आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशशीतपित्त (अलर्जी)

शीतपित्त या अलर्जी

6 मिनट का पाठ

आजकल प्रायः यह कहते हुए सुना जाता है कि अमुक व्यक्ति को अलर्जी हो गई है। जितना आधुनिक कृत्रिम दवाओं का प्रयोग बढ़ता जा रहा है उतना ही अलर्जी का प्रकोप भी बढ़ता जाता है। शीतपित्त, उदर्द और कोठ के नाम से जो रोग आयुर्वेद शास्त्र में बतलाये गये हैं वे आजकल की अलर्जी के अन्दर ही आते हैं।

अलर्जी या शीतपित्त शरीर की एक प्रतिक्रिया है जो उन पदार्थों के खाने या छूने से उत्पन्न होती है, जो रोगी की प्रकृति के अनुकूल नहीं होते। प्रकृति के अनुकूल होने को शास्त्र में सात्म्य और प्रतिकूल होने को असात्म्य कहा जाता है।

कुछ लोगों को टेरिलीन के कपड़े पहनने से अलर्जी हो जाती है। इन लोगों को टेरिलीन का प्रयोग असात्म्य है।

एक स्त्री को बाकला की फली काटते समय शीतपित्त का दौरा हो गया -- शरीर पर लाल-लाल पित्ती उछल आई, पित्ती की पिड़काओं में खुजली चलने लगी और शरीर, आँखें और चेहरा तमतमा गया।

कुछ लोगों को स्ट्रेप्टोपेनिसिलीन का इंजेक्शन लगते ही उपर्युक्त लक्षण तो उत्पन्न हो ही जाते हैं श्वास का वेग बढ़ जाता है। नाड़ी क्षीण हो जाती है और क्रियासंग (शॉक) और घबराहट होकर मृत्यु तक हो जाती है। पेनिसिलीन या प्रोकेन पेनिसिलीन इन लोगों के लिए असात्म्य होकर मारक भी हो सकती है। डाक्टर लोग इसके लिए कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स (डैकाड्रोन, बेटनेसोल, कॉर्टीजोन) ऐविल, साइनोपेन तथा एड्रिनलीन का प्रयोग कर जीवन रक्षा करने में सचेष्ट होते हैं।

आयुर्वेद में शुरू से ही असात्म्य पदार्थ, विरुद्धाशन का निषेध किया गया है।

जिन लोगों को शीतपित्त या अलर्जी का दौरा हो उन्हें तत्काल औषध प्रयोग करना चाहिए, यदि स्वयं व्यवस्था में समर्थ न हों तो समय न खोकर अच्छे चिकित्सक या अस्पताल में भेज देने में विलम्ब न करना चाहिए।

आयुर्वेदीय औषधियाँ भी इसमें कम लाभ करती हों ऐसा नहीं है।

जो अलर्जी के रोगी पर्याप्त काल तक डाक्टरी दवाओं से ठीक नहीं होते उनका रोग सदा के लिए नीचे लिखे योग दूर कर स्थायी लाभ पहुँचाने में उपयोगी सिद्ध हुए हैं :-

मकरध्वज रस

इसे चन्द्रोदय रस भी कहते हैं। १८६·५६ ग्राम शुद्ध हिंगुलोत्थपारद में २३·२ ग्राम स्वर्ण के पत्र एक-एक करके डालें और नींबू का रस मिला खरल में घोंटें। जब ८ घण्टे बराबर मर्दन हो चुके तो उसे पानी से धो लें। इसमें ३७१ ग्राम शुद्ध गन्धक डालकर मर्दन कर कज्जली बनावें। दूसरे दिन कपास के लाल फूलों के स्वरस में घोंटें फिर घृत कुमारी के गूदे में १ दिन मर्दन कर सुखा लें। इसे, कपड़मिट्टी की हुई काली पक्की बोतल में भर वालुकायन्त्र में कूपीपक्व विधि से मध्य मन्द अग्नि लगावें। लोहे की सलाई से बोतल का मुख खोलते रहें। जब गन्धक उड़ जाय तो खड़िया की डाट लगा दें। उसे गुड़-चूने से बिल्कुल बन्द कर दें। फिर १२ घण्टे तीव्र अग्नि देकर छोड़ दें।

स्वाङ्गशीतल होने पर बोतल की गर्दन पर जमे मकरध्वज को और बोतल के तल में रखे स्वर्ण को सावधानी से निकाल लें। जो लोग कूपीपक्व विधि के ज्ञाता नहीं उन्हें इसे न बनाना चाहिए अन्यथा पारद की भाप उनके मुख को सुजा दे सकती है तथा कब डाट बन्द करें इसका ज्ञान न होने से उन्हें कुछ भी पल्ले नहीं पड़ेगा।

अब १ भाग उपर्युक्त स्वर्ण का चूर्ण, ८ भाग मकरध्वज, ८ भाग कपूर, ८ भाग लौंग, ८ भाग केशर, ८ भाग जायफल और १ भाग कस्तूरी ले लें। पहले स्वर्ण और मकरध्वज का ३ दिन मर्दन करें। फिर कस्तूरी और अन्य द्रव्यों का कपड़छान किया चूर्ण डाल १ दिन और मर्दन कर शीशी में पक्की डाट लगा रख दें।

इस मकरध्वज रस को १२१·५१ से ३६४ मि.ग्रा. की मात्रा में शहद में चटा देने से अलर्जी तत्काल दूर हो जाती है। हृदय को बल मिलता है। क्रियासंग (शॉक) मिट जाता है और रक्त का परिभ्रमण पुनः अपने प्राकृत रूप में होने लगता है। यह उत्तम रसायन, वाजीकर और बलवर्द्धक है। इसका प्रयोग अनुपान भेद से अन्य अनेक रोगों में किया जा सकता है।

हरिद्राखण्ड

पाठ-संशोधन टिप्पणी: हल्दी, निशोथ और हरड़ के साथ लिखी ३७३ ग्राम मात्रा प्रत्येक की है या कुल, यह उपलब्ध OCR में स्पष्ट नहीं है।

यह एक निर्दोष योग है जो शीतपित्त में गत कई शताब्दियों से आयुर्वेदज्ञ व्यवहार में लाते रहे हैं। ट्रॉपीकल इओसिनोफिलिया में हल्दी का प्रयोग लाभदायक सिद्ध होने से भी इस योग का महत्त्व बढ़ गया है। इसके मूल योग में यादवजी महाराज ने कुछ परिवर्तन किया है जो इस प्रकार है - हल्दी, निशोथ और गुठली रहित हरड़ ३७३ ग्राम, दारूहल्दी, नागरमोथा, अजवायन, अजमोद, चित्रक की जड़ की छाल, कुटकी, जीरा सफेद, छोटी पिप्पली, सोंठ, छोटी इलायची, दालचीनी, तेजपात, वायविडंग, गिलोय, अडूसा, कूठ कडुआ, त्रिफला, चव्य, धनिया, लोह भस्म, अभ्रक भस्म प्रत्येक ११.६६ ग्राम; चीनी या मिश्री ३·७३ किलो।

सबसे पहले तामचीनी या स्टेनलेस स्टील के बर्तन में थोड़ा पानी और चीनी डाल कर चाशनी करें, चाशनी जब बूरा बनने योग्य (२ तार की) हो जाय तब उसे उतार लें और तुरन्त सब भस्में तथा उपर्युक्त औषधों का कपड़छान किया हुआ चूर्ण मिला दें तथा कतरी ढाल लें।

मात्रा: ३ से ६ ग्राम २-३ बार गरम जल के साथ दें। शीतपित्त और अलर्जी को दूर करने में अच्छा कार्य करता है।

सर्वदोषान्तक योग

पाठ-संशोधन टिप्पणी: इस योग में शुद्ध गन्धक की मात्रा छूटी हुई है।

हल्दी ४६·४ ग्राम, सोनागेरू ११.६६ ग्राम तथा शुद्ध गन्धक [मात्रा OCR में उपलब्ध नहीं]। पहले हल्दी को भूनकर चूर्ण कर लें। फिर सब द्रव्यों को कूटकर कपड़छान करें और मिला दें। इसे पानी में घोंट ३६४ मि.ग्रा. की टिकिया बना प्रयोग करें।

मात्रा: २ से ४ टिकिया तक ३-३ घण्टे पर जल के साथ देने से शीतपित्त, उदर्द, कोठ तथा सभी अलर्जिक विकार दूर हो जाते हैं। जिस अलर्जी में मुख से रक्त तक गिरता हो उसे भी सद्यः लाभ करता है।

इस रोग में ३-४ काली मिर्च चबवा कर घी पिला कर कम्बल उढ़ा कर सुला देते हैं और आग में अजवाइन डाल धूनी देते हैं। गुड़ और अजवायन भी खिलाते हैं।

अश्वगन्धादि योग

मिश्री, असगन्ध, ‘तागोरी’ [द्रव्य-नाम अस्पष्ट] और विधारे का चूर्ण ८-८ भाग, बड़ी इलायची का चूर्ण तथा कुक्कुटाण्डकपाल चूर्ण २-२ भाग और वंगभस्म १ भाग सबको एकत्र खरल करें और शीशी में भर कर रख लें।

मात्रा: २ से ६ ग्राम गाय के दूध से देने से सफेद प्रदर निश्चित रूप से ठीक होता है।

बोलादिवटी

हीराबोल (मुरमकी) २, शुद्ध सुहागा १, कसीस १, घी में भुनी हुई हींग १, एलुआ (मुसब्बरजर्द) १ सबको जटामांसी के क्वाथ में पीस २४३ मि.ग्रा. की गोलियां बना लें।

मात्रा: २४३ मि.ग्रा. भोजन के आधे घण्टे बाद जल के साथ दें। इसके प्रयोग से स्त्रियों का रक्तप्रदर ठीक होकर मासिक-धर्म समय से ठीक मात्रा में होता है।