आहार (भोजन)
65 मिनट का पाठ
पूर्ण स्वास्थ्य के तीन मूल आधारों में प्रथम स्थान आहार का है। मुख्य रूप से अन्न पानादिक भोजन ही आहार की संज्ञा में गिने जाते हैं तथापि अन्नादि के अतिरिक्त जल और वायु भी शरीर के लिए अनिवार्य आहार हैं। शरीर की क्षतिपूर्ति और शक्त्यर्जन तो केवल भोजन से ही होता है। जल भोजन का प्रधान सहायक है, उससे भोजन के पाचन प्रचूषण में सहायता मिलती है। शरीर के तीन अनिवार्य घटक हैं भोजन, जल और वायु—यह तीनों ही त्रय उपस्तम्भ में आहार के अन्तर्गत आ जाते हैं। अतएव इस अध्याय में हम भोजन के अतिरिक्त जल और वायु पर भी विचार करेंगे।
आहारः प्राणिनः सद्योबलकृद्देहधारकः।
आयुस्तेजः समुत्साहः स्मृत्योजोऽग्निविवर्धनः ॥
आहार अर्थात् भोजन ही प्राणियों को नया बल और देह धारण करने की शक्ति देने वाला है। आहार से ही आयु, तेज, उत्साह, स्मृति, ओज (जीवशक्ति) तथा शरीराग्नि की वृद्धि होती है। अपने इन गुणों को 'सार्थक करने वाला भोजन किस प्रकार का होना चाहिए, इस संबन्ध में श्रीमद्भगवद्गीता में सात्त्विक भोजन कह कर वर्णन किया गया है।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकाः प्रियाः।
जो भोजन समस्त रसतत्वों वाला सुरस अर्थात स्वादिष्ट हो, स्निग्ध अर्थात् चिकनाई युक्त हो, शरीर को स्थैर्य देने की शक्ति रखता हो, हृदय, दिल और दिमाग को ताकत देने वाला हो, सुविधापूर्वक पचने वाला और प्रिय हो वह सात्त्विक आहार है।
आधुनिकों ने सन्तुलित भोजन (Balanced Diet) को सर्वोपरि माना है। वस्तुतः गीता में वर्णित उक्त सात्त्विक आहार ही सन्तुलित भोजन है। हमारे पूर्वजों ने संतुलित भोजन को मात्राहार और षट् रसयुक्त हित भोजन कहकर प्राचीन ग्रंथों में वर्णन किया है।
षट्त्रिशतं सहस्राणि रात्रीणां हितभोजनः।
जीवत्यनातुरो जन्तुजितात्मा संमतः सताम् ॥
हित भोजन अर्थात् सन्तुलित पथ्य भोजन ग्रहण करने वाला संयमी व्यक्ति छत्तीस हजार रात्रि अर्थात् सौ वर्ष तक पूर्ण निरोग अवस्था में जीवित रह सकता है।
भोजन के मुख्य कार्य
भोजन का मुख्य कार्य रस-रक्त आदि धातुओं को बढ़ाकर शरीर का विकास करना, क्षतिपूर्ति करना, अनिवार्य उष्णता और बल बनाये रखना तथा शरीर की जीवनी शक्ति को स्थिर करना है। आयुर्वेद का सिद्धान्त है।
'सामान्यं वृद्धि-कारणम्।' समान गुण-धर्म वाले पदार्थ से वृद्धि होती है। अतएव हमारे शरीर के निर्माण में जिन-जिन तत्त्वों का समावेश है, उन-उन तत्त्वों की क्षतिपूर्ति और बढ़ोत्तरी, उन ही तत्त्वों वाले अन्नादि पदार्थ खाने से हो सकती है। इस विचार से हम भोज्य पदार्थों के मुख्यतः चार भाग कर सकते हैं:-
-
वे पदार्थ जिसमें रस रक्तादि धातुओं और स्नायुओं की वृद्धि तथा शारीरिक क्षतिपूर्ति करने वाले तत्त्व हों जैसे दूध, अण्डा, मांस और दाल।
-
वे पदार्थ जो शरीर को आवश्यक उष्णता प्रदान करते हैं जैसे आटा, चावल, चीनी, आलू आदि।
-
वे पदार्थ जो शरीर को जीवशक्ति सम्पन्न बनाकर शक्ति का कोष भी संचित करते हैं जैसे घी, मक्खन और तेल आदि स्नेह पदार्थ।
-
वे पदार्थ जो भोजन के पाचन प्रचूषण में सहायता करते हैं, जैसे जल, पेय, खनिज पदार्थ, पाचकांश और विटामिनें।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने नवीन दृष्टिकोण से खोज करके यह निश्चित कर दिया है कि शरीर-निर्माण में कौन-कौन तत्त्व कितने अनुपात में सन्निहित हैं। तदनुसार उन्होंने यह भी निर्धारित कर दिया है कि शरीर-पोषण हेतु उन तत्त्वों में कौन-कौन कितने परिमाण में मनुष्य को अपने भोजन में ग्रहण करना चाहिए। आधुनिक विज्ञान के इस नवीन ज्ञान से अवश्य लाभ उठाना चाहिए। संसार के अन्य देशों ने नये ज्ञान से अपना भोजन स्तर उत्कृष्ट बना लिया है और हम भी अपना भोजन स्तर श्रेष्ठतर बना सकते हैं, क्योंकि १९६० में विश्व स्वास्थ्य-संगठन द्वारा सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रीय भोजन-स्तर जांच में हमारे देश का भोजनस्तर सबसे निकृष्ट सिद्ध हुआ। भारतवासियों को यह कलंक मिटाना चाहिए और अपना भोजन-स्तर उठाकर अधिक स्वस्थ एवं दीर्घायु बनना चाहिए।
भोजन का सांयोगिक संगठन
आधुनिक विज्ञान के मतानुसार मानव शरीर का सांयोगिक संगठन मुख्यतः प्रोभूजिन (Proteins), स्नेह (Fats), प्रांगोदीय (Carbohydrates), खनिज (Minerals) और जल (Water) से हुआ है। इन्हीं तत्त्वों वाले संतुलित भोजन से शरीर का पोषण और अभिवृद्धि होती है।
किस भोज्य पदार्थ में कौन-कौन सांयोगिक तत्त्व कितनी-कितनी मात्रा में विद्यमान रहते हैं, इसका ज्ञान बड़ा उपयोगी है, अतएव हम आगे विभिन्न धान्यों और खाद्यों की एक संक्षिप्त सांयोगिक संगठन तालिका दे रहे हैं।
अन्न
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बाजरा (Bajra) या वज्रान्न | ६७.१ | ११.६ | ५.० | १०२ | २२० | ३३३ | ... |
| जव (Barley) | ६९.३ | ११.५ | १.३ | ९५ | ४५४ | ... | |
| ज्वार (Millet) | ७४.० | १०.४ | १.९ | १०१ | १३६ | ३४७ | ... |
| मकई (Maize, Tender) | १५.१ | ४.३ | ०.५ | २३ | ४२ | ५०.६ | ... |
| मकई, सूखी (Maize, Dry) | ६६.२ | ११.१ | ३.६ | ९७ | १०१ | ... | |
| चावल घर के कुटे (Rice home pounded parboiled) | ७७.४ | ८.५ | ०.६ | ९९ | १५ | ३९४ | ... |
| चावल मशीन के कुटे (Rice, milled parboiled) | ७९.१ | ६.४ | ०.४ | ९८ | २१३ | ... | |
| गेहूँ (Wheat, Whole) | ७१.२ | ११.८ | १.५ | ९८ | १०८ | ६६० | ... |
| गेहूँ का आटा (Wheat flour, whole) | ७२.२ | १२.१ | १.७ | १०० | |||
| गेहूँ का मैदा (Wheat flour, refined) | ७४.१ | ११.० | ०.९ | ९९ | १२१ | ... |
द्विदल वर्ग दालें (Pulses)
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चना (Bengal Gram) | ६१.२ | १७.१ | ५.३ | १०३ | ३१६ | ३०२ | ... |
| उर्द (Black Gram) | ६०.३ | २८.० | १.४ | ९९ | ६४ | ४२२ | ... |
| मूंग (Green Gram) | ५६.६ | २४.० | १.३ | ९५ | १५८ | ४६५ | ... |
| अरहर की दाल (Red Gram) | ५७.२ | २२.३ | १.७ | ९५ | २२० | ४५२ | ... |
| सूखे मटर (Peas, Dry) | ५६.६ | १९.७ | १.१ | ९८ | ... | ४५० | ... |
| भूना मटर (Peas, Roasted) | ६३.५ | २२.९ | १.४ | १०२ | ... | ... | ... |
| मसूर (Lentil) | ५९.७ | २५.१ | ०.७ | १०० | ४५० | ४५० | ... |
| सोयाबीन (Soya-bean) | २०.९ | ४३.२ | १९.५ | १२३ | ७१० | ९०२ | ... |
| कुलथी (Horse Gram) | ५७.३ | २२.० | ०.५ | ९१ | ११९ | १.५ | ... |
पत्तीदार साग
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बन्दगोभी (Cabbage) | ६.३ | १.८ | ०.१ | ९ | २,००० | १८० | १२४ |
| गाजर का पत्ता (Carrot leaves) | ४.३ | ५.१ | ०.५ | १६ | ... | ... | ०.४ |
| हरा धनियाँ (Coriander) | ६.५ | ३.३ | ०.६ | १३ | १३,००० | ६१ | १३५ |
| गंधला (Curry leaves) | १६.० | ६.१ | १.० | २८ | १२,६०० | २.३ | ४ |
| सहजन (Drum Stick) या शिग्रु | १३.४ | ६.७ | १.७ | २७ | ११,३०० | २११ | २२० |
| मेथी (Fenugreek) | ९.८ | ४.९ | ०.९ | १९ | ३,९०० | २११ | ... |
| पोदीना (Mint) | ८.० | ४.८ | ०.६ | १६ | २,७०० | ... | ... |
| नीम (Neem) | २१.२ | ११.६ | ३.० | ४५ | ४,६०० | ... | ... |
| पालक (Spinach) | ४.० | १.९ | ०.९ | ९ | ३,००० | २७० | ४८ |
| सोया का साग (Soya leaves) | १०.८ | ६.० | ०.५ | २० | ... | १६० | ... |
कन्द-मूलादि
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चुकन्दर (Beet roots) | १३.६ | १.७ | ०.१ | १९ | अत्यल्प | ३०० | ८८ |
| गाजर (Carrot) | १०.७ | ०.९ | ०.२ | १३ | ३,००० | २०० | ३ |
| प्याज (Onion) | ११.६ | १.२ | ०.१ | १४ | ... | १३० | ११ |
| आलू (Potato) | २२.९ | १.६ | ०.१ | २८ | ४० | ७१ | १७ |
| मूली (Radish) | ४.२ | ०.७ | ०.१ | ६ | ३ | २०० | १५ |
| शकरकंद (Sweet potato) | ३१.० | १.२ | ०.३ | ३७ | १० | ४० | २४ |
| जमीकंद (Yam, elephant) | १६.४ | १.२ | ०.१ | २२ | ४३४ | १३० | अत्यल्प |
| रताल (Yam, ordinary) | २७.० | १.४ | ०.१ | ३३ | ... | ७२ | अत्यल्प |
| अरवी (Colocasia) | २२.१ | ३.० | ०.१ | २९ | ४० | २७० | अत्यल्प |
अन्य साग
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| करेला (Bitter gourd) | ४.२ | १.६ | ०.२ | ७ | २१० | १६२ | ८८ |
| बैंगन (Brinjal) | ६.४ | १.३ | ०.३ | १० | ५ | १३६ | २३ |
| लौकी (Calobash Cucumber) | २.९ | ४.५ | ०.१ | ४ | अत्यल्प | १० | ... |
| गोभी (Cauliflower) | ५.३ | ३.५ | ०.४ | ११ | ३८ | ४११ | ६६ |
| गौर की फली (Cluster beans) | ९.९ | ३.७ | ०.२ | १६ | ३३० | ... | ४९ |
| काकरी (Cucumber) | २.८ | ०.४ | ०.१ | ४ | अत्यल्प | ९४ | ७ |
| कटहल बीज (Jack-fruit seeds) | ३८.४ | ६.६ | ०.४ | ५२ | ... | ... | ... |
| भिंडी (Okra) | ७.७ | २.२ | ०.२ | १२ | ५८ | ६३ | १६ |
| विलायती लहसुन (Leeks) | १७.२ | १.८ | ०.१ | २२ | ३० | २२५ | ११ |
| आम (Mango, green) | ८.८ | ०.७ | ०.१ | ११ | १५० | ०.२ | ३ |
| आँवला (Nellikai) | १४.१ | ०.५ | ०.१ | १७ | ... | ... | ६०० |
| मटर (Peas, English) | १९.८ | ७.२ | ०.१ | ३१ | ३९ | ३७० | ९ |
| कद्दू (Pumpkin) | ५.३ | १.४ | ०.१ | ८ | ८४ | १०० | २ |
| तोरई (Ridge gourd) | ३.७ | ०.५ | ०.१ | ५ | ५६ | ६६ | ... |
स्नेहल बीज तथा शुष्क फल
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बादाम (Almond) | १०.५ | २०.५ | ५८.९ | १८६ | अत्यल्प | २४२ | ... |
| काजू (Cashew-nut) | २२.३ | २१.२ | ४६.९ | १६९ | १०० | १९२ | ... |
| नारियल (Cocoanut) | १३.० | ४.५ | ४१.६ | १२६ | अत्यल्प | १४५ | १ |
| तिल (Gingeli seed) | २५.२ | १८.३ | ४३.३ | १६० | १०० | ४.४ | ... |
| मूंगफली (Ground nut) | २०.३ | ३६.७ | ४०.१ | १५६ | ६३ | १२१४ | ... |
| अलसी (Linseed seed) | २८.८ | २०.३ | ३७.१ | १५१ | ५० | ... | ... |
| राई (Mustard seed) | २३.८ | २२.० | ३९.७ | १५१ | २७० | ४ | अत्यल्प |
| पिस्ता (Pistachio-nut) | १६.२ | १९.८ | ५३.५ | १७८ | २४० | १.४ | ... |
| अखरोट (Walnut) | ११.० | १५.६ | ६४.५ | १९५ | १० | ४५० | ... |
फल
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सेव (Apple) | १३.४ | ०.३ | ०.१ | १६ | अत्यल्प | १५० | २ |
| केला (Plantain) | ३६.४ | १.३ | ०.२ | ४३ | अत्यल्प | १८० | १ |
| अंजीर (Fig) | १७.१ | १.३ | ०.२ | २१ | २७० | ५० | २ |
| खजूर (Date, Persian) | ६७.३ | ३.० | ०.२ | ८० | ६०० | १२० | अत्यल्प |
| अंगूर (Grapes, blue) | १०.२ | ०.८ | ०.१ | १३ | १५ | १०.३ | .३ |
| कटहल (Jack fruit) | १८.९ | १.९ | ०.१ | ४ | ५४० | ०.४ | १० |
| जामुन (Jambu fruit) | १९.७ | ०.७ | ०.१ | २४ | ... | ... | ... |
| करौंदा (Kareanda, dry) | ६७.१ | २.३ | ९.६ | १०३ | ... | ... | ... |
| नीबू (Lemon) | १०.९ | १.५ | १.० | १७ | २६ | ०.१ | ६३ (रस) |
| कैरी (कच्चा आम) (Mango, green) | ८.८ | ०.७ | ०.१ | ११ | १५० | ३० | ३ |
| आम (Mango, ripe) | ११.८ | ०.६ | ०.१ | १४ | ४,८०० | ५० | १३ |
| तरबूज (Water Melon) | ३.४ | ०.१ | ०.२ | ५ | अत्यल्प | ०.२ | .१ |
| नारंगी (Orange) | १०.६ | ०.९ | ०.३ | १४ | ३०५ | १८० | ६८ |
| पपीता (Papaya, ripe) | ९.६ | ०.५ | ०.१ | ११ | २,०२० | २५ | ४६ |
| आड़ू (Peaches) | ७.६ | १.५ | ०.२ | ११ | अत्यल्प | ०.२ | .१ |
| अनन्नास (Pine-apple) | १२.० | ०.६ | ०.१ | १४ | ६० | १२० | ६३ |
| नाशपाती (Pear, country) | ११.५ | ०.२ | ०.१ | १३ | १४ | ३० | अत्यल्प |
| अनार (Pomegranate) | १४.६ | १.६ | ०.१ | १८ | ... | १० | १६ |
| किशमिश (Raisin, preserved) | ७७.३ | २.० | ०.२ | ९१ | ... | २२५ | अत्यल्प |
| स्ट्राबेरी (Strawberry) | ९.८ | ०.७ | ०.२ | १२ | ... | ... | ५३ |
| टमाटर (Tomato, ripe) | ३.९ | १.० | ०.१ | ६ | ३२० | १८० | ३२ |
| कैंथ (Wood apple) | १५.५ | ७.३ | ०.६ | २८ | ... | १७० | ... |
| इमली (Tamarind pulp) | ६७.४ | ३.१ | ०.१ | ८२ | १०० | ०.७ | ३ |
| बेर (Plum) | १२.८ | ०.८ | ०.१ | १६ | ७० | ... | ... |
| अमरूद (Guava, Country) | १४.५ | १.५ | ०.२ | १९ | अत्यल्प | ३०.२ | १९९ |
मांस-गोश्त
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बतक का अण्डा (Eggs, Duck's) | ०.७ | १३.५ | १३.७ | ५१ | २,१०० | ०.२ | ... |
| मुर्गी का अण्डा (Eggs, Fowl's) | ... | १३.३ | १३.३ | ४९ | २,२०० | अत्यल्प | ... |
| मछली (Fish, Mangalor, big) | ... | २२.६ | ०.६ | २६ | ३५ | २.० | ... |
| कलेजी (Liver, Sheep) | १.४ | १९.३ | ७.५ | ४३ | २२,३०० | २,०७६ | २० |
| बकरी का गोश्त (Mutton muscle) | ... | १८.५ | १३.३ | ५५ | ३१ | ४५.६ | ... |
| सूअर का गोश्त (Pork muscle) | ... | १८.७ | ४.४ | ३२ | अत्यल्प | १९० | २ |
| मुर्गा (Fowl) | ... | २५.९ | ०.६ | ३१ | ... | ... | ... |
दूध-दही
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गाय का दूध (Milk, Cow's) | ४.८ | ३.३ | ३.६ | १८ | १८० | २५१ | २ |
| भैंस का दूध (Milk, Buffalo's) | ५.१ | ४.३ | ८.८ | ३३ | १६२ | ... | ... |
| बकरी का दूध (Milk, Goat's) | ४.७ | ३.७ | ५.६ | २४ | १८२ | ४० | ... |
| स्त्री का दूध (Milk, Human) | ७.० | १.० | ३.९ | १९ | २.८ | ३० | ... |
| दही (Curds) | ३.३ | २.९ | २.९ | १४ | १३० | ६० | ... |
| मठा (Butter-milk) | ०.५ | ०.८ | १.१ | ४ | अत्यल्प | ... | ... |
| पनीर (छेना) (Cheese) | ६.३ | २४.१ | २५.१ | ९९ | २७३ | ... | ... |
| दूध का पाउडर (Skimmed milk powder) | १.० | ३८.० | ०.१ | १०१ | ... | ५७ | ... |
संकीर्ण
| खाद्य द्रव्य | प्रांगोदीय (कार्बोज) | प्रोटीन | स्नेह (वसा) | कैलोरी प्रति औंस | खाद्योज A (I U प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज B (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) | खाद्योज C (मिलीग्राम प्रति १०० ग्राम में) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पान (Betel leaves) | ६.१ | ३.१ | ०.८ | १२ | ९,६०० | ३१ | ५ |
| नारियल, ताजा (Cocoanut tender) | ६.१ | ०.९ | १.४ | ११ | ... | ... | २ |
| नारियल का पानी (Cocoanut water) | ४.० | ०.१ | ०.१ | ५ | ... | ... | ... |
| मछली का तेल (Cod liver oil) | ... | ... | १०० | २५६ | ६०,००० से २,००,००० | १.० | ... |
| गुड़ (Jaggery) | ९५ | ०.४ | ०.६ | १०९ | २८० | १.० | ... |
| गन्ना, ईख (Sugarcane) | २०.५ | ०.१ | ०.१ | २४ | ... | ||
| ताड़ी (Toddy) | १.३ | ०.२ | ०.१ | २ | ... | १५ | ... |
| खमीर (Yeast) | ३९.१ | ३९.५ | ०.६ | ९१ | ११० | १०,०४० | ... |
| मधु (Honey) | ८० | ... | ... | ९८ | ... | ... | अत्यल्प |
१ मिलीग्राम = १/१००० ग्राम; २८.५ ग्राम = १ औंस।
I. U. = International Unit (खाद्योज A का असर I. U. से नापा जाता है।) कैलोरी = खुराक की ऊष्मा (शक्ति) प्रदान की क्षमता नापने का यूनिट (ईकाई), जो १, ००० ग्राम (१५, ००० ग्रेन) पानी को १५° से १६° सें० गरम करने की जितनी शक्ति का व्यय होता है, उसके बराबर है।
भोजन के पौष्टिक पदार्थ
दूध
क्षीरघृताभ्यासी रसायनानाम् श्रेष्ठतमः।
आयुर्वेद के मतानुसार शरीर को परिपुष्ट और एक प्रकार से नया बना देने वाले रसायन तत्वों में दूध और घी सर्वश्रेष्ठ हैं। दूध में शरीर की क्षतिपूर्ति करके रस रक्तादि धातुओं को विवर्द्धित कर अंग-प्रत्यंग का विकास करने वाले तत्त्व प्रभूत मात्रा में होते हैं।
विश्ववन्द्य महात्मा गांधी ने 'आरोग्य की कुंजी' नामक पुस्तक में दूध के विषय में लिखा है कि— "मैं शाकाहार का पक्षपाती हूँ। मगर अनुभव से मुझे यह स्वीकार करना पड़ा है कि दूध और दूध से बनने वाले पदार्थ जैसे मक्खन, दही आदि के बिना मनुष्य शरीर पूरी तरह टिक नहीं सकता।.... मैं १९१७ में सख्त पेचिस का शिकार बना। शरीर हाड़-पंजर हो गया।
मैंने हठपूर्वक दूध या छाछ लेने से इन्कार किया। शरीर किसी तरह बँधता ही नहीं था।.... जो भी हो बकरी का दूध तुरन्त आया और मैंने वह लिया। लेते ही मुझमें नया चेतन आया। शरीर में शक्ति आयी। मैं खाट पर से उठा। इस तरह से और ऐसे अनेक अनुभवों से मैं लाचार होकर दूध का पक्षपाती बना हूँ।"
दूध वस्तुतः पूर्ण आहार है। जन्म से ही केवल माता का दूध पीकर बालक स्वस्थ रहकर विकास पाता है। यह दूध के पूर्ण आहार होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। पर्याप्त मात्रा में केवल दूध लेकर मनुष्य आनन्द से पूरा जीवन बिता सकता है। केवल दूध पर निर्भर रहने के लिए उसकी मात्रा अधिक होनी चाहिए। थोड़ा भी अन्न साथ लेने से दूध की मात्रा कम ही चल सकती है।
युवा अवस्था का व्यक्ति यदि केवल दूध दिन भर में तीन सेर से कम लेवे तो उसका वजन घटने लगेगा, परन्तु दस तोला ही अन्न एक सेर दूध के साथ लेते रहने से शरीर का वजन और शक्ति यथावत बनी रहेगी। दूध को आम के रस में मिला कर लेने से शरीर की उत्तम पुष्टि होती है इसी प्रकार दही के साथ केले का प्रयोग भी शरीर का वजन बढ़ाने में अद्वितीय है। केवल आम या केला से कुछ नहीं होता, जब कि दूध या दही अकेला ही पर्याप्त मात्रा में लेने पर वजन बढ़ा सकता है।
दूध सदा ही स्वस्थ पशु का लेना चाहिए। बीमार पशु का दूध लेने से मनुष्य का रोगी हो जाना निश्चित है, क्योंकि अन्य आहारीय पदार्थों की अपेक्षा दूध में जीवाणु - पोषक शक्ति सर्वाधिक होती है। रोगी पशु के दूध में उसके रोग-कीटाणु अधिक सशक्त होते हैं, इसलिए उससे जीवाणुजन्य रोग होने की अधिक संभावना रहती है। दूध से उत्पन्न होने वाले रोग का आरम्भ तत्काल होता है और दूध का सेवन बन्द करते ही एकदम रोग बन्द हो जाता है।
जिसका बच्चा जीवित हो ऐसी स्वस्थ गाय का दूध अमृत समान है। स्वच्छ पात्र में दुहा हुआ धारोष्ण दूध यदि तुरन्त ही स्वच्छ वस्त्र से छानकर पिया जाय तो वह सर्वोत्तम होता है। दुहने के बाद यदि १०-१५ मिनट भी दूध रक्खा रहे तो वह विकृत हो जाता है। दूध को एक उफान देकर गर्म कर लेने से उसके रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। अधिक देर आग पर रखने से भी दूध के उत्तम गुण क्षीण हो जाते हैं, और पचने में गरिष्ट भी हो जाता है।
इसलिए दूध को एक उफान आने पर आग से उतार कर, शीतोष्ण करके पी लेना चाहिए। आजकल वैज्ञानिक पद्धति से डेरीयों में ताजा दूध शुद्ध बोतलों में 100 सेण्टीग्रेड तक उबाल कर और 0° सेन्टीग्रेड तक ठण्डा करके भरा जाता है इसे दूध का पाश्चुरीकरण कहते हैं। इस विधि से दूध जीवाणु रहित हो जाता है, और उसे सीधा बिना उबाले लिया जा सकता है।
बाजारू दूध विश्वास योग्य नहीं होता और वह लाभ के स्थान पर हानि ही करता है। इसलिए किसी पूर्ण विश्वस्त ग्वाले या अच्छे डेरी फार्म का ही दूध लेना चाहिए। वैसे सबसे अच्छा तो यह है कि अपने घर में ही एक गाय रखें। इससे उत्तम दूध तो मिलेगा ही, गोबर के रूप में जलाने के लिए ईंधन या खेती-बारी अथवा बागवानी के लिए उत्तम खाद भी प्राप्त होगा।
गाय न रख सके तो स्वस्थ बकरी ही रक्खें। इस से कम दैनिक व्यय में ही एक सेर शुद्ध दूध मिलेगा। बकरी का दूध अधिक हल्का, सुपाच्य और गुणदायक होता है। गाय का उससे कम और भैस का दूध तो इन दोनों की अपेक्षा पचने में गरिष्ट और बुद्धिनाशक होता है; क्योंकि भैस स्वयं बुद्धिहीन पशु है। नीचे तालिका दी जा रही है।
विविध प्राणियों के दुग्धों की संगठन तालिका
| प्राणी | जल % | वसा % | शर्करा % | प्रोटीन % | राख % | आयुर्वेदीय गुण |
|---|---|---|---|---|---|---|
| [पशु का नाम अस्पष्ट: कुत्ती] | 86.5 | 3.1 | 5.6 | 4.0 | 0.8 | |
| कुतिया | 75.4 | 9.6 | 3.1 | 11.2 | 0.7 | |
| गधी | 90.0 | 1.3 | 6.5 | 1.7 | 0.5 | |
| भैंस | 87.35 | 3.75 | 8.75 | 3.4 | 0.75 | |
| बकरी | 86.0 | 4.6 | 4.2 | 4.8 | 0.8 | |
| भेड़ | 79.4 | 8.3 | 4.3 | 6.7 | 1.00 | |
| [पशु का नाम अस्पष्ट: मुर्गिया] | 80.9 | 7.9 | 4.5 | 5.9 | 0.8 | |
| स्त्री | 89.6 | 4.8 | 3.4 | 1.3 | 0.9 | |
| हथिनी | 67.8 | 19.6 | 8.8 | 3.9 | 0.7 |
दूध को पूर्णाहार की संज्ञा दी जाती है। इसमें जैसा कि तालिका से प्रकट है आहार के सभी घटक अच्छी मात्रा में पाये जाते हैं। दूध की प्रोटीनें बहुत उच्च प्रकार की होती है। इसमें कसीनोजन, लैक्टैल्ब्यूमिन तथा लैक्टोग्लोब्यूलिन नामक प्रोटीनें होती हैं। कार्बोजों में लैक्टोज मिलता है जो आंतों में ग्लूकोज तथा गैलेक्टोज में विभक्त हो जाता है। लैक्टोज लैक्टिक एसिड में बदल कर आन्त्र की सड़नक्रिया करने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देता है।
दूध में घी बहुत सूक्ष्म बिन्दुकों के रूप में होने से बड़ी जल्दी पच जाता है। दूध में कई खनिज लवण जैसे - कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम और सोडियम अच्छी मात्रा में होते हैं। वास्तव में दूध ही कैल्शियम प्राप्ति का सामान्य भारतीयों के लिए एक प्रमुख साधन है। दूध में विटामीन ए, बी, रीबोफ्लेवीन तथा सी मिलते हैं। डी की मात्रा कम होती है। दूध के उबालने से विटामिन सी की मात्रा बहुत कम हो जाती है पर पाश्चुरीकरण से उसको कोई हानि नहीं होती। दूध को तेज रोशनी में खुला रखने से उसकी रीबोफ्लेवीन नामक विटामिन नष्ट हो जाती है।
अन्य उच्चवर्गीय प्रोटीनों की अपेक्षा दूध की एक बड़ी विशेषता है। इसकी राख का क्षारीय होना जब कि मांस और मछली की राख अम्लीय होती है। इससे दूध पीने से शरीर का क्षारीय स्राव बढ़ता है। दूध के द्वारा आन्त्रस्थ जीवाणुओं (इंटेस्टाइनल फ्लोरा) का संरक्षण होता है जो मानव स्वास्थ्य एवं विटामिन उत्पादन की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
दूध के अतिरिक्त उससे बनने वाले अन्य पदार्थ भी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकर होते हैं। कमजोर हाजमे वालों या पेट के रोगियों के लिए दूध से बना दही, छाछ, मट्ठा और छेना आदि दूध से अधिक हितकारक होते हैं, क्योंकि इनमें चिकनाई का अंश कम रहता है, इसलिये हजम करने में शरीर को अधिक श्रम नहीं करना पड़ता। जिन्हें दूध कठिनाई से पचता हो, पेट में वायु करता हो या दस्त लगता हो, उन्हें दूध के स्थान पर दही लेना चाहिए। गर्म जलवायु वाले स्थानों और विशेषकर ग्रीष्म ऋतु में सर्वत्र दही का उपयोग ही उचित होता है।
शरीर में दही की क्रिया अच्छा प्रभाव डालती है, क्योंकि दही के रस से आँतों में रहने वाले हानिकर कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। शास्त्रों में भी दही को दीर्घ जीवन देने वाला माना गया है।
दही को मथकर उसमें से घी निकाल लेने के बाद जो मट्ठा (छाछ) बचता है, उसको कुछ लोग फेंक दिया करते हैं या पशुओं को पिला देते हैं। ऐसा करना बड़ा अज्ञान है। घी निकाला हुआ मट्ठा और मक्खन निकाला हुआ दूध यदि एक सेर लिया जाय तो वह भी एक पाव असली दूध के बराबर पुष्टई करता है। मन्दाग्नि अर्थात् कमजोर हाजमे वालों के लिए यह बहुत ही काम का होता है, क्योंकि पचने में काफी सुगम होता है। उसमें घी के अतिरिक्त शेष सभी तत्व रहते हैं। मट्ठा या तक्र की तुलना भावमिश्र ने अमृत से की है। तक्र देकर ठीक किये रोग फिर उत्पन्न नहीं होते। लिखा है :
यथा सुराणाममृतं हिताय तथा नराणां भुवि तक्रमाहुः।
दूध से बनने वाले पदार्थों में मक्खन बहुत हल्का होता है। उसका समूचा भाग आँतों में प्रचूषित हो जाता है। विशेषकर बच्चों के लिए मक्खन ही अधिक हितकारक होता है। दूध से ही पनीर या छेना बनाया जाता है। इनमें छेना तो कुछ हलका होता है, परन्तु पनीर में २० प्रतिशत प्रोभूजिन, २५ प्रतिशत स्नेह और ६ प्रतिशत लवण होता है। स्नेह की अधिकता से यह पचने में कठिन होता है, फिर भी जिन्हें पचता हो उनके लिए पनीर बहुत पौष्टिक खाद्य है। पौष्टिकता के विचार से पनीर मांस से दो गुना अधिक पुष्टिकारक होता है।
गाँधीजी के विचार से दूध शाकाहार न होकर प्राणिज भोजन है।
अण्डा
दूध की भाँति अण्डा भी पूर्ण आहार है। यह सस्ता भी पड़ता है। मुर्गी या जल-मुर्गी रखने में अधिक खर्च नहीं होता। देखा जाय तो मुर्गी और बकरी पाल कर ही हमारे देश के निर्धन वर्गीय मुसलमान और हरिजन भाई अपने शरीर को पुष्ट रखते हैं। सवर्ण हिन्दू धार्मिक भावनावश अण्डे को असात्त्विक और घृणित मान कर नहीं खाते। शाकाहार की नई परिभाषा में आजकल अण्डा भी शाकाहार में सम्मिलित किया जा रहा है।
अण्डे के विषय में महात्मा गांधीजी ने लिखा है : "अण्डे सामान्यतः मांसाहार में गिने जाते हैं, मगर दरअसल वे मांस नहीं है। आजकल तो अण्डे ऐसे तरीके से पैदा किए जाते हैं कि मुर्गी, मुर्गे को देखे बिना ही अण्डे देती है। इन अण्डों में चूजा (जीव) कभी बनता ही नहीं। इसलिए जिन्हें दूध पीने में कोई संकोच नहीं, उन्हें इस प्रकार के अण्डे खाने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए।"
शीघ्र पुष्टई देने वाले पदार्थो में अण्डा उत्तम है। आयुर्वेद में भी अण्डे को सुपाच्य, मधुर, दाह न करने वाला और तुरन्त बल देने वाला कहा गया है।
क्षीणरेतःसु कासेषु हृद्रोगेषु क्षतेषु च।
अण्डानि हितानि।
अर्थात शारीरिक धातुक्षय के अनेक रोगों में अण्डा बहुत उपयोगी है; क्योंकि यह अत्यन्त धातु-पुष्टकर खाद्य है। क्षीण गर्भाशय वाली स्त्रियों के लिए अण्डा बहुत ही लाभकर है।
एक अण्डा एक पाव दूध के बराबर गुणकारी होता है। अण्डे में खनिज दूध से भी अधिक होता है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बहुत सुपाच्य होता है। अण्डे का ९५ प्रतिशत भाग अन्त्र में ही प्रचूषित हो जाता है। केवल पाँच प्रतिशत का मल बनता है। इतनी सात्मीकरणता अन्य किसी भी खाद्य में नहीं हैं। खून की कमी, मन्दाग्नि, यक्ष्मा और पाण्डु से पीड़ित रोगियों के लिए अण्डा बहुत अच्छा पथ्य है। नीरस होने के कारण कच्चा अण्डा पाचक रसों को उत्तेजित नहीं कर पाता, इसलिए ही उसका पाचन आमाशय में न होकर आन्त्र में हुआ करता है। उबाला हुआ अण्डा प्रोभूजिन जम जाने से कुछ दुष्पाच्य हो जाता है।
अण्डे में किसी प्रकार की मिलावट की सम्भावना तो नहीं है, फिर भी खाने के लिए केवल ताजा अण्डा ही लेना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में तो वासी अण्डा प्रायः सड़ जाता है। अण्डे के विषय में आधुनिक आहार शास्त्रियों ने बहुत अध्ययन किया है। इसके अनुसार मुर्गी के अण्डे के विविध भागों का औसत संगठन निम्न प्रकार का होता है :
| जल % | प्रोटीन % | वसा % | राख % | |
|---|---|---|---|---|
| पूर्ण अंडा | 74% | 13% | 11% | 1.0% |
| अंडे की सफेदी | 88% | 10.5% | स्वल्प | 0.8% |
| अंडे की जर्दी | 49% | 17% | 31.5% | 1.4% |
अण्डे की जर्दी कुल अण्डे की एक तिहाई और सफेदी दो तिहाई होती है।
अण्डे की वसा में प्रायः लेसिथिन की मात्रा अधिक होती है।
स्नेह पदार्थ (घी और तेल)
दूध और अण्डा के बाद भोजन के पौष्टिक पदार्थों में घी बहुत महत्वपूर्ण है। बल-वीर्य और आयु की वृद्धि तथा मस्तिष्क के स्नायु मण्डल को शक्ति पहुँचाने में घी के बराबर शक्तिशाली दूसरा पदार्थ नहीं। विशेषकर अण्डा और मांस आदि से परहेज रखने वाले भारतीयों के भोजन में पोषक तत्व के रूप में घी का रहना नितान्त आवश्यक है।
दैनिक भोजन में एक छटांक घी लेते रहने से शरीर को पूर्ण चिकनाई और पौष्टिक तत्व मिल जाते हैं। घी में सौ प्रतिशत स्नेह होता है। प्रोभूजिनयुक्त दाल आदि खाद्य पदार्थ यदि घी सहित थोड़े परिमाण में भी खाये जावें तो उनसे शरीर की क्षतिपूर्ति होती है। बिना घी के प्रोभूजिनयुक्त पदार्थ अधिक मात्रा में लेने पर भी उतना लाभ नहीं करते।
उष्णता जनन करनेवाले स्नेह तथा उदांगारतत्व शरीर में आवश्यक गर्मी और पाचकाग्नि को ठीक रखते हैं। घी में उत्तम पौष्टिकता के अतिरिक्त सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह शरीर में उष्णताजनन का कार्य बहुत सफलतापूर्वक करता है। एक तोला मांस या चीनी खाने से जितनी उष्णता उत्पन्न होती है, उससे ढाई गुनी एक तोला घी खाने से होती है। इससे ही भोजन में घी के महत्व का अन्दाज लगाया जा सकता है।
स्नेह द्वारा उष्णताजनन का कार्य, यों तो तेल खाने से भी हो सकता है; परन्तु घी, मक्खन आदि प्राणिज स्नेह, तेल की अपेक्षा पचनीय और जीवतिक्ति (विटामिन) युक्त होते हैं। उष्णताजनन के अतिरिक्त वे ऊर्जोत्पादन, धातु-वृंहण, शरीर की क्षतिपूर्ति, स्थैर्य और शक्ति का कोष संचित करने में भी सहायक होते हैं।
तथापि, आजकल बाजार में दूध-दही से भी अधिक, असली घी का मिलना कठिन हो गया है। पूरी निश्चिन्तता के साथ शुद्ध घी उसको ही कहा जा सकता है, जो घर में ही, या अपने सामने ही निकाला गया हो। गाँवों से आने वाले देशी घी को भी सहसा पूर्ण शुद्ध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ग्रामीणों ने घी में मिलावट करने के ऐसे बढ़िया तरीके अब सीख लिए हैं, कि आश्चर्य होता है।
दूध में वनस्पति तेल मिला कर दही जमाते हैं और उससे निकाला हुआ मिलावटी घी, शुद्ध देशी के नाम से मँहगा बेचते हैं। ऐसे मिलावटी घी पर पैसा खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है। विश्वस्त और पूर्ण शुद्ध घी न मिले तो उसके स्थान पर शुद्ध और ताजा तेल खाना ही अधिक हितकर है।
शुद्ध घी गो या भैस के मक्खन से बनाया जाता है। गो का घी रंग में पीला और भैंस का सफेद होता है। शुद्ध घी की परीक्षा करने का ढंग यह है। कि थोड़े घी में थोड़ा-सा नमक का तेजाब डालना चाहिए। यदि उसमें वेजिटेबल घी मिला होगा, तो उसका रंग कुछ लाल हो जायगा।
आजकल बाजार में मिलने वाले जिस पदार्थ को लोग वनस्पति घी कहते हैं, वह वास्तव में तेल का जमाया हुआ रूप है, जो कि तेल से भी निकृष्ट होता है। तेल को जमाकर उसको घी का रंग-रूप देने में जो क्रिया करनी पड़ती है, उससे तेल के बहुत-से गुण नष्ट हो जाते हैं और अनेक विपरीत अवगुण आ जाते हैं। जमा हुआ होने से यह पहचानना भी कठिन है कि यह किस चीज का तेल है और कितना पुराना है।
वस्तुतः उसमें शुद्ध और ताजे तेल के भी गुण नहीं होते। इस तथाकथित बनावटी वनस्पती घी की इतनी खराबियाँ सिद्ध हो चुकी है कि यदि शुद्ध और ताजा तेल भी न मिले तो रूखा-सूखा ही भोजन अच्छा परन्तु यह नकली और बनावटी घी नहीं बरतना चाहिए।
खाने के लिए तेल भी सर्वथा शुद्ध और ताजा लेना चाहिए। तिल का तेल सर्वोपरि होता है। उसके बाद सरसों और मूँगफली का तेल भी खाने के काम में लाया जाता है। गुजरात में शींगदाणा के नाम से मूंगफली का तेल खूब इस्तेमाल किया जाता है।
मांस-मछली
भोजन के रूप में संसार में मांस-मछली का उपयोग किया जाता है। यह पर्याप्त पुष्टिकारक पदार्थ है। संसार की बहुत बड़ी जन संख्या मांस-मछली खाकर ही शक्ति प्राप्त करती है। तथापि हमारे देश में धार्मिक भावना के कारण इसका प्रचार कम है।
आयुर्वेद में मांसाहार को शरीरवृद्धि के लिए उपयोगी माना गया है।
शरीरबृंहणो नान्यत्वाद्यं मांसाद्विशिष्यते। चरक --
न हि मांससमं किंचिदन्यद् देहबृहत्वकृत्। -- वागभट्ट मांस में शरीर को बढ़ाने की अनुपम शक्ति है, क्योंकि मांस अत्यन्त पौष्टिक और सुपाच्य खाद्य है। खाये हुए मांस का केवल १५ प्रतिशत् व्यर्थ जाता है और लगभग ८५ प्रतिशत भाग आंतों में प्रचूषित होकर सीधा रस रक्त में मिल जाता है। कच्चा मांस दो घण्टे में, आधा उबाला ढाई घण्टे में और पूरा उबाला तीन घण्टे में पचता है। इसी प्रकार आधा भुना मांस तीन घण्टे में और पूरा भुना चार घण्टे में पचता है।
मांस की यह पचनीयता और पौष्टिकता उसके पकाने की विधि पर निर्भर करती है। इसलिए मांस को उतना ही पकाना चाहिए जितने से उसमें व्याप्त संक्रामक रोगों के कीटाणु नष्ट हो जावें और उसका जलीय अंश कम हो जावे। जिस मांस में स्नेह (चर्बी) अधिक होता है, वह पचने में उतना ही अधिक कठिन होता है।
खाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न पशुओं का मांस प्रयोग में लाया जाता है। भेड़, बकरी, जंगली सुअर और मुर्गी का मांस अधिक सुस्वादु और पौष्टिक होता है। वैसे शिकार किये हुए मृग, चीतल, बारहसिंघा, आदि जंगली जानवरों और भैंस, घोड़ा आदि पालतू पशुओं का मांस भी कुछ लोग खाते हैं।
मांसाहार में मछली काफी पौष्टिक खाद्य है, इसका लगभग १५ प्रतिशत भाग आंतों में प्रचूषित हो जाता है। दुर्बल मनुष्यों के लिए विशेष शक्तिवर्धक होती है। हमारे देश में समुद्र या नदी तट वाले स्थानों में मछली का उपयोग बहुतायत से होता है। बंगाल, उड़ीसा आदि में मत्स्याहार प्रधान है।
यद्यपि मांस-मछली पौष्टिक खाद्य है, परन्तु असावधानी से पकाने और असात्म्य ढंग से खाने पर इनसे अनेक रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं। मांस बहुत जल्दी सड़ने वाला पदार्थ है। इसलिए बासी या अधिक देर का रखा मांस नहीं लेना चाहिए। विकृत होने पर मांस का रंग काला हो जाता है।
यहाँ पौष्टिक खाद्यों में मांस-मछली का उल्लेख हमें मुख्यतः इस कारण करना पड़ा कि हमारे देश में कुछ लोग तो इसका व्यवहार करते ही हैं। जो व्यवहार करते हैं उन्हें मांस-विषयक ज्ञान स्वास्थ्य - साहित्य में मिलना ही चाहिए जिससे अज्ञानतावश हानि न उठावें। दूसरी बात सर्वोत्कृष्ट पौष्टिकतत्त्व - घी दूध - का देश में निरन्तर अभाव-सा होता जा रहा है। राज्य घी-दूध का उत्पादन बढ़ाने को समुचित प्रोत्साहन नहीं दे रहा। दुधारू पशुओं के पालन-हेतु लोगों की रुचि कम होती जा रही है। इन कारणों से सर्वथा शुद्ध दूध-घी शहरों में तो मिलता ही नहीं। इस कारण लोग यदि मांसाहार की ओर आकृष्ट होते हैं तो अस्वाभाविक नहीं।
सत्य तो यह है कि हमारे देश की स्थिति और जलवायु को देखते हुए मांसाहार आवश्यक नहीं है। मांस में जो पौष्टिकता है वह अन्य कई शाकाहारी पदार्थो में भी है। उष्णताजनन, पुष्टि एवं शक्ति का संचय मांस की अपेक्षा शुद्ध घी से अधिक होता है। मांस के प्रायः सभी तत्त्व दालों में होते हैं। मांस में २९ प्रतिशत प्रोटीन होते हैं। जब कि दालों में ३० प्रतिशत तक प्रोटीन रहते हैं। इसलिए जिन्हें रुचता न हो उन्हें देखा-देखी या केवल पौष्टिकता के लोभवश मांसाहारी नहीं बनना चाहिए, क्योंकि उत्तम और संतुलित शाकाहारी भोजन भी पूर्ण पौष्टिक होता है।
दालें
दालें आहार - पूर्ति भी करती हैं और पौष्टिक भी होती हैं, इसलिए भोजन में दाल का विशेष महत्त्व है। अच्छी प्रकार से बनायी गयी दाल, रोटी या चावल के साथ लेने से उनको सुस्वादु बनाती है। चना, अरहर, मूंग, मसूर, मटर, उड़द, सोयाबीन आदि दालों में मांस से अधिक प्रोभूजिन या प्रोटीन होते हैं।
दालों के कणों पर एक विशेष झिल्ली होती है, जिसको शरीर के पाचक रस आसानी से नहीं गला पाते, इसलिए वे दुष्पाच्य होती हैं; परन्तु दालों को पर्याप्त पानी में डालकर दो घण्टे तक पकाया जाय फिर मथनी से दही की भाँति मथकर छोक दिया जाय, तो कणों की झिल्ली हट जाती है और दाल पाचक बन जाती है, खाने के लिए दाल को खूब पतला बनाना चाहिए। खूब पकी दाल को दो-तीन तोला घी या तेल डालकर रोटी या भात के साथ खाने पर वह सन्तुलित भोजन हो जाता है और उससे उतनी ही पौष्टिकता मिलती है, जितनी कि मांस, मछली, अण्डा आदि असात्त्विक भोजन से प्राप्त होती है।
अन्न
भोजन में अन्न मुख्य आहार है। आयुर्वेद में अन्न को ही प्राणियों का प्राण कहा गया है और लोकभाषा में अन्न को ही भोजन कहा जाता है।
शाकाहारी भोजन अन्नप्रधान होता है। अन्नों में विशेषकर गेहूँ, चावल, चना, ज्वार, बाजरा, मकई और जौ आदि धान्यों का प्रयोग होता है। इन धान्यों में शरीर - पोषक प्रोभूजिन, ऊष्मा आदि पदार्थ विभिन्न मात्रा में विद्यमान रहते हैं।
हमारे देश में जो दैनिक आहार ग्रहण किया जाता है उसमें गेहूँ, दाल और चावल की प्रधानता रहती है। गरीबों के भोजन में ज्वार, बाजरा मक्का और दाल की अधिकता रहती है। इनमें गेहूँ या ज्वार-वाजरा की रोटी तथा दाल, अथवा चावल और दाल खायी जाती है। जो लोग चावल अधिक खाते हैं, वे स्वास्थ्य की दृष्टि से निर्बल होते हैं। चावल के साथ थोड़ी चिकनाई मिलाकर पर्याप्त मात्रा में दाल भी खायी जावे, तो वह किसी प्रकार संतुलित भोजन हो सकता है। स्नेह और दूध साथ में लेने से ही अन्नाहार पौष्टिक भोजन माना जाता है।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे देश में ही विभिन्न प्रदेशों के भोजन और स्वास्थ्य-स्थिति में देखा जा सकता है। हमारे देश में सबसे अच्छा भोजन पंजाब वाले करते हैं। खमीर उठाकर बनाई हुई गेहूँ की रोटी, उड़द की दाल और पर्याप्त घी-दूध उनका प्रधान भोजन होता है। वे मांस - भोजी भी होते हैं। वस्तुतः अपने पूर्ण आहार में काफी घी-दूध और दही लेने के कारण ही पंजाबी भाई काफी स्वस्थ लम्बे और तगड़े होते हैं।
राजस्थान की जलवायु पंजाब से कम स्वास्थ्यकर नहीं है, परन्तु भोजन-स्तर उत्तम न होने के कारण राजपूताना निवासी उतने लम्बे-तगड़े और सबल नहीं होते, जितने पंजाबी। जलवायु तथा भोजन की दृष्टि से उत्तरप्रदेश को दूसरे नम्बर पर गिना जा सकता है। वहाँ का भोजन रुचिकर तो बहुत होता है, परन्तु दुग्ध या दुग्धकृति की कमी के कारण, उसे पूर्ण पुष्टिकर नहीं कह सकते। इसलिए उत्तरप्रदेश-वासी भी पंजाववासियों से शरीर में दूसरे नंबर के होते हैं।
बिहार का जलवायु बहुत अच्छा है, परन्तु आहार की दृष्टि से हीन होने के कारण वहाँ के निवासियों का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं होता। जिनको पूर्ण खुराक मिलती है, वे बिहारी भी पंजाब के मुकाबले के तन्दुरुस्त होते हैं। बंगाली मद्रासी, असमी आदि केवल चावल खाने वालों के भोजन में तो घी-दूध बहुत आवश्यक है। गुजरात और महाराष्ट्र में चाय के बहुतायत प्रचार ने दूध-घी खाने की सुरुचि को नष्ट कर रखा है, फलतः इन प्रदेशवासियों का स्वास्थ्य सामान्यतः गिरा हुआ है।
पौष्टिकता के विचार से चावल से अच्छा ज्वार-बाजरा और इनसे भी उत्तम गेहूँ होता है। संसार में गेहूँ की खपत सबसे अधिक है। ८-१० घण्टा बैठ कर दिमागी काम करने वालों के लिए धान्यों में गेहूँ सर्वोपरि है। थोड़ा चना साथ मिलाकर खाने से गेहूँ स्वादिष्ट, पाचक और अधिक पौष्टिक हो जाता है। गेहूँ के बराबर स्वास्थ्यकारक तत्त्व चावल में नहीं होते। रस-धातुओं को पुष्ट एवं विवर्द्धित करने की शक्ति चावल में बहुत कम होती है। प्रधानत: वह उष्णताजनन का ही काम करता है। इसलिए गेहूँ के साथ स्वाद बदलने के लिए, थोड़ी मात्रा में ही चावल खाना चाहिए।
काजू और पोषण
काजू (Cashew) एक शक्तिप्रद मेवा (nut) है। इसकी तुलना में अन्य मेवाओं का ठहरना कठिन है। काजू गिरी का विश्लेषण करने पर इसमें निम्न-लिखित पदार्थ मिलते हैं :- - स्निग्ध पदार्थ (फैट्स) ४८ प्रतिशत - शिम्बीतत्व (प्रोटीनें) २१ प्रतिशत - शर्करावर्गीयतत्व (कार्बोहाइड्रेट्स) २२.३ प्रतिशत - कैल्शियम 0·५ प्रतिशत [मूल मान की पुष्टि आवश्यक] - पानी 5.9 प्रतिशत - खनिज पदार्थ २ प्रतिशत - लौह ·५ प्रतिशत [मूल मान की पुष्टि आवश्यक] - फास्फोरस ४ प्रतिशत [मूल मान की पुष्टि आवश्यक] - कैलोरी मान ५९६ प्रति १०० ग्राम काजू के फल में बहुत अधिक पोषणतत्व मिलते हैं। इसमें प्रोटीन, फैट्स, कार्बोहाईड्रेट्स, कैल्शियम, फास्फोरस और लोहा रहता है। इसके १०० ग्राम रस में २६१.५ मि० ग्रा० विटामिन सी तथा कुछ कैरोटीन मिलती है।
काजू से भी सस्ता और गुणकारी मेवा अखरोट है। अखरोट को तोड़कर ताजा गिरी खायी जाती है यह बादाम से भी अधिक पौष्टिक है तथा काजू से अधिक गुणकारी और सस्ती है। मूंगफली भी बहुत गुणकारी है।
भोजन के सहायक पदार्थ
मीठा
शरीर में उष्णता और शक्ति उत्पन्न करने के लिए जितने प्रांगोदीय या कार्बो-हाईड्रेट्स की अपेक्षा होती है, वे चावल, गेहूँ, दाल और घी आदि से मिल जाते हैं। फिर भी मीठा इसलिए भोजन का सहायक पदार्थ है कि उससे उत्पन्न उष्णता से पाचकाग्नि भी बढ़ती है। उचित मात्रा में मीठा खाना हितकर है, परन्तु आजकल शहरों में जिस प्रकार अधिक मीठा खाया जाता है, वह स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला होता है।
दूध-मिठाई आदि में कुल मिलाकर अधिक-से-अधिक एक छटांक मीठा प्रतिदिन खाना चाहिए। मीठे में सबसे उत्तम तो मधु (शहद) होता है; परन्तु वह आजकल सबको विशुद्ध नहीं मिलता। उसके बाद गुड़ उपयोगी है, उसमें मिश्रित पीला पदार्थ विशेष लाभदायक होता है। चीनी (शक्कर) में वह नहीं होता, इसलिए चीनी गुड़ के बराबर गुणकारी नहीं होती।
ईख (गन्ने) से बने गुड़ की अपेक्षा ताड़ या खजूर का गुड़ अधिक उपयोगी होता है, क्योंकि उसमें बहुत बड़ी मात्रा में ग्लूकोज विद्यमान रहता है। बंगाल-बिहार में ताड़ का गुड़ काफी बनता है।
मीठे के स्थान पर विशेषकर पेयों में सेकरिन नामक जो पदार्थ दूकानदार प्रयोग करते हैं, वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
खनिज द्रव्य
खनिज द्रव्यों से शरीर की अस्थि, रक्त आदि धातुयें बनने और पुष्ट होने में मदद मिलती है। अन्नादि के पाचन एवं सात्मीकरण में भी खनिज सहायक होते हैं। खनिजों में नमक प्रधान है। कुल मिलाकर डेढ़ तोला खनिज दैनिक भोजन में होना चाहिए अन्य खनिज तो रोटी, दाल, शाक, चावल, दूध और मांस आदि से उचित अनुपात में मिल जाते हैं; परन्तु नमक इन पदार्थो में कम होता है, इसलिए ऊपर से मिलाकर खाना पड़ता है।
मांस में स्वाभाविक ही काफी नमक होता है, इसलिए मांसाहारियों को अतिरिक्त नमक कम लगता है। परन्तु शाकाहारी भोजन में लगभग आधा तोला नमक दाल, शाकों और आटा में मिलाकर नित्य खाना चाहिए। नमक बिलकुल न खाने से कई प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
अन्य मिर्च-मसाले और अचार चटनी-मुरब्बा आदि स्वास्थ्य पुष्टि की दृष्टि से बिलकुल आवश्यक नहीं। इनका उपयोग केवल रुचि उत्पन्न करने (भोजन में स्वाद बढ़ाने) के लिए किया जाता है। इन्हें आवश्यकता होने पर कम मात्रा में ही खाना चाहिए, क्योंकि इनसे उत्पन्न रुचि स्वाभाविक नहीं होती, और अन्ततः यह हानि करते हैं। बहुत मिर्च-मसाले और चाट-पकोड़ी खाने वाले कभी स्वस्थ नहीं रह सकते।
विटामिन्स (जीवतिक्तियाँ)
भोजन के साथ अल्प मात्रा में विटामिन (जीवतिक्ति) नामक तत्त्वों का लेना हितकर है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में, आधुनिक लोगों के अत्यधिक प्रचार से आजकल विटामिन्स खाने में अत्युत्साह पाया जाता है।
मांस में विटामिन्स कम रहते हैं, इसलिए मांसाहारियों को अलग से हरे साग-सब्जी, फल आदि खाकर विटामिन्स की पूर्ति करना आवश्यक है। केवल मांसाहार पर आश्रित पश्चिमी देशों में आजकल इसी कारण शाकाहार को भोजन में सम्मिलित करने पर जोर दिया जा रहा है। शाकाहार में ही हरीपत्ती, फल-अन्न आदि है।
परन्तु हमारे देश में, जहाँ का भोजन ही शाकाहार प्रधान है, वहाँ फलाहार के अधिक प्रचार की कोई अपेक्षा नहीं। शाकाहार में विटामिन्स स्वयमेव ही बहुतायत से विद्यमान रहते हैं, इस कारण अतिरिक्त लेने की आवश्यकता नहीं।
इतना ही पर्याप्त है कि प्याज, टमाटर, लूनी, हरा धनिया, पोदीना, मूली की पत्तियाँ तथा सलाद, अमरूद, ककड़ी आदि में से कुछ को लेकर भली-भाँति धोकर बारीक काट लें। उसमें नमक, नीबू का रस और अल्प मात्रा में हरी मिर्च मिलाकर चटनी या कचूमर बना लें और बहुत थोड़ा-सा भोजन के साथ ले लें। शाकाहारी भोजन में इतने से ही अपेक्षित विटामिन्स की पूर्ति हो जाती है।
विटामिन्स प्राप्ति के लिए आधुनिक लोग अधिक मात्रा में सब्जी और फल खाने पर बहुत जोर देते हैं। परन्तु केवल शाक-सब्जी-फल खाकर स्वस्थ रहने की कल्पना गलत है। विटामिन्स से ही शरीर पुष्ट होता है और वही भोजन का सार है---यह बड़ा भारी भ्रम हमारी जनता में फैल गया है। आधुनिक पढ़े-लिखे युवक इस प्रचार से बहुत गुमराह हो रहे है। एक बार मेरे एक भतीजे ने कहीं पढ़ लिया कि पपीता पेट के रोगों पर अचूक है।
उसके पेट में खराबी थी। वस, पन्द्रह दिन तक उबाले हुए पपीता पर ही वह रहा। मुझे पता लगते ही अन्नाहार शुरू कराया। परन्तु पपीता तब तक काफी 'गुण' कर चुका था। उस समय उसकी जो पपीता खाने से अग्नि मन्द हुई, वह आज कई वर्ष बीतने पर भी बनी हुई है।
सारांश यह है कि हमारे देश में विटामिन्स का अति प्रचार करके सब्जी और पत्तियों को बहुत खाने का अभ्यास कराना कदापि युक्ति युक्त नहीं है। भिण्डी, बैंगन, तोरई, कद्दू, लौकी (घिया) फूलगोभी, पत्तागोभी, गाँठगोभी, सेम तथा सहजन की फली आदि के साग यदा-कदा रुचि बदलने के लिए खाना चाहिए। शाकों में आलू का बहुत प्रयोग होता है। मांसाहारियों के लिए आलू आवश्यक है, परन्तु शाकाहारियों के लिए यह कुछ भी उपयोगी नहीं। इससे अच्छा केला है जिसमें स्टार्च के साथ कुछ लोहा भी है।
फल
फल खाने से भी अपेक्षित विटामिन्स की पूर्ति होती है। फलों में आँवला और कागजी नीबू सर्वश्रेष्ठ गुणदायी फल हैं। आम, अंगूर, अनार, सेव, सन्तरा, मौसमी, अनन्नास आदि भी स्वास्थ्यकर फल हैं। कच्चे खाने योग्य फलों में ककड़ी, खीरा, अमरूद उत्तम फल हैं। इनमें अमरूद सर्वाधिक उपयोगी है।
उसको भारत का सेव कहा जा सकता है। केला वैसे साधारण फल है, परन्तु दही के साथ खाने पर लाभदायक है। कन्दों में प्याज बहुत बढ़िया कन्द है। शकरकन्द, आलू आदि निकृष्ट कन्द हैं।
सूखे फल और मेवे जैसे बादाम, पिश्ता, काजू, खुमानी, अखरोट, चिलगोजा चिरौंजी, किसमिस और मूंगफली आदि भी पौष्टिक होते हैं। इनमें मूंगफली सबसे सस्ता और पुष्टिकारक मेवा है। इसको चीनी बादाम भी कहते हैं। श्री बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन ने झाँसी में लक्ष्मी व्यायाम मंदिर नामक संस्था में जो पौष्टिक खाद्य का परीक्षण किया था, उसमें मूंगफली बहुत उपयोगी सिद्ध हुई। एक छटाँक मूँगफली का बीज, एक छटाँक पानी में भिगोए अंकुरित चने, आधी छटाँक गुड़ के साथ अथवा तलकर नमकीन बनाकर नित्य नाश्ते में लेने से पर्याप्त पौष्टिक खाद्य शरीर को मिल जाता है।
युवकों के लिए यह अच्छा शक्तियुक्त नाश्ता है। किस आहार द्रव्य में कौन-कौन सी और कितनी विटामिनें हैं इसे पीछे तालिकाओं में दिया गया है।
भोजन बनाना
वैसे तो शरीर रूपी स्वसंचालित मशीन की यह विशेषता है कि इसे जो कुछ मिल जाता है, उससे ही अपना काम चला लेती है। केवल बाजरा, जौ, या ज्वार - मक्का की रोटी चटनी से खाकर अथवा नमक - सत्तू लेकर ही लाखों गरीब भारतीय स्वस्थ रहते हैं और परिश्रम करते हैं; परन्तु बुद्धिजीवी मनुष्य पौष्टिक तत्त्व रहित भोजन से केवल पेट भर सकता है, पूर्ण स्वस्थ एवं दीर्घायु नहीं हो सकता। विशेषकर बुद्धिजीवियों के लिए तो स्नेह-रहित भोजन एकदम व्यर्थ और अहितकर है। सामान्यतः हरएक के भोजन में अपेक्षित पौष्टिक तत्त्व रहना, स्वास्थ्योन्नति की पहली शर्त है।
परन्तु, भोजन के पौष्टिक तत्त्वों का लाभ तभी हो सकता है जबकि भोजन को विधिपूर्वक बनाया जाय। बढ़िया भोजन बनाना एक कला है। भोज्य पदार्थों के सदुपयोग हेतु उसकी जानकारी आवश्यक है।
महात्मा गाँधी ने लिखा है -- "अनाज को साफ करके चक्की में पीसकर, बिना छाने इस्तेमाल करना चाहिए। अनाज की भूसी में सत्त्व और क्षार रहते हैं। यह दोनों पदार्थ बहुत उपयोगी होते हैं। इनके अतिरिक्त भूसी में एक ऐसा पदार्थ भी होता है जो बिना पचे निकल जाता है और मल को भी निकालता है। चावल का दाना नाजुक होने से ईश्वर ने उसके ऊपर एक छिलका भी बनाया है, जो खाने के काम नहीं होता, इसलिए उसको कूटना पड़ता है।
कुटाई उतनी ही करनी चाहिए जिससे चावल (धान) के ऊपर का छिलका निकल जाय। मशीन से चावल के छिलके के अलावा उसकी भूसी भी निकल जाती है। इसका कारण यह है कि भूसी रक्खी जाय तो उसमें सुरारी या कीड़ा पड़ जायगा। कारण कि चावल की भूसी में बहुत मिठास रहती है। गेहूँ और चावल की यह भूसी निकाल दें तो बाकी केवल निशाश्ता (स्टार्च - कार्बोहाड्रेट्स) रह जाता है और भूसी में अनाज का कीमती हिस्सा निकल जाता है।"
भूसी के साथ दाने के ऊपर का गुणकारी कण छँट जाने से ही गेहूँ का मैदा और मिल का पालिशदार चावल खाने से कई रोग भी होते हैं। बेरी-बेरी नामक रोग, पालिशदार चावल का भात खाने वालों को बहुतायत से होता है।
धान को हाथ से कूटकर निकाले गये चावलों में सब तत्त्व सुरक्षित रहते हैं। उसको अधिक मात्रा में कूट कर रक्खा नहीं जा सकता, नहीं तो कीड़ा खा जायगा। जब खाना होगा तभी कूटना पड़ेगा, इससे दैनिक व्यायाम भी होगा। और अन्न की बचत भी होगी। यही बात आटे के विषय में है। मशीन की चक्की से पिसे बहुत महीन आटे की मुलायम रोटी स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं। गेहूँ का दलिया कब्जियत में इसीलिए लाभ करता है कि वह चोकरयुक्त होता है। रोटी भी हाथ की चक्की से पिसे चोकरयुक्त आटे की ही खानी चाहिए।
भोजन में मैदा का प्रयोग हानिकर है। आजकल नाश्ते में जो मैदा की डबल रोटी और विस्कुट खाते हैं, वह स्वास्थ्यनाशक होती है। आगे चलकर उससे पाचन-संस्थान पर बहुत खराब प्रभाव पड़ता है। आटे की (ब्रेड) और ताजी डबल रोटी बहुत ठीक होती है। मैदा की अन्य वस्तुयें भी पाचन को खराब करती हैं।
सभी खाद्य वस्तुओं को इस प्रकार पकाना चाहिए कि वे अधिक स्वास्थ्य-कारक हों। आटे को माँड़ कर थोड़ा पानी डालकर तीन चार घण्टे रखने से उसमें स्वतः खमीर उठ आता है और उसमें सोडा बाइकार्ब जैसा पाचक गुण वढ़ जाता है। ऐसे खमीर उठे आटे को खूब गूंद कर पतले-पतले फुलके (चपातियाँ) बनाकर पहले तवे पर सेंकें फिर अंगारों पर खूब सेंक कर फुला लिया जाय। यह ध्यान रहे कि तेज आँच से वह जले नहीं और कम आँच में कच्ची न रह जाय। ऐसी रोटी अच्छी होती है।
तन्दूर की बनी रोटी सब से उत्तम पाचक होती है। अँग्रेजी ढंग से बनी आटे की पावरोटी में भी यही गुण होता है। आजकल कुकर में जो भोजन पकाया जाता है वह भाप में पकने के कारण बहुत स्वास्थ्यकर होता है, क्योंकि उसमें खाद्य पदार्थ के सम्पूर्ण तत्त्व भोजन में सुरक्षित रहते हैं।
किसी भी खाद्य वस्तु को पानी में पकाकर या उबालकर उसका पानी फेंक देना मूर्खतापूर्ण है। पालक, मेथी, बथुआ, गाजर आदि पत्तियों वाले शाकों को, उबाल कर उनका पानी निचोड़ कर छौंकना, बहुत गलत हैं। उबले हुए उस पानी के साथ शाक के विटामिन और खनिज तत्त्व सब निकल जाते हैं। सार-हीन फोक बचता है उसको घी तेल में छौंक कर साग के नाम से खाने से क्या लाभ?
इसी प्रकार लोग चावल पकाते हैं तो उसका माँड़ फेंक देते हैं। उस माँड़ में ही चावल का सार तत्त्व निकल जाता है। दवा का काढ़ा फेंककर जड़ी बूटी खाना जैसा है वैसा ही कोरा भात बचता है। इसलिए चावल को उतना ही पानी डालकर पकाना चाहिए कि वह भली-भाँति पक जाय और पानी भी न फेंकना पड़े।
अधिक पकाने और उबालने से कोई चीज सुपच बन जाती है और कोई चीज उलटी दुष्पच हो जाती है। गेहूँ या दाल अधिक पकाने से सुपच बनते हैं, परन्तु दूध और सब्जियाँ अधिक आग पर रखने से निश्चित दुष्पच एवं गुणहीन हो जाती हैं।
भोजन में रुचि का बहुत महत्त्व है। उत्तम रीति से पकाया हुआ भोजन सुपाच्य के अतिरिक्त, इतना स्वादिष्ट और दर्शनीय होता है कि उसके देखते ही रुचि बढ़ती है। वास्तविक रुचि तो निश्चित समय पर लगने वाली कड़ाके की भूख से होती है। नकली रुचि अचार चटनी से उत्पन्न होती है, किन्तु अधिक प्रयोग हानिकर होता है। कागजी नीबू और दही उत्तम, निर्दोष एवं रुचिवर्द्धक होते हैं। लाभकारी भी होते हैं।
भोजन बनाने के लिए रसोई घर और भोजन बनाने-खाने के सभी वर्तन बहुत साफ-सुथरे होने चाहिए।
दाल, भात, रोटी, साग, दूध, दही, मीठा आदि सभी खाद्य वस्तुओं को सदा ढककर रखना चाहिए जिससे मक्खी-मच्छर, चींटी, चूहा आदि उन्हें दूषित न कर सकें। खुले भोजन में हवा के साथ उड़ने वाले धूलिकण और रोगाणु मिल जाते हैं। मक्खी विशेषकर खुली चीजों पर बैठकर असंख्य रोगों के कीटाणु खाद्य-पदार्थो में मिला देती है, जिससे अनेक घातक छूत के रोग फैलते हैं।
भोजन निर्माता तथा परोसने वाला भी बहुत साफ-सुथरा, सुरुचिपूर्ण और मृदुल स्वभाव वाला होना चाहिए। भोजन की उत्तमता में रसोइया का महत्त्व कदापि कम नहीं होता। स्त्रियों के द्वारा यह कार्य बहुत अच्छा होता है।
भोजन करने की विधि
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैनमकुत्सयन्।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ॥ -- मनुस्मृति
भोजन कितना भी सुस्वादु, पौष्टिक और सुपाच्य हो, परन्तु भोजन के समय खाने वाला ईर्ष्या, क्रोधादि विकारों से ग्रस्त है तो वह उत्तम भोजन भी व्यर्थ जायगा और शरीर को नहीं लगेगा। भोजन के समय मानसिक प्रसन्नता अनिवार्य है। ऊपर के श्लोक में मनु ने कहा है कि भोजन का पूजन करके खाना चाहिए। भगवान के पूजन में जैसी पवित्रता और स्वच्छता का ध्यान रक्खा जाता है, वैसा ही भोजन के प्रति रखना चाहिए।
आधुनिक विज्ञान ने भी सिद्ध किया है कि व्याकुल चित्त से खाया गया पौष्टिक भोजन भी हानि करता है। इसलिए भोजन के समय क्रोध, भय, विषाद, घृणा आदि विकार मन में नहीं रखना चाहिए। जो कुछ भी सामने आवे उसको भगवान का प्रसाद मान कर खाना चाहिए और कभी भोजन की निन्दा नहीं करना चाहिए।
भोजन करने में हाथ बहुत लगते हैं। उनमें गंदगी या रोगाणु रहने से वे भोजन के साथ पेट में चले जाते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए भोजन पर बैठने से पूर्व भली-भाँति हाथ-पैर धोकर कुल्ली करनी चाहिए। स्वयं सर्वथा स्वच्छ होकर, भोज्य पदार्थों को स्वच्छ पात्रों में रखकर, स्वच्छ आसन पर बैठकर भोजन करना चाहिए।
अंग्रेजी की कहावत है कि 'पेट में दाँत नहीं होते।' इसका मतलब है भोजन को चबाने का काम पेट के भीतर नहीं हो सकता। जो लोग बेमन से बिना भली भाँति चवाये जल्दबाजी में भोजन को पेट में ठूंसते हैं, उनको भोजन का पूरा लाभ तो मिलता ही नहीं, मन्दाग्नि का रोग भी हो जाता है। क्योंकि आँतों पर अधिक परिश्रम पड़ने से वे कमजोर हो जाती हैं। इसलिए हर कौर को दाँतों और दाढ़ों से खूब चबाकर बारीक करके ही निगलना चाहिए।
मुंह में ही भोजन को देर तक चबा लेने से दो लाभ होते हैं, एक यह कि खाया हुआ पदार्थ छोटे-छोटे बारीक कणों में विभक्त हो जाता है, दूसरा यह कि चबाने की क्रिया द्वारा मुख की ग्रन्थियों से लार नामक एक विशेष रस निकल कर भोजन में मिल जाता है। यह रस बहुत पाचक होता है और जितनी अधिक मात्रा में भोजन के साथ मुंह में मिल जाता है उतना ही भोजन सुपाच्य होकर उसका अधिकतम सार भाग हमारे शरीर को प्राप्त होता है।
असली स्वाद भी अधिक चबाने में आता है। चाहे जितना स्वादिष्ट भोजन हो, बिना खूब चबाये निगलते जाने से कुछ भी स्वाद नहीं आयेगा। महात्मा गांधी ने लिखा है-- 'वस्तुतः भोजन को खूब चबा-चबा कर ही खाना चाहिए। ऐसा करने से थोड़ी खुराक में भी हम अधिक से अधिक सत्व ग्रहण कर सकेंगे।' व्यर्थ की बातों और विनोद में तो घण्टों बर्बाद करें और जीवन के प्रधान आधार भोजन में इतनी जल्दी करें, जैसे आफत टाल रहे हो -- यह महान अज्ञान है। खूब चबाकर मुंह का कौर पतला होकर आसानी से गले में उतरने लायक हो जावे और उसमें कुछ मिठास आ जावे, तब ही निगलना चाहिए। पानी के सहारे कौर निगलना हानिकारक होता है।
भोजन से उठकर भली-भाँति कुल्ली करनी चाहिए जिससे दाँत में अन्न के कण फँसे न रहें। गरारा करके कंठ भी साफ करना चाहिए। कुल्ली, गरारा की प्राचीन प्रथा त्यागने से ही आजकल पायरिया आदि दन्तरोग और टान्सिल बढ़ने की बीमारी बहुत होती है।
भोजनोपरान्त ताम्बूल सेवन उपयोगी है। उत्तम देशी पान का एक वीड़ा खाने से मुख - शुद्ध होता है, गला साफ होता है और भोजन का पाक भली-भाँति होता है। अधिक पान खाना दाँतों को खराब करता है।
जो लोग भोजन के तुरन्त बाद लिखा-पढ़ी के काम में लग जाते हैं या दफ्तर, दूकान अथवा स्कूल को दौड़ पड़ते हैं, वे अन्ततः निश्चय ही बीमार पड़ते हैं। शरीर का एक स्पष्ट नियम है कि जिस समय जो शरीरांग कार्यरत हो उस समय उसीको विशेष मात्रा में हृदय रक्त भेजता है। भोजनोपरान्त भोजन पचाने वाले अंगों को तेजी से अपने काम पर लग जाना पड़ता है, इसलिए उनकी ओर ही रक्त का संचार बढ़ जाता है।
ऐसी स्थिति में यदि भोजन के तुरन्त बाद कोई दिमागी या शारीरिक परिश्रम का काम करने लगे तो हृदय को विवश हो कर पाचन संस्थान की ओर से रक्त संचार रोक कर अन्य काम में लगे अंगों को रक्त भेजना पड़ेगा। परिणामतः पाचन संस्थान को रक्त कम मिलेगा तो वह अपना काम यथावत कैसे कर सकता है? शरीर के सभी अंगों को कार्य की शक्ति रक्त से ही मिलती है।
इसलिए भोजन के बाद लगभग आधे घण्टे तक कोई भी शारीरिक या दिमागी काम नहीं करना चाहिए और विश्राम करना चाहिए। विश्राम का अभिप्राय सो जाना नहीं है। भोजनोपरान्त ही सो जाने से भी आहार का पाचन ठीक नहीं होता। भोजन के बाद कम-से-कम एक घण्टे तक सोना भी हितकर नहीं।
यही बात परिश्रम के तुरन्त बाद भोजन करने से होती है। जब तक व्यायाम या परिश्रम में थके अंगों की थकान दूर नहीं हो जाती तब तक रक्त का संचार उन अंगों की ओर ही रहता है। इसलिए व्यायाम या थकान से कम-से-कम एक घण्टा बाद भोजन और भोजन के कम-से-कम एक घण्टा बाद ही कोई अन्य परिश्रम का काम करना चाहिए। व्यायाम तो भोजन के तीन घण्टा बाद ही करना चाहिए।
जब जी न चाहे और भूख कच्ची हो तब तो भोजन करना ही नहीं चाहिए; महीने में दो-तीन पूरे समय या आधे समय का उपवास कर लेना हितकर होता है। हम लोग सप्ताह में एक दिन की छुट्टी मनाते हैं, जिसमें आराम करने से शरीर और मन ताजगी का अनुभव करता है। वैसे ही भोजन पचाने वाले अंगों को बीच-बीच में विश्राम देना उचित ही है। महीने में दो बार एक आहार का उपवास करना चाहिए।
जिन भोजन में पूरे पोषक तत्त्व न हों अथवा जो भली-भांति न बनाने से कच्चा रह गया हो या जल गया हो; वासी हो, बदबूदार हो, या अन्य प्रकार से विकृत हो गया हो, ऐसा अहितकर भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। बासी और ठंडा भोजन तो अहितकर होता ही है, अधिक गर्म खाने से भी हानि होती है इसलिए भोजन को मन्दोष्ण अवस्था में खाना चाहिए। बासी भोजन तामस, अधिक उष्ण राजस और मन्दोष्ण सात्त्विक होता है।
जिस रस की अधिक आकांक्षा हो वही भोजन में लेना चाहिए। अभिलषित रस शरीर के पाचक रसों के अनुकूल होता है इसलिए आहार शीघ्र पचाता है। स्वादवश आपात भद्र, अर्थात् जो तत्काल अच्छा लगे परन्तु जिसका परिणाम अच्छा न हो ऐसा खाद्य नहीं खाना चाहिए।
नित्य नियत समय पर भोजन करने का अभ्यास आवश्यक है। इससे भोजन परिपाक ठीक होता है और निश्चित समय पर अपने-आप भूख लगती है। नियत समय से पूर्व या देर से भोजन करने से अनेक व्याधियाँ हो जाती हैं।
एक बार किया हुआ पूर्ण भोजन लगभग ६ से ८ घण्टे में पच जाता है। इसलिए दो भोजनों के मध्य ६ से ८ घण्टे का अन्तर होना ही चाहिए। आयुर्वेद में भोजन कब करना चाहिए इसका एक सुन्दर सूत्र निम्न शब्दों में दिया गया है-
याममध्ये न भोक्तव्यं यामयुग्मं न लंघयेत्।
याममध्ये रसोद्वेगः युग्मेऽतीते बलंक्षयः ॥
अर्थात् एक बार भोजन करने के ३ घण्टे के अन्दर कुछ भी सेवन न करना चाहिए, तथा ६ घण्टे से ऊपर बिना भोजन नहीं रहना चाहिए, क्योंकि ३ घण्टे के भीतर भोजन से रस का उद्वेग हो जाता है तथा ६ घण्टे तक भोजन न करने से शरीर-बल घट जाता है। हमारे देश की जलवायु के विचार से छात्र जीवन में तीन बार, युवावस्था में दो बार और वृद्धावस्था में एक बार दैनिक भोजन करना चाहिए।
भोजन के लिए अपने कार्य और व्यवसाय की सुविधा से ही लोगों को समय निश्चित करना पड़ता है, फिर भी अंग्रेजों की नकल करके दिन में कई बार खाने की आदत अच्छी नहीं। असन्तुलित और अनियमित भोजन के कारण ही हमारे देश में दिमागी काम करने वाले अधिकतर बीमार पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें शारीरिक श्रम करना नहीं पड़ता, फिर कई बार का खाया भोजन पचे कैसे?
आयुर्वेद में हितकर भोजन को हिताशन, नियत समय के भोजन को नियताशन, उचित मात्रा में भोजन को मिताशन कहा जाता है। इसी प्रकार असात्म्य भोजन को अहिताशन, असमय खाने को विषमाशन और जल्दी-जल्दी दो तीन घण्टा से खाने को अध्यशन कहते हैं। भोजन में इन सबका ध्यान रखना चाहिए।
भोजन की मात्रा
कितनी मात्रा में भोजन किया जाय, इसका ज्ञान रखना बहुत आवश्यक है। कम खाने से शरीर का वजन, बल और कांति आदि घटते हैं। पेट में वायु हो जाती है, बुद्धि में प्रखरता नहीं रहती और निद्रा कम हो जाती है। इसी प्रकार अधिक भोजन करने से रोगों का प्रधान कारण अजीर्ण गले पड़ जाता है। आमाशय, यकृत् (लीवर) तथा आंते कमजोर होकर रुग्ण हो जाती हैं। जब तक एक बार खाया पूरी तरह पच न जाय तब तक पाचन के अंगों को बराबर परिश्रम करना पड़ता है, इस कारण वे अशक्त होते हैं। इसलिए खुराक के विषय में न कम, न अधिक का मध्यम मार्ग श्रेयस्कर है।
प्राणाः प्राणभृतामन्नं तदयुक्त्या हिनस्त्यसून्।
अर्थात् अन्न प्राणियों का प्राण है, परन्तु अयुक्तिपूर्वक सेवन करने से वही प्राणघातक हो जाता है। इसलिए भोजन की मात्रा का निश्चय हर व्यक्ति को अपनी पाचन शक्ति के अनुसार करना चाहिए। आयुर्वेद के मतानुसार भोजन की मात्रा वही श्रेष्ठ है, जो भली-भाँति पच जावे।
मात्रा प्रमाणं निर्दिष्टं सुखं यावत् विजीर्यते।
जो सुखपूर्वक विजीर्ण (हजम) हो जाय और जिसका रस बन जावे वही। भोजन की उपयुक्त मात्रा है।
अपने शरीर की बनावट (वजन और लम्बाई), अवस्था (उम्र, कर्त्तव्य-कार्य) (जिस प्रकार के परिश्रम का काम करना पड़ता हो) तथा ऋतु और जलवायु का विचार करके भोजन की मात्रा स्वयं ही निर्धारित करनी चाहिए। २२-२५ वर्ष की आयु तक शरीर का विकास जारी रहता है। छात्र जीवन में खेल-कूद में शक्ति भी अधिक खर्च होती है, इसलिए प्रतिदिन आधा लिटर दूध या एक अण्डा, सामान्य भोजन के अतिरिक्त, शरीर- पुष्टि के लिए, इस आयु में अवश्य लेना चाहिए।
सामान्यतः तौल या माप में इतना भोजन खाना चाहिए कि आमाशय की कुल जगह का आधा भाग अन्न से और चौथाई भाग पेय से भरा जाये। पेय में जल और दूध आदि सभी पेयों का समावेश है। आमाशय का शेष चौथाई भाग वायु के लिए खाली छोड़ना चाहिए। पेय रूप में दिन के भोजन के अन्त में थोड़ा छाँछ (मट्ठा) और रात्रि भोजन के अन्त में दूध पीना उत्तम होता है। स्वास्थ्य के लिये भोजन के पश्चात् छांछ (मट्ठा) लेना बहुत लाभदायी है। महाराष्ट्र और गुजरात में यह नियम है।
हलवा, पूरी, कचौड़ी, खीर आदि भारी चीजें कम मात्रा में खानी चाहिए, हल्की चीजों से भी अतितृप्ति करके भोजन न करना चाहिए। चपाती (फुलका), दाल, साग, चावल, फल आदि से भी उतना पेट नहीं भरना चाहिए जिससे वह भारी हो जाय; पेट की वायु विचरण न करके रुक जाए और साँस लेने में भी कठिनाई हो, चलने-फिरने की हिम्मत न हो और शरीर को आलस्य घेर ले।
भोजन का ठीक-ठीक पाचन हुआ या नहीं, इसकी पहचान के लिए महात्मा गांधी ने लिखा है कि, जो मनुष्य पचने योग्य भोजन करता है, उसका दस्त थोड़ा बँधा हुआ कुछ कालिमा लिए हुए तथा दुर्गन्धरहित होता है। जिसे ऐसा दस्त नहीं होता, उसे समझना चाहिए कि उसने अयोग्य तथा अधिक भोजन किया है और भोज्यवस्तुओं को अच्छी तरह चबा-चबाकर नहीं खाया। इस तरह मनुष्य अपने दस्त से भी जान सकता है कि उसने अधिक खाया है या कम।
अधिक खाने वाले को सोते समय बेचैनी रहती है, स्वप्न आते हैं तथा प्रातःकाल उसकी जीभ बिगड़ी हुई और मलावृत रहती है। जो प्रवाही (द्रव) अधिक पीता है, उसे रात को पेशाब करने के लिए कई बार उठना पड़ता है (जिससे नींद पूरी नहीं होती) कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनके श्वास से बदबू आती है, इससे यह समझना चाहिए कि उन्हें भोजन ठीक हजम नहीं होता।
कितनी ही बार देखा गया है कि अधिक भोजन करने वालों के शरीर में फोड़े फुंसियां निकल आती हैं, पर वे इन कष्टों की परवाह नहीं करते और अज्ञानवश अधिक खाने की बुरी आदत को नहीं छोड़ते। कितने ही व्यक्तियों को डकारें आया करती हैं, तथा कितने ही व्यक्तियों को दुर्गन्धयुक्त अपान वायु निकलती है। इन सब बातों का यही अर्थ हुआ कि हमारा पेट पाखाना हो गया और हम पाखाने की पेटी को साथ-साथ लिये फिरते हैं।
यद्यपि आधुनिकों ने विभिन्न भोज्य संयोगों के विचार से यह भी निश्चित कर दिया है कि भोजन में कौन-कौन पदार्थ कितने-कितने परिमाण में लेना चाहिए, परन्तु सव के लिए एक समान मात्रा कैसे चल सकती है?
फिर भी हम आगे मात्रानुसार भोजन की छः विभिन्न तालिकायें दे रहे हैं जिनमें भिन्न भिन्न पदार्थों के संयोग से संतुलित एवं पौष्टिक भोजन की मात्रा निर्धारित है। यह भोजन मात्रा युवा अवस्था के स्वस्थ मनुष्यों का स्वास्थ्य-बल बढ़ाने में उपयुक्त है। विभिन्न युवा मनुष्य अपनी पाचन शक्ति, आयु और जलवायु का विचार कर इनमें से किसी को ग्रहण कर सकते हैं।
दैनिक भोजन तालिका
भोजन नं 1
| नाम | वजन |
|---|---|
| चावल | 6 छटांक |
| आटा | 1 पाव |
| दाल | 2 छटांक |
| नारियल का तेल या और कोई तेल | 1 छटांक |
| गुड़ | 1 छटांक |
| आलू या अरवी | 1 छटांक |
| हरे साग | 1 पाव |
| छांछ | 8 छटांक |
| मूंगफली | 2 छटांक |
| नमक | आधा तोला |
भोजन नं 2
| नाम | वजन |
|---|---|
| आटा (गेहूँ, जौ, वाजरा) | 10 छटांक |
| सोयाबीन | 2 छटांक |
| दाल | 1 छटांक |
| छाछ | 6 छटांक |
| गुड़ | 1 छटांक |
| तेल (सरसों, तिल, मूंगफली) | 1 छटांक |
| हरे साग | 4 छटांक |
| आलू | 1 छटांक |
| नमक | आधा तोला |
भोजन नं 3
| नाम | वजन |
|---|---|
| चावल | 8 छटांक |
| सोयाबीन | 2 छटांक |
| दाल | 1 छटांक |
| छाछ | 6 छटांक |
| गुड़ | 2 तोला |
| तेल | 1 छटांक |
| आलू अरवी | 1 छटांक |
| हरे साग | 4 छटांक |
| नमक | आधा तोला |
भोजन नं 4
| नाम | वजन |
|---|---|
| आटा | आधा सेर |
| भींगा चना | आधा पाव |
| गुड़ | 2 तोला |
| प्याज | 1 तोला |
| छाछ | आधा सेर |
| तेल | 1 छटांक |
| हरे साग | 1 पाव |
| केला | 2 अदद |
| नमक | आधा तोला |
भोजन नं 5
| नाम | वजन |
|---|---|
| आटा | 8 छटांक |
| दूध | 8 छटांक |
| तेल या घी | 1 छटांक |
| दाल | 1 छटांक |
| आलू | 1 छटांक |
| साग | 3 छटांक |
| केला | 2 अदद |
| नमक | आधा तोला |
भोजन नं 6
| नाम | वजन |
|---|---|
| आटा | 8 छटांक |
| मांस | 2 छटांक |
| अंडे | 2 अदद |
| तेल या घी | 1 छटांक |
| दाल | 1 छटांक |
| आलू | 1 छटांक |
| साग | 1 पाव |
| नमक | आधा तोला |
वक्तव्य: यह ध्यान रहे कि १ तोला = १२ ग्राम होते हैं : इस हिसाब से १ छटांक = ६० ग्राम; १ पाव = २४० ग्राम; आधा सेर = ४८० ग्राम होते हैं।
पेय पदार्थ
मुख्यतः तीन प्रकार के पेय पदार्थ प्रचलित हैं। जलवर्ग, चायवर्ग और मद्यवर्ग।
साधारण जल के अतिरिक्त आजकल कुछ संघटकों को मिलाकर विभिन्न कृत्रिम जल बनाये जाते हैं; जिनमें वातेरित जल (Aerated water), लेमनेड, जिन्जर, सोडावाटर, कोका-कोला आदि प्रसिद्ध हैं। लोग इनको स्वाद, ठंडक और हाजमा के लिए यह सोचकर पीते हैं कि बोतल में कोई दोष नहीं होता, यह बड़ा भ्रम है। यह कृत्रिम जल यदि उबाले हुए, तिर्यक्पातित या निस्यन्दित पानी से न बनाया हो तो अच्छा नहीं होता क्योंकि केवल हैजा के कीटाणु छोड़कर शेष सभी रोगों के रोगाणु इसमें रहकर वृद्धि कर सकते हैं और अनेक संक्रामक रोगों के कारण बन सकते हैं। अधिकांश बनानेवाले इन्हें विधिवत नहीं बनाते।
सर्वोत्तम पेय
शुद्ध जल तो सब से बढ़िया प्राकृतिक पेय है; दूध और दूध से बने पेय जैसे दही की लस्सी, छाछ और मट्ठा भी स्वास्थ्यकारक पेय हैं। ताड़ या खजूर से निसृत रस नीरा बहुत ही उपयोगी पेय है, लेकिन वह तब तक ही पीने योग्य है जब तक कि उसमें खट्टापन न आये और संधान न होकर मादकता उत्पन्न न हो। बिना झाग आये नीरा पीना चाहिए। गन्ने का रस बड़ा पोषक है, उत्तम पेय है और दूध के साथ मिलाकर पीने से अनेक रोगों में लाभ करता है। नीबू, सन्तरा, मौसमी, अनन्नास आदि फलों का ताजा और निर्दोष रस भी पेय रूप में लेना हितकर होता है।
मादक पेय पदार्थ
जितने भी मादक पदार्थ हैं वे एक बार आरंभ करने पर आदत में बस जाते हैं और फिर उनका छोड़ना कठिन हो जाता है। आरम्भ में उपयोग करने पर ऐसा लगता है कि वे थकान मिटाकर शरीर को स्फूर्ति और मन को प्रसन्नता देने वाले हैं; परन्तु उनका यह गुण स्थायी नहीं रहता, ज्यों-ज्यों वे शरीर के अभ्यास में आते हैं त्यों-त्यों उनमें आराम देने की क्षमता कम होती जाती है। इसलिए मादक पदार्थों की मात्रा भी धीरे-धीरे बढ़ानी ही पड़ती है। यह दुर्गुण सब तरह के मादक पदार्थों में है।
चाय
प्रचार के बल पर क्या हो सकता है, इसका उदाहरण भारत में चाय के प्रचार से बढ़कर दूसरा शायद ही कोई मिले। अब तो चाय का प्रचार इतना अधिक होने लगा है कि उसका निषेध सरल नहीं रहा। शहरों में और गाँवों में शायद ही कोई घर हो जिसमें चाय न पी जाती हो। गांवों में भी चाय का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है।
चाय में हल्का नशा होता है। इसमें विद्यमान टैनिन नामक पदार्थ बहुत हानिकर होता है। इसीसे अधिक चाय के प्रयोग से पाचन संस्थान खराब होता है। कोष्ठबद्धता के अतिरिक्त यह स्नायुमण्डल पर भार डालती है और नींद का हरण करती है।
चाय की हानियों से बचने के लिए उसके बनाने में सावधानी रखनी चाहिए। पहले जल को उबाला जाय, फिर खोलते जल को आग से उतार कर उसमें उत्तम चाय की पत्ती डालकर पाँच मिनट से अधिक न रक्खा जाय। फिर अलग पात्र में घोल को छानकर पर्याप्त दूध और चीनी मिलाकर पिया जाय। खोलते पानी में पाँच मिनट से अधिक पत्ती रहने से उसका टैनिन नामक हानिकारक पदार्थ घोल में आ जाता है। चाय, दूध, शक्कर, पानी सबको एक साथ पानी में मिलाकर खोलाने की बजारू क्रिया अत्यन्त हानिकारक है।
यद्यपि उत्तेजक पदार्थ होने के कारण चाय क्षणिक स्फूर्ति और क्षणिक विचार-शक्ति बढ़ाती है, मूत्र-नि:सारक होने से यह शरीर के विषों को भी बाहर निकालती है, तथापि स्वास्थ्य के विचार से चाय निश्चय ही हानिकारक पेय है। प्रारंभिक आयु में चाय का प्रयोग करने से बच्चों का कोमल पाचनसंस्थान सदा के लिए अशक्त और रोगी हो जाता है।
काफी
यह भी चाय वर्ग का पेय है। यह उत्तेजक होने पर भी हृदय को बल देती है। हृदय की धड़कन बढ़ जाती है और नींद कम हो जाती है। फिर भी काफी के साथ दूध अधिक मात्रा में लेना पड़ता है, इसलिए वह चाय से कम हानिकर और स्फूर्ति देने वाला पौष्टिक पेय हो जाती है। एक प्याला काफी से ४० कैलोरी शक्ति मिलती है।
मद्य (शराब)
मादक पेयों में सर्वाधिक निकृष्ट, हानिकारक और घृणित आचरण बनाने वाला द्रव्य शराब है। प्राचीन समय में औषध रूप में इसका आरम्भ हुआ था। जब कभी अत्यल्प मात्रा में दवा की तरह लेने से यह उत्तेजक औषधि की भांति शरीर में शक्ति और स्फूर्ति उत्पन्न करती है। परन्तु एक बार जितनी मात्रा पीने से जितनी उत्तेजना प्राप्त होती है; आगे उतनी ही मात्रा में उतनी उत्तेजना नहीं मिलती, इसलिए मात्रा बढ़ानी पड़ती है। इसी प्रकार धीरे-धीरे मात्रा बढ़ती ही जाती है जो अन्त में विनाश और रोगों का कारण बनती है।
अधिक परिमाण में अथवा अधिक दिनों तक निरन्तर शराब पीने से पाचन-कला विकृत हो जाती है। यह सभी जानते हैं कि चमड़ी पर स्प्रिट लगाने से वह कड़ी पड़ जाती है। शराब में भी स्प्रिट होती है जिससे वह भीतर पहुँचकर आमाशय इत्यादि कोमल अंगों को एकदम जलाकर कड़ा और काला कर देती है, जिससे उनकी रस छोड़ने की कार्यशक्ति क्षीण हो जाती है। आमाशय में दस प्रतिशत मद्य हो जाने से पाचन कार्य स्थगित हो जाता है।
इसलिये मद्यपी को मन्दाग्नि हो जाती है। यकृत् (लीवर) पर तो शराब का बहुत ही दुष्प्रभाव पड़ता है। प्रारंभिक रूप में इससे मस्तिष्क उत्तेजित होता है, परन्तु बाद में यह स्नायुमंडल को इतना निर्बल कर देती है कि विचार शक्ति ही नष्ट हो जाती है।
निरन्तर शराब पीने वालों की शक्ति और रोग निवारण शक्ति निश्चित ही कम हो जाती है। कुछ लोग कहते हैं कि विचार सम्बन्धी कठिन श्रम करने वाले को एक औंस मद्य प्रतिदिन प्रयोग करने से शान्ति मिलती है। भारत जैसे उष्ण जलवायु वाले देश के लिए यह बात कदापि सत्य नहीं। आयुर्वेद में मद्य के अति प्रयोग से अनेक भीषण दुष्परिणाम और रोग होना बताया गया है।
मद्ये मोहो भयः शोकः क्रोधो मृत्युश्च संश्रितः।
सोन्मादमदमूच्र्छाद्याः सापस्मारापतानकाः।
निवृत्तो यस्तु मद्येभ्यो जितात्मा बुद्धिपूर्वकृत्।
विकारैः स्पृश्यते जातु न स शारीरमानसः।
अर्थात् मद्यपान से मोह, भय, शोक, क्रोध और मृत्यु होती है। पागलपन, नशा, मूच्र्छा, मृगी, धनुर्वात रोग पैदा होते हैं। जो मनुष्य मद्यपान से मुक्त रहता है उसको शारीरिक और मानसिक रोग नहीं होते।
आजकल विशेषकर धनी लोगों में मद्य के अतिप्रयोग से अनेक मानसिक विकार बढ़ रहे हैं। निर्धन और मजदूर वर्ग में भी आर्थिक और शारीरिक हीनता का बड़ा कारण मद्य-पान है। मद्य निश्चित ही आचरण- भ्रष्टता की ओर ले जाता है। इसका दुष्प्रभाव सन्तति पर भी पड़ता है। हमारे देश में ऐसे अगणित उदाहरण हैं कि मद्यपान के फलस्वरूप अच्छे-से-अच्छे धनसम्पन्न और वीरक्षत्रिय परिवार नष्ट हो गये। इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हर क्षेत्र में मद्यपान का त्याग किया जाय।
नशा के लिए अफीम, भंग, गाँजा, चरस आदि पदार्थों का भी प्रयोग करते हैं। ये सभी शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए नितान्त अहितकर हैं। सब का ही प्रभाव हृदय, मस्तिष्क, आमाशय आदि कोमल अंगों पर बुरा पड़ता है और मादक द्रव्यों के अतिसेवन से ये अंग बहुत जल्द बेकाम हो जाते हैं। स्वस्थ रहने की इच्छा रखने वाले को इन सबसे निश्चय ही दूर रहना चाहिए। भांग से बहुत लोग पागल होते हैं वे किसी चिकित्सा से अच्छे नहीं होते।
तम्बाखू
तम्बाखू में निकोटिन नामक एक इतना विषैला पदार्थ होता है कि उसकी केवल दो बूंदों से कुत्ता और आठ बूंदों से घोड़ा मर सकता है। यह विष मनुष्य शरीर में धीरे-धीरे रक्त में मिलकर अनेक भयंकर रोगों का कारण बनता है। तम्बाखू में मादक तत्त्व होते हैं, इसलिए वह भी कुछ दिन लेने से आदत में बन जाती है।
खाने के तम्बाखू के साथ सुपारी होने से दाँत खराब होते ही हैं, भीतर आमाशय भी विकृत हो जाता है। अग्निमांद्य तथा कोष्ठबद्धता आदि पाचन के रोग निश्चित बढ़ते हैं।
धूम्रपान के रूप में तम्बाखू का उपयोग भी कम हानिकारक नहीं है। दुर्भाग्य वश आजकल धूम्रपान नयी सभ्यता का चिह्न बन गया है। बचपन से ही हमारे बालक और युवक देखा-देखी बीड़ी-सिगरेट पीने लगते हैं। यह सामाजिक दोष है।
हुक्का, चूरट, सिगार, सिगरेट, बीड़ी आदि किसी भी रूप में तम्बाखू पीने से फेफड़े रोगी हो जाते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों ने खोज करके यह सिद्ध कर दिया है कि कैंसर जैसा भयंकर मृत्युकारक रोग धूम्रपान से होता है। अमेरिका आदि देशों में सिगरेट की डिबिया पर लिखा रहता है कि इसके पीने से कैंसर हो सकता है फिर भी जो पीते हैं वह मनुष्य कैसे कहे जायेंगे?
फेफड़ों का मुख्य काम रक्त की सफाई करना है। हृदय से चलकर रक्त सारे शरीर में दौड़ कर अंग-प्रत्यंग का मैल बटोर कर फेफड़ों में लौट आता है। फेफड़े रक्त को साफ करके उसमें व्याप्त विषाक्त तत्त्व, निश्वास मार्ग से (कार्बन डाइ ऑक्साइड के रूप में) बाहर निकालते हैं। जिन फेफड़ों का प्रधान काम ही कार्बन को बाहर निकालना है, उन्हें हम धूम्रपान करके कार्बन से भरें यह कितना बड़ा उल्टा काम है?
तम्बाखू के धुएँ में सब से अधिक कार्बन डाइ ऑक्साइड होता है। वह भीतर पहुँच कर फेफड़ों को जलाता है और उनके चारों ओर कालिख की तह जमा कर उन्हें बेकाम कर देता है। इसलिए कदापि धूम्रपान की आदत नहीं डालनी चाहिए।
अतएव सब तरह के मादक पदार्थों में न्यूनाधिक परिमाण में विष के ही गुण-प्रभाव होते हैं। इसलिए उनका परिणाम भी विष के ही समान होता है। पूर्ण स्वास्थ्य की कामना रखनेवालों को सभी प्रकार के मादक द्रव्यों से बचना चाहिए।