आरोग्य-प्रकाशप्रमेह या धातुस्राव (पेशाब में धातु आना)

प्रमेह या धातुस्राव (पेशाब में धातु जाना)

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सामान्यं लक्षणं तेषां प्रभूताविलमूत्रता।

२० प्रकार के प्रमेहों में पेशाब का अधिक होना और पेशाब का गंदलापन (साफ न होना) प्रधान लक्षण है। इसके उत्पन्न होने के कारणों में अधिक बैठना (आस्यासुख), अधिक सोना (स्वप्नसुख), अधिक दही का खाना, ग्राम्य जल पीना, आनूप पशु का मांस-रस सेवन आदि से प्रमेह रोग होता है। अधिक और साफ पेशाब न हो तो प्रमेह जानकर चिकित्सा करनी चाहिए। आगे जो दवाएँ लिखी गयी हैं, वे सब प्रमेह रोग की हैं।

वर्तमान समय में प्रमेह रोग को 'धातुस्राव', 'पेशाब में धातु जाना' आदि नाम देकर ठगी का व्यापार चल रहा है, जो आयुर्वेद और यूनानी को बदनाम कर रहा है।

आजकल जिधर देखिए उधर ही इस रोग का दौरदौरा है। किसी समाचार-पत्र को देखिए, किसी दवाखाने का सूचीपत्र देखिए, धातुपुष्टि की दवाइयों की भरमार रहती है।

मैंने इस रोग के विषय में बहुत-कुछ अन्वेषण किया है और शास्त्रों के अध्ययन, गम्भीर वाद-विवाद तथा स्वतन्त्र बुद्धि से चिन्तनपूर्वक विचार किया है। हजारों रोगियों की चिकित्सा भी की है। फलस्वरूप यह सत्य छिपाने को तैयार नहीं हूँ कि धातुस्राव के विषय में सर्वसाधारण जनता को अत्यन्त भ्रम हो गया है। आजकल के विज्ञापनबाजों ने इस भ्रम को और भी पुष्ट कर दिया है, क्योंकि इस भ्रम से उन लोगों का खासा लाभ है। मूर्ख लोग जो वैद्यक शास्त्र का ज़रा भी ज्ञान नहीं रखते, इस भ्रम से अच्छी आमदनी कर लेते हैं। असल में आजकल के धातुस्राव के रोगी अधिकतर मन्दाग्नि के रोगी हैं। खाना अच्छी तरह हजम नहीं होता; बराबर कब्ज की शिकायत बनी रहती है अथवा जितना भोजन सुखपूर्वक हजम कर सकते हैं, उससे बहुत अधिक भोजन करते हैं। घी, मलाई, दूध, रबड़ी, मिठाई, बादाम आदि इतना खाते हैं जिसका आधा भाग खाना चाहिए था। ऐसा पुष्टिकर भोजन करना और दिन भर निकम्मा बैठे रहना इस तरह के रोग का खास कारण है। इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होने पर पेशाब में धातु जैसा सफेद पदार्थ जाता हुआ मालूम होता है। टट्टी में कब्ज होने के कारण काँखना पड़ता है। काँखते समय दो-चार बूँद वीर्य जैसा पदार्थ निकल जाता है। पेशाब में मट्ठा जैसा सफेद पदार्थ निकलता है, जिसे देखते ही रोगी धातुस्राव का निश्चय कर लेता है। भोजन करने के बाद जो पेशाब होता है या सायंकाल टट्टी जाते समय जो पेशाब होता है, प्रायः उसमें धातु जैसा पदार्थ जाता है।

बच्चों के पेट में कीड़ा होने से भी ऐसा ही पेशाब होता है। यकृत् की बीमारी या मन्दाग्नि की बीमारी में भी मट्ठा जैसा पदार्थ पेशाब के साथ जाता है। इस प्रकार का पेशाब होने पर इसी को धातुस्राव की बीमारी समझना बड़े दुर्भाग्य की बात हो जाती है; क्योंकि धातु-पुष्टि करने वाली दवाएँ -- चूर्ण, पाक, मोदक आदि खुद मुश्किल से जीर्ण होती हैं। उस पर जब इस तरह का रोगी धातुपुष्टि की दवा खाता है, तो उसे लाभ के स्थान पर हानि ही होने लगती है। अपने आपको धातुस्राव का रोगी समझने वाले सज्जनों से हमारा अनुरोध है कि वे मन्दाग्नि की दवा और उचित आहार-विहार का सेवन करें।

सर्वप्रथम कब्जियत हटावें, इसके लिए ईसबगोल का सेवन या छोटी हरड़ का चूर्ण समभाग काला नमक मिलाकर सोते समय लेने से पेट साफ हो जायगा। स्वास्थ्य को ठीक रखने वाले नियमों का पालन करें, कुछ व्यायाम करें और खान-पान पर विशेष दृष्टि रखें। यदि इस प्रकार के आहाराचार से लाभ न हो, तो आगे लिखे क्रम से चिकित्सा करें; भूलकर भी विज्ञापनबाजों की दवा का सेवन न करें। विज्ञापन पढ़कर कुछ का कुछ दवा खाना जीवन के आनन्दों से हाथ धोना है।

अब हम इस धातुस्राव रोग के लक्षण और उत्पत्ति का पूरा-पूरा विवरण लिखते हैं। दिन या रात में सोते समय जननेन्द्रिय उत्तेजित होकर स्वप्नदोष हो जाता है। गुप्तांग का उत्तेजित न होना अथवा हो तो शीघ्र ही शिथिल हो जाना; काम-सम्बन्धी बातों के चिन्तनमात्र से वीर्य का निकल जाना, स्त्री-सहवास के समय अतिशीघ्र वीर्यपात, वीर्य का पानी के सदृश पतला होना, स्वच्छ कपड़े पर वीर्य लगकर सूख जाने पर कपड़े पर निशान (चिह्न) का न होना, शरीर जीर्ण-शीर्ण, कमर में दर्द, स्मरणशक्ति की कमी, बिना कारण नाना प्रकार की चिन्ताओं का होना, चित्त उदास, पागलपन का आभास होना, बिना कारण भय, कार्य करने की शक्ति का नाश, आँखों का भीतर धँस जाना, कपोलों का चिपक जाना और उन पर निशानों का होना, दृष्टि में कमी, ज़रा-सा काम करते ही थक जाना, निर्जन स्थान में रहने की इच्छा, बातें करने की अनिच्छा, हृदय का धुक-धुक करना, जीवन से निराशा, कब्जियत और अजीर्ण आदि इस रोग के लक्षण हैं। मन को चंचल करने वाली पुस्तकों का पढ़ना, विषयभोग-सम्बन्धी बातों का निरन्तर चिन्तन, स्त्रियों को कामवासना की दृष्टि से देखना, अश्लील गाने गाना आदि कामवासना के प्रबल विचारों से ही इस धातुस्राव नामक रोग की उत्पत्ति होती है। बुरी संगति के कारण हस्तमैथुनादि प्रकृति-विरुद्ध काम करने से भी धातुस्राव रोग उत्पन्न हो जाता है।

अहंकार या यौवन के उत्साह के कारण बहुत-से युवा मर्द लोग अधिक स्त्री-संगम करते हैं। इससे भी धातु में पतलापन और नपुंसकता उत्पन्न हो जाती है। दूसरे रोगों के कारण भी धातुस्राव उत्पन्न हो जाता है। पेट के गर्म होने से या मन्दाग्नि के कारण धातु का पतलापन देखा गया है। जो नवयुवक शरीर की पुष्टि के ख्याल से बहुत उत्तम भोजन -- घी, मलाई, दूध, बादाम आदि खाते हैं; परन्तु शारीरिक परिश्रम भोजन के अनुरूप नहीं करते, जिससे वह उत्तम भोजन सुखपूर्वक जीर्ण हो जाय। यदि ऐसे नवयुवकों को स्त्री-संगम करने का अवसर नहीं मिलता है, तो उन्हें धातुस्राव का रोग होना अवश्यम्भावी है। ऐसी अवस्था में दिन-रात विषयभोग की चिन्ता बनी रहती है। विषयभोग की चिन्ता के कारण जननेन्द्रिय उत्तेजित होकर वीर्य अण्डकोश में आ उपस्थित होता है। महर्षि सुश्रुत ने शारीरस्थान में लिखा है कि जैसे दूध में घृत-परमाणु मिले होते हैं, ईख के रस में गुड़ मिला होता है, ठीक उसी तरह शरीर के प्रत्येक परमाणु में शुक्र मिला होता है। मन में जब विषयभोग की इच्छा उत्पन्न होती है, तब सारे शरीर में एक तरह का उबाल होने लगता है और उबाल के फलस्वरूप वीर्य उत्पन्न होकर अण्डकोश में एकत्रित हो जाता है। जब वह उत्पन्न होकर एकत्रित हो गया, तब किसी न किसी प्रकार से बाहर हो ही जायगा। उसे रोकने के सभी उपाय व्यर्थ हैं। इससे निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि कुत्सित विचारों के कारण धातुस्राव की उत्पत्ति होती है। मेरा जन्म-स्थान एक छोटे से गाँव में है। अतः किसानों की चिकित्सा करने का अवसर बहुत मिला है। परन्तु मुझे स्मरण नहीं होता कि आजतक किसी किसान ने मुझसे धातुपुष्टि की कोई चिकित्सा कराई हो। इससे रोगोत्पत्ति के निश्चयपूर्वक तीन कारण स्थिर किए जा सकते हैं -- (१) पौष्टिक पदार्थों का अधिक खाना, (२) शारीरिक परिश्रम न करना और (३) विषय-भोग का अधिक चिन्तन। ये तीनों कारण किसानों में नहीं पाए जाते। किसानों को अच्छा भोजन नहीं मिलता और बिना परिश्रम किए तो उनका जीवन-निर्वाह भी नहीं होता है। शिक्षित और शहरी जीवन में ये तीनों कारण एकत्रित होते ही धातुस्राव का रोग उत्पन्न हो जाता है। धातुस्राव के फलस्वरूप नपुंसकता, पक्षाघात और राजयक्ष्मा आदि रोग हो जाते हैं।

चिकित्सा

किसी भी प्रकार की चिकित्सा व्यर्थ है; "संक्षेपतः क्रियायोगो निदानं परिवर्जनम्" (जिस कारण से रोग उत्पन्न हो गया हो, उसको छोड़ देना ही मुख्य चिकित्सा है) -- यह सुश्रुत का वचन है। इसलिए सर्वप्रथम (१) मामूली खाना खाएँ, (२) शारीरिक परिश्रम करें और (३) उत्तम विचारों से दिमाग को भरें। फिर कदाचित् ही दवा लेने की आवश्यकता पड़ेगी। रोग आप ही आप शान्त हो जायगा। फिर भी दवा लेने की जरूरत समझी जाय तो शास्त्रीय दवाओं का ही सेवन उचित है। मैंने भी इसकी रामबाण दवा के लिए बहुत चेष्टा की है; परन्तु शास्त्रीय दवाओं से उत्तम नुस्खा मुझे नहीं मिला। वास्तव में शास्त्रोक्त दवाइयाँ ही रामबाण की तरह काम करती हैं; देश, काल, अवस्था, दोष आदि के विचार से उसमें उचित परिवर्तन किया जा सकता है। पहले ही लिखा जा चुका है कि मन्दाग्नि के रोगी अपने आपको धातुस्राव का रोगी समझकर धातुपुष्टि की दवाओं का सेवन करने लग जाते हैं। धातुस्राव के रोगियों के बहुत-से पत्र हमारे पास आया करते हैं, जिनमें लिखा होता है कि "हमने विश्वासपात्र दवाखानों से खरीदकर धातु-पुष्टि की दवा खाई, परन्तु कुछ भी लाभ नहीं हुआ। अब आपके ऊपर विश्वास करके दवा मँगाते हैं, धातुपुष्टि की अमुक दवा भेजिये।" कहना न होगा कि ऐसे रोगी दवा खाकर फिर पत्र में लिखते हैं कि "आपकी दवा से कुछ लाभ नहीं हुआ, आपकी दवा भी किसी काम की नहीं है।" फिर पत्र-व्यवहार से पता लगता है कि धातुस्राव का तो भ्रम था, असल रोग दूसरा है। प्रायः मन्दाग्नि का होना साबित होता है। धातुस्राव के रोग में नीचे लिखी दवाएँ परीक्षित हैं। नियमपूर्वक सेवन की जायें तो निश्चय फायदा दिखाएँगी --

(१) त्रिफला (हरड़, बहेड़ा और आँवला) का चूर्ण ५.८३ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक शहद या गर्म जल के साथ सेवन करने से धातुस्राव ठीक हो जाता है।

(२) गिलोय (गुडूची) का स्वरस ११.६६ ग्राम समान भाग शहद मिलाकर पीने से धातुस्राव में बहुत लाभ होता है। गिलोय का काढ़ा भी लाभकारी है।

(३) कच्ची हल्दी का स्वरस ११.६६ ग्राम समभाग शहद मिलाकर पीने से धातु पुष्ट होता है। सूखी हल्दी के चूर्ण को घी में भूनकर तथा समभाग मिश्री मिलाकर सेवन करने से भी उपकार होता है।

(४) आँवले का स्वरस ११.६६ ग्राम समभाग शहद मिलाकर पीने से धातुस्राव अच्छा होता है। सूखे आँवले का चूर्ण भी लाभकारी है। आँवले के चूर्ण को आँवले के रस में जितनी बार भावना दे सकें, दें। यदि १० बार भावना दे सकें, तो फिर क्या कहना है! यह धातुस्राव की परमोषधि है। वीर्य के विकारों को नष्ट करके शरीर में बल-वीर्य की वृद्धि करता है। भारतवर्ष जैसे गर्म देश के निवासियों के लिए इससे उत्तम धातु-पुष्टि की दवा शायद ही कोई हो। यह दिल, दिमाग और मेदे को अपूर्व ताकत देती है और धातुस्राव को जड़ से उखाड़ फेंकती है। यह चरक का नुस्खा है। काष्ठौषधिवर्ग में इससे उत्तम दवा दूसरी नहीं है। यह हमारा बहुत परीक्षित प्रयोग है।

(५) शुद्ध असली शिलाजीत १ से ३ ग्राम तक शहद में मिलाकर चाटने से धातुस्राव आराम होता है। यह नुस्खा विषय-वासना-प्रेमियों को ही सेवन करना चाहिए, क्योंकि इससे उत्तेजना बहुत होती है। केवल रोग की चिकित्सा कराने वाले को इसके सेवन की आवश्यकता नहीं है, उनके लिए और दवाइयाँ बहुत हैं। शिलाजीत, वंशलोचन, छोटी इलायची के बीज और सालम मिश्री -- इन चारों चीजों को समभाग लेकर गोलियाँ बनाकर खाने से अधिक गुण करती हैं।

(६) २३३ ग्राम कौंच (कपिकच्छु) के बीजों को १२ घण्टे गो-दुग्ध में भिगोकर ऊपर के छिलके उतार लें तथा महीन पीसकर पिट्ठी बना लें। इसे घी में पकाकर ११.६६ ग्राम के बड़े बनाएँ और शहद में डाल दें। एक या दो बड़े रोज सुबह दूध के साथ खाएँ। यह धातुपुष्टि के लिए उत्तम औषध है।

(७) १२१.५० मि.ग्रा. मकरध्वज, ४८६ मि.ग्रा. कवाबचीनी का चूर्ण और ज़रा-सा कपूर शहद में मिलाकर चाटें और ऊपर से २९ ग्राम चूने का पानी पिएँ। यह स्वप्नदोष की अचूक दवा है। ५८.३२ ग्राम चूने को एक बोतल पानी में मिला दें, कुछ समय बाद चूना बोतल के पेंदे में बैठ जायगा और स्वच्छ पानी ऊपर रहेगा। यही चूने का पानी है। रात को सोने के समय उपर्युक्त दवा चाटें और सुबह चन्द्रप्रभा वटी गिलोय के काढ़े के साथ खाएँ, तो स्वप्नदोष में शर्तिया लाभ होगा। कवाबचीनी स्वप्नदोष में बहुत लाभ पहुँचाती है।

(८) धातुपुष्टि चूर्ण -- शतावरी, गोखरू, बीज बन्द, वंशलोचन, कवाबचीनी, चोपचीनी, कौंच के बीज, सफेद मूसली, स्याह मूसली, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, सालम मिश्री और विदारीकन्द -- इन १४ दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम, निशोथ ७० ग्राम और मिश्री २३३ ग्राम -- सबको कूटकर चूर्ण कर लें। यह चूर्ण ११.६६ ग्राम ताजा गो-दुग्ध के साथ सेवन करने से पतला धातु गाढ़ा हो जाता है। जिसका हाजमा अच्छा हो, उसके लिए इसका सेवन करना लाभदायक है।

(९) चन्द्रप्रभा वटी -- कपूर, वच, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय, देवदारु, हल्दी, अतीस, दारुहल्दी, पीपलामूल, चित्रकमूल की छाल, धनिया, हरड़, बहेड़ा, आँवला, चव्य, वायविडंग, गजपीपल, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, सोनामक्खी की भस्म, जवाखार, विड-नमक, सेंधा नमक और संचर नमक -- इन २७ दवाओं का प्रत्येक तीन-तीन ग्राम; निशोथ (त्रिवृत्), दन्तीमूल, तेजपत्र, छोटी इलायची के बीज, दालचीनी और वंशलोचन -- इन ६ दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम; लौह भस्म ३२.२ ग्राम, मिश्री ४६.४ ग्राम, शुद्ध शिलाजीत ९३ ग्राम और शुद्ध गुग्गुलु ९३ ग्राम लें। सोनामक्खी, लौह भस्म, शिलाजीत और गुग्गुलु को छोड़कर सब चीजों का चूर्ण कर लें। फिर सोनामक्खी आदि मिलाकर लोहे के इमामदस्ते में ज़रा-ज़रा घी देकर खूब कूटकर एक-एक ग्राम की गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ दूध के साथ सेवन करने से पेशाब से धातु का जाना, कमजोरी आदि नष्ट होते हैं। यह धातु-क्षीणता की परीक्षित दवा है। स्वप्नदोष में भी लाभकारी है। -- शा० ध०

(१०) मेहमुद्गर वटिका -- रसोत, वायविडंग, देवदारु, बेल की गिरी, गोखरू, अनारदाना, चिरायता, पीपलामूल, त्रिकटु, हरड़, बहेड़ा, आँवला और त्रिवृत् (निशोथ) -- इन १३ दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम, लौह भस्म १५१.६४ ग्राम और गुग्गुलु ५८.३२ ग्राम -- इन सबको घी में मिलाकर एक-एक ग्राम की गोलियाँ बना लें और बकरी के दूध या जल के साथ खाएँ। इससे पेशाब के साथ धातु का जाना रुक जाता है।

(११) स्वर्ण राज वंगेश्वर -- शुद्ध वंग १४० ग्राम को गलाकर पारा ७० ग्राम में मिला दें। फिर खरल में डालकर उसमें थोड़ा नमक और नीबू का रस डालकर मर्दन करें, फिर पानी से धोएँ; जब तक कालापन रहे तब तक धोएँ। फिर नौसादर और गन्धक प्रत्येक ४६.४ ग्राम मिलाकर कज्जली बना लें। फिर सबको कपड़मिट्टी की हुई बोतल में भरकर बालुकायन्त्र से पाक कर लें। स्वांग-शीतल होने पर शीशी तोड़कर निकाल लें। सोने जैसा पदार्थ मिलेगा। इसे 'स्वर्णवंग' कहते हैं। १२१.५ से ३६४.५ मि.ग्रा. पर्यन्त मलाई आदि में खाने से धातु पुष्ट होता है। इससे नपुंसकता में भी लाभ होता है।

(१२) बसन्तकुसुमाकर रस -- स्वर्ण भस्म २३.२ ग्राम, चाँदी-भस्म २३.२ ग्राम, वंग भस्म, सीसा भस्म और लौह भस्म प्रत्येक ३५ ग्राम तथा अभ्रक भस्म, प्रवाल भस्म, मोती भस्म और रससिन्दूर प्रत्येक ४६.४ ग्राम -- इन ८ दवाओं को पत्थर के खरल में डालकर शतावरी का रस, ईख का रस, अडूसे के पत्ते का रस, हल्दी का रस, केले के फूल का रस, श्वेत कमल का रस, मालती फूल का रस, केशर का पानी -- इन चीजों की क्रमशः अलग-अलग सात-सात भावना देकर २३.२ ग्राम कस्तूरी मिलाकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। घी, चीनी और शहद इसका अनुपान है। यह बसन्तकुसुमाकर धातुपुष्टि की सर्वोपरि औषध है। यदि इससे धातुस्राव का रोग आराम न हो, तो फिर औषधमात्र से फायदा होना कठिन है। इससे पेशाब में चीनी का जाना बन्द हो जाता है, नपुंसकता और नामर्दी दूर हो जाती है और सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति आती है। -- भै० र०

(१३) प्रमेहमिहिर तेल -- २.८ किलो तिल के तेल को खूब औंटाकर संस्कार कर लें। फिर सोआ, देवदारु, नागरमोथा, हल्दी, दारुहल्दी, मूर्वामूल, कूठ, असगन्ध, श्वेत चन्दन, लाल चन्दन, रेणुका, कुटकी, मुलैठी, रास्ना, दालचीनी, छोटी इलायची, भारङ्गी, चव्य, धनिया, इन्द्रजौ, करंजबीज, अगर, तेजपत्ता, हरड़, बहेड़ा, आँवला, नलिका, नेत्रवाला, बला (बरियारा), अतिबला (कंघी), मजीठ, सरलकाष्ठ, पद्मकाष्ठ, लोध्र, सौंफ, वच, जीरा, खस, जायफल, अडूसे की छाल और तगर -- इन ४१ दवाओं का प्रत्येक २३.२ ग्राम लेकर कल्क करें। इस कल्क को तैल-पाक-विधि से तेल में डालकर पकाएँ। ३.७३ किलो लाख को ३० किलो पानी में डालकर काढ़ा करें। जब ७.५ किलो बचे तब छानकर इसी तेल में पकाएँ। फिर शतावरी का रस १.८७ किलो, दूध १.८७ किलो और दही का पानी ७.४६ किलो डालकर पकाएँ। जब तेलमात्र रह जाय तब छानकर रख लें। यह 'प्रमेहमिहिर तैल' है। इसके मर्दन से धातु पुष्ट होता है। विशेष करके जब पेशाब में चीनी जाने लगती है, तब इसका मर्दन करना बहुत लाभकारी है। धातुस्राव को बन्द करके शरीर को बल-वीर्य युक्त करता है। शरीर की जलन, पित्ताधिक्य, प्यास, मुँह का सूखना आदि नष्ट होते हैं। हमारा अनुभव है कि इस तेल की मालिश से उतना ही गुण होता है जितना दवा खाने से। -- भै० र०

पथ्यापथ्य

धातुस्राव के रोगियों के लिए दवाओं की अपेक्षा पथ्यापथ्य विशेष लाभदायक है। यदि इस पथ्यापथ्य के साथ शास्त्रोक्त ऊपर लिखी किसी दवा का भी सेवन किया जाय, तो कोई हताश नहीं होगा। अधिक न खाएँ, सोने से तीन घण्टे पहले खाना खाकर सोएँ और चित्त को पवित्र रखें। परमात्मा ने मन पदार्थ को इस प्रकार बनाया है कि वह निरन्तर कुछ न कुछ सोचा करता है। अतः मन से अच्छी बातें सोचें। मन में यदि दूषित विचारों का प्रवाह आने लगे तो उसे तुरन्त हटाकर उसकी जगह ब्रह्मचर्य का प्रभाव, पराक्रम, संसार में बलवान मनुष्य की आवश्यकता, भगवद्भक्ति आदि उत्तम विचारों को स्थान दें। स्त्रियों को कामवासना की दृष्टि से न देखें। विचार करें, क्या मनुष्य विषयभोग के लिए ही पैदा हुआ है? पशु भी बिना ऋतु के सहवास नहीं करते। तब क्या मनुष्य पशु से भी अधम है? यह रोग अप्राकृतिक जीवन व्यतीत करने का ही घोर परिणाम है।

कठोर जीवन व्यतीत करें। मुलायम बिस्तरे पर न सोएँ। स्वप्नदोष होता हो तो अधिक देर न सोएँ। नियमपूर्वक शीर्षासन करें। दूध, घी, मलाई, रबड़ी, पेड़ा आदि पौष्टिक पदार्थ न खाएँ। चाय, काफी, पान, तम्बाकू, भांग, गाँजा, चण्डू, चरस, अफीम, कोकीन, ताड़ी, शराब आदि नशामात्र से घृणा करें। नाटक, उपन्यास, किस्से-कहानी आदि मन को चंचल करने वाली पुस्तकों से सख्त परहेज करें। कामदेव को भड़काने वाले दृश्य -- नग्न चित्र, सिनेमा आदि से बचें। अधिक दवा खाने से भी परहेज करें। निकम्मे न रहें। कुछ न कुछ काम करते रहें। कुछ काम ऐसा भी करें, जिससे शरीर में थकावट आ जाय। पहले ही लिखा गया है कि परिश्रमी किसानों को यह रोग पैदा नहीं होता। यह सच है कि सब लोग किसान नहीं हो सकते, किन्तु दो-एक घण्टा शारीरिक व्यायाम प्रत्येक मनुष्य कर सकता है। घोड़े और साइकिल की सवारी जैसा परिश्रम निषेध है।