आरोग्य-प्रकाशकामला (पीलिया)

कामला (पीलिया)

7 मिनट का पाठ

पीलिया रोग होने पर रोगी का चमड़ा, आँखों का सफेद भाग, नाखूनों का मूल भाग और पेशाब -- ये सब पीले (हल्दी) रंग के जैसे देखने में आते हैं। रोग आरम्भ होने पर पहले-पहल पेशाब पीला होने लगता है एवं आँखों में पीलापन देखा जाता है। फिर ज्यों-ज्यों रोग की वृद्धि होती है, त्यों-त्यों नाखून और शरीर के चमड़े पर भी असर होने लगता है। रोग बढ़ जाने पर रोगी को सब चीजें पीली ही पीली नजर आती हैं। आखिरी अवस्था में तो रोगी के पसीने से सफेद कपड़ा भी पीला हो जाता है।

निदान

यकृत् की क्रिया बिगड़ने पर पित्त अच्छी तरह अवशोषित नहीं होता; वह पित्त खून में मिलकर खून के स्वाभाविक रंग को बदल देता है। इसी से पाण्डुरोग या पीलिया हो जाता है।

लक्षण

कब्जियत, मल काठिन्य और गाँठ-गाँठ होना अथवा कभी पतले दस्त होना, मुँह का स्वाद कड़वा, कमजोरी, मन्द ज्वर आदि लक्षण इस रोग में होते हैं। रोग पुराना होने पर पैर, हाथ, मुँह आदि पर शोथ (सूजन) हो जाता है।

चिकित्सा

सर्वप्रथम रोगी को अच्छी तरह जुलाब दें, फिर दवा का सेवन कराएँ। बहुत-से रोगी तो सिर्फ जुलाब से ही ठीक हो जाते हैं, औषध देने की जरूरत भी नहीं पड़ती। जरूरत होने पर नीचे लिखी दवाओं का सेवन कराने से निश्चित फायदा होगा।

(१) मण्डूर भस्म -- शास्त्र के अनुसार और हमारे अनुभव से सिद्ध हुआ है कि मण्डूर भस्म पीलिया रोग की अव्यर्थ महौषधि है। मण्डूर भस्म बनाना बहुत आसान है। लोहे के मैल को मण्डूर कहते हैं। यदि लोह-मैल १०० वर्ष पुराना हो तो उत्तम माना जाता है। अंग्रेजों के आने के पहले भारत में लोहा बहुतायत से पुराने ढंग से तैयार किया जाता था, उन स्थानों में आज भी लाखों मन उत्तम मण्डूर मिल सकता है। इस मण्डूर को पहले लोहे के इमामदस्ते में डाल कर चूर्ण कर लें। तदुपरान्त लोहे की कड़ाही में डालकर खूब गर्म कर लें और उस गर्म-गर्म मण्डूर को गोमूत्र में डालें। इस तरह सात बार डालने से मण्डूर शुद्ध हो जाता है। फिर घृतकुमारी के रस में घोंटकर तथा टिकिया बनाकर गजपुट में फूँक दें। ३ या ४ पुट में भस्म तैयार हो जाती है। यह बहुत काम की वस्तु है। २४३ मि.ग्रा. से १ ग्राम तक की खुराक समभाग पीपल का चूर्ण मिलाकर गोमूत्र या मट्ठे के साथ सेवन करानी चाहिए। यह मण्डूर भस्म केवल पाण्डुरोग की ही महौषधि नहीं वरन् सूजन, खून की कमी, बदहजमी, यकृत् की खराबी, संग्रहणी आदि रोगों की भी शर्तिया दवा है। ताजे आँवले के रस की भावना देने से यह और अधिक लाभकारी हो जाता है।

(२) वर्धमान पिप्पली -- दूध में बराबर पानी डालकर तीन पीपल डाल दें। गर्म करने से जब पानी जल जाय और दूध मात्र शेष रह जाय, तब पीपल चबाकर खा लें और ऊपर से दूध पी जाएँ। क्रमशः रोज एक-एक पीपल बढ़ाएँ। जब दस पीपल हो जाएँ तब रोज एक-एक पीपल कम करते जाएँ। यदि रोगी बलवान् और कष्ट-सहनशील हो तो दो-दो, तीन-तीन पीपल भी बढ़ा सकते हैं। इसी क्रम का नाम 'वर्धमान पिप्पली' है।
वर्धमान पिप्पली की दूसरी विधि यह है कि पिप्पली को थोड़ा कूटकर गोमूत्र या मट्ठा में भिगो दें। २४ घण्टे भीगने पर खूब महीन पीसकर, जरा-सा नमक मिलाकर पानी के साथ पी जाएँ। पिप्पली बढ़ाने या घटाने का क्रम पहले जैसा ही रखें। यह विधि श्रेष्ठ है। हम इसी विधि से रोगियों को सेवन कराते हैं। इसके सेवन से पीलिया, यकृत्, प्लीहा, पुराना बुखार, मन्दाग्नि, संग्रहणी आदि कठिन बीमारियाँ अच्छी होती हैं। पुराने ज्वर में तो यह बहुत लाभ करती है। हमारी बहुत बार की परीक्षित है।

(३) नवायस लौह -- सोंठ, पीपल, काली मिर्च, हरड़, बहेड़ा, आँवला, नागरमोथा, वायविडङ्ग और चित्रकमूल की छाल -- इन ९ दवाओं में से प्रत्येक ११.६६ ग्राम और लौह भस्म १०५ ग्राम -- इन सबको एक साथ घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें या महीन चूर्ण बनाकर कपड़छान कर रख लें।
अनुपान -- शहद और घी। इसके सेवन से पाण्डुरोग निश्चय ही अच्छा होता है। यह बहुत बार की परीक्षित दवा है। इसे २४३ मि.ग्रा. से आरम्भ कर २ ग्राम तक खाना चाहिए। यह यकृत्-रोग की भी अच्छी दवा है। (भै. र.)

(४) ताप्यादि लौह -- हरड़, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, चित्रकमूल, वायविडङ्ग -- प्रत्येक २९ ग्राम; नागरमोथा १७.५ ग्राम; पीपलामूल, देवदारु, दारूहल्दी, दालचीनी, चव्य -- प्रत्येक ११.६ ग्राम; शुद्ध शिलाजीत, स्वर्णमाक्षिक भस्म, रौप्य (चाँदी) भस्म, लौह भस्म -- प्रत्येक ११६.६ ग्राम; मण्डूर भस्म २३३.३ ग्राम; मिश्री ३७३ ग्राम -- सबको बारीक घोंटकर छान लें। इसकी १२१.५ से ३६४.५ मि.ग्रा. तक की मात्रा दिन में दो बार मूली के रस या गोमूत्र के साथ देने से पाण्डु, कामला, यकृत् एवं प्लीहा-विकार, खून की कमी, शोथ (सूजन), स्त्रियों के मासिक धर्म की गड़बड़ी आदि रोग शीघ्र आराम होते हैं। मलेरिया के बाद उत्पन्न रक्ताल्पता की भी यह अच्छी दवा है। इससे खून की वृद्धि होकर शरीर की सब इन्द्रियाँ बलवान् हो जाती हैं। यह बालकों के धनुर्वात एवं बाल-ग्रह में भी लाभदायक है। (औ. गु. ध. शा.)

(५) पुनर्नवादि मण्डूर -- पुनर्नवा, निशोथ, सोंठ, पीपल, मिर्च, वायविडङ्ग, देवदारु, चित्रक, पुष्करमूल, हर्रे, बहेड़ा, आँवला, हल्दी, दारूहल्दी, दन्तीमूल (जमालगोटे की जड़), चव्य, इन्द्रजौ, कुटकी, पीपलामूल, नागरमोथा -- इन २० दवाओं को प्रत्येक ११.६६ ग्राम और मण्डूर भस्म ४६७ ग्राम लें। बनाने की विधि यह है कि ऊपर वाली सब दवाओं का महीन चूर्ण करके रख लें। मण्डूर भस्म ४६७ ग्राम को ३.७३ किलो गोमूत्र में डालकर लोहे की कड़ाही में पकाएँ। जब द्रव भाग गाढ़ा हो जाय तब नीचे उतारकर ऊपर वाला चूर्ण मिला दें और ३६४.५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। गोमूत्र के अनुपान से रोगी को खिलाएँ। इससे पाण्डुरोग, शोथ, उदररोग, अफरा, शूलरोग आदि अच्छे होते हैं। परीक्षित है। (भै. र.)

(६) आरोग्यवर्धिनी वटी -- (यकृत् रोगाधिकार देखें) पीलिया की परीक्षित शास्त्रीय औषध है।

(७) आमलक्यावलेह -- आँवले का रस ३.७३ किलो लेकर पकाएँ। ४६७ ग्राम शेष रहने पर उतार कर पीपल २३३ ग्राम, मुनक्का २३३ ग्राम, मुलेठी २९ ग्राम, वंशलोचन २९ ग्राम और सोंठ २९ ग्राम -- (इनमें मुनक्का पीसकर और शेष ४ चीजों का महीन चूर्ण करके) डाल दें। फिर ७२९ ग्राम चीनी की चाशनी अलग बनाकर मिलाएँ और २३३ ग्राम शहद भी मिलाएँ। इसी का नाम 'आमलक्यावलेह' है। ५.८ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक गोमूत्र या मट्ठा के साथ सेवन करने से पाण्डुरोग अच्छा हो जाता है। (यो. र.)

(८) त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आँवला), गिलोय, अडूसा, कुटकी, चिरायता और नीम की छाल -- इन आठ दवाओं का काढ़ा शहद के साथ पीने से पीलिया अच्छी होती है।

(९) सनाय ११.६६ ग्राम, खजूर ५८ ग्राम और मजीठ ३ ग्राम को २३३ ग्राम जल में अच्छी तरह मिलाकर रात को रख दें। सुबह बिना हिलाये उस पानी को छानकर पीने से पाण्डुरोग आराम होता है।

(१०) कड़वी तुम्बी (कटुतूम्बी) का चूर्ण नस्य की तरह सूँघने से पीलिया में बहुत आराम होता है।

(११) कुटकी का महीन चूर्ण कर लें। सुबह और शाम तीन-तीन ग्राम चूर्ण को ताजे जल के साथ लें। यह पीलिया की परीक्षित औषध है, निश्चित रूप से लाभकारी है।

(१२) गोमूत्र २९ ग्राम से ५८.३ ग्राम तक पीने से पाण्डुरोग अच्छा होता है।

(१३) ताजे आँवले के रस ५८.३ ग्राम में २३.२ ग्राम शहद मिलाकर पीने से आराम होता है। सहजन की छाल, पीली सरसों, एलवा, देवदारु, एरण्डमूल, पुनर्नवामूल -- ये सब समान भाग लेकर बकरी के दूध में पीसकर कुछ गर्म करके बढ़े हुए यकृत् पर मोटा लेप करने से लाभ होता है।

पथ्यापथ्य

जौ, गेहूँ, चना आदि की रोटी खानी चाहिए। आटा मोटा और भूसी सहित खाया जाय तो उत्तम है। दलिया या खिचड़ी, पुराने चावल का भात और हरी पत्तियों का शाक, लोहे की कड़ाही में गर्म किया हुआ दूध, नमक मिलाकर मट्ठा पीना उत्तम है। परन्तु मट्ठे में घी का भाग न होना चाहिए। मछली, मांस, गरम मसाला, मिर्च, तेल, मिठाई, पूरी, कचौड़ी आदि खाना मना है। जिससे कब्जियत पैदा होती हो, ऐसा आहार-विहार न करना चाहिए। शक्ति के अनुसार घूमना-फिरना और हल्का व्यायाम करना अच्छा है। गाय का ताजा दही या मट्ठा बहुत लाभ करता है।