आरोग्य-प्रकाशऔषधि द्रव्यों के ग्रहण में उपयोगी बातें

औषधि-द्रव्यों के ग्रहण करने में उपयोगी बातें

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औषधियों के उत्पत्ति-स्थान

विन्ध्याचल पर्वत आग्नेय गुणयुक्त है, अतः इस पर उत्पन्न होने वाली औषधियाँ आग्नेय गुणयुक्त होती हैं। हिमालय पर्वत सौम्य (शीतल) गुणयुक्त है, अतः इस पर उत्पन्न होने वाली औषधियाँ सौम्य होती हैं।

अन्य पर्वतों, वनों एवं उपवनों में उत्पन्न औषधियों के विषय में भी उनके उत्पत्ति-स्थान के गुणों के अनुसार आग्नेय, सौम्य और समशीतोष्ण गुणों का विचार करके उन्हें ग्रहण और प्रयोग करना चाहिए।

वर्जित स्थान

निम्न स्थानों में उत्पन्न औषधियाँ ग्रहण नहीं करनी चाहिए:

  • वल्मीक (साँप आदि के बिलों) वाली भूमि।
  • मल-मूत्र विसर्जन और कूड़ा-कर्कट फेंकने की भूमि।
  • आनूप, अर्थात् जलार्द्र भूमि।
  • श्मशान, ऊसर और मार्ग की भूमि।
  • जीव-जन्तुओं तथा कीड़े-मकोड़ों से युक्त भूमि।
  • अग्नि से जली हुई या बर्फ से ढकी हुई भूमि।

औषधियों के ग्राह्य भाग

जिन औषधियों की जड़ें मोटी हों और उनके अन्दर काष्ठभाग हो, उनकी जड़ों के छिलके लेने चाहिए। जिनकी जड़ें पतली हों, उन्हें पूरी लें। बड़ आदि बड़े वृक्षों की छाल, बीजक तथा खदिर का काष्ठसार (भीतर की लकड़ी), तालीश आदि के पत्र एवं त्रिफला आदि के फल लेने चाहिए।

चित्रक की जड़; सूरन और विदारीकन्द आदि का कन्द; नीम और अडूसे की पत्ती; धातकी के फूल; कण्टकारी का सम्पूर्ण भाग; तथा क्षीर (दूध) वाले वृक्षों की छाल लेनी चाहिए। सर्जरस (साल) आदि का गोंद, अखरोट आदि की मज्जा (गिरी) और स्नुही आदि का क्षीर लें। नीम के पत्ते न मिलें तो नीम की छाल लें। बेल का कच्चा फल और अमलतास का पका फल लें।

जहाँ विशेष निर्देश न हो

  • औषधि के किसी भाग का उल्लेख न हो तो उसकी जड़ लें।
  • किसी योग में औषधियों का वजन न लिखा हो तो सब औषधियाँ समान भाग में लें।
  • किसी विशेष धातु के पात्र का उल्लेख न हो तो मिट्टी का बर्तन लें।
  • औषधि-प्रयोग के समय का उल्लेख न हो तो प्रातःकाल लें।
  • किसी विशेष द्रव का उल्लेख न हो तो पानी लें।
  • किसी विशेष तेल का उल्लेख न हो तो तिल का तेल लें।
  • योग या अनुपान में केवल घृत, दूध, मूत्र अथवा गोबर लिखा हो तो गाय से प्राप्त द्रव्य लें।
  • केवल लवण लिखा हो तो सैन्धव लवण लें।

रक्त, रोम और नख आदि प्राणिज द्रव्य युवा प्राणियों से ही ग्रहण करें। दूध, मूत्र एवं मल ग्रहण करना हो तो प्राणी का आहार पच जाने के बाद का ही लें। किसी योग में एक ही औषधि का नाम दो बार लिखा हो तो उसे दुगुने परिमाण में लें।

चूर्ण, घृत, तेल, आसव-अरिष्ट और अवलेह के योगों में ‘चन्दन’ शब्द से सफेद चन्दन लें; लेपों में इसी शब्द से लाल चन्दन लें। शरीर के अन्दर प्रयोग, अर्थात् खाने-पीने के योगों में जहाँ अजमोद लिखा हो वहाँ अजवायन लें। शरीर के बाहरी भागों में प्रयोग के योगों में जहाँ अजवायन लिखी हो वहाँ अजमोद लेना चाहिए।

अनुपलब्ध या प्रतिकूल औषधि का विकल्प

किसी योग (नुस्खे) की कोई दवा न मिले तो उसके स्थान पर समान गुण वाली दूसरी दवा डालकर काम चला सकते हैं। यह बात केवल गौण दवाओं के लिए है; मुख्य दवा वही डालनी चाहिए। किसी योग की दवा रोगी के अनुकूल न पड़े तो उसके बदले दूसरी अनुकूल दवा का प्रयोग करना चाहिए।

औषधि-संग्रह करने का समय

समस्त रोगों में प्रयोग के लिए शरद् ऋतु में रसादि से युक्त औषधियों का संग्रह करें। वमन और विरेचन में काम आने वाली औषधियों का संग्रह वसन्त ऋतु में करें।

औषधियों के गुणहीन होने का समय

वनौषधियाँ जिस रूप में संग्रह की गई हों, उसी रूप में बनी रहने पर भी एक वर्ष में गुणहीन हो जाती हैं। किन्तु यह बात पुराने समय की है। आजकल सीमेण्ट और कंक्रीट के बने गोदामों में बोरों के अन्दर प्लास्टिक की बड़ी थैलियों में वनस्पतियाँ भरकर उनके मुँह सील कर दिए जाते हैं। इससे बाहरी हवा का प्रवेश नहीं हो पाता और वे अधिक समय तक सुरक्षित एवं गुणकारी बनी रहती हैं।

औषधियों के चूर्ण दो महीने बाद, गुटिका और अवलेह एक वर्ष बाद तथा घृत और तेल के योग सोलह महीने बाद गुणहीन हो जाते हैं। किन्तु यह बात भी उस समय की है जब औषधियों को रखने और पैक करने के अच्छे साधन सुलभ नहीं थे। आजकल काँच और प्लास्टिक के पात्र, वायुरुद्ध पैकिंग तथा पिलफर-प्रूफ सीलिंग के उत्तम साधनों से औषधियाँ पर्याप्त समय तक सुरक्षित एवं गुणयुक्त बनी रहती हैं।

औषधि का उपयोग करते समय देख लें कि वह अपने स्वाभाविक स्वरूप, वर्ण, गन्ध और सार से युक्त है या नहीं। इनसे युक्त हो तो उपयुक्त है; अन्यथा उसे गुणहीन समझें। आसव-अरिष्ट, धातु और उपधातु की भस्में, रस-रसायन (पारद-मिश्रित औषधि-योग) तथा कूपीपक्व रसायन जितने पुराने होते हैं, उतने ही अधिक गुणकारी होते हैं।