आरोग्य-प्रकाशहैजा (कालरा)

हैजा (कालरा)

13 मिनट का पाठ

वैद्यक शास्त्र के मतानुसार जो मनुष्य बिना देश-काल का विचार किये पशु की तरह अधिक भोजन करता है, उसको अजीर्ण होकर हैजा उत्पन्न होता है। प्रायः देखा जाता है कि हैजे का अधिक प्रकोप जब अधिक गर्मी पड़ती है, तभी होता है। और यह तो सुप्रसिद्ध बात है कि अधिक गर्मी पड़ने के कारण मामूली खाना भी अच्छी तरह हजम नहीं होता -- अजीर्ण हो जाता है। मेरा बहुत बार का देखा हुआ है कि गर्मी के मौसम में विवाह आदि उत्सवों में अधिक खाने के कारण अजीर्ण होकर बहुत आदमियों को एक-साथ हैजा हो गया।

आजकल वैज्ञानिकों ने निश्चय किया है कि हैजा पैदा करने वाले एक खास जाति के कीड़े (जीवाणु) होते हैं। वे जहाँ उत्पन्न हो जाते हैं, वहीं हैजा फैलाते हैं। जहाँ हैजा उत्पन्न हुआ कि गाँव-के-गाँव साफ हो जाते हैं। हैजे के कीड़े जिस तालाब या कुएँ में उत्पन्न हो जाते हैं, उस कुएँ या तालाब का पानी पीने वाले सभी लोगों को हैजा हो जाता है; परन्तु जो लोग उसी पानी को खूब औटाकर और छानकर पीते हैं, वे इस रोग से बच जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि यह रोग संक्रामक जाति का है। अजीर्ण के कारण जो हैजा उत्पन्न होता है, वह उतना प्राणघातक नहीं होता जितना कि कीटाणुजनित हैजा। कीटाणुजनित हैजा बहुत भयानक होता है, तीन-चार घण्टे में ही रोगी को मार देता है। हैजा, प्लेग आदि संक्रामक रोगों में रोग के अलावा मरने का कारण भय भी है। बहुत-से लोग तो बिना रोग हुए ही सिर्फ भय से मर जाते हैं।

लक्षण

हैजा अधिकतर दो तरह का देखने में आता है -- सामान्य और कठिन। सामान्य हैजे को प्रबल अजीर्ण ही समझना चाहिए। जब किसी कारण से अत्यन्त अजीर्ण हो जाता है, तब हैजे की तरह कै और दस्त होने लगते हैं, तथा अन्यान्य लक्षण भी हैजे के जैसे ही प्रकट हो जाते हैं। फिर भी अजीर्ण से पैदा होने वाले हैजे में प्रायः मृत्यु नहीं होती। हैजे की सभी अवस्थाएँ प्रकट होकर भी आखिर रोगी बच जाता है। दोनों तरह के हैजे में पेशाब बन्द हो जाती है।

कीटाणुजनित हैजा बहुत भयानक होता है। इसमें प्रायः ६ से १० घण्टे के भीतर रोगी की मृत्यु हो जाती है। कै और दस्त के लिए रोगी को जरा भी बल नहीं लगाना पड़ता। बिना इच्छा और तकलीफ के कै-दस्त होते हैं। शरीर की गर्मी एकदम कम हो जाती है। दो-एक दस्त और कै होने से ही रोगी अत्यन्त दुर्बल हो जाता है। इस प्रकार का हैजा प्रायः ढलती रात में होता है।

सामान्य हैजे में इससे विपरीत लक्षण होते हैं, अर्थात् बहुत कै-दस्त होने पर भी रोगी कमजोर नहीं होता, कै और दस्त होने के समय जोर लगाना पड़ता है। इसमें चावल के धोवन जैसा दस्त होता है और दस्त के साथ या दस्त जाने के बाद ही तुरन्त कै का होना दोनों तरह के हैजे में वर्तमान रहता है।

एक तीसरी किस्म का हैजा भी कभी-कभी देखने में आता है, जिसको आयुर्वेद में "अलसक" और डॉक्टरी में 'Dry Cholera' कहते हैं। साधारण बोलचाल में इसे सूखा या बन्द हैजा कहा जाता है। इसमें कै और दस्त नहीं होते, परन्तु हैजे के और सब लक्षण वर्तमान रहते हैं। पेट में भयानक दर्द, पेशाब न होना, कमजोरी, प्यास, हाथ-पैर में ऐंठन, पेट फूलना आदि लक्षण होते हैं। यह भी कठिन हैजे की तरह भयानक होता है।

दोनों तरह के हैजे में नीचे लिखी ५ अवस्थाएँ देखी जाती हैं:

(१) आक्रमण अवस्था -- मामूली पतले दस्तों के साथ सिर्फ कमजोरी मालूम होती है। कै भी मामूली होती है।

(२) पूर्ण विकसित अवस्था -- पूर्ण वेग के साथ दस्त और कै, हाथ-पैरों में ऐंठन (बायटे), प्यास, बेचैनी और आँखों का भीतर धँसना।

(३) शीतांग अवस्था -- इस भयानक अवस्था में रोगी का शरीर बर्फ के समान ठण्डा हो जाता है, नाड़ी छूट जाती है, ललाट पर पसीना आता है, दस्त और प्यास की अधिकता के कारण कै ज्यादा होती है। इस अवस्था में रोगी की शीघ्र मृत्यु हो जाती है। परन्तु जब रोगी अच्छा होने को होता है, तब नीचे लिखी चौथी अवस्था देखी जाती है।

(४) प्रतिक्रिया अवस्था -- कुछ देर तक शान्त रह कर रोगी का शरीर गर्म होने लगता है। पेशाब की थैली में पेशाब जमा होने लगता है या पेशाब हो जाता है। धीरे-धीरे रोगी आरोग्य लाभ करता है।

(५) परिणाम अवस्था -- अच्छी तरह आराम नहीं होने पर रोग फिर आक्रमण कर देता है। पेशाब का न होना, तन्द्रा, हिचकी, कै आदि उपद्रव फिर हो जाते हैं। कई रोगी इस अवस्था को भोग कर भी ठीक हो जाते हैं; परन्तु अधिकतर इस अवस्था में मर ही जाते हैं।

चिकित्सा

आजकल विद्वानों का मत है कि हैजे में कै और दस्तों के कारण शरीर का जलीय पदार्थ सब निकल जाता है। जल का अंश कम होने के कारण खून बहुत गाढ़ा हो जाता है -- खून गाढ़ा होने के कारण शरीर में रक्त का संचार कम हो जाता है -- फलतः शीघ्र ही शरीर की गर्मी नष्ट होकर रोगी प्राण त्याग देता है। इसलिए हैजे की सर्वोत्तम चिकित्सा यही है कि गाढ़े खून को फिर से पतला किया जाय। हाथ की धमनी के द्वारा रक्त में लवण-जल (सलाइन) मिलाकर रक्त को पतला किया जाता है। परन्तु यह काम सरल नहीं है। इसलिए कठिन हैजे के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को पास के अस्पताल में जल्दी भेज देना चाहिए, जिससे समय पर उचित चिकित्सा हो सके।

हैजे के लिए नीचे लिखी दवाइयाँ बहुत अच्छी हैं और हमारी बहुत बार की आजमाइश की हुई हैं। हैजे के रोगी को कुछ घण्टे के अन्तर से एनीमा देकर आंत को धो देना बहुत लाभकारी है। अफीम आदि शुरू में देना उचित नहीं है। कै और दस्तों के द्वारा हैजे का जहर शरीर से निकल जाय, तब स्तम्भक दवा देनी चाहिए; क्योंकि रोग का जहर शरीर में रहना उचित नहीं। फिर जब तक जहर बाहर निकल नहीं जाता, तब तक वह बन्द भी नहीं होता। बन्द हैजे में कै और दस्त कराने वाली दवा देनी चाहिए। इसके लिए इच्छाभेदी रस का प्रयोग अच्छा है। २३३ ग्राम गर्म जल में २९ ग्राम नमक डालकर पिला देने से भी कै और दस्त होकर रोग शान्त हो जाता है। नीचे लिखी दवाइयाँ हैजे में बहुत अच्छी साबित हुई हैं:

(१) अर्क कपूर -- असली रेक्टिफाइड स्पिरिट (Rectified Spirit) ४४८ मि.ली. में ११२ ग्राम कपूर डाल दें। यदि २८ ग्राम पिपरमिण्ट का फूल भी डाल दें, तो बहुत उत्तम रहे। कुछ ही समय में अर्क कपूर तैयार हो जायगा। बाजार में जितने अर्क कपूर बिकते हैं, वे सब इसी विधि से तैयार किये जाते हैं, परन्तु धूर्त लोग इसमें पानी मिला देते हैं, जिससे अर्क कपूर पूरा फायदा नहीं करता। असली अर्क कपूर तुरन्त जल जायगा, परन्तु पानी मिला हुआ अर्क कपूर नहीं जलेगा। यह हैजे की अच्छी दवा है। ५ से २० बूंद तक की खुराक चीनी में मिलाकर आवश्यकतानुसार ५-५ मिनट से लेकर २ घण्टे के अन्तर से दी जा सकती है। अर्क कपूर सेवन करके तुरन्त जल न पीना चाहिए। इससे हैजा, गर्मी के दस्त, कै, पेट का दर्द आदि बहुत जल्दी अच्छे होते हैं।

(२) अमृतधारा -- कपूर, पिपरमिण्ट का फूल और अजवायन का सत्त्व -- ये तीनों चीजें समभाग लेकर शीशी में डालकर मुँह बन्द कर दें। थोड़ी ही देर में अर्क तैयार हो जायगा। इसको ५ से १० बूंद तक चीनी या बताशे के साथ खिलाएँ। हैजे की यह उत्तम दवा है। कै, दस्त, पेट-दर्द, जी मिचलाना, बदहजमी आदि बहुत जल्द अच्छे होते हैं। यह खाने और लगाने दोनों तरह के काम में आता है।

(३) लहसुन, जीरा, सेंधा नमक, शुद्ध गन्धक, सोंठ, काली मिर्च, पीपल और भुनी हुई हींग -- इन आठ दवाओं को समभाग लेकर नीबू के रस में घोंटकर चने के बराबर गोलियाँ बना लें। रोग के अनुसार एक बार में २ से ५ गोली तक ताजे जल के साथ खिलाएँ। यह गोली हैजे में बहुत फायदा करती है।

(४) शुद्ध कुचला, भुनी हुई हींग और नौसादर का फूल -- इन तीनों दवाओं को जल के साथ घोंटकर चने के बराबर गोलियाँ बना लें और हैजे में जल के साथ खिलाएँ।

(५) प्याज का रस २३.२ ग्राम से ७० ग्राम तक पिलाने से हैजे में बहुत अच्छा फायदा होता है।

(६) अपामार्ग (चिरचिरी) की जड़ को जल के साथ घोंटकर पिलाने से हैजा शान्त हो जाता है।

(७) पाँच लाल मिर्च को जल के साथ खूब महीन पीसकर ७ बताशे मिलाकर पिलाने से हैजे में फायदा होता है।

(८) अगर अजीर्ण के कारण हैजा हो गया हो, तो एरण्ड के तेल २९ ग्राम में जरा-सा सौंफ का अर्क मिलाकर रोगी को पिला दें। इससे दस्त साफ होकर शीघ्र फायदा होगा। आजकल दारूहल्दी का काढ़ा बहुत लाभकारी माना जा रहा है। आधुनिक विद्वानों का मत है कि दारूहल्दी से हैजे के कीड़े मर जाते हैं।

(९) अजीर्णकण्टक रस -- यह भी हैजे की बहुत अच्छी दवाई है।

हैजा के उपद्रवों की चिकित्सा

प्यास -- पुराने पीपल के वृक्ष के सूखे छिलके को जलाएँ। जब अंगार हो जाय तब पानी में डालें। थोड़ी देर बाद धीरे-धीरे बगैर हिलाये इस पानी को मिट्टी के दूसरे बर्तन में छानकर रख दें। हैजे की प्यास या और किसी तरह से उत्पन्न हुई प्यास के लिए यह पानी अमृत की तरह गुण करता है और इससे सब तरह के वमन में भी फायदा होता है। पानी को सावधानी से छानें, ताकि राख न जाने पावे। अथवा १०-१५ लौंग को पानी के साथ अच्छी तरह पीसकर १.८७ किलो पानी में मिलाकर औंटाएँ। अच्छी तरह औंट जाने पर मिट्टी के नये बर्तन में रख दें, ताकि खूब ठण्डा हो जाय। हैजा या अन्य रोग की तृष्णा में यह जल बहुत फायदा करता है। सौंफ का अर्क, पुदीने का अर्क, गुलाब का अर्क या केवड़े का अर्क -- इन चारों में से कोई भी अर्क जल मिलाकर देने से प्यास में शान्ति मिलती है। बर्फ डालकर ठण्डा किया हुआ जल भी प्यास के लिए उत्तम है। खाली बर्फ के टुकड़े मुख में रखने से प्यास में शान्ति आती है। नीबू का रस पानी में मिलाकर एक-एक चम्मच थोड़ी-थोड़ी देर से दें, इससे भी प्यास शान्त होगी। ध्यान रहे कि रोगी को दिया जाने वाला पानी खूब औटाकर ठण्डा किया हुआ हो।

ऐंठन -- हाथ-पैरों की ऐंठन को दूर करने के लिए अर्क कपूर की मालिश करनी चाहिए। तेल में कपूर मिलाकर मालिश करना भी उत्तम है। गर्म पानी बोतल में भरकर सेंकना भी लाभदायक है।

शीतांग होने पर -- रोगी के हाथ-पैर में सोंठ के चूर्ण की मालिश करनी चाहिए तथा मकरध्वज, कस्तूरी और कपूर मिलाकर शहद के साथ चटाना चाहिए।

पेशाब बन्द होने पर -- नाभि के नीचे पेशाब की थैली में पेशाब जमा है या नहीं, पहले इस बात की परीक्षा करनी चाहिए। यदि पेशाब जमा हो, तो सलाई (कैथेटर) द्वारा पेशाब निकाल देना चाहिए। दवा के लिए मूत्रकृच्छ्र और मूत्राघात-प्रकरण देखना चाहिए।

पथ्यापथ्य

हैजे के रोगी को रोग-काल में कुछ भी खिलाना निषिद्ध है। रोग की अवस्था में तो बरफ या जल के सिवा कुछ देना ही न चाहिए। रोग शान्त होने पर भी नीबू और मिश्री का शर्बत, फलों का रस, दूध या दही की बर्फ मिली लस्सी, मट्ठा, बार्ली का पानी, साबूदाना आदि पेय-प्रधान भोजन होना चाहिए। भात, रोटी आदि तो कुछ दिन ठहर कर देना उचित है। नीबू का रस देकर तैयार की गई पुदीने की चटनी भोजन के साथ खाना हितकारी है।

हैजा से बचने के उपाय

एक कहावत है कि इलाज की अपेक्षा रोगों को उत्पन्न न होने देना अधिक बुद्धिमानी है। वैद्यक शास्त्र में हैजे को उत्पन्न करने के लिए मनुष्य को ही दोषी ठहराया गया है। इस तरह तो प्रायः सभी रोग मनुष्य की भूल के ही परिणाम हैं, परन्तु हैजे की भूल भयानक है। सावधान आदमी निश्चय ही हैजे से बच सकता है।

जहाँ बहुत अधिक गर्मी पड़ने लगे, वर्षा न हो या गन्दगी अधिक होने लगे अथवा अजीर्णकारक भोजन बराबर होने लगे, वहाँ समझना चाहिए कि हैजा फैलने वाला ही है। हैजा शुरू होते ही लोगों को उससे बचने के उपायों में लग जाना चाहिए। डरपोक प्रकृति वाले आदमी को वह स्थान छोड़ देना चाहिए। हैजे को उत्पन्न करने वाले जो कीड़े कहे गये हैं, वे भी सहायक सामग्री के बिना कुछ नुकसान नहीं पहुँचा सकते। कच्चे व सड़े फलों को खाना, सड़ा व बासी भोजन, बाजार की मिठाई, दूषित वायु, मैले या सड़े पानी का पीना, मादक चीजों का सेवन, रात्रि-जागरण, ऋतु-परिवर्तन आदि इसके सहायक कारण हैं। बुद्धिमान आदमी को ऊपर लिखे कारणों से बचना एवं लोगों को बचने के लिए कहना चाहिए। भय या चिन्ता न करके भगवान् पर अटल विश्वास रखना चाहिए। मन को सदा प्रसन्न रखें। सुगन्धित चीजों का व्यवहार करें। कपूर सूँघते रहना बहुत उत्तम है। उत्तम धूप से घर की वायु को शुद्ध कर देना चाहिए। उपवास या व्रत न करना चाहिए। अधिक परिश्रम करने की तरह निकम्मा रहना भी खतरे से खाली नहीं है। दस्तावर दवा न लें। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात जल की है। हैजे के दिनों में भूलकर भी कच्चा पानी न पीना चाहिए। पानी खूब अच्छी तरह औंटाएँ और उसी औटते हुए पानी से बर्तन को धोकर तब उसमें अच्छी तरह ढँक कर पीने का पानी रखें। रसोई बनाने के लिए भी उसी पानी को काम में लाएँ। पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) उत्तम कृमिघ्न औषध है। २९ ग्राम एक कुएँ में डालने से पानी शुद्ध हो जाता है। बिन बुझा चूना (पत्थर का चूना) १८.६६ किलो महीन पीसकर डालने से या २.३४ किलो फिटकरी का चूर्ण डालने से भी कुएँ का जल शुद्ध हो जाता है।

रोगी के मल-मूत्र और कै को गड्ढा खोदकर गाड़ दें या फिनाइल मिलाकर एक तरफ डालें। इसी तरह रोगी के कपड़ों से भी बचें। मकान में जो जगहें नीची, गीली या दुर्गन्धपूर्ण हों, उन सब जगहों में कार्बोलिक एसिड या राख डाल दें। यदि माता को हैजा हो गया हो, तो उसका दूध बच्चे को न पीने दें। भोजन के साथ पुदीने की चटनी या प्याज खाएँ। भोजन हल्का और ताजा खाएँ। अजीर्ण न हो जाय, इस बात पर पूरा ध्यान रखें। अर्क कपूर की दो-तीन बूंद रोज सुबह खाएँ और घर से खाली पेट बाहर न जाना चाहिए। कुछ खाकर ही हमेशा रोगी के यहाँ जाना चाहिए। इस तरह सावधान रहने से हैजा होने का भय बिल्कुल नहीं रहता।