संग्रहणी
14 मिनट का पाठ
संग्रहणी मन्दाग्नि का ही एक रूप है। खाया हुआ भोजन जब अच्छी तरह हजम नहीं होता है, तब कब्ज हो जाता है या दस्त होने लगते हैं। बदहजमी के पुराने दस्तों को ही संग्रहणी कहते हैं। किसी को कई दिन तक कब्ज होकर एक दिन पाँच-सात पतले दस्त हो जाते हैं, किसी रोज सुबह के समय तीन-चार पतले दस्त हो जाते हैं किन्तु रात को बिल्कुल नहीं होते, किसी-किसी को दिन-रात में आठ-दस पतले दस्त रोज ही होते हैं। ४० दिन के ऊपर अतिसार के हो जाने पर उसे संग्रहणी कहने लगते हैं। संग्रहणी के दस्तों का कोई नियम नहीं है। संग्रहणी के दस्तों की खास पहचान यह है कि दस्त बहुत होता है। अर्थात् साधारण अवस्था में जितना मल मनुष्य करता है, उससे दुगुना, तिगुना मल संग्रहणी के समय एक बार में करता है। मल में आँव का भाग जरूर रहता है। दस्त का वेग बहुत होता है, यहाँ तक कि यदि पाखाने के लिए कहीं दूर जाना हुआ तो कपड़े खराब हो जाते हैं और मलोत्सर्ग के बाद अत्यधिक दुर्बलता का अनुभव होता है। दस्त के समय पेट में मरोड़ उठती है।
भोजन करते ही दस्त का वेग होना, शरीर दुर्बल और रक्तहीन होना, पेट का गुड़गुड़ करना, मुँह में छाले होना, कमर में दर्द, नाड़ी चंचल और भारी, शरीर कमजोर और रूखा आदि लक्षण इस रोग में प्रकट होते हैं। रोग पुराना होने या आँव का भाग अधिक होने पर अथवा आंतों में घाव होने पर ज्वर भी होता है। भोजन अच्छी तरह हजम न होने के कारण संग्रहणी की उत्पत्ति होती है। संग्रहणी वाले रोगी के दाँतों में मवाद का पाया जाना बहुत सम्भव है।
चिकित्सा
बहुत अनुभव के बाद निश्चय हुआ है कि संग्रहणी की सर्वोत्तम चिकित्सा जलवायु का परिवर्तन है। बहुत अच्छे जलवायु के स्थान का बन्दोबस्त न हो सके तो किसी भी दूसरी खुली जगह में रोगी को ले जाना चाहिए। अनेक बार देखा गया है कि मील-दो मील दूर वाले स्थान पर ही रोगी को ले जाने से आराम हो गया है। जिस स्थान पर रोगी बराबर रहता है उस जगह रह कर भी योग्य चिकित्सा होने से रोग में आराम हो सकता है, परन्तु आबोहवा बदलने से तो आश्चर्यजनक लाभ होता है। नीचे लिखी दवाओं का सेवन संग्रहणी रोग में लाभदायक है।
(१) संग्रहणी की बहुपरीक्षित दवा -- लोहे की कड़ाही में घी, शहद, रेंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) और भिलावा -- प्रत्येक ७०० ग्राम डालें। उसी कड़ाही में रूमी हिंगुल (अशुद्ध ही) २३३ ग्राम डालकर चूल्हे पर चढ़ा दें। पहले मन्द-मन्द अग्नि लगाकर बाद में जोर की आग लगाएँ। जब कड़ाही में से अधिक धुआँ उठने लगे तब जलती हुई लकड़ी की सहायता से कड़ाही में आग लगा दें। जरा देर के बाद जब कड़ाही से आग की लपटें उठने लगें, तब चूल्हे की आग बिल्कुल हटा दें। जब सब चीजें जलकर कड़ाही ठण्डी हो जाय तब रूमी हिंगुल को निकाल लें। अग्नि के ताप से हिंगुल तुरन्त उड़ जाता है परन्तु ऊपर वाली चीजों के संयोग से हिंगुल आग की लपटों के बीच रखा हुआ भी नहीं उड़ता। कड़ाही ठण्डी होने पर हिंगुल के टुकड़ों को निकालकर पत्थर के खरल में खूब महीन पीसें। फिर जायफल, जावित्री और लौंग -- प्रत्येक २३३-२३३ ग्राम वजन में लेकर महीन चूर्ण करके उपर्युक्त सिद्ध किये हुए हिंगुल में मिला दें। यह मन्दाग्नि और संग्रहणी की रामबाण दवा है। सिर्फ इसी दवा के प्रभाव से कलकत्ते के एक वैद्यराज ने बहुत रुपये कमाए हैं। १२२ मि.ग्रा. दवा से आरम्भ करके ७२९ मि.ग्रा. तक इस दवा की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए। संग्रहणी वाले रोगी को कपड़े द्वारा जल निकाले हुए ५८ ग्राम दही के साथ दवा लेनी चाहिए। मन्दाग्नि, अम्लपित्त और कब्जियत की बीमारी में ५८ ग्राम से २३३ ग्राम तक दही (बगैर पानी निकाला हुआ) के साथ सेवन करना चाहिए। रोज प्रातःकाल एक ही खुराक दवा सेवन करनी चाहिए। दो-तीन दिन के बाद ही भूख खुल जायगी। परन्तु यदि इस नयी भूख में भरपेट भोजन कर लिया जायगा तो दवा से कुछ फायदा नहीं होगा। भूख लगने पर ज्यादातर मट्ठा ही सेवन करना चाहिए। अन्न खाना एकदम छोड़ देना चाहिए। दवा से गर्मी ज्यादा मालूम हो तो सन्तरा और अनार का सेवन करें, तुरन्त शान्ति आ जायगी। पूरे फायदे के लिए इस दवा को ४० दिन तक खाना चाहिए। संग्रहणी की यह बहुत बढ़िया दवा है। हमने बहुत बार परीक्षा की है।
(२) चित्रकादि गुटिका -- चित्रकमूल की छाल, पीपलामूल, जवाखार, सज्जीखार, पाँचों नमक, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, भुनी हुई हींग, अजमोद और चव्य -- इन १५ दवाओं को समभाग लेकर महीन चूर्ण करें। फिर नीबू और अनार के रस में अच्छी तरह घोंटकर चने के बराबर गोलियाँ बना लें। दिन-रात में तीन या चार बार २ से ४ गोली तक जल के साथ या इसी तरह खाएँ। ये गोलियाँ संग्रहणी और मन्दाग्नि में बहुत फायदा करती हैं। खाये हुए पदार्थ को अच्छी तरह हजम करती हैं तथा आँव का नाश करती हैं। (भै. र.)
(३) लाई चूर्ण -- शुद्ध गन्धक ११.७ ग्राम, शुद्ध पारा ५.८ ग्राम -- दोनों को पत्थर के खरल में घोंटकर अच्छी तरह कज्जली बना लें। बाद में सोंठ, मिर्च, पीपल प्रत्येक ११.७ ग्राम, पाँचों नमक प्रत्येक ११.७ ग्राम, भुनी हुई हींग, स्याह जीरा, सफेद जीरा प्रत्येक १६.५ ग्राम, घी में भुनी हुई भांग ९६ ग्राम -- इन सब चीजों का महीन चूर्ण करके ऊपर वाली कज्जली में मिला दें। इसका नाम 'लाई चूर्ण' है। ९७२ मि.ग्रा. की खुराक शहद या मट्ठे के साथ लेनी चाहिए। इसमें भाँग मिश्रित है; अतः रोगी को जितना बर्दाश्त हो, उतनी ही मात्रा देनी चाहिए। भांग के नशे में अधिक भोजन न खा लेना चाहिए। यह संग्रहणी और मन्दाग्नि की प्रसिद्ध दवा है। (भा. प्र.)
(४) दुग्ध वटी -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष, ताम्र भस्म, अभ्रक भस्म, लौह भस्म, शुद्ध हरिताल, शुद्ध हिंगुल, सेमर का खार और अफीम -- प्रत्येक समभाग लेकर दूध में घोंटकर आधे जौ के बराबर गोलियाँ बना लें। एक गोली दूध के साथ सेवन करने से शोथ सहित संग्रहणी रोग आराम होता है। इसमें पानी पीना और नमक खाना निषेध है। प्यास लगने पर दूध ही पीना चाहिए तथा दूध-भात का ही भोजन करना चाहिए। पानी की बहुत इच्छा हो तो बहुत थोड़ा गर्म पानी देना चाहिए। इससे शोथयुक्त संग्रहणी में बहुत लाभ होता है। पुरानी संग्रहणी में जब किसी तरह से रोग शान्त न हो तो इसको देना उत्तम होता है।
(५) जातिफलादि चूर्ण -- जायफल, लौंग, छोटी इलायची, तेजपात, दालचीनी, नागकेशर, कपूर, सफेद चन्दन, धोए हुए तिल, वंशलोचन, तगर, आँवला, तालीसपत्र, पीपल, हर्रे, चीता (चित्रक) की छाल, सोंठ, वायविडङ्ग, मिर्च और काला जीरा -- इन दवाओं को समभाग लेकर चूर्ण करें। फिर इस चूर्ण का जितना वजन हो, उसके समान वजन में धुली हुई भांग का चूर्ण और मिला दें। भाँग मिलाने के बाद चूर्ण का जितना वजन हो उतनी ही मिश्री और मिलावें। ९७२ मि.ग्रा. चूर्ण को शहद के साथ चटावें। यदि भांग का नशा अधिक मालूम हो, तो चूर्ण की खुराक कम कर दें। यदि रोगी बर्दाश्त कर सके, तो चूर्ण की खुराक २.९ ग्राम तक बढ़ा सकते हैं। यह संग्रहणी में बहुत फायदेमन्द है। परन्तु भाँग के नशे में कुछ अंट-संट न खा लेना चाहिए।
(६) बृहत् गंगाधर चूर्ण -- बेल की गिरी, मोचरस, पाठा, धाय के फूल, धनिया, सुगन्धवाला, सोंठ, नागरमोथा, अतीस, अफीम, लोध, कच्चे अनार के फल की छाल, कुरैया (कुटज) की छाल, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक -- सब दवाएँ समभाग लेकर पहले पारा और गन्धक की कज्जली कर लें; फिर उसमें अफीम तथा अन्यान्य दवाएँ मिलाकर चूर्ण तैयार कर लेना चाहिए।
अनुपान -- मट्ठा या चावल भिगोया हुआ पानी। इसके सेवन से सब तरह के अतिसार, संग्रहणी, पेट के रोग और आठों तरह के ज्वर आराम होते हैं। (भै. र.)
(७) नृपतिबल्लभ रस -- जायफल, लवंग, नागरमोथा, दालचीनी, छोटी इलायची, आग पर फुलाया हुआ सुहागा, घी में भुनी हुई हींग, जीरा, तेजपात, अजवायन, सोंठ, सेंधा नमक, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और ताम्र भस्म प्रत्येक ४७ ग्राम, और काली मिर्च ९४ ग्राम लेकर प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली करें, बाद में अन्य औषधियों को मिलाकर बकरी के दूध में घोटकर पश्चात् आँवला-रस की ७ भावना देकर ३६६ मि.ग्रा. प्रमाण की वटी बनाकर छाया में सुखाकर रख लें। यह संग्रहणी, मन्दाग्नि एवं अन्यान्य उदर रोगों की उत्तम दवा है। (भै. र.)
अनुपान -- जल, मट्ठा या रोगानुसार।
(८) पीयूषवल्ली रस -- (सिद्धयोग संग्रह में देखें)।
(९) स्वर्ण पर्पटी -- २३.५ ग्राम शुद्ध पारा में ५.१ ग्राम सोने की भस्म (कई वैद्य सोने का तबक डालते हैं) मिलाकर खरल करें। फिर २ तोला (२३.३ ग्राम) शुद्ध गन्धक मिलाकर एक दिन घोटें। तदुपरान्त लोहे की कलछी में घी लगाकर इस कज्जली को डालकर बहुत मन्द अंगारों की आग पर रखें। थोड़ी देर बाद कज्जली गलकर पानी जैसी हो जायगी। गोबर के ऊपर केले का पत्ता रखकर इस पानी जैसी कज्जली को डाल दें। उस पर तुरन्त दूसरा केले का पत्ता रखकर गोबर से ढक दें। थोड़ी देर बाद जो चिपटा पदार्थ जम जायगा, इसी को 'पर्पटी' कहते हैं।
मात्रा -- एक रत्ती से आरम्भ करके चार रत्ती तक बढ़ाएँ।
अनुपान -- मट्ठा, धनिया और जीरे का काढ़ा। पर्पटी में बहुत वैद्य जरा-सी भुनी हींग और शंख भस्म भी मिलाकर रोगी को सेवन कराते हैं, जो अच्छा है। यह संग्रहणी की सर्वश्रेष्ठ दवा है। जब रोग किसी तरह भी अच्छा नहीं होता हो तब इसका सेवन रोगी को प्राणदान कर सकता है। जब आंतों में घाव हो जाते हैं, खून व मवाद के दस्त आने लगते हैं, तब इसके सेवन से आंतों का घाव ठीक हो जाता है। सोना न डालकर पारे के बराबर भाग लौह भस्म मिला दिया जाय, तो इसी को 'लौहपर्पटी' कहते हैं। खाली पारा और गन्धक के रहने से 'रसपर्पटी' कहलाती है।
(१०) बिल्वादि चूर्ण -- (सिद्धयोग संग्रह, पृ. २४ देखें)।
(११) कुटज घनवटी -- (सिद्धयोग संग्रह, पृ. २४ देखें)।
(१२) नागकेशरादि चूर्ण -- (सिद्धयोग संग्रह, पृ. ३१ देखें)।
(१३) पंचामृत पर्पटी -- शुद्ध गन्धक ९४ ग्राम, शुद्ध पारा ४७ ग्राम, लौह भस्म २३.५ ग्राम, अभ्रक भस्म ११.७ ग्राम और ताम्र भस्म ५.८ ग्राम -- इनकी पर्पटी बनाने से 'पंचामृत पर्पटी' कहलाती है। (भै. र.) लाभ की दृष्टि से सबसे अच्छी 'पंचामृत पर्पटी' समझी जाती है। मन्दाग्नि-मूलक संग्रहणी के लिए पंचामृत पर्पटी सर्वोत्तम दवा है।
पर्पटी का सेवन यदि कुशल वैद्यराज की देख-रेख में किया जाय, तो बहुत अच्छा रहता है। पर्पटी सेवन के समय सिर्फ दूध या मट्ठा का सेवन किया जाय और अन्न बिल्कुल छोड़ दिया जाय, तो सर्वोत्तम फल होगा और किसी रोगी को निराश न होना पड़ेगा। पर्पटी-सेवन के समय अक्सर कब्जियत हो जाती है। इसके लिए कब्जियत अधिकार में लिखी 'भुवनेश्वर वटी' सेवन करनी चाहिए।
संग्रहणी रोग में मट्ठा का सेवन अमृत के समान फायदा करता है। यदि रोगी को कफ, खाँसी, ज्वर और सूजन हो, तो मट्ठे की जगह बकरी का दूध सेवन करना चाहिए। यदि कुछ भी दवा न लेकर संग्रहणी में सिर्फ मट्ठे का ही सेवन किया जाय, तो भी रोग पूर्ण रूप से अच्छा हो सकता है।
रोगी की अवस्था के अनुसार घी निकाला हुआ या घी सहित मट्ठा ही सेवन कराना चाहिए। मट्ठा बनाने के लिए दही न अधिक मीठा हो और न अत्यन्त खट्टा। मामूली कुछ खट्टा दही होना सर्वोत्तम है। दही से चौथाई भाग जल मिलाकर मट्ठा बनाना होता है। घी सहित मट्ठा अधिक गुण करनेवाला होता है, परन्तु जिसका हाजमा बहुत खराब हो गया हो, उसे घी निकालकर ही मट्ठा देना चाहिए। सोंठ, चीतामूल की छाल और सेंधा नमक -- इन तीनों का चूर्ण ९७२ मि.ग्रा. या लवणभास्कर चूर्ण ९७२ मि.ग्रा. हर बार मिलाकर मट्ठा पीने से बहुत लाभ होता है। अन्न का खाना धीरे-धीरे कम करके एकदम छोड़ देना चाहिए। अन्न की जगह मट्ठा बढ़ाना चाहिए। हम बहुत-से रोगियों को ६.५ किलो तक दही का मट्ठा पिला देते हैं। जब अन्न के बिना भूख बहुत लगे, अत्यन्त बेचैनी हो जाय, तब बार्ली का पानी, साबूदाना या कच्चे केले की रोटी देनी चाहिए। अन्न को छोड़कर सिर्फ मट्ठा या दूध के आधार पर रहने से एक बार तो रोगी बहुत दुर्बलता का अनुभव करता है; परन्तु जल्दी -- दो-तीन दिन के बाद ही कमजोरी हटने लगती है। फिर कुछ दिनों के बाद तो अन्न की जरा भी परवाह नहीं रहती। एकदम नीरोग हो जाने पर अन्न ग्रहण करना चाहिए।
उस समय पुराने चावल का भात और दही का भोजन होना चाहिए। मट्ठा या दूध के सेवन-काल में भी संग्रहणी के रोगी को अन्न देने की जरूरत मालूम हो, तो दही-भात ही दिया जाना चाहिए। मट्ठा या दूध रोगी को पिलाने की सबसे अच्छी विधि यह है कि हर एक घण्टे के अन्तर से मट्ठा या दूध पिलाया जाय। जैसे -- सुबह ५-६ बजे से ५८.३ ग्राम या ११६.६ ग्राम मट्ठा या दूध; हर एक घण्टा बाद रात के ९-१० बजे तक पिलाया जाय। दूसरे दिन २३.३ ग्राम मट्ठा या दूध वजन में हर बार बढ़ाकर देना चाहिए। जल जहाँ तक हो नहीं देना चाहिए। अगर जल देने की जरूरत हो तो सौंफ का अर्क या फलों का रस देना उचित है। जल की अत्यन्त आवश्यकता होने पर गरम जल जरा-सा पिला देना चाहिए। इस तरकीब से रोगी को मट्ठा या दूध ७-८ सेर तक हजम हो जाता है। यह याद रखने लायक बात है कि दो-चार तोला अन्न देने पर भी दूध या मट्ठा रोगी अधिक नहीं पी सकता है। दूध में मीठा न मिलाना चाहिए। फल या फलों का रस दिया जा सकता है। रोगी को शान्त चित्त से लेटे रहना चाहिए। रोगी इधर-उधर थोड़ा-बहुत टहल सकता है या मन बहलाव के लिए बैठ सकता है, लेकिन शारीरिक या मानसिक परिश्रम न करना चाहिए। इस तरह मट्ठा या दूध का सेवन करने वाले संग्रहणी, मन्दाग्नि, अम्लपित्त या पुराने आँव के रोगी निश्चय ही तन्दुरुस्त हो जाते हैं।
व्यवस्था -- हम संग्रहणी के रोगी की नीचे लिखी व्यवस्था से चिकित्सा करते हैं, जिससे बहुत बढ़िया फल होता है। प्रातःकाल एक खुराक संग्रहणी की दवा नं. (१) दही के साथ सेवन कराते हैं। दिन-भर में चित्रकादि वटी १०-१२ गोली खिला देते हैं। रात को सोते समय अतिसार अधिकार की कपूर वटी एक या दो गोली धान्यपंचक काढ़े के साथ देते हैं। पान, सुपारी, इलायची की जगह रोगी को सौंफ चबाने को देते हैं। भोजन की रीति ऊपर लिखी ही जा चुकी है। इस प्रकार व्यवस्था करने से संग्रहणी का रोगी जल्द अच्छा हो जाता है।
पथ्यापथ्य
यह सोलह आने पूर्ण सत्य है कि संग्रहणी का रोगी यदि भूख का वेग न सह सके, तो अमृत से भी अच्छा नहीं किया जा सकता। संग्रहणी में दस्त लगने के कारण अच्छी कड़ाके की भूख लगती है। कुछ समय तक तो समझदार रोगी संयम से काम लेता है, परन्तु पुराना रोग होने से रोगी का मन चंचल हो उठता है और विचार-शक्ति मृतप्राय हो जाती है। बहुत दिन रोग भोगने के कारण रोगी बदपरहेजी और हठी हो जाता है। इसलिए घरवालों का कर्त्तव्य हो जाता है कि रोगी के खान-पान पर खूब ध्यान रखें, बुद्धिमान् रोगी का भी विश्वास न करें।
कच्चे केले को जल में पकाकर सुखा लें और महीन आटा बना लें। जरा-सी सूजी या आटा मिलाकर इसकी रोटी बनाकर रोगी को खिलाएँ। कच्चे केले को उबालकर मट्ठा के संयोग से कढ़ी बनाकर रोगी को खिलाएँ। रात को मूंग के आटे की कढ़ी भी दी जा सकती है। बार्ली की रोटी भी बहुत हल्की होती है। जरूरत के समय दही-भात भी दिया जा सकता है। संग्रहणी रोग के साथ प्रायः दाँतों में पायरिया की बीमारी पायी जाती है। इसलिए दाँत के डाक्टर को दाँत जरूर दिखा लेने चाहिए। आगे मन्दाग्नि में जो नियम लिखे हैं, उन पर भी अच्छी तरह ध्यान रखना चाहिए; क्योंकि पहले ही कहा जा चुका है कि संग्रहणी भी मन्दाग्नि का ही एक भेद है। स्वच्छ जल से स्नान और ज्यों-ज्यों शक्ति आती जाय, त्यों-त्यों भ्रमण करना उत्तम है।