स्वास्थ्य की आवश्यकता
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धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च ॥ --चरक
भारतीय संस्कृति में मनुष्य जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति है। इन चारों ही को पाने का वास्तविक साधन पूर्ण स्वास्थ्य है। अस्वस्थ मनुष्य न तो धर्म का यथावत् पालन कर सकता है, न धन कमा सकता है। काम का आनन्द भोगना उसके लिए सम्भव नहीं; और मोक्ष की तो बात ही जाने दीजिए। वस्तुतः जीवन की सार्थकता और सुख प्राप्ति में स्वास्थ्य अर्थात् तन्दुरुस्ती का सबसे बड़ा उपयोग है।
कहावत भी है 'एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत!' तन्दुरुस्ती एक तरफ और संसार के हजारों सुख एक तरफ! विद्या, बुद्धि, धन-वैभव, कीर्ति सम्मान आदि सब तरह के सुख-साधन जिसको प्राप्त हैं वह यदि पूर्ण स्वस्थ नहीं है, तो उसके लिए वे साधन किस काम के? तन्दुरुस्त भिखारी रोगी करोड़पति से अधिक सुखी रहता है। शरीर से चंगा गरीब आदमी, रूखा-सूखा जो कुछ भी मिले उसे सन्तोष से खा-पीकर पचा लेता है और मेहनत करके सुख की नींद सोता है; परन्तु रोगी धनवान बढ़िया से बढ़िया भोजन पाकर भी उसको खा ही नहीं सकता, क्योंकि पचा नहीं पाता।
न तो वह अधिक चल-फिर सकता है, न अन्य श्रम कर सकता है, न सांसारिक भोगों को भोग सकता है और न सुख की नींद सो सकता है। इसलिए पूरे जीवन में सफलतापूर्वक संसारी सुख भोगने के लिए, विद्वत्ता, नेतृत्व, राजकार्य, व्यवसाय-नौकरी, धनोपार्जन, समाज और देश की सेवा, कीर्ति-अर्जन आदि सबके लिए सबसे पहली और अनिवार्य आवश्यकता तन्दुरुस्ती है। जीवन का सच्चा सार ही स्वास्थ्य है।
आयुर्वेद और स्वास्थ्य
सभ्यता के आरम्भ से ही हमारी जीवन-व्यवस्था में पूर्ण स्वास्थ्य और आरोग्य को ही प्राथमिक महत्त्व दिया गया है। हमारे पूर्वज पूर्ण स्वस्थ रहना मनुष्य का अनिवार्य धर्म मानते थे, इसलिए स्वास्थ्य-साधन के नियम भी धार्मिक आचरण का अंग बनकर, प्राचीन धार्मिक साहित्य में स्पष्ट मिलते हैं। भारतीय जीवन-विज्ञान -- आयुर्वेद का तो उद्देश्य ही प्राथमिक रूप से स्वस्थों के स्वास्थ्य की रक्षा करना और द्वितीयतः रोगी की व्याधि का परिमोक्षण करना निर्धारित है -- प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च।
वर्तमान काल में स्थिति बड़ी विचित्र और शोचनीय होती जा रही है। हर व्यक्ति को सुख प्राप्ति की स्वाभाविक कामना तो है, परन्तु सुख के यथार्थ आधार -- स्वास्थ्य--के प्रति सुरुचि और सचेष्टता का प्रायः अभाव ही दिखाई देता है। लोगों का इतना ही कर्तव्य शरीर के प्रति रह गया है कि जब बीमार हो गये तब वैद्य डाक्टर के पास भागे, और रोग को तुरन्त दमन करनेवाली दवा या इन्जेक्शन लेकर शरीर को काम चलाने लायक बना लिया।
इस वृत्ति के परिणामस्वरूप जन सामान्य की रोगक्षमता और जीवनी-शक्ति एकदम निर्बल होती जा रही है। मामूली कारणों से ही बात-की-बात में लोग बीमार पड़ने लगे हैं। अस्पतालों या वैद्य डाक्टरों के यहाँ जहाँ भी देखिये, रोगियों की खासी भीड़ देखने को मिलती है। हमारी सरकार को करोड़ों-अरबों रुपए प्रतिवर्ष चिकित्सा के साधन बढ़ाने पर व्यय करने पड़ते हैं। फिर भी चिकित्सा-सुविधाएँ न के बराबर हो रही हैं।
डाक्टरों की कमी को पूरा करने के लिए करोड़ों रुपयों की लागत के नये नये मेडिकल कालेज खोले जा रहे हैं। सब तरह की दवाओं की खपत दिनों-दिन अधिक हो रही है और नित्य नई दवाओं का प्रचार बढ़ रहा है।
परन्तु इस तरह चिकित्सा के साधन बढ़ाते जाने से रोगों का अन्त और आरोग्य की स्थापना कभी नहीं हो सकती। ज्यों-ज्यों चिकित्सा-सुविधा बढ़ेगी, त्यों-त्यों मनुष्य स्वाभाविक स्वास्थ्य-साधन के प्रति उदासीन बनता जायगा।
रोग निवारण हेतु चिकित्सा और औषध निश्चय ही आवश्यक हैं; परन्तु केवल रोगियों की रक्षा के लिए चिकित्सा-साधन विपुल बनाने मात्र पर सारी शक्ति लगा दी जावे और स्वस्थों की स्वास्थ्य-रक्षा पर उचित ध्यान न दिया जाय तो धीरे-धीरे वे भी रोगी होंगे, इस तरह रोगियों की संख्या बढ़ेगी और रोगों का यह कभी समाप्त न होने वाला क्रम बन जायगा।
वस्तुतः आवश्यकता यह है कि चिकित्सा-साधनों की आवश्यकता ही कम होती जावे। यह तभी हो सकता है कि लोग तन्दुरुस्ती का श्रेष्ठ महत्त्व समझें और दवाओं पर आश्रित रहने की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहने के प्रति सुरुचि सम्पन्न, जागरूक और सचेष्ट हों।
पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए स्वास्थ्य-रक्षा के नियमों और सिद्धान्तों का ज्ञान हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। ज्ञान होने से भी अधिक अनिवार्य है उस ज्ञान का जीवन के आचरण व्यवहार में सदुपयोग। स्वास्थ्य का महत्त्व हृदयंगम करके, उसके लिए तदनुकूल आचरण करने से ही स्वास्थ्य के स्थैर्य की प्राप्ति होगी। आचरण की प्रवृत्ति भावना-धारणा से होती है, इसलिए प्रत्येक मनुष्य को विद्यार्थी जीवन से ही यह दृढ़ भावना बना लेनी चाहिए कि जीवन में पूर्ण स्वस्थ रहना सबसे बड़ी सफलता और समस्त सफलताओं का सुनिश्चित आधार है। स्वस्थ रहना उत्तम धर्म और रोगी होना सबसे बड़ा अपराध और महापाप है। रोग आरोग्य और कल्याण को नष्ट करते हैं।
सच्चे स्वास्थ्य की पहचान
बहुत लोग भारी-भरकम शरीर को ही स्वस्थ मान लेते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि जिसके शरीर में किसी रोग के कीटाणु न हों, वही स्वस्थ है; परन्तु ये दोनों बातें पूर्ण स्वास्थ्य की परिचायक नहीं हैं। आयुर्वेद में पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा निम्न है :-
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥
अर्थात वही मनुष्य पूर्ण स्वस्थ है जिसके शरीर में वात अर्थात् स्नायुमण्डल (Nervous system), पित्त अर्थात् पाचकाग्नि एवं रक्त- संवहन (Digestion and blood circulatory system) और कफ अर्थात् ओज (जीवनशक्ति) और मलोत्सर्ग (Vitality and Excretory system) यह तीनों ही निश्चित अवस्था में, बराबर-बराबर एक समान हो और तीनों प्रणालियां यथावत काम करती हों, जिसकी अग्नि सम हो अर्थात् तीव्र या मन्द न हो, जिससे खाये-पिये अन्नादि का पाचन ठीक से होता हो, समधातु, अर्थात् जिसकी रस, रक्त, मांस, मज्जा आदि समस्त शरीर धातुएं कम-बढ़ न हों, जिसकी मलक्रिया अर्थात् शरीरगत मलों को भीतर से बाहर निकालने वाली प्रणाली ठीक-ठीक कार्य करती हो, जिससे पाखाना, पेशाब, कफ और पसीना आदि मैल यथासमय नियमित निकलते रहते हों। इसके साथ ही जिसकी आत्मा, मन और इन्द्रियाँ प्रसन्न एवं सन्तोषी रहें-- वही स्थिति पूर्ण स्वास्थ्य की परिचायक है।
आयुर्वेद के मतानुसार मानव शरीर के रचनातत्त्वों में पंचमहाभूतों के अतिरिक्त आत्मा और मन को भी गिना जाता है। मानव शरीर मन प्रधान है, अतएव पूर्ण स्वास्थ्य में शरीर के साथ अन्तःकरण का स्वस्थ होना भी परम आवश्यक है। शरीर तो हृष्टपुष्ट और सर्वथा कीटाणुरहित हो; मुख्य घटक सम हों, शारीरिक क्रियायें भी नियमित हों, परन्तु अन्तःकरण यदि स्वस्थ और प्रसन्न नहीं है तो उस मनुष्य को पूर्ण स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। ऊपर से स्वस्थ सुखी दिखने वाला मनुष्य यदि भीतर से अशान्त एवं दुःखी है तो उसको यथार्थ में पूर्ण स्वस्थ कैसे माना जायगा? पूर्ण स्वस्थ वही है जिसके निरोग और बलशाली शरीर में स्वस्थ और सशक्त मन का निवास है।
मानसिक स्वास्थ्य
पूर्ण स्वास्थ्य की परिभाषा में मानसिक प्रसन्नता का सर्वोपरि महत्त्व है। अतएव स्वास्थ्य का ज्ञान करते हुए हमें सबसे पहले मानसिक स्वास्थ्य पर विचार करना चाहिए।
वायुः पित्तं कफश्चेति शारीरो दोष संग्रहः।
मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥
वात-पित्त-कफ ये शारीर दोष हैं। इसी प्रकार रज और तम मानस दोष हैं। इन दोनों की वृद्धि से मानसिक अस्वास्थ्य उत्पन्न होता है। अन्य देशों के मुकाबले हमारे देश में अभी भी मानसिक अस्वास्थ्य अधिक नहीं है तथापि हमारे नागरिक क्षेत्र के शिक्षित वर्ग में विशेषकर, मानसिक असन्तोष से उत्पन्न काम-क्रोध, भय, विषाद, उन्माद इत्यादि के रूप में विभिन्न मानसिक रोग पाये जाते हैं। भौतिक शिक्षा से काम-वासना, तृष्णा, लोभ और अति संग्रह की प्रवृत्ति से मानसिक असन्तुलन बढ़ता है, वही आधुनिक जीवन में मानसिक अस्वास्थ्य का प्रधान कारण है।
अति प्राचीन काल में ऋषि जीवन बिताने वाले भारतीय, यायावर स्थिति में रहा करते थे, अर्थात् किसी एक स्थान पर स्थिर न होकर पर्यटक की भांति यत्र-तत्र प्रवास करते थे। उनकी आवश्यकतायें सीमित थीं। अधिक सामग्री संग्रह करने की न अपेक्षा थी, न सुविधा। इस प्रकार वे सन्तुष्ट और शान्त मना रहा करते थे। कालान्तर में यायावर स्थिति को त्याग कर, वे समूह बना कर एक स्थान पर रहने लगे।
धीरे-धीरे उनमें शालीनतापूर्वक रहने की इच्छायें जागृत हुईं, इसलिए उन्होंने ग्राम और नगर बसाये। परिणामतः उनमें ग्राम्यदोष उत्पन्न हो गये। परिश्रम त्यागकर आलसी हो गये और संग्रहवृत्ति से उनमें मानसिक दोष उत्पन्न होने लगे। यायावर स्थिति में दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के लिये जो दैनिक परिश्रम करते थे, वह शालीनतापूर्वक रहने से समाप्त हो गया। उस नियमित श्रम के अभाव से शारीरिक गठन तो क्षीण हुआ ही, संग्रहवृत्ति से लोभ बढ़ा जिससे उनका मन अस्वस्थ हुआ और यहीं से रोगों का श्रीगणेश हुआ। ऐसा विवरण चरक संहिता के विमान स्थान में दिया है।
आज के युग में मनुष्य का यायावर की भांति रहना सभ्यता के प्रतिकूल समझा जाता है और वैसा जीवन संभव भी नहीं रहा। समूह के साथ गृहस्थी बनाकर रहना ही पड़ता है और जीवनोपयोगी वस्तुओं के संग्रह की प्रवृत्ति अपनानी पड़ती है, तथापि उपरोक्त विवरण मानस दोषों की उत्पत्ति के मूल कारण पर प्रकाश डालता है और यह स्पष्ट संकेत करता है कि जीवन की आवश्यकताओं को सीमित रखकर ही मनुष्य सदा मनोविकारों से बचा रह सकता है।
जब से हमारा नागरिक जीवन यूरोप की भांति भौतिकता - प्रधान होता जा रहा है, तब से ही हमारे यहाँ मानसिक अस्वस्थता बढ़ रही है। निश्चय ही भौतिक विज्ञान की एकदम उपेक्षा नहीं की जा सकती। संसार की प्रगति से अपने को बिल्कुल ही अछूता बना कर तो हम रह नहीं सकते। तथापि हमें अन्धानुकरण से बचना चाहिए और पाश्चात्य सभ्यता की केवल उन्हीं बातों को ग्रहण करना चाहिए जो हमारे देश की स्थिति, जलवायु एवं परंपरा तथा सामाजिक जीवन से मेल खाती हों; जिससे कि हम मानसिक व्याधियों से बच सकें।
आत्मा की आवाज
मानसिक अस्वास्थ्य का मूल कारण है सुख-वासनावश अन्तरात्मा के विरुद्ध आचरण करना। मन, वचन और कर्म में जब विलगता एवं विपरीतता होती है, तब मनुष्य भीतर से अशान्त और दुखी रहने लगता है, अन्तरात्मा की इच्छा के प्रतिकूल, बाह्य परिस्थितिवश मनुष्य सोचता कुछ और है, कहता कुछ और है, और करता कुछ और है। आत्मा की आवाज को वह बिलकुल सुन नहीं पाता अथवा सुनकर भी उसकी अवहेलना करता है।
अन्दर अचेतन उस अन्याय को अधिक सहन नहीं कर पाता, तो वह मनुष्य को चैन नहीं लेने देता। अन्तरात्मा प्रबल शक्ति सम्पन्न है। उसके सशक्त प्रतिरोध के कारण मनुष्य के भीतर अन्तर्द्वन्द्व चलता है, उन सभी अनैतिक कार्यों के लिए दुःखी रहना पड़ता है, जिन्हें वह आत्मा की सदिच्छाओं के प्रतिकूल करता है। यह आन्तरिक दुःख, अशान्ति और असन्तोष ही मानसिक अस्वास्थ्य का मूल कारण है।
अत्यधिक आधिभौतिकवादी और तृष्णालु व्यक्तियों को सदा अन्तरात्मा के विपरीत कार्य करना पड़ता है, इसलिए वे भीतर से अहर्निश दुःखी रहते हैं। उनकी आत्मिक प्रसन्नता लुप्त हो जाती है, जिससे उनमें स्फूर्ति नहीं रहती और वे थकित, म्लान, अशान्त और पराजित से रहते हैं। आत्म- प्रसन्नता के बिना रहा भी नहीं जाता, इसलिए ऐसे लोग प्रसन्नता प्राप्ति के अन्य कृत्रिम प्रकारों से सुख प्राप्ति की चेष्टा करते हैं।
यह चेष्टा ही व्यसन बन जाती है। दुःखी मन को बहलाने के लिए उपन्यासादि पढ़ना, नाटक, सिनेमादि देखना, व्यभिचार करना, चाय, तम्बाखू, भंग और शराब आदि मादक द्रव्य पीना - यह सब कृत्रिम प्रसन्नता प्राप्त करने के अस्वाभाविक उपक्रम हैं। ये उपक्रम कभी मन को पूर्ण तुष्ट करने में सफल नहीं होते। इनसे धीरे-धीरे मन और भी अधिक अशान्त रहने लगता है, फलतः मनुष्य अति उद्विग्न रहने लगता है।
उधर आत्मा की निरन्तर फटकार से वह स्वयं को दुःखी अनुभव करने लगता है। इन सब का परिणाम मानसिक विकारों की उत्पत्ति में होता है।
कुछ पाश्चात्य विचारक अतृप्त वासना को मानसिक विकारों का मूल कारण मानकर, वासना तृप्ति को ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य बताते हैं। इन पाश्चात्य विचारकों की यह धारणा है कि नारी के प्रति पुरुष या पुरुष के प्रति नारी के आकर्षण और 'अपोजिट सेक्स' में प्रेम का कारण काम-वासना मात्र है। इसी आधार पर बहन-भाई और माता-पुत्र के स्वाभाविक प्रेम में भी पाश्चात्य लोग काम-वासना को ही अन्तर्निहित आधार मानते हैं।
यह धारणा बड़ी विचित्र है और हमारी सांस्कृतिक विचारधारा से एकदम उल्टी है। निश्चय ही पाश्चात्यों का यह निष्कर्ष सत्य नहीं है, क्योंकि समान योनि के भाई-भाई, पिता-पुत्र, माता-पुत्री और मित्रों में भी अविरल प्रेम होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब कि समान योनि वाले एक-दूसरे के लिए प्राण देते देखे गये हैं। फिर यही कैसे मान लिया जाय कि विरोधी योनि वालों के पारस्परिक प्रेम का मूल कारण काम-वासना मात्र ही है।
मनोविकारों की जननी- कामवासना
आजकल के मनोवैज्ञानिक (Psychologists) अतृप्तवासना को ही मानसिक रोगों की उत्पत्ति में मूल कारण समझते हैं। नारी तथा पुरुष के पारस्परिक प्रेम का आधार वे कामवासना मानते हैं। माता-पुत्र, भाई-बहन के प्रेम में भी वे इसी को कारण समझते हैं। यह विचार भारतीय सिद्धान्तों तथा मान्यताओं के नितान्त विरुद्ध है। वात्सल्यस्नेह और भाई-बहन का स्नेह एक पवित्र मनो-भाव है जबकि कामवासना एक मर्यादा में स्वीकृत अलग मनोभाव है जिसे सदा नियमित और संयमित रखने के लिए ही हिन्दू धर्मशास्त्रों में वैज्ञानिक विवेचन किया गया है। अपोजिट सेक्स सदा ही कामवासना जनक है, इसे भारतीय मनोविश्लेषक स्वीकार नहीं करते।
यह निश्चित है कि प्राणी मात्र में सुख प्राप्ति की कामना रहती है। सुखों में जननेन्द्रिय-सुख सर्वाधिक मधुर होता है। इसीलिए जननेन्द्रिय से मिलने वाला सुख सर्वोपरि आनन्ददायक होता है। आयुर्वेदीय विचारधारा में काम-वासना को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है। वाजीकरण प्रयोगों में श्रेष्ठ स्त्री-संभोग भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है। यह सब कुछ है, फिर भी केवल अतृप्त काम-वासना मात्र को मानसिक विकारों का कारण और उसकी तृप्ति को ही उनका निवारण मानना सर्वथा सत्य नहीं है।
काम-वासना ऐसी इच्छा है, जो निरन्तर संभोग से कभी तृप्त नहीं होती; दिन दूना बढ़ती है और अन्ततः अति काम-संभोग ही मानसिक विकार एवं स्नायुदौर्बल्य का कारण बन जाता है। इसलिए मानसिक आरोग्य के लिए काम वासना का सन्तुलन ही सर्वोपरि और यथार्थ साधन है। इच्छा का दमन अभिप्रेत नहीं, परन्तु ऐसी मनःस्थिति का निर्माण अभिप्रेत है जिसमें काम वासना प्रबल न हो।
आयुर्वेद के मतानुसार मानसिक रोगों की उत्पत्ति के प्रधान कारण रज और तम दोष हैं। इनसे उत्पन्न काम-क्रोध-लोभ-मोह ईर्ष्या-भय-अति चिन्ता और मनो- दैन्य (दिमागी कमजोरी) है। इन विकारों का जनक मुख्यतः मनुष्यों का प्रज्ञापराध है। महर्षि चरक ने सत्य ही कहा है कि :-
प्रज्ञापराधो हि मूलं रोगाणाम्।
अर्थात् -- मानव-बुद्धि की अनवधानता से होने वाली भूलें ही रोगों का मूल कारण है। मानसिक रोगों का हेतु तो निश्चित रूप से प्रज्ञापराध ही है--
ईर्ष्या शोकभयक्रोधमानद्वेषादयश्च ये।
मनोविकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः ॥
अर्थात् - जो भी मन के विकार हैं वे सब के सब प्रज्ञापराध से ही उत्पन्न होते हैं। अतएव मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रज्ञापराधों से बचना पहला कर्त्तव्य है।
मानसिक नीरोगता की प्राप्ति का सर्वोपरि उपाय यही है कि इच्छाओं में अधिक आसक्ति न रख कर जीवन की आवश्यकताओं को सीमित करें और साधन - बहुलता एवं अतिसंग्रह की प्रवृत्ति से दूर रहें। निश्चय ही सन्तोष और संयम मानसिक प्रसन्नता के आवश्यक अंग हैं। कहा भी है।
स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला।
मनसि च सन्तुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः ॥
मन के सन्तोष से करोड़पति और दरिद्र का भेद नहीं रहता। तृष्णायुक्त धनवान दरिद्र से बुरा और तृष्णाविरत निर्धन, धनवान से अधिक सुखी तथा स्वस्थ रहता है। सन्तोष का सम्बल बहुत बड़ी शक्ति है। मन सन्तोषी होगा तो उसमें विकार उत्पन्न होने का कारण ही नहीं।
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
विषयों पर ही निरन्तर ध्यान जमा रहने से वही मन में रम जाते हैं। मन और विषयों के इस संग-संयोग से काम-वासना उत्पन्न होती है; और उसमें किंचित् भी व्यवधान पड़ा कि क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से सम्मोह अर्थात् कर्तव्याकर्तव्य की अज्ञानता उत्पन्न होती है; उससे स्मृति का नाश हो जाता है। फिर यह ज्ञान नहीं रहता कि अमुक अहित आचरण से अमुक हानि हुई थी अथवा अमुक वस्तु खाने से अमुक दुःख हुआ था। इस प्रकार का ज्ञान न रहने से मनुष्य बार-बार भूलें करता है; उसे ही स्मृतिनाश कहते हैं। स्मृतिनाश से बुद्धिनाश हो जाता है और फिर सर्वनाश निश्चित ही है।
रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यविधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥
मनुष्य की बुद्धि राग-द्वेष से विमुक्त होकर विषयों का सेवन करे तो अन्तरात्मा में सन्तोष होता है, मनुष्य को स्वाभाविक शान्ति सुलभ रहती है। मनःशान्ति और बुद्धि - नियमन आहार-विहार में नियमित होने से प्राप्त होते हैं।
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलाभे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ॥ -- योगसूत्र
आहार की शुद्धता अर्थात् खान-पान में नियमित रहने से सत्त्व (मन) शुद्धि होती है। सत्त्व शुद्धि से स्मृति अर्थात् बुद्धि सन्तुलित होती है। स्मृति शुद्धि से आत्मज्ञान बढ़ता है, जिससे मानसिक ग्रन्थियों (Complexes) का पराभव होता है।
आहार-नियम के अतिरिक्त मानसिक आरोग्य के लिए मनोनिग्रह का अभ्यास सर्वोपरि है। मनोनिग्रह विषयासक्ति से निश्चित छुटकारा दिलाता है।
मनोनिग्रह सात्त्विक आचरणों से सुगमतापूर्वक साध्य होता है। सात्त्विक आचरणों की भूमिका का निर्माण सन्ध्या-वन्दन, अग्निहोत्र, ध्यान, जप और दान आदि आदर्श प्रवृत्तियों से होता है।
शरीर और मन का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। शारीरिक क्षीणता से जब मस्तिष्क कमजोर होता है तो अनिद्रा, अस्थिरता, भ्रम, अशान्ति, भय, घबराहट आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं जो मानसिक उद्वेगों को बढ़ाते हैं। बाल्यकाल से ही आयुर्वेदीय स्वस्थवृत्त का अभ्यास रहे तो रात-दिन परिश्रम करने पर भी शारीरिक क्षीणता नहीं होती और जीवन में मानसिक आनन्द भी बना रहता है। छात्र जीवन आजकल कुछ विचित्र होता जा रहा है।
शिक्षक गुरुओं के प्राचीन दायित्व से कतराते हैं और छात्रों का संग भी कुछ विकृत होता जा रहा है, इस कारण बहुत पहले से ही बालक या तरुण का मानसिक और शारीरिक विकास यथोचित नहीं हो पा रहा है। इसलिए माता-पिता या अभिभावक को बालक के विकास की ओर विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता होती है ताकि उससे प्रज्ञापराध न बन पावे।
मानसिक स्वास्थ्य हमारे शारीरिक स्वास्थ्य की आधारशिला है। स्वस्थ मन के बिना स्वस्थ शरीर की कल्पना ही गलत है। वस्तुतः शरीर की प्रमुख संचालिका गति-शक्ति मन ही तो है। मन ही मस्तिष्क है। शरीर उसका आवरण मात्र है। भीतर के तत्त्व का सीधा और प्रत्यक्ष प्रभाव आवरण पर होता है। मन की स्थिति का प्रतिबिम्ब शरीर पर निश्चित पड़ता है। यही कारण है कि क्रोधी, लोभी, कामी और ईर्ष्यालु मनःस्थिति वाले मनुष्यों की आकृति एवं शारीरिक स्थिति में स्पष्ट विभिन्नता दिखाई देती है।
क्रोधी व्यक्ति का शरीर सूखा -- सा और मुखाकृति रूखी एवं कठोर देखने में आती है। जिसका अन्तःकरण स्वस्थ होगा, उसका शरीर निश्चित ही स्वस्थ होगा। मन तो बीज है। बीज के अनुरूप ही वृक्ष और फल होता है। अशक्त बीज से सशक्त वृक्ष और फल मिलता ही नहीं। इसलिए शारीरिक स्वास्थ्य की उत्तमता के लिए मानसिक स्वास्थ्य की उत्कृष्टता निश्चित ही अनिवार्य है।
अतएव हमारा मन सदा स्वस्थ रहे, इसके लिए दैनिक जीवन में संयम-नियम, संतोष और मनोनिग्रह का अभ्यास निरन्तर रखना चाहिए। इस अभ्यास का सर्वोत्तम साधन अध्यात्म-भावनापूर्वक परमात्मा की उपासना करना है।
शारीरिक स्वास्थ्य
शरीर की कर्मेन्द्रियों का यथावत् पूर्ण सक्रिय, सशक्त और स्फूर्तिसम्पन्न रहना ही शारीरिक स्वास्थ्य है। शारीरिक स्वास्थ्य की अभिवृद्धि और स्थैर्य वस्तुतः आचरण पर अधिक निर्भर है। इसीलिए आयुर्वेद में ज्ञान से भी प्रमुख महत्व आचरण को दिया गया है। जो सत्साहित्य एक बार पढ़ा जाय उसको दैनिक जीवन के अभ्यास में सम्मिलित कर लिया जाय, इससे ज्ञान परिपक्व होता है और फलदायी भी।
दैनिक कार्यों के परिश्रम से शरीर की शक्तियाँ और रसधातु आदि का जो व्यय होता है, उसकी पूर्ति के साथ ही अतिरिक्त शक्ति संचय का प्रयास शारीरिक स्वास्थ्य का साधन है।
शरीर एक स्वसंचालित मशीन के समान है। निरन्तर चलते रहने से जैसे मशीन के पुर्जे घिसते हैं, वैसे ही काम-काज के श्रम से हमारे देहाणु (Cells) भी घिसते टूटते हैं। जैसे मशीन की सुरक्षा के लिए उसमें यथासमय तेल देना और उसको बीच-बीच में बन्द रखना जरूरी है, वैसे ही शरीर रूपी मशीन को भी आवश्यक खुराक, स्निग्धता और विश्राम मिलना चाहिए। इनके अभाव में मशीन के समान मानव शरीर भी टूटने लगता है।
शारीरिक शक्ति संचय और स्थैर्य ही शरीर स्वास्थ्य का लक्षण है। इसके लिए प्रातविधि, दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का पालन हानि पहुंचाने वाले असात्म्य आहार-विहार का त्याग, सर्वत्र सर्वप्रकार से स्वच्छता का ध्यान-यह शारीरिक स्वास्थ्य की मूल भित्ति है।
मनुष्य संपर्क के दुर्गुणों से बचकर देखा-देखी अहितकर आचरण न करे, क्षणिक और अस्वाभाविक आनन्द प्राप्ति के लोभ में मादक द्रव्यों का व्यसन न करे, शक्ति से अधिक श्रम न करे, भोग-विलास में अति न करे, आहार-विहार, विश्राम और संयम के नियमों पर दृढ़ रहकर, आयुर्वेदीय स्वास्थ्य सिद्धान्तों को दैनिक जीवन के व्यवहार में अपना ले तो प्रत्येक मनुष्य निश्चित रूप से पूर्ण स्वास्थ्य लाभ कर सकता है।
स्वास्थ्य के तीन उपस्तम्भ
भारतीय जीवन-विज्ञान - आयुर्वेद -- में पूर्ण स्वास्थ्य के निश्चित स्थैर्य हेतु तीन मूल आधार माने गये हैं;
त्रयः उपस्तंभा इत्याहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति।
एभिस्त्रिभिर्युक्तियुक्तं उपस्तब्धमुपस्तम्भैः शरीरम्।
बलवर्णोपचयोपचितमनुवर्तते यावदायुः संस्कारात्।
चरक संहिता के इस उद्धरणानुसार पूर्ण स्वस्थ मानव शरीर तीन उपस्तम्भों (आधारों) पर निर्भर रहता है। आहार अर्थात संतुलित भोजन, स्वप्न (निद्रा) अर्थात पूर्ण विश्राम और ब्रह्मचर्य अर्थात संयम। इन तीनों उपस्तम्भों को युक्तियुक्त रखने से शरीर सदा ही पूर्ण स्वस्थ रहकर दीर्घायु होता है।
कितना सत्य और सुनिश्चित सिद्धांत है। जैसे तीन पायों की तिपाई तभी तक खड़ी रह सकती है, जब तक उसके तीनों पाये यथावत् रहें। एक भी पाया टूटा तो तिपायी गिर जायगी। यही स्थिति पूर्ण स्वस्थ शरीर रूपी तिपायी की है।
तीन उपस्तम्भों पर आधारित पूर्ण स्वास्थ्य का यह आयुर्वेदीय सिद्धांत अवस्थानुसार बाल, युवा, वृद्ध, स्त्री-पुरुष सब के लिए समान रूप से हितकर और व्यावहारिक है। स्वाभाविक रूप से पूर्ण स्वस्थ और दीर्घजीवी बनने के लिए इन तीन उपस्तम्भों को समान रूप से सुदृढ़ रखना चाहिए। एक के बिगड़ते ही शेष दो स्वतः अशक्त हो जायेंगे। आहार अर्थात् भोजन में नियमित न रहें तो निद्रा और ब्रह्मचर्य कदापि यथावत् नहीं रह सकते। इसी प्रकार निद्रा (विश्राम) में नियमित न रहें तो आहार में अनियमितता अपने आप आ जायगी। आहार या विश्राम में असन्तुलन से ऐसी मनःस्थिति रह ही नहीं सकती जिसमें ब्रह्मचर्य (संयम) का यथोचित पालन हो सके।
निश्चित समय पर, नियमित भूख लगते ही, पाचन शक्ति के अनुकूल उचित मात्रा में संतुलित और पौष्टिक भोजन करना, शरीर थकने पर उचित विश्राम लेना और निश्चित समय पर सुख निद्रा में सोना, इन्द्रियों का सीमित और संतुलित उपभोग करते हुए ब्रह्मचर्य से रहना, ये तीन बातें पूर्ण स्वास्थ्य के मूल आधार हैं।
स्वास्थ्य-साधन के प्रसंग में ब्रह्मचर्य का अर्थ उचित मात्रा में, कामवासना की संतुष्टि हेतु भोग-विलास करते हुए, इन्द्रिय संयमपूर्वक जीवन रखना तो है ही, इसके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य से यहाँ उत्कृष्ट आचरण का भी संकेत है।