आरोग्य-प्रकाशकृमिरोग

कृमिरोग

8 मिनट का पाठ

हमारा देश उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र में है। उष्ण प्रदेश के निवासियों के पेट में कीड़े या कृमि प्रायः पड़ जाते हैं। इस कारण हमारे यहाँ भी वे लोग, जो स्वास्थ्य के नियमों तथा शुद्ध पेय जल की महत्ता से अनभिज्ञ हैं, पेट के कृमियों के शिकार हो जाते हैं। ये कृमि कई प्रकार के होते हैं जो मनुष्य के मल में बराबर निकलते रहते हैं और उन्हें आसानी से देखा जा सकता है। कुछ कीड़ों को नंगी आँखों से देख पाना कठिन होता है। इनके अण्डे या सुप्तरूप (सिस्ट) का ज्ञान सूक्ष्मदर्शक यन्त्र (माइक्रोस्कोप) की सहायता से आजकल आसानी से कर लिया जाता है। आयुर्वेद में भी कृमियों का विशद वर्णन मिलता है, परन्तु आधुनिक विज्ञान का वर्णन बहुत खोजपूर्ण और विशाल है। कृमि होने पर निम्नलिखित लक्षण प्रायः मिलते हैं:

ज्वरो विवर्णता शूलं हृद्रोगः सदनं भ्रमः।
भक्तद्वेषातिसारश्च संजातकृमिलक्षणम् ॥

अर्थात् ज्वर या हरारत का होना, शरीर का पीला पड़ जाना, पेट में दर्द, दिल में धक-धक होना (घबराहट), चक्कर आना, खाना अच्छा न लगना तथा यदा-कदा दस्त हो जाना। उदर में पाये जाने वाले कृमियों का वर्णन नीचे दिया जा रहा है:

(१) सूत्रकृमि (Threadworm / Pinworm) -- सूत जैसे छोटे-छोटे ये कीड़े दल बाँधकर मलद्वार के पास निवास करते हैं। कभी-कभी मूत्रनली या योनि के पास भी पहुँच जाते हैं। वहाँ पहुँच कर खुजली तथा जलन पैदा कर देते हैं। ये छोटे-छोटे कीड़े (चुनचुने) बच्चों को बहुत होते हैं और बच्चों को तकलीफ भी बहुत देते हैं। गुड़ या चीनी का अधिक खाना इस रोग का प्रधान कारण है। इनका प्रधान लक्षण यह है कि बच्चा नींद में सोते-सोते दाँत पीसता है, नाक के अग्रभाग और गुदा-द्वार को बार-बार खुजलाता है, साँस से दुर्गन्ध आती है, हाजमा खराब रहता है, कै, पतले दस्त, बुखार और शरीर में खून की कमी हो जाती है। ये छोटे-छोटे कृमि बड़ी उम्र वालों को भी होते हैं, परन्तु उनको विशेष नुकसान नहीं पहुँचा सकते।

(२) गण्डूपद कृमि (Roundworm) -- केंचुए जैसा लम्बा और केंचुए के आकार का यह कीड़ा छोटी आंत में रहता है। कभी-कभी आमाशय की राह से चढ़कर मुँह से भी निकल आता है। पेट में दर्द, नींद में चौंकना, नाक और गुदा में खुजली, पेट फूलना, बेहोशी, कभी तीव्र भूख और कभी अरुचि, कमजोरी, शरीर का सूखना, मुँह में लार आना, कै आदि इसके लक्षण हैं। इस कीड़े की लम्बाई ४ से १२ इंच तक की होती है।

(३) स्फीत कृमि (Tapeworm) -- यह फीते जैसा लम्बा चपटा कीड़ा होता है। यह मल के साथ टुकड़ों में निकलता है। यह आकार में चिपटा, गाँठदार और रंग में सफेद होता है। इसमें भी अन्य कृमियों जैसे ही लक्षण प्रकट होते हैं। स्फीतकृमि मुख्यतया मांसाहार करने वालों को होता है; अधपके गोमांस, सूअर के मांस और दूषित मछली के सेवन से यह फैलता है। स्फीत कृमि कई-कई मीटर लम्बे होते हैं।

(४) अंकुशमुख कृमि (Hookworm) -- हुकवर्म एक अन्य घातक कृमि है जो छोटी आंत में चिपक जाता है और मनुष्य का रक्त चूसता रहता है, जिसके कारण इस कृमिरोग से पीड़ित रोगी पीला पड़ जाता है और उसे भयंकर पाण्डुरोग (रक्तक्षय/एनीमिया) हो जाता है। रक्त में लौह-तत्त्व की भारी कमी हो जाती है। मल के साथ इसके अण्डे बाहर आते हैं, जिनसे लार्वा निकलकर बालकों या बड़ों के नंगे पैरों की फटी त्वचा को भेदकर शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। वहाँ से ऊतकों (टिश्यूज) और रक्त-प्रवाह से होते हुए छोटी आँत में पहुँचकर पूर्ण कृमि बन जाते हैं और आँत से चिपककर खून पीते हैं। जिन क्षेत्रों में यह रोग हो, वहाँ नंगे पैर शौच के लिए जाने से लोगों को रोकना चाहिए और खुले में शौच नहीं करने देना चाहिए।

कृमि पैदा होने के कारण

बराबर कब्जियत रहना, अधिक मिठाई खाना, मन्दाग्नि, कच्चे और सड़े फलों का खाना, दूषित जल पीना, अधपका या दूषित मांस खाना आदि। बालकों का कृमि-रोग बहुत-से रोगों का कारण होता है तथा बहुत-से अन्य रोगों के साथ पाया भी जाता है।

चिकित्सा

कृमिरोग के रोगी को शाम को मीठा दलिया खिलाकर सुबह मामूली जुलाब देना चाहिए। कृमिरोगी का पेट खूब साफ रखना चाहिए। एनिमा (पिचकारी) से पेट साफ करना बहुत लाभकारी है; क्योंकि आँतों में मल का संचय होना ही इस रोग की उत्पत्ति का प्रधान कारण है।

नीचे लिखी दवाओं की खुराक पूरी उम्र वाले वयस्क के लिए है। बच्चों को कृमिरोग अधिक होता है, इसलिए आगे लिखी दवाइयाँ बच्चों की उम्र के लिहाज से चौथाई भाग या उससे भी कम मात्रा में दी जानी चाहिए। फायदा न हो तो दवा की खुराक धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए।

बच्चों के कीड़ों के लिए कश्मीर में एक जड़ी पैदा होती है जिसे वहाँ के निवासी 'बुईबटी' कहते हैं। यह जड़ी सैकड़ों मन की तादाद में विलायत जाती थी और वहाँ से उसका सत्त्व बनकर आता था जिसे 'सैण्टोनीन' (Santonine) कहते हैं। अब यह भारत में भी तैयार होने लगा है। इसकी दो ग्रेन (१२१.५ मि.ग्रा.) की मात्रा दस्तावर दवा के साथ मिलाकर देने से सब तरह के कीड़े बाहर आ जाते हैं। यह दवा विषैली होती है, इसलिए पेट में न रहनी चाहिए। दवा खाने के तीन-चार घण्टे बाद जुलाब दे देना चाहिए, जिससे कीड़े भी बाहर हो जाएँ और दवा भी। आधुनिक चिकित्सा में इसके स्थान पर पिपेराजीन साइट्रेट का प्रयोग अधिक निरापद माना जाता है।

(१) सुबह उठते ही २३.२ ग्राम गुड़ खाकर १५ मिनट आराम करें। इससे पेट के सब कीड़े एक जगह जमा हो जाएँगे। फिर १ ग्राम खुरासानी अजवायन ठण्डे पानी के साथ खाएँ। इससे सब कीड़े गुदा द्वारा बाहर निकल जाएँगे और पेट के छोटे-छोटे कीड़े एकदम नष्ट हो जाएँगे।

(२) २३.२ से ३५ ग्राम तक गुड़ खाकर १५ मिनट विश्राम करें। बाद में कबीला या वायविडङ्ग का चूर्ण गर्म जल के साथ खाएँ। दोनों एक साथ मिलाकर भी खा सकते हैं। मात्रा ३ ग्राम से ६ ग्राम तक। इससे पेट के कीड़े मरकर निकल जाएँगे। कबीला और वायविडङ्ग पेट के कीड़ों की परीक्षित दवा है।

(३) प्याज का रस पिलाने से बच्चों के छोटे कीड़े (चुनचुने) मर जाते हैं।

(४) पलाश (ढाक) के बीजों का चूर्ण कृमिरोग में बहुत लाभ करता है। मात्रा ३ से ६ ग्राम। पलाश-बीज के घनसत्त्व की गोलियाँ गण्डूपद कृमि (राउण्डवर्म) निकालने की अचूक दवा मानी गई हैं।

(५) बकायन और नीम की जड़ की छाल को जल के साथ पीसकर पूरे पेट पर लेप कर दें। इससे पेट के कीड़े दस्त के साथ निकल जाएँगे। बकायन का प्रभाव बहुत ही आश्चर्यजनक बताया गया है।

(६) कृमिघातिनी वटिका -- शुद्ध पारा ११.६६ ग्राम, शुद्ध गन्धक २३.२ ग्राम, अजवायन ३५ ग्राम, वायविडङ्ग ४६.४ ग्राम, पलाश के बीज ५८.३ ग्राम और शुद्ध कुचला ७० ग्राम -- ये सब द्रव्य शहद में मिलाकर १२१.५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। गोली खाकर प्यास लगने पर नागरमोथा या मूषापर्णी का काढ़ा मिश्री मिलाकर पिएँ। इससे बहुत जल्द उदरस्थ कृमि नष्ट हो जाएँगे। (भै. र.)

(७) कृमिकुठार रस -- इन्द्रजौ, त्रायमाणा, अजमोद, वायविडङ्ग, शुद्ध हिंगुल, शुद्ध बच्छनाग, नागकेशर -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम, कपूर ९३ ग्राम, पलाश-बीज का चूर्ण १७५ ग्राम -- इन सबके चूर्ण में एक-एक भावना भृङ्गराज (जलभंगरा), मूषाकर्णी और ब्राह्मी के रस की देकर १२१.५ मि.ग्रा. (१ रत्ती) की गोलियाँ बना लें। इसे सत्यानाशी की जड़ के काढ़े के साथ या शहद से दें। इससे सब तरह के पेट के कीड़े (कृमि) नष्ट हो जाते हैं। यह बालकों के कृमिरोग में विशेष लाभदायक है। (र. रा. सु.)

(८) कृमिमुद्गर रस -- शुद्ध पारद १ भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग, अजमोदा ३ भाग, विडङ्ग ४ भाग, शुद्ध विषमुष्टि (कुचला) ५ भाग, पलाशबीज ६ भाग -- कूट-कपड़छान कर १२१.५ मि.ग्रा. की मात्रा में मधु से लेने से तीन ही दिन में समस्त कृमिरोगों को नष्ट करता है और जठराग्नि दीप्त करता है। इसके ऊपर नागरमोथा का क्वाथ पीना चाहिए। यह न केवल कृमिनाशक है अपितु कृमिजन्य विविध उपद्रवों को भी शान्त करता है। (भै. र.)

पथ्यापथ्य

कृमिरोग अधिकतर बालकों को तकलीफ देता है, अतः उनको ही कृमिरोग से बचाने का प्रबन्ध करना चाहिए। अनुभव से कहा जा सकता है कि ज्यादा मीठा (मिठाई या चीनी) खाने के कारण बच्चों के पेट में कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं। बालकों के पेट में कीड़े होने पर मीठी वस्तु खिलाना एकदम बन्द कर देना चाहिए। अजीर्ण के कारण भी कीड़े पैदा होते हैं, इसलिए बच्चों का पेट साफ रखना भी जरूरी है। बड़ी हरड़ को जल के साथ घिसकर और जरा-सा सुहागे का लावा मिलाकर देने से पेट साफ हो जाता है एवं अजीर्ण भी नष्ट होता है। बच्चे मीठी व बासी चीजें न खाने पावें, इस बात की पूरी सावधानी रखनी चाहिए।