आरोग्य-प्रकाशदवाओं के निर्माण के विषय में आवश्यक जानकारी

दवाओं के निर्माण के विषय में आवश्यक जानकारी

14 मिनट का पाठ

स्वरस

ताजी हरी वनस्पति को जल से धोकर छोटे-छोटे टुकड़े कर खरल या इमामदस्ता में कूटकर अथवा सिलबट्टे से पीसकर साफ कपड़े में रखकर निचोड़ने से स्वरस निकलता है। इसे रस भी कहते हैं। तुलसी, अदरक, ब्राह्मी, भृंगराज, कटेरी आदि स्वरस बहुल वनस्पतियों का स्वरस इसी प्रकार निकाला जा सकता है।

पुटपाक

कुड़ाछाल, गूलरछाल और नीम-छाल जैसी कम स्वरस वाली वनस्पतियों की ताजी अन्तर्छाल जल से धोकर कूटें और उसका गोला बना लें। उस पर बड़, जामुन अथवा कमल के पत्ते लपेटकर सूत से बाँधें। फिर गीली चिकनी मिट्टी का दो अंगुल मोटा लेप करके थोड़ा सुखाएँ और आग के अंगारों में लाल होने तक पकाएँ।

इसके बाद मिट्टी और पत्ते हटाकर औषधि का गोला निकालें। उसे कपड़े में रखकर निचोड़ने से जो स्वरस प्राप्त होता है, उसे पुटपाक स्वरस कहते हैं।

कषाय (क्वाथ)

औषधि द्रव्य को जौकुट करके सोलह गुने पानी में डालकर मिट्टी के पात्र अथवा कलईदार बर्तन में बिना ढक्कन लगाये मन्दाग्नि पर पकायें – चतुर्थांश (चौथाई) जल शेष रहने पर छानकर हलका गरम ही पिलाएँ।

यूनानी मतानुसार उस क्वाथ के बचे हुए फोक (औषध द्रव्य) को पुनः आठ गुने जल में १२ घण्टे भिगोकर मन्दाग्नि पर पका कर छानकर पिलाने का भी विधान है।

फाण्ट

औषधि द्रव्य को चूर्ण कर चौगुने गरम जल में डालकर ढक्कन से ढककर लगभग १५–२० मिनट रखा रहने दें। बाद में हाथ से मसलकर कपड़े में छानकर प्रयोग में लें।

हिमकषाय

औषधि द्रव्य को चूर्ण कर छः गुने जल में मिट्टी के या काँच के पात्र में भिगोकर ढककर रात्रि भर रखा रहने दें। प्रातःकाल हाथ से मसलकर कपड़े से छानकर पियें। इसे हिमकषाय अथवा शीतकषाय कहते हैं।

कल्क

गीले ताजे द्रव्यों को जल से धोकर छोटे-छोटे टुकड़े कर सिलबट्टे पर चटनी की तरह पीस लें। अथवा सूखे द्रव्यों को चूर्ण कर जल के साथ पीस कर कल्क बना लें।

मात्रा

स्वरस, क्वाथ, फाण्ट और हिम इनकी मात्रा २३.४ से ४६.४ ग्राम तक है। कल्क की मात्रा ५.८३ से ११·६६ ग्राम तक है।

प्रक्षेप

इनमें मिश्री, मधु, भुना हुआ जीरा, गुग्गुलु, क्षार, लवण, शिलाजीत, त्रिकटु इनको मिलाना अभीष्ट हो तो एक ग्राम से ३ ग्राम तक की मात्रा में मिलायें। हींग भुना हुआ मिलाना हो तो १२१·५० से ३६३·५० मि.ग्रा. तक को पीसकर मिलायें। घी अथवा तेल मिलाना हो तो क्वाथ आदि से चतुर्थांश मात्रा में मिलायें।

चूर्ण

अत्यन्त सूखे द्रव्यों को अच्छी तरह इमामदस्ता में कूटकर वस्त्र से छानकर अथवा महीन जाली की चलनी से छानकर साफ पात्र में भरकर रख लें। इसे क्षोद या रजः भी कहते हैं। चूर्णों में चिरायता, चोपचीनी, सालममिश्री, विधारा आदि कठिन द्रव्यों को अलग से कुटवाकर उनके अनुपात के हिसाब से मिलाना चाहिये।

गुटिका (वटी)

औषधियों के कपड़छान चूर्ण को मधु, गुड़, चीनी आदि की कड़ी (गाढ़ी) चाशनी में मिलाकर या शुद्ध गुग्गुलु व शुद्ध शिलाजीत मिलाकर औषधियों के स्वरस या क्वाथ के साथ खरल में या सिलबट्टे पर अच्छी तरह घोंटाई करके हाथ से उचित परिमाण (साइज) की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाकर साफ पात्र में भरकर ढक्कन लगाकर रख लें।

प्रायः काष्ठ औषधि द्रव्यों की व गुग्गुलु योगों की गोलियाँ ४८६ मि.ग्रा. परिमाण की, धातु-भस्मों से युक्त औषधियों की २४३ मि.ग्रा. परिमाण की, शुद्ध पारद - गन्धक, शुद्ध वत्सनाभ, शुद्ध जमालगोटा, शुद्ध कुचला आदि मिश्रित औषधियों की १२१·५० मि.ग्रा. परिमाण की, शुद्ध मल्ल, शुद्ध हरिताल, शुद्ध मैनसिल, शुद्ध धतूरा बीज आदि उग्र द्रव्यों के मिश्रित योगों वाली औषधियों की ६१ मि.ग्रा. परिमाण की गोलियां बनानी चाहिए।

शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक को औषधियों में मिलाना हो तो पहले इन दोनों को पत्थर के खरल में डालकर घोंटकर कज्जल जैसी महीन और चमक रहित कज्जली बनाकर अन्य औषधियों के महीन चूर्ण में हाथों से अच्छी तरह मिलाकर मसलें।

शुद्ध वत्सनाभ या शुद्ध कुचला अथवा शुद्ध जमालगोटा को मिलाना हो तो इन्हें खूब महीन पीसकर आठ गुने गरम जल में भिगोकर पतला (द्रव) बना औषधियों के महीन चूर्ण में थोड़ा-थोड़ा चम्मच से डालते हुए हाथों से अच्छी तरह मसलकर मिलायें ताकि सारे औषधि चूर्ण में अच्छी तरह समान रूप से मिल जाये।

गोली (वटी) को चबाकर खाना चाहिए। साबुत खाने पर वह बिना हजम हुए मल के साथ जैसी की तैसी निकल जाती है; इससे कुछ भी लाभ नहीं होता।

अवलेह, पाक और मोदक

क्वाथ (काढ़ा), स्वरस, फाण्ट आदि को छानकर फिर कढ़ाही या भगोना आदि पात्र में डालकर अग्नि पर पका कर गाढ़ा किया जाता है उसे रस-क्रिया, अवलेह और घन कहते हैं। जो अँगुली से चाटने योग्य हो वह अवलेह होता है और जो गाढ़ा हो उसे पाक कहते हैं। इसी पाक के हाथ से लड्डू बना लेने पर उन्हें मोदक कहते हैं।

अवलेहों में जहाँ द्रव्यों का परिमाण न लिखा हो वहाँ प्रक्षेप चूर्ण की मात्रा से चीनी चार गुनी, गुड़ दुगुना और द्रव पदार्थ जल या क्वाथ आदि चार गुने डाले जाते हैं।

प्रायः अवलेहों में चाशनी चार तार की बनानी चाहिये व पाक तथा मोदक के लिये लच्छा की चाशनी बनाने से उत्तम व टिकाऊ बनते हैं।

तैल-पाक

प्रायः औषध सिद्ध तैल तिल से बनाये जाते हैं। यथोक्त परिमाण में तिल तैल को साफ कढ़ाही में डालकर उसमें धुआँ उठने तक गरम करके ठण्डा कर लें। फिर तैल के सोलहवें भाग के बराबर मंजीठ लें। मंजीठ के चौथाई भाग के बराबर हल्दी, लोंध, नागरमोथा, नालुका (तज), आँवला, बहेड़ा, हरड़, केवड़ामूल, बड़ की जटा और सुगन्धवाला (खस) — प्रत्येक द्रव्य लें। इनका चूर्ण करके जल के साथ चटनी जैसा पीसें और तेल में मिलाएँ। चौगुना जल डालकर मन्दाग्नि पर पकाएँ। जल का भाग जल जाने पर तेल मूर्छित हो जाता है।

अब इस तेल में योगानुसार यथोक्त औषधियों का कल्क व क्वाथ, स्वरस, कांजी, दही, दूध, गोमूत्र आदि के साथ पका करके तैल पाक सिद्ध हो जाने पर कुछ गरम रहते हुए ही कपड़े से छान कर साफ पात्र में भरकर ढक्कन लगाकर रख लें।

पीने के काम में आने वाले तैलों का पाक मध्यम किया जाता है एवं मालिश के काम में आने वाले तेलों का पाक खर करना चाहिए।

तेलों में कस्तूरी व कपूर मिलाना हो तो तैल को छानने के बाद कस्तूरी व कपूर रेक्टीफाइड स्पिरिट या मृतसंजीवनी सुरा के साथ अच्छी तरह घोंटकर पूरे तेल में अच्छी तरह मिला देना चाहिये।

घृत, तेल आदि का पाक एक दिन में ही सिद्ध नहीं करना चाहिये। मन्द-मन्द अग्नि पर पका कर पाँच-सात दिन में सिद्ध करना चाहिये। इससे वे विशेष गुणकारी होते हैं।

तैल-पाक सिद्ध होने के लक्षण ये हैं:

  • कल्क को तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों पर रखकर अँगूठे से मलने पर उसकी बत्ती-सी बँधने लगे।
  • तेल में कल्क और क्वाथ आदि द्रव्यों की गन्ध आने लगे।
  • वर्ण (रंग) भी उन्हीं द्रव्यों के अनुसार हो जाए।
  • पाक के अन्त में फेन आने लगे।

घृत-पाक

औषध सिद्ध घृतों का पाक करने में सबसे पहले एक सेर घृत को साफ कढ़ाही में मन्दाग्नि पर गरम करके फेन रहित होने पर उसमें हरड़, बहेड़ा, आंवला, हल्दी, नागरमोथा इन सबको ११·६६ ग्राम लेकर बिजोरा नीबू के रस के साथ पीस कर कल्क बनाकर घृत में मिलाकर एवं ९३३ ग्राम जल मिलाकर मन्दाग्नि से पकायें। जल का भाग जल जाने पर घृत मूर्च्छित अर्थात् आम-दोष रहित और वीर्यवान् हो जाता है।

इसके पश्चात् जो घृत बनाना हो उसके योगानुसार औषधियों का कल्क एवं क्वाथ जल, स्वरस, दूध, आदि जिन द्रव पदार्थों से पाक करना अभीष्ट हो उनको मिलाकर मन्दाग्नि से तेल पाक विधि से पकायें। पाक सिद्ध होने पर गरम-गरम को ही कपड़े से छानकर साफ बर्तन में भरकर ढक्कन लगाकर रख दें।

घृत का परिपाक और पाक सिद्ध होने की परीक्षा आदि सभी बातें तेल पाक विधि के सदृश ही हैं।

सिर्फ फर्क इतना है कि तैल पाक सिद्ध होने के समय फेन (झाग) उठते हैं। जबकि घृत में पाक सिद्ध होने पर फेन (झाग) उठना बन्द हो जाता है। घृत प्रायः पीने के काम में ही उपयोग किये जाते हैं। अतः घृत का पाक मृदु अथवा मध्यम ही करना चाहिये।

आसव-अरिष्ट की सन्धान-कल्पना

औषधियों के स्वरस, क्वाथ या जल आदि द्रव पदार्थों में गुड़, चीनी या मधु आदि मीठे द्रव्यों को घोलकर धायफूल, बबूल छाल, बेरी की छाल, महुए के पुष्प आदि सन्धान करने वाले द्रव्यों एवं औषधियों के प्रक्षेप को मिलाकर किसी साफ मटके, मर्तबान या काठ के पात्र (ढाल; मूल पाठ की पुष्टि अपेक्षित) में भरकर एक महीने या पन्द्रह दिन तक (शास्त्रोक्त मर्यादा के अनुसार) संधान कर रखने पर उसमें मद्यसार (अल्कोहल) उत्पन्न हो जाता है। यह औषधियों को चिरकाल तक सुरक्षित रखता है एवं औषधि के गुणों को भी बढ़ाती है। औषधि मद्य के व्यवायी विकासी आदि गुणों से संयुक्त होकर रोगी के शरीर में शीघ्र ही प्रभाव करती है।

आचार्यों ने इस प्रक्रिया को आसव-अरिष्ट नाम से कहा है।

आसव और अरिष्ट इन दोनों की संधान प्रक्रिया प्रायः एक समान ही है।

सिर्फ फर्क इतना है कि आसव औषधियों एवं जल को बिना पकाये हुए बन जाते हैं और अरिष्ट औषधियों के क्वाथ से बनाये जाते हैं।

किन्तु शास्त्रकारों ने सर्वत्र इस नियम का पालन नहीं किया है जैसे द्राक्षासव, लोध्रासव आदि अनेक आसव अरिष्ट विधि से बनाने का उल्लेख है और कनकारिष्ट, बबूलारिष्ट, सारिवाद्यारिष्ट, त्रिफलारिष्ट आदि अनेक अरिष्टों को आसव विधि से बनाने का विधान है।

आसव-अरिष्टों का चिकित्सा में बहुत उपयोग होता है, क्योंकि उनके सेवन से रोगी को बड़ी सुविधा रहती है जब कि पंचविधि कषाय कल्पना के स्वरस, क्वाथ, फाण्ट और हिम तथा कल्क आदि को नित्य ताजा बनाकर सेवन करने में प्राय: रोगी कष्ट व असुविधा अनुभव करते हैं।

इस विषय में अधिक जानकारी के लिये बैद्यनाथ प्रकाशन के आयुर्वेद सार संग्रह ग्रन्थ के आसव अरिष्ट प्रकरण के प्रारम्भ में दी हुई जानकारी का अवलोकन करें।

शर्बत

औषधि प्रयोग में काम आने वाले प्राय: शर्बत वनस्पतियों के स्वरस, क्वाथ, हिम, अर्क और फलों के रस आदि द्रव पदार्थों में चीनी या मिश्री मिलाकर मन्दाग्नि पर दो तार की चाशनी बनाकर तैयार होते हैं।

जहाँ द्रव पदार्थ का परिमाण एवं चीनी का परिमाण न लिखा हो वहाँ ४६७ ग्राम द्रव पदार्थ में ९३३ ग्राम चीनी डालकर शर्बत बनाना चाहिये। शर्बत न अधिक पतले और न अधिक गाढ़े बनाने चाहिये। पतले शर्बत जल्दी खराब हो जाते हैं और गाढ़े शर्बत बोतलों में जम जाते हैं।

आजकल शर्बतों की चाशनी के गाढ़ेपन (घनता) को मापने का स्पैसिफिक ग्रैविटी हाइड्रोमीटर एक हजार से पन्द्रह सौ रेंज का आता है। किसी लम्बे ग्लास या बर्तन में शर्बत को भरकर उसमें इस हाइड्रोमीटर को खड़ा डालने से जितनी डिग्री तक यह शर्बत में डूब जाये उतनी डिग्री गाढ़ी चाशनी समझनी चाहिये। शर्बत की गर्म चाशनी १२०० से १२५० डिग्री तक होनी चाहिये और शर्बत ठण्डा होने पर १२५० से १३०० डिग्री तक होनी चाहिये। इससे कम होने पर पतली और ज्यादा डिग्री की होने पर गाढ़ी चाशनी समझनी चाहिये।

शर्बत बनाते समय ९०·३३ किलो चीनी में १० ग्राम के हिसाब से नीबू का सत्त्व मिलाने से शर्बत जम नहीं पाता और स्वाद में भी अच्छा बनता है।

पाठ-संशोधन टिप्पणी: चीनी की ऊपर दी गई मात्रा का दशमलव अपुष्ट है। हाइड्रोमीटर के अंकों का पैमाना भी मूल स्कैन से सत्यापित किया जाना शेष है।

अर्क

जो औषधियाँ सुगन्ध वाली होती हैं जैसे सौंफ, अजवायन, चन्दन सफेद, इलायची आदि इनका क्वाथ करने से इनकी गन्ध और तैलीय अंश उड़ जाते हैं, जो कि इनके मुख्य कार्यकारी तत्व होते हैं। अतः इनका हमेशा क्वाथ की बजाय अर्क बनाकर ही प्रयोग करना चाहिये। अर्क में इनकी गन्ध और तैलीय अंश पूर्ण रूप से मौजूद रहते हैं। अतः वे पूर्ण प्रभावकारी होते हैं।

अर्क बनाने के लिये १·८७ किलो औषधि-द्रव्य कठिन हों तो उन्हें जौकुट करके एवं सौंफ, अजवायन, मकोय, गोरखमुण्डी आदि मुलायम द्रव्य हों तो साबुत ही सायंकाल अर्क निकालने के भपके की डेग में आठ गुने अर्थात् १५ किलो जल में भिगोकर ढककर रखें।

प्रातःकाल भपके का ऊपरी भाग उस पर फिट करके कपड़मिट्टी से सन्धिरोध करके भट्टी पर चढ़ाकर मन्दाग्नि देकर इससे १६ बोतल अर्क खींच लें।

खींचते समय भपके के ऊपरी भाग में बने आलवाल (जल भरने का स्थान) में पानी भर देना चाहिये। इस पानी से भाप उठने लगे, तब इस पानी को नाली का कार्क खोलकर बाहर निकाल देना चाहिये और कार्क लगाकर फिर ठण्डा पानी भर देना चाहिए। ऐसा आवश्यकतानुसार बार-बार करते रहें। अर्क-नाली से जिस पात्र में अर्क निकलकर गिरता रहता है उस पात्र के भी चारों तरफ ठण्डा जल भरा रहे तो अर्क बहुत अच्छा बनता है।

अर्क बिलकुल ठण्डा हो जाने पर चार तह के साफ कपड़े से या फिल्टर बैग से साफ पात्र में छानकर साफ करके सुखायी हुई बोतलों में भरकर अच्छी तरह कसकर मजबूत कार्क लगा देना चाहिये या पी० पी० कैप्स लगाकर सीलिंग करके रख लें।

अर्कों के भरने की बोतलों में कच्चे पानी की बूंदें रहने से व कार्क ढीले लगाने पर उनमें वायु प्रवेश करके अर्कों में जाले पड़कर खराब हो जाते हैं। अतः इस विषय में पूरी सावधानी रखने की आवश्यकता है। १ लीटर अर्क में ३ मि.लि. ‘सल्फ्युरिक एसिड’ मिलाकर बोतलों में भरने से जाला नहीं पड़ता है।

पाठ-संशोधन टिप्पणी: ऊपर रसायन का नाम OCR में ‘सल्फ्युरिक एसिड’ है। इसका नाम और परिमाण मूल स्कैन से पुष्ट किए बिना संशोधित नहीं किए गए हैं।

क्षार-निर्माण विधि

जिस किसी भी वनस्पति का क्षार बनाना हो उसके पंचांग को सुखाकर साफ जगह में जलाकर राख कर लें, ठण्डी हो जाने पर राख को समेटकर तोलकर मिट्टी के घड़े या कलईदार बर्तन में रखकर राख के वजन से छः गुना जल डालकर हाथ से मिलाकर पात्र को ढककर रख दें, एक-दो दिन में जब राख बर्तन के पेंदे में बैठकर पानी एकदम स्वच्छ हो जाये तब धीरे से पानी को नितार कर चार तह के कपड़े से दो-तीन बार छानकर मिट्टी की नाँद या कलईदार बर्तन में रखकर अग्नि पर पकायें। पकते-पकते जब रबड़ी जैसा गाढ़ा हो जाय तब उतारकर धूप में रखकर सुखाकर काँच या चीनी मिट्टी के जार में रख लें।

घनसत्त्व बनाने की विधि

जिस चीज का घनसत्त्व बनाना हो वह ताजी मिल सके तो ताजी ही लेकर जल से धोकर छोटे-छोटे टुकड़े करके लकड़ी के ऊखल में या इमामदस्ता में जौकुट करके साफ बर्तन में आठ गुने जल में अग्नि पर पकायें। चतुर्थांश जल शेष रहने पर कपड़े से छानकर प्राप्त क्वाथ को साफ बर्तन में डालकर मन्द-मन्द अग्नि पर पकायें। पकते-पकते मधु जैसा गाढ़ा हो जाय तब उतार लें। ठण्डा हो जाने पर घी चुपड़े हुए साफ पात्र में रख लें।

सूखे द्रव्यों का घनसत्त्व बनाना हो तो उनको कूटकर सोलह गुने जल में सायंकाल भिगोकर प्रातः क्वाथ करके अष्टमांश क्वाथ जल शेष रखकर कपड़े से छानकर घनसत्त्व बनाना चाहिये।

छोटे वनस्पति क्षुपों के पंचांग का, बड़े वृक्षों की अन्तःछाल, खदिर और विजयसार के अन्तःकाष्ठ भाग का, उदुम्बर की पत्तियों का, अदरक, हल्दी, कुटकी इनके मूल के गाँठ भाग का, गिलोय और मुलैठी लता के टुकड़ों का घनसत्त्व बनाना चाहिये।

शुष्क सत्त्व

इस प्रक्रिया में औषधियों का क्वाथ किए बिना ही सत्त्व बनाया जाता है। इनमें गिलोय सत्त्व मुख्य है। उसी की निर्माण विधि यहाँ दी जा रही है। ताजी हरी गिलोय लाकर उसमें से अंगूठे जैसी मोटी एवं इससे अधिक मोटी भी जो हो उसे लेकर जल से धोकर दो-दो इंच के टुकड़े करके लकड़ी के ऊखल में कूटकर साफ कलईदार बड़े पात्र में रखें। फिर इसमें अन्दाज से चौगुना पानी डालकर कुटी गिलोय को हाथों से मसल-मसल कर पानी में मिला दें, ताकि गिलोय के रेशों में जमा हुआ सत्त्व पानी में अच्छी तरह धुल जाय।

पश्चात् इस जल को कपड़े से अन्य साफ कलईदार पात्र में छानकर एक दिन-रात बिना हिलाए-डुलाए पड़ा रहने दें, ताकि सत्त्व पात्र के पेंदे में इकट्ठा होकर तह रूप में जम जाये।

पश्चात् दूसरे दिन धीरे-धीरे पात्र से जल को नितार कर निकाल दें और पात्र के पेंदे में जमे हुए गिलोयसत्त्व को धूप में सुखाकर रख लें। यह सत्त्व कुछ मटमैले रंग का होता है।

इसी प्रकार अदरक और हल्दी की ताजी गाँठों से और कुड़े की ताजी छाल आदि औषधियों से भी शुष्क सत्त्व बनाये जा सकते हैं।