आरोग्य-प्रकाशप्रवाहिका या डिसेन्ट्री

प्रवाहिका या डिसेंट्री

13 मिनट का पाठ

दस्तों के साथ मरोड़ (कांखना) जिस अवस्था में होता है वह अवस्था प्रवाहिका कहलाती है। मल में श्लेष्मा (म्यूकस) अधिक होता है। मल कम होता है। अमीबाजन्य डिसेंट्री (Amoebic Dysentery) प्रवाहिका ही है। इसका कारण एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका नामक जीवाणु है। यह सक्रियावस्था तथा सुप्तावस्था इन दो रूपों में आंतों में पाया जाता है। सक्रिय होने पर प्रवाहिका होती है, सुप्तावस्था में नहीं होती। कुछ अमीबा सुस्त और कुछ चुस्त अवस्था में भी देखे जा सकते हैं। अमीबा आंत की कला से नीचे रहते हैं। वहीं से कभी-कभी रक्त-धारा में होकर यकृत् तक जाकर वहाँ विद्रधि (फोड़ा) बना सकते हैं।

अमीबिक प्रवाहिका जीर्ण स्वरूप की होती है। इसमें मरोड़ के साथ एक या दो टट्टियाँ आती हैं। टट्टी में श्लेष्मा और कभी रक्त होता है। मल दुर्गन्धित होता है। ताजे मल में क्रियाशील अमीबा के दर्शन माइक्रोस्कोप में देखने से हो जाते हैं।

एक दूसरे प्रकार की डिसेंट्री बैसीलरी डिसेंट्री (Bacillary Dysentery) कहलाती है। यह प्रवाहिका न होकर एक प्रकार का अतिसार ही है जो बहुत घातक होता है। इसमें रोग का कारण दण्डाणु होते हैं। इसमें तीव्र ज्वर आता है। इसे ज्वरातिसार कहना अधिक उपयुक्त है। १०-२०-३०-५० बार तक पतले दस्त होते हैं। पेट में ऐंठन के साथ दर्द होता है। दस्त में म्यूकस और रक्त दोनों होते हैं।

चिकित्सा

पेचिश की चिकित्सा बहुत सावधानी से करनी चाहिए। दस्त को बन्द करने की दवा भूलकर भी न देनी चाहिए। आँव एक तरह का जहर है। उसे पेट में बन्द कर देने का मतलब है आदमी को सदा के लिए रोगी बनाना। अफीम आदि दवा की सहायता से आँव के दस्त को बन्द कर देने से पैर, हाथ-मुँह आदि स्थानों पर सूजन, पीलिया (पाण्डु), तिल्ली और जिगर की खराबी, कोढ़, जलोदर, मन्द ज्वर, मन्दाग्नि आदि बहुत-से रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

अक्सर देखा गया है कि पेचिश की भयानक तकलीफ के कारण अफीम, पोस्ता आदि स्तम्भक दवाओं से दस्त बन्द कर दिये जाते हैं। इस तरह एक बार तो आराम मालूम होता है, परन्तु वह मनुष्य सदा के लिए रोगी हो जाता है। मुझे बहुत-से ऐसे रोगी मिले हैं, जिन्होंने बतलाया कि अमुक समय मुझे आँव के दस्त हुए थे और अफीम आदि से बन्द कर दिये गये थे, परन्तु तब से मेरी तबियत बराबर खराब होती जा रही है।

पहले ही लिखा जा चुका है कि आंत में बहुत-सा मल जमा होने से पेचिश होती है, उस दूषित मल को खुद प्रकृति बाहर निकाल कर कोष्ठ को साफ करना चाहती है। हमें प्रकृति के कार्यों में सहायता करनी चाहिए, न कि रुकावट। इसलिए विज्ञान-सम्मत और युक्ति-संगत बात यही है कि मामूली दस्तावर दवा खिला कर आँव बाहर निकाल दिया जाय। भीतर के जहर रूपी आँव के बाहर निकलते ही रोगी को फौरन लाभ मालूम होता है।

आँव के दस्त शुरू होते ही २९ ग्राम शुद्ध रेंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) २३३ या ११६.७ ग्राम दूध में या त्रिफला के काढ़े में मिलाकर पिएँ। यह बहुत मुफीद दवा है, तुरन्त फायदा मालूम होगा। बड़ी हरड़ की छाल का चूर्ण ६ ग्राम में काला नमक एक ग्राम मिलाकर गर्म पानी से सेवन करें, तुरन्त फायदा मालूम होगा। किसी भी मामूली जुलाब -- गुलाब के फूल, गुलकन्द, मुनक्का आदि से पेट साफ कर दें तो रोगी को फौरन फायदा होगा। पेट साफ होते ही मरोड़, बार-बार दस्त जाना, पेट दर्द आदि तत्काल अच्छे हो जाते हैं। याद रखना चाहिए कि रेंडी का तेल आँव और खून दोनों में बहुत अच्छा फायदा करता है। हरड़ आदि केवल आँव के दस्त में ही लाभ पहुँचाते हैं, खून के दस्त में नहीं।

आँव के दस्त मिट जाने पर भी कुछ दिन आमनाशक दवा खानी चाहिए और खान-पान का खूब संयम रखना चाहिए, क्योंकि आँव का थोड़ा-भी अंश पेट में रहने से बहुत उपद्रव पैदा कर सकता है।

पेट का दर्द आराम करने के लिए तारपीन का तेल पेट पर मालिश करना चाहिए। आमाशय पर तीन-चार घंटे के अन्तर से मृदु सेंक करना भी पेट दर्द में फायदा पहुँचाता है। एनीमा (पिचकारी) लेकर आंतों को धो देना बहुत फायदेमन्द है।

(१) सफेद राल और चीनी दोनों बराबर लेकर १.५ ग्राम की मात्रा में पानी के साथ खाने से पेचिश में जल्दी आराम होता है।

(२) पीपल, अनंतमूल, निशोथ, बड़ी हरड़ की छाल, आँवला, कपूरकचरी -- इनको समभाग २३.२ ग्राम लेकर काढ़ा करें और शहद तथा मिश्री मिलाकर पिलाएँ। इससे आँव के दस्त में जल्दी फायदा होता है।

(३) धनियाँ, सोंठ, बेलगिरी, नागरमोथा और नेत्रवाला -- इन पांचों दवाओं का काढ़ा आँव रोग की सर्वश्रेष्ठ दवा है। इसका नाम 'धान्यपंचक' है। आँव को समूल नष्ट करने के लिए इससे अच्छी दूसरी दवा नहीं है। रोगी की गर्म प्रकृति हो या पित्तांश अधिक हो तो इस काढ़े में से सोंठ निकालकर सौंफ मिला देनी चाहिए।

(४) कुड़ा की छाल या इन्द्रजौ, अतीस, बेलगिरी, नेत्रवाला और नागरमोथा -- इन पाँचों दवाओं का काढ़ा बनाकर पीने से आँव, शूल और रक्तातिसार में बहुत फायदा होता है। वत्सकादि काढ़ा अमीबा नामक कृमि के कारण होने वाले आँव की सबसे श्रेष्ठ दवा है। सैकड़ों रोगियों पर स्वयं परीक्षा की है। भारतवर्ष में अमीबाजन्य आँव-पेचिश बहुत व्यापक रोग है, उसकी इससे उत्तम दवा नहीं है।

(५) रूमी मस्तगी, गुलकन्द, सौंफ और बड़ी इलायची -- इन चारों चीजों का महीन चूर्ण करके और बराबर वजन में मिश्री मिलाकर ११.६६ ग्राम जल के साथ सेवन करें। इससे आँव के दस्त जल्द अच्छे होंगे।

(६) मधुकादि चूर्ण (कब्जियत अधिकारोक्त) और लवणभास्कर चूर्ण (मन्दाग्नि अधिकारोक्त) बराबर भाग मिलाकर ६ ग्राम, गर्म पानी के साथ लेने से आँव के दस्त ठीक हो जाते हैं।

(७) बड़ी हरड़, मुनक्का, सौंफ और गुलाब के फूल -- इन चारों चीजों का काढ़ा आँव के दस्त में फायदा करता है। मरोड़ (ऐंठन) ज्यादा और मल बहुत कम हो तो इससे बहुत फायदा होता है।

(८) काला तिल ३ से ६ ग्राम तक का कल्क बनाकर और पांच गुनी चीनी या मिश्री मिलाकर खाने से खून के दस्त बन्द हो जाते हैं। बवासीर का खून भी बन्द हो जाता है।

(९) कुड़ा (कुरैया) की ताजी छाल का काढ़ा शहद डाल कर पीने से खून के दस्त आराम होते हैं। केवल खून के दस्त में या खून मिश्रित दस्त में कुड़ा बहुत फायदा करता है। पुटपाक रीति से स्वरस बनाकर २३.२ ग्राम में ११.६६ ग्राम शहद मिलाकर पीना भी लाभदायक है।

(१०) कुटजावलेह -- कुरैया (कुटज) की छाल ११.६६ किलो को कूटकर ६० किलो पानी में औंटाएँ। १५ किलो शेष रहने पर उतार कर छान लें। इस क्वाथ को फिर औंटाएँ। जब क्वाथ गाढ़ा हो जाय, तब मोचरस, पाठा, लज्जालु, अतीस, नागरमोथा, बेलगिरी, धाय के फूल -- इन सातों दवाओं के प्रत्येक का ११६.६ ग्राम चूर्ण मिलाकर उतार लें। इसी का नाम 'कुटजावलेह' है। ६ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक की खुराक एक-दो या तीन बार बकरी के दूध या अडूसे की जड़ की छाल के काढ़े के साथ लेनी चाहिए। इससे खून के दस्त निश्चय आराम होते हैं। यह खूनी बवासीर, रक्तप्रदर, आँव के दस्त, संग्रहणी आदि रोगों में भी बहुत अच्छा फायदा करता है। हमारा बहुत बार का परीक्षित है। (शा. सं.)

(११) पके हुए बेल का शर्बत पुराने आँव की अव्यर्थ महौषधि है। परन्तु वह हर समय और समस्त भारतवर्ष में प्राप्त नहीं होता। चैत्र से आषाढ़ तक बंगाल, बिहार आदि प्रान्तों में मिलता है। इसके सेवन से बहुत शीघ्र लाभ होता है। इसके जैसी कब्ज को साफ करने वाली दूसरी दवा नहीं है। जो लोग कब्ज की शिकायत बराबर किया करते हैं उनको तथा बवासीर के रोगियों को समय-समय पर बेल का शर्बत पीकर अवश्य लाभ उठाना चाहिए।

(१२) इसबगोल ४ भाग, सौंफ (आधी भुनी, आधी कच्ची) १ भाग -- यह पुराने और नये आँव की उत्तम दवा है। २.९२ से ५.८३ ग्राम तक बराबर मिश्री मिलाकर जल के साथ सेवन करना चाहिए।

(१३) कुटजारिष्ट -- कुड़ा की उत्तम छाल ५.८३ किलो, मुनक्का २.९१ किलो, महुआ के फूल और गम्भारी की छाल ५८३ ग्राम को ५५.७ किलो जल में काढ़ा करें और ९.७ किलो शेष रहने पर छान लें। इस काढ़े में धाय के फूल १.२ किलो, गुड़ ५.८ किलो डाल कर स्वच्छ बर्तन में एक मास तक रखें। तैयार होने पर छान कर बोतल में भर लें। इसकी मात्रा १४.७ से २९.२ ग्राम तक है। समभाग जल में मिलाकर दिन में तीन-चार बार पिलावें। इससे सब प्रकार की संग्रहणी, अतिसार, आँव, खून के दस्त, ज्वर, मन्दाग्नि आदि नष्ट होते हैं। यह अरिष्ट अग्नि को बढ़ाता है।

पथ्यापथ्य

आँव, पेचिश के रोगियों को खान-पान पर खूब ध्यान रखना चाहिए। बहुत-से रोगी मनमाना खान-पान करके रोग को बढ़ा लेते हैं। पेचिश ज्यादा दिन रहने से आँतों में घाव हो जाता है और दस्त के साथ बराबर खून गिरने लगता है। संग्रहणी भी हो जाती है। पेचिश के रोगी को शुरू में मिश्री का शरबत, मट्ठा, बार्ली, अरारोट, साबूदाना, दूध आदि पदार्थों का सेवन करना चाहिए। धान का लावा पानी में मिलाकर लेना चाहिए। सिंघाड़े के आटे की लपसी, भात का मांड आदि भी पथ्य है। गर्म पानी ठण्डा करके देना चाहिए। जब रोगी भूख से व्याकुल होने लगे, तब पुराने चावल का भात, दही, चावल-मूंग की खिचड़ी, गेहूँ का दलिया आदि देना चाहिए। रोटी, पूरी, कचौड़ी आदि कठिन चीजें न दें। रोग पुराना हो गया हो, तो अन्न बिल्कुल न देना चाहिए। बकरी या गाय के दूध पर ही निर्वाह उत्तम है। यदि सिर्फ दही ही भोजन में दिया जाय तो बहुत लाभ होता है। रोगी को हवादार और उजाले स्थान पर शान्ति से लेटे रहना चाहिए। घूमना-फिरना एकदम मना है। आँव और खून के दस्तवाले रोगी को उठना-बैठना भी नुकसान करता है। जहाँ तक हो लेटे-लेटे ही टट्टी और पेशाब रोगी को करना उचित है। स्नान मना है, परन्तु तौलिये को जल में भिगो कर शरीर को अच्छी तरह पोंछ लेना चाहिए।

अमेबिक प्रवाहिका (Amoebic Dysentery)

समस्त भारत में अमेबिक प्रवाहिका रोग अत्यधिक होता है। कोई ही भाग्यशाली व्यक्ति होगा जिसको यह आँव-पेचिश न हुई हो। यह रोग जल द्वारा फैलता है। इसलिए इसके बचाव के लिये भारत सरकार शुद्ध पेय जल की व्यवस्था समस्त भारतवर्ष में कर रही है, जिसमें हजारों अरब रुपया खर्च होगा। वास्तव में यह आँव-पेचिश का रोग बहुत दुष्ट है। एक बार होने पर मनुष्य का सुख-स्वास्थ्य सदा के लिए नष्ट हो जाता है। इस रोग की प्रथमावस्था में बदहजमी होती है। दस्त की कब्जियत या ढीला पतला दस्त होता है। रोग बढ़ने पर दस्त में आँव (चिकना कफ जैसा) आता है। कई बार पाखाना जाने पर भी पेट साफ नहीं होता। मन में ग्लानि बनी रहती है। काम में उत्साह नहीं होता। बड़ी आंत में वायु बहुत पैदा होती है जिसको आजकल सभी लोग गैस कहते हैं। आंत में घाव हो जाता है। बिना पका हुआ मल जाता है। मल परीक्षा में अमीबा कीटाणु या उसके अण्डे दीखते हैं। आँव-पेचिश के रोगी को मल परीक्षा अवश्य करा लेनी चाहिए।

चिकित्सा -- अमीबा रोगाणु की वृद्धि मल संचय से होती है, इसलिये पेट साफ रहना आवश्यक है। इसके लिये इस रोग की सर्वश्रेष्ठ और निर्दोष दवा इसबगोल है। साबित इसबगोल १ चम्मच भिगोकर भोजन के बाद खाना चाहिए। भोजन करके भिगोई हुई ईसबगोल खाकर उठना चाहिए, उसी समय दूसरे समय के लिये ईसबगोल भिगो देना चाहिए। कम से कम ८ घंटा भीगना चाहिए। यदि ऐसा होना संभव न हो तो ६० ग्राम ईसबगोल दाना, २० ग्राम भुनी हुई सौंफ, २० ग्राम बिना भुनी सौंफ -- इनका चूर्ण बनाकर भोजन के बाद इसे ६ ग्राम मात्रा में लेना चाहिए। इससे अमीबा के रोगी का समस्त जीवन आराम से कट जाता है। दवा की कोई आदत नहीं पड़ती। बीच-बीच में अधिक वायु हो तो अग्नितुण्डी वटी या हिंग्वाष्टक चूर्ण ले लें। इस रोग की स्थायी लाभ-वाली चिकित्सा केवल आयुर्वेद में है, पर है बहुत लम्बी तथा उकता देने वाली। अँग्रेजी दवा से तत्काल फायदा अवश्य होता है लेकिन कुछ समय बाद फिर रोग वैसा ही हो जाता है। नीचे लिखा वत्सकादि कषाय मैंने हजार रोगियों से अधिक को सेवन कराया है। अपने अस्पताल में रख कर विधि-विधान से करीब ५० रोगियों पर परीक्षण किया है। यह काढ़ा बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। योग यह है:

सवत्सकः सातिविषः सबिल्वः, सोदीच्य मुस्तैश्च कृतः कषायः।
सामे सशूले सह शोणिते च, चिरप्रवृत्तेऽपि हितोऽतिसारे ॥

(१) कड़वा कुड़ा की छाल, (२) कड़वा अतीस, (३) बेलगिरी, (४) खश, (५) नागरमोथा -- इन ५ दवाओं का ३५ ग्राम वजन लेकर ३५० ग्राम पानी में पकावें। जब ८७.२ ग्राम बचे तब छानकर प्रातः, सायं और सोते समय तीन बार में इसको पीवें। रोग के लक्षण शान्त होने तक तथा मल परीक्षा में कीटाणु तथा अण्डा न दीखे तब तक पीते रहें। बल्कि १५ दिन और पीवें तो अच्छा है। इस योग में कुड़ा की छाल और अतीस तत्त्व की दवा है। छाल ताजी हो तथा अतीस कड़वा तथा नया हो, घुना हुआ न हो।

(२) श्योनाक (सोनापाठा) की ताजी छाल की घनसत्त्व वटी बना लें। २-२ वटी ३ बार देने से भी अमीबा निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है -- यह काशी विश्वविद्यालय के द्रव्यगुण विभाग के अध्यक्ष श्री प्रियव्रत जी ने लिखा है, सो निश्चय ही प्रामाणिक होगा।

बहुत-से वैद्य बन्धु श्योनाक को अरलु जानते हैं, यह भ्रम है। ये दो भिन्न द्रव्य हैं। सोनापाठा के पर्ण संयुक्त २-३ हाथ लम्बे; फली दो-दो हाथ लम्बी, चार अंगुल चौड़ी, तलवार की आकृति की होती है। चातुर्मास प्रारम्भ में फूल आते हैं। अरलु वृक्ष इससे भिन्न है। अरलु की छाल भी दस्त बन्द करती है, अति स्तम्भक है।

(३) ताजी कड़वे कुड़ा की छाल की घनसत्त्व वटी बना लें। दो-दो वटी ३ बार लेने से अमीबा में लाभ होता है। आँव के साथ खून भी गिरता हो तो यह वटी बहुत लाभ करती है। केवल कुड़ा की छाल का चूर्ण भी बहुत लाभ करता है।

(४) कड़वा इन्द्रजौ का चूर्ण ३६५ मि.ग्रा. जल या मट्ठा के साथ लेने से लाभ होता है।

(५) कुटजावलेह -- कुटजाष्टक क्वाथ, कुटजारिष्ट भी इस रोग में लाभ करते हैं।

पथ्यापथ्य

चिकित्सा के समय में दलिया, खिचड़ी, दही-भात आदि पतली वस्तु देने से रोग शीघ्र अच्छा होता है। मट्ठा या दही भी बहुत लाभकारी है। जिस रोगी को अत्यधिक वायु होती हो उसको भोजन में शुद्ध तेल या घी भी लेना चाहिए। लाल या काली मिर्च बिल्कुल न खानी चाहिए। दाल कम लें या उसका पानी लें। मद्य न पिएँ। इस रोगी को सदा ही खान-पान में सावधान रहना पड़ता है। कुपथ्य होते ही रोग फिर से उभर आता है।