आरोग्य-प्रकाशअर्श (बवासीर)

अर्श (बवासीर)

9 मिनट का पाठ

गुदा-द्वार की त्रिवली की नसें फूलतीं और बड़ी हो जाती हैं। वे मटर, मुनक्का या इनसे भी बड़े आकार की देखने में होती हैं। इसे अर्श या बवासीर कहते हैं। एक या कई बवासीर के मस्से एक बार में हो जाते हैं। गुदा-द्वार के बाहर होने से 'बहिर्वलि' और गुदा-द्वार के भीतर होने से 'अन्तर्वलि' बवासीर कहलाती है। ये दोनों बवासीर दो तरह की देखी जाती हैं -- खूनी और बादी। खूनी बवासीर से समय-समय पर खून गिरता है। खूनी बवासीर प्रायः अन्तर्वलि की होती है। बादी बवासीर से खून नहीं गिरता, परन्तु दर्द बहुत होता है। बराबर कब्जियत रहने के कारण शौच के समय मल निकालने के लिए बहुत जोर लगाकर काँखना पड़ता है। इसी काँखने से प्रायः बवासीर हो जाती है। बार-बार जुलाब लेना, चटपटी मसालेदार चीजों का अधिक खाना, मद्यपान, रात का जागना, बिना शारीरिक परिश्रम के जीवन बिताना, घी, मलाई आदि गुरुपाकी चीजें अधिक खाना, खूब सख्त या खूब नरम आसन पर बैठकर निरन्तर काम करना आदि कारणों से बवासीर उत्पन्न हो जाती है। यह स्मरण रखना चाहिए कि यकृत् (लीवर) की खराबी से भी बवासीर उत्पन्न होती है।

मल-द्वार के पास कुटकुटाहट होना, काँटा चुभने जैसी वेदना, कब्जियत, मन्दाग्नि, बार-बार दस्त जाने की इच्छा, गुदा में जलन और खुजली आदि बवासीर के लक्षण हैं।

चिकित्सा

बवासीर की सर्वोत्तम चिकित्सा यही है कि योग्य चिकित्सक द्वारा शस्त्र या क्षार-सूत्र से कटवा कर सब मस्से निकलवा दिए जाएँ या जोंक लगाकर शमन कर दिये जाएँ। बवासीर में वायु की गति प्रतिलोम हो जाती है, जिससे वायु की गति अनुलोम हो, वही चिकित्सा विधेय है। बवासीर के रोगी को प्रायः कब्जियत रहती है और मल खुश्क हो जाता है, इसलिए दस्त साफ और नरम होकर आवे, ऐसी दवा देनी चाहिए। बवासीर रोग में फायदा पहुँचाने वाली दवाइयाँ नीचे लिखी जाती हैं:

(१) नीम की निबौली, रसोत, खूनखराबा, शुद्ध गुग्गुलु, बड़ी हरड़ का छिलका और मुनक्का -- प्रत्येक दो-दो तोला (२३.३ ग्राम), गुलाब के फूल और सनाय ११.७ ग्राम तथा पीपल १६.५ ग्राम -- इन सब दवाओं का चूर्ण करके शेष में गुग्गुलु मिलाकर त्रिफला के काढ़े से बेर के बराबर गोलियाँ बना लें। सुबह-शाम जल के साथ दो-दो या चार-चार गोलियाँ खाएँ। अगर ज्यादा कब्जियत रहती हो तो गरम पानी के साथ खाएँ। इससे दोनों तरह के बवासीर में अच्छा फायदा होता है। यह बहुत बार की परीक्षित दवा है।

(२) नीम के फलों (निबौली) की गिरी, खूनखराबा, मुनक्का, गेरू और कहरवा -- इन पाँचों दवाओं को बराबर लेकर जल के संयोग से चने के बराबर की गोलियाँ बना लें। दो-दो या चार-चार गोली दोनों समय खाने से खूनी बवासीर में निश्चय ही फायदा होता है।

(३) नागकेशर १.५ ग्राम या धुले हुए काले तिल ११.७ ग्राम, ताजा घी या मक्खन के साथ खाने से बवासीर से खून गिरना बन्द हो जाता है। निबौलियों के बीज १०-१५ की संख्या में दो-तीन बार जल के साथ खाने से भी खून गिरना बन्द हो जाता है।

(४) रीठा, जो रेशमी (सिल्क) कपड़े धोने के काम में आता है -- उसके छिलके को जलाकर भस्म ९७२ मि.ग्रा. शहद के साथ चटाने से बवासीर से खून गिरना बन्द हो जाता है।

(५) मोती की सीप को महीन चूर्ण कर गुलाबजल से घोटें। इसकी २४३ मि.ग्रा. खुराक मक्खन में डालकर खाने से बवासीर में खून गिरना बन्द हो जाता है। यह रक्तप्रदर में भी बहुत फायदा करता है। परीक्षित दवा है।

(६) काली मिर्च ११.७ ग्राम, पीपल २३.४ ग्राम, सोंठ ३५ ग्राम, चित्रक ४६.८ ग्राम और सूरण ७० ग्राम -- इन पाँचों चीजों का महीन चूर्ण करके १८७.२ ग्राम गुड़ में मिलाकर ११.७ ग्राम की गोलियाँ बना लें। दूध या जल के साथ खाने से दोनों तरह की बवासीर में फायदा होता है।

(७) जमीकन्द (सूरण) का घी में भुरता बनाकर दही के साथ खाने से दोनों तरह की बवासीर में आराम होता है।

(८) भिलावा, त्रिफला, निशोथ और चीता -- इनको समभाग में लेकर फिर नारियल के खप्पर में भरकर सबों के वजन से दूना नमक मिला दें और कण्डे की आग में फूँक दें। नमक तैयार हो जायगा। यह नमक ५.८ ग्राम मट्ठा या काँजी के साथ लेने से बवासीर में बहुत शीघ्र लाभ होता है।

(९) गेरू ५८.५ ग्राम को भृङ्गराज के रस में तीन भावना दें और टिकिया बना लें। फिर एक पाव कण्डे की आग में रखकर फूँक दें। ४९० मि.ग्रा. की मात्रा में इसकी भस्म शहद के साथ चाटने से बवासीर से खून गिरना निश्चय ही बन्द हो जायगा। श्री गुरुजी का परीक्षित है।

(१०) बवासीर में जलन, दर्द या खुजली हो, तो भाँग को जल के साथ पीसकर चक्राकार बनाकर थोड़ा गर्म करके गुदा पर बाँधना बहुत फायदेमन्द है। सुहागे के लावे को घी में मिलाकर लेप करना भी उत्तम है। गेंदे के पत्ते की लुगदी बाँधना भी लाभकारी है।

(११) लाल चन्दन, चिरायता, जवासा और सोंठ -- इन चारों दवाओं का काढ़ा पीने से खूनी बवासीर ठीक होती है।

(१२) ताकत की दवाओं में लिखा हुआ भिलावा खाना बवासीर में अत्यन्त लाभ पहुँचाता है।

(१३) बाहुशाल गुड़ -- इन्द्रायण-मूल, नागरमोथा, जमालगोटे की जड़, हर्रे, निशोथ, कपूरकचरी, वायविडङ्ग, गोखरू, चित्रक, सोंठ और तेजबल -- इन ११ दवाओं का प्रत्येक ११.७ ग्राम, सूरण (जमीकन्द) १८७.२ ग्राम, विधारा ९३.६ ग्राम और भिलावा ९३.६ ग्राम -- इन सब दवाओं को जौकुट कर ७.५ किलो पानी में पकाएँ। दो सेर पानी शेष रहने पर छानकर उस पानी में १.५ किलो पुराना गुड़ डालकर लड्डुओं जैसी चाशनी बना लें। फिर चीता की छाल, निशोथ, दन्तीमूल और तेजबल -- प्रत्येक २३.४ ग्राम, काली मिर्च, सोंठ, पीपल, छोटी इलायची, आँवला और दालचीनी -- प्रत्येक ७०.२ ग्राम -- इन १० दवाओं का महीन चूर्ण करके मिला दें। बिल्कुल ठण्डा होने पर ४६६.५ ग्राम शहद और मिला दें। इसी का नाम 'बाहुशाल गुड़' है। ११.७ ग्राम सुबह-शाम बकरी के दूध या जल के साथ सेवन करें। इससे बवासीर, गुल्म, वातोदर, पेट की गैस, प्रतिश्याय (जुकाम), पाण्डुरोग, आमवात, संग्रहणी, प्रमेह आदि नष्ट होकर शरीर बलवान हो जाता है। बवासीर रोग में वायु पेट में जमा हो जाती है, उसका अनुलोमन करने में बाहुशाल गुड़ प्रसिद्ध दवा है। (शा. सं.)

(१४) सूरण मोदक -- जमीकन्द ९३.६ ग्राम, चित्रक ४६.८ ग्राम, सोंठ २३.४ ग्राम, काली मिर्च ११.७ ग्राम, शुद्ध भिलावा, पीपलामूल, वायविडङ्ग, तालीसपत्र और पीपल -- प्रत्येक २३.४ ग्राम, त्रिफला ७०.२ ग्राम, विधारा ९३.६ ग्राम, काली मूसली ४६.८ ग्राम और दालचीनी व छोटी इलायची के बीज ११.७ ग्राम -- इन दवाओं का महीन चूर्ण करके २ किलो पुराने गुड़ में मिलाकर ११.७ ग्राम की गोलियाँ बना लें। इसका नाम 'बृहत् सूरण मोदक' है। वैद्यक शास्त्र ने सूरण मोदक की बहुत तारीफ की है। यह खूनी और बादी दोनों तरह की बवासीर को नष्ट करके भूख बढ़ाता है। सचमुच ही यह मोदक काबिले-तारीफ है। (भै. र.)

(१५) अभयारिष्ट -- उत्तम बड़ी हरड़ ५.८ किलो, मुनक्का २.९ किलो, वायविडङ्ग ५८३ ग्राम, महुआ के फूल ५८३ ग्राम -- इन सबको ५९.७ किलो जल में डालकर पकावें। जब १४.९ किलो बाकी रहे, तब छानकर उसमें गुड़ १४.९ किलो, गोखरू, निशोथ, धाय के फूल, इन्द्रायण की जड़, चव्य, सौंफ, सोंठ, दन्तीमूल, मोचरस -- ये सब ११७ ग्राम लेकर कूटकर मिला दें। फिर मिट्टी के भाँड़ (मर्तबान) में भरकर एक महीना रखा रहने दें। तैयार होने पर छानकर भर लें। मात्रा -- १४.७ से २७.३ ग्राम तक; समभाग जल मिलाकर पीने को दें। इसका नाम 'अभयारिष्ट' है। यह सब तरह के बवासीर, उदर रोग, मल-मूत्र की कब्जियत को नष्ट करता तथा अग्नि को प्रदीप्त करता है। (भै. र.)

(१६) अर्शकुठार रस -- शुद्ध पारद ११.७ ग्राम, शुद्ध गन्धक २३.४ ग्राम, लौह भस्म ३५ ग्राम, अभ्रक भस्म ३५ ग्राम, बेलगिरी, चित्रकमूल की छाल, शुद्ध कलिहारी, काली मिर्च, हरड़, दन्तीमूल, फूला हुआ सुहागा, जवाखार और सेंधा नमक -- प्रत्येक ५८.५ ग्राम, गोमूत्र ३७४.४ ग्राम, थूहर का दूध ३७४.४ ग्राम -- इन सबको एकत्र करके मन्दाग्नि से पकाकर मटर के बराबर गोली बना लें। एक या दो गोली तक जल के साथ लेने से खूनी तथा बादी दोनों तरह की बवासीर अच्छी होती हैं।

(१७) कांकायन गुटिका -- हरीतकी के फल का छिलका ५ भाग, काली मिर्च १ भाग, सफेद जीरा १ भाग, पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, शुण्ठी प्रत्येक १-१ भाग, भिलावे के फल ८ भाग, अरण्डी के बीजों की मींगी १६ भाग, यवक्षार २ भाग -- भिलावा फल को छोड़कर शेष सबको कूट-कपड़छान कर लें एवं भिलावा फल गुड़ मिलाते समय मिलावें। दो गुने गुड़ के साथ ९७२ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यह कांकायन गुटिका उन अर्श के मस्सों को भी दूर करती है जो क्षार, अग्नि और शस्त्र के द्वारा काट देने पर भी ठीक नहीं होते। (यो. र.)

पथ्यापथ्य

बवासीर के रोगी को खान-पान पर अधिक ध्यान रखना चाहिए। बवासीर कटवाने पर भी जिन रोगियों का आहार-विहार अच्छा नहीं रहता, उनको फिर से बवासीर होते देखा गया है। पेट को साफ रखना जरूरी है; परन्तु उसके लिए जुलाब न लेना चाहिए। अन्न जब अच्छी तरह हजम हो जाता है, तब स्वतः ही दस्त साफ आने लगता है। मट्ठे में लवणभास्कर चूर्ण मिलाकर पीना कब्जियत के लिए अच्छा है। रात को सोते समय ३ ग्राम इसबगोल की भूसी दूध के साथ लेना बहुत फायदेमन्द है। जमीकन्द, बथुआ, चौलाई, मूली, कच्चा पपीता आदि का साग खाना बहुत हितकर है। त्रिफला चूर्ण ५.८ से ११.७ ग्राम तक सोते समय गर्म दूध या गर्म पानी से लेने पर दस्त साफ हो जाता है। शौच जाने के बाद मध्यमा अंगुली की सहायता से गुदाचक्र को अच्छी तरह साफ कर देना चाहिए। मन्दाग्नि के आहार-विहार की तरह आचरण करना विधेय है। प्रतिदिन कुछ-न-कुछ व्यायाम करना चाहिए। हलका और पुष्टिकारक भोजन करना चाहिए। मसालेदार चटपटी चीजें न खानी चाहिए। कच्चे पपीते का साग और पका पपीता खाना तथा मूली में नमक लगाकर खाना बहुत गुणकारी है।