आरोग्य-प्रकाशमधुमेह (पेशाब में चीनी जाना)

मधुमेह (पेशाब में चीनी जाना)

5 मिनट का पाठ

मधुमेह दो प्रकार का होता है -- मधुमेह और मूत्रमेह। पेशाब के साथ चीनी जैसा मीठा पदार्थ निकलता है, उसे मधुमेह और केवल पेशाब अधिक होने को मूत्रमेह या मूत्रातिसार कहा जाता है। अधिक ठण्डी वस्तु खाने वा सहसा ठण्डी ऋतु होने से बाज़ समय बहुत पेशाब हो जाता है, परन्तु वह कोई रोग नहीं है। दो-एक दिन में स्वतः ठीक हो जाता है। मधुमेह रोग बहुत धीरे-धीरे उत्पन्न होता है, यहाँ तक कि बहुत वर्षों तक रोगी को ख्याल भी नहीं होता कि उसे कोई रोग हो गया है। मधुमेह के आरम्भ में रोगी को पेशाब के लिए दो-एक बार रात को उठना पड़ता है। फिर धीरे-धीरे पेशाब अधिक होने लगता है और बढ़ते-बढ़ते रात-दिन में ३.७३ से १८.६६ किलो तक पेशाब हो जाता है। साथ ही सिर-दर्द, कब्जियत, भूख की अधिकता, चमड़ा खुश्क और खुरदुरा, प्यास की अधिकता आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं। रोग बढ़ने पर शरीर जीर्ण-शीर्ण, भूख की कमी, पेशाब में चीनी का आधिक्य, दृष्टि की कमी, पीठ का फोड़ा आदि लक्षण होते हैं। पेशाब की परीक्षा करने से चीनी का अंश साफ मालूम हो जाता है। मधुमेही रोगी जहाँ पेशाब करता है, वहाँ चीनी जैसा सफेद पदार्थ जम जाता है और उस जगह पर चींटियाँ और मक्खियाँ बैठती हैं। अन्त में पृष्ठ-व्रण या राजयक्ष्मा होने से रोगी की मृत्यु हो जाती है। मधुमेही रोगी का ज़रा-सा घाव भी भयंकर घाव हो जाता है; क्योंकि रक्त में चीनी होने के कारण घाव ठीक होने की प्राकृतिक शक्ति नष्ट हो जाती है। इस रोग की उत्पत्ति का कारण अग्न्याशय (पैंक्रियाज) में उत्पन्न होने वाले तत्व इन्सुलिन की कमी माना जाता है। आधुनिक चिकित्सक इन्सुलिन की सुई लगाकर इस रोग का नियन्त्रण करते हैं। किन्तु इन्सुलिन का प्रयोग भी खतरे से खाली नहीं। केवल योग्य चिकित्सक को ही इसका प्रयोग करना चाहिए। विद्यासागर और बाल गंगाधर तिलक जैसे मेधावी महापुरुषों की मृत्यु का कारण मधुमेह ही है, जिससे अनुमान किया जा सकता है कि अधिक मानसिक परिश्रम करने वालों को यह रोग होता है।

चिकित्सा

मधुमेह के रोगी को जहाँ तक हो सके दिमागी काम करना छोड़ देना चाहिए। चूँकि रोग जल्दी आराम होने वाला नहीं है, इसलिए लोग फिर दिमागी काम में लीन हो जाते हैं और इसी प्रकार जीवन व्यतीत कर देते हैं। नीचे लिखी दवाएँ चीनी को निश्चय कम कर देती हैं, परन्तु रोग के निर्मूल होने की गारण्टी नहीं दी जा सकती।

मधुमेह रोग के लिए 'गुड़मार जड़ी' लाभदायक सिद्ध हुई है। यह विचित्र प्रभावशाली जड़ी है। इसको ज़रा-सा खाकर ऊपर से गुड़, चीनी, मिश्री आदि वस्तु कितनी ही खायी जाय, स्वाद में ज़रा-सा भी मीठापन नहीं आता। इस जड़ी का चूर्ण १ ग्राम और स्वर्णवंग भस्म ६१ मि.ग्रा. मिलाकर सेवन करने से मधुमेह में बहुत लाभ होता है।

(१) मकरध्वज १२१.५० मि.ग्रा. और काले जामुन की मींगी (गुठली की गिरी) का चूर्ण १ ग्राम मधु के साथ सेवन करने से मूत्र में चीनी का जाना कम होता है एवं मूत्र का परिमाण भी कम होता है। काला जामुन का फल इस रोग में बहुत उपयोगी है।

(२) करेला २३३ ग्राम को पानी ४६७ ग्राम में पकावें, ११६.६४ ग्राम पानी शेष रहने पर छानकर पी लें। करेला भी खाएँ तो अच्छा है। मधुमेह में बहुत लाभ करता है।

(३) धातुस्राव-प्रकरण में लिखा बसन्तकुसुमाकर रस निरन्तर सेवन करने से मधुमेह में बहुत-कुछ लाभ होने की सम्भावना है।

(४) तिल ११.६६ या २३.२ ग्राम बराबर गुड़ मिलाकर खाने से मूत्रमेह में लाभ होता है। तिलों में पेशाब कम करने की विचित्र शक्ति है।

(५) हेमनाथ रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, स्वर्ण भस्म और सोनामक्खी भस्म प्रत्येक ११.६६ ग्राम तथा लौह भस्म, प्रवाल, कपूर और वंग भस्म प्रत्येक ५.८३ ग्राम -- इन ८ चीजों को एकत्रित करके पोस्त डोडा का काढ़ा, केले के फूल का रस और गूलर के फल का रस -- प्रत्येक की सात-सात भावना दें और १२१.५० मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यह मधुमेह और मूत्रमेह की अपूर्व दवा है। गिलोय रस और मधु के साथ सेवन करें। यदि पारा और गन्धक की जगह मकरध्वज डाला जाय, तो उत्तम गुण करता है। -- भै० र०

(६) शिलाजित्वादि वटी -- त्रिवंग भस्म ३५ ग्राम, छाया में सुखायी हुई नीम की पत्ती का चूर्ण ११६.६४ ग्राम, गुड़मार की पत्ती का चूर्ण ११६.६४ ग्राम और शिलाजीत १७५ ग्राम लें। प्रथम शिलाजीत में त्रिवंग भस्म मिलाएँ। पश्चात् अन्य चीजों के चूर्ण मिलाकर ४८६ मि.ग्रा. की गोलियाँ बनावें। यदि इस योग में ५.८३ ग्राम सुवर्ण भस्म भी मिलाकर गोलियाँ बनाई जायें तो विशेष गुणकारी बनता है। ४-४ घंटे के अन्तर से तीन-तीन गोलियाँ करके दिन भर में १२ गोलियाँ ठण्डे पानी के साथ देवें। बहुमूत्र, इक्षुमेह और मधुमेह में इस दवा के सेवन से बहुत अच्छा लाभ होता है। आचार्य श्री यादवजी त्रिकमजी का यह बहुपरीक्षित योग है। -- सि० यो० सं०

पथ्यापथ्य

चीनी, गुड़, मिश्री आदि मिष्टमात्र वस्तु न खाएँ। दूध आदि में चीनी का व्यवहार न करें। मीठे फल -- अंगूर आदि भी त्याज्य हैं। घी बहुत कम खाना चाहिए। नये चावल का भात, मैदा की रोटी, कचौड़ी, मछली आदि हानिकारक हैं। भूसी सहित आटे की रोटियाँ खानी चाहिए। हरे साग और ताजे फलों का सेवन लाभदायक है। पुराने चावल का भात, सत्तू, लावा, शहद, छाछ आदि पथ्य है। मक्खन निकाला हुआ दूध भी यथेष्ट पिया जा सकता है। नीबू मिला जल और आँवले के खाने से प्यास में शांति आती है। शारीरिक परिश्रम करना नितान्त आवश्यक है। ५-७ मील पैदल भ्रमण रोज करना चाहिए। यह रोग जैसा खराब है, वह किसी से छिपा नहीं है, लेकिन सुबह-शाम दोनों समय नियमित रूप से पैदल घूमने वालों का यह कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यह अच्छी तरह देखी हुई बात है कि मधुमेह का सबसे अच्छा इलाज पैदल घूमना और कम भोजन करना ही है। इस प्रकार का आहार-आचार करके औषध का निरन्तर सेवन किया जाय, तो शायद भगवान् की इच्छा से रोग आराम हो जाय। प्रमेहमिहिर तेल का मर्दन भी लाभकारी है।