मिश्रित हो जाते हैं और वही दूषित पानी पीने पर यह कीटाणु स्वस्थ मनुष्य के भी पेट में पहुँच कर रोग का संक्रमण करते हैं । घर में खाने पीने की वस्तुओं के खुले रहने से धूल के साथ खाद्य सामग्री में भी मिलकर कीटाणु मनुष्य के पेट में पहुँचकर विकार करते हैं ।
कीटाणुओं को मनुष्यों के पेट में पहुँचाने का एक बड़ा साधन मक्खियाँ भी हैं । मक्खियाँ प्राय: मल पर बैठती है और मल में से हजारों कीटाणु अपने पंजों में उठा लेती हैं । वे ही मक्खियाँ जब घर में या बाजार में खुली रखी मिठाई और अन्य खाद्य वस्तुओं पर बैठती है, तो मल से पंजों में संग्रहीत कीटाणु उन वस्तुओं पर छूट जाता है ।
प्रवाहिका कई प्रकार का होता है; तथापि दो प्रकार का अधिक देखने में आता है; एक वेसेलरी और दूसरा एमेबिक । यह रोग कीटाणु विशेष से होता ओर फैलता है ।
प्रवाहिका के कीटाणु मनुष्य के पेट में पहुँच कर कब्ज करते हैं । वे खायें पिये पदार्थों का रस चूसते हैं और विष उगलते हैं । उस विष से पाचन-संस्थान निष्क्रिय और विशेषकर आंतें बहुत विकृत हो जाती हैं । इससे यकृत् (जिगर) का परिश्रम बढ़ जाता है, और धीरे-धीरे वह भी थकित एवं निर्बल हो जाता है । कीटाणुओं का यह प्रभाव ही प्रवाहिका रोग का प्रधान कारण है । यह कीटाणु विशेषत: आंतों में घर बनाकर अपनी परिमित संतति बढ़ाते हैं । कभी कभी जब यह कीटाणु यकृत् में पहुँच जाते हैं तो रोगी की मृत्यु का कारण बन जाते हैं ।
कीटाणुओं के प्रहार से निर्बल आँतें जब अपना काम नहीं कर पाती, तो बड़ी आंत में मल जमा हो जाता है और आँव या खून का दस्त आने लगता है । प्रारंभिक अवस्था में पेट में मरोड़ के साथ बार-बार दस्त होते हैं । कभी-कभी 1 अपान वायु के साथ भी मल का तरल भाग निकल जाता है । शौच की शंका इतने जोर से होती है, मानों दस्त निकला ही पड़ता है; परन्तु शौच पर बैठने से दस्त नहीं होता, केवल थोड़ा कफ जैसा पदार्थ दस्त में निकलता है । भूख की कमी, जीभ पर सफेद मैल जमना और पेट में दर्द के साथ कभी-कभी मल के साथ खून भी आने लगता है अथवा खून के ही दस्त होने लगते हैं और आँतों में घाव हो जाता है ।
प्रवाहिका जैसे घातक और भयंकर रोग का शिकार न होना पड़े, इसके लिए मन्दाग्नि और अपच से बचने के साथ ही इसके कीटाणुओं से अपनी रक्षा करनी चाहिए । सदैव नल का पानी ही पीने के उपयोग में लाना चाहिए । क्योंकि वह यान्त्रिक विधि से सर्वथा कीटाणुरहित करके ही नलों में भेजा जाता है । जहाँ नल न हों वहाँ कुयें का पानी साफ कपड़े की दो तहों से छाने बिना नहीं पीना चाहिए । बाजारू चाट-मिठाई, या घर की खाद्य सामग्री जो खुली रखी रहती हो और जिस पर मक्खियाँ बैठा करती हों उसको नहीं खाना चाहिए। पता नहीं कब किस मिठाई या पानी के साथ एक-दो कीटाणु ही पेट में पहुँच कर हमारा जीवन संकट में डाल दें, ऐसा विचार कर सदा ही खान-पान में गंदगी ओर मक्खियों से अपनी रक्षा करते रहना चाहिए ।