आरोग्य-प्रकाशवायु (हवा)

वायु (हवा)

10 मिनट का पाठ

वायु (हवा) शरीर का एक मुख्य घटक और प्राकृतिक आहार है। भोजन के बिना कुछ दिनों और पानी के बिना कुछ घण्टों मनुष्य जीवित रह सकता है; परन्तु हवा के बिना कुछ क्षण भी जीवित रहना संभव नहीं। वस्तुतः वायु ही तो प्राण है।

पृथ्वी के चतुर्दिक् सौ मील की ऊंचाई तक वायु का आवरण है जिसमें अनेक तत्व मिश्रित हैं। मुख्यतः प्राणवायु (ऑक्सीजन), भूयाति (नाइट्रोजन) और प्रांगार द्विजारेय (कार्बन डाइऑक्साइड) इन तीन तत्त्वों के अलावा भाप, धूल, सेन्द्रिय और खनिज द्रव्यों के कण तथा कुछ गैसें भी वायु में रहती हैं।

वायु के संघटक तत्त्व

खुले वायुमण्डल की हवा में प्राणवायु और भूयाति का अनुपात इस OCR में अस्पष्ट है। प्रति दस हजार भाग में ३–४ भाग प्रांगार द्विजारेय बताया गया है। नीचे मूल पाठ में उपलब्ध प्रतिशत दिए गए हैं। इन तत्त्वों में प्राणवायु मनुष्य के लिए परम उपयोगी, भूयाति निरुपयोगी और प्रांगार द्विजारेय अत्यन्त हानिकर बताया गया है।

अधिक मात्रा में प्राणवायु मिश्रित हवा को शुद्ध और प्रांगार द्विजारेय मिश्रित को अशुद्ध हवा कहते हैं। शुद्ध हवा में कोई रंग, रूप, गंध या स्वाद नहीं होता, क्योंकि वायु के अन्य तत्त्व निर्गन्ध और निःस्वाद होते हैं, परन्तु प्रांगार द्विजारेय खट्टे स्वादवाला, दुर्गन्धयुक्त एवं वजनदार होता है। भारी होने से ही वह खड्डों में, गहरे जलहीन कुओं में और आठ-दस फीट की ऊँचाई तक भूमि तल में अधिक मात्रा में रहता है। प्राणवायु ज्वलनशील होता है, परन्तु प्रांगार द्विजारेय ज्वलनशील और जीवन का पोषक नहीं होता। इसलिए जहां प्रांगार-द्विजारेय वायु अधिक हो, वहाँ दीपक बुझ जाता है। ऐसी अशुद्ध हवा में मनुष्य भी जीवित नहीं रह सकता।

वायुमंडल में प्रांगार द्विजारेय की मात्रा मनुष्य की निःश्वास से अधिक बढ़ती है। जब हम श्वास द्वारा हवा शरीर के भीतर ले जाते हैं तो वायु के तत्त्व निम्न परिमाण में भीतर पहुँचते हैं :- - प्राणवायु (ऑक्सीजन) २०.९६ प्रतिशत - प्रांगार द्विजारेय (कार्बन डाइऑक्साइड) ०.०४ प्रतिशत - भूयाति (नाइट्रोजन) ७९.०० प्रतिशत प्रश्वास द्वारा बाहर निकलने वाली वायु शरीर के भीतर का मैल बटोर लाती है, इसलिए उसमें प्राणवायु की मात्रा कम, और प्रांगार द्विजारेय की मात्रा लगभग सौ गुना बढ़कर निकलती हैं। निःश्वसित हवा में निम्न तत्त्व होते हैं :- - प्राणवायु १६.४० प्रतिशत - भूयाति ७९.१९ प्रतिशत - प्रांगार द्विजारेय ४.४१ प्रतिशत इनके अतिरिक्त निःश्वास से बाहर आनेवाली वायु में कुछ भाप और अन्य मैल भी रहते हैं।

अशुद्ध हवा

जिस जगह में गंदगी हो, नमी या सीलन रहती हो, मकान में धूप और साफ हवा आने के लिए पर्याप्त खिड़कियां और दरवाजे न हों, चीजें सड़ती हों और बदबू फैलती हो बहुत सवारी और घनी बस्ती हो, कम जगह में अधिक प्राणी रहते हों, जहां कल-कारखाने हों और धुआं, धूल के कण, रुई या रेशम के रेशे उड़ते हैं। ऐसी जगहों में वायु में गंदगी और प्रांगार द्विजारेय (अशुद्ध हवा) की मात्रा बढ़ जाती है।

अँधेरे और तंग स्थान में अथवा जहां बहुत-से व्यक्ति बैठे या लेटे हों, जैसे सिनेमा आदि में वहाँ की वायु अधिक अशुद्ध होती है। रात में चारों ओर से किवाड़ खिड़की बन्द करके कई आदमी सोवें तो उनकी प्रश्वास द्वारा निकली अशुद्ध वायु से कमरे का वातावरण जहरीला हो जाता है। कमरा बन्द करके अँगीठी या मिट्टी के तेल का दीपक जलता छोड़ दें तो कमरे के वातावरण में व्याप्त प्राणवायु नष्ट हो जायगी और प्रांगार द्विजारेय (अशुद्ध हवा) बढ़ जाएगा, क्योंकि दीपक या आग प्राणवायु खाकर ही जलते हैं और उनकी ज्वलन क्रिया से प्रांगार द्विजारेय उत्पन्न होता है।

कोई चीज जल रही हो और बाहर से हवा आने का मार्ग बन्द हो ऐसे स्थान पर ठहरने वाला व्यक्ति, वहाँ अशुद्ध वायु की अधिकता से अंततः मर जायगा।

कस्बों और बड़े नगरों में कोल गैस और मिट्टी का तेल अधिक जलाने से, कल-कारखानों के धुएँ से सकरी गलियों की गंदगी और अधिक आबादी तथा घनी बस्तियों से वहाँ के वायुमंडल में अशुद्ध वायु की मात्रा बढ़ती है।

गाँवों में खुला वातावरण होने से वायु-मण्डल में पर्याप्त प्राणवायु रहती है, परन्तु उस प्राकृतिक सुविधा का लाभ, हमारे ग्रामवासी अज्ञानतावश नहीं उठाते। प्रायः सर्वत्र ही गाँवों में छोटे-छोटे, नीचे-नीचे, कच्चे और बिना खिड़कियों के मकान होते हैं, जिनमें धुप और शुद्ध हवा काफी नहीं आ जा पाती। उस पर भी अधिकांश गांव वाले रहने के मकान में ही गाय-भैंस आदि पशुओं को रखते हैं, जिससे सारे मकान में पशुओं के मल-मूत्र का कीचड़, सीलन, सड़ाँद और गंदगी भरी रहती है।

कुछ लोग तो खाद के लिए गोबर, कूड़ा-कर्कट अपने आँगन में ही या मकान के बहुत निकट इकट्ठा करते हैं। ग्रामवासियों के लिये पशु, गोबर और कूड़ा आदि खेत के खाद देने के लिए अत्यावश्यक हैं। खाद गड्ढे बनाकर डालने से वह अधिक उपयोगी हो जाती है तथा गाँव भी स्वच्छ रहता है। खाद का गड्ढा गाँव से दूर होना चाहिए। इन कारणों से ही गाँव का वातावरण अशुद्ध और अस्वास्थ्यकर होता है।

अभ्यस्त हो जाने से वह गाँव वालों को स्वयं नहीं अखरता, परन्तु सत्य यह है कि इस अज्ञानता से गाँव की बस्ती और घरों के वायुमण्डल में अशुद्ध वायु की मात्रा बढ़ती है और रोग फैलते हैं।

गाँवों में अधिकांश खेतों पर काम करने वाले स्त्री-पुरुषों को तो उचित मात्रा में शुद्ध हवा भी मिल जाती है, परन्तु ज्यादातर घर के भीतर रहने वाले बालकों और वधुओं के स्वास्थ्य पर घरों की उस गंदगी और संकीर्णता का बुरा प्रभाव निश्चित पड़ता है।

अशुद्ध हवा अर्थात् वायु का विषाक्त तत्त्व -- प्रांगार द्विजारेय जहाँ मनुष्यों के प्राणों के लिए अत्यन्त घातक है वहाँ पेड़-पौधों की वही खुराक है। सूर्य के प्रकाश में पौधे अशुद्ध वायु को खाते हैं और प्राणवायु छोड़ते हैं। यह क्रिया रात में उल्टी हो जाती है। रात में पौधे प्राणवायु खाकर अशुद्ध वायु उगलते हैं। इसलिए रात के समय पेड़-पौधों के नीचे मनुष्य को नहीं सोना चाहिए। बड़, पीपल ऐसा नहीं करते।

वायु में अशुद्ध हवा बढ़ जाने से श्वास लेने में कठिनाई होती है। जी घबराता है या मिचलाता है और कै होने लगती है। आदमी बेहोश हो जाता है और दम घुट कर मर तक जाता है।

प्रांगार द्विजारेययुक्त अशुद्ध वायु के अतिरिक्त सीलन वाले वातावरण की नम हवा भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। उसकी अपेक्षा खुश्क हवा अधिक हितकर होती है। शरीर का मैल और जहर जो पसीना आदि के रूप में बाहर निकलता है, उसे आसानी से सोखने की शक्ति खुश्क हवा में ही होती है। उससे शरीर के भीतर की क्रियायें दुरुस्त रहती हैं। मैल को भीतर से बाहर निकालने की जितनी क्षमता खुश्क हवा में है, उतनी नम हवा में नहीं होती।

शुद्ध हवा (प्राणवायु)

वायु के तत्त्वों में प्राणवायु ही जीवन और शरीर के लिए उपयोगी है। श्वास द्वारा भीतर पहुँचकर शरीर का मैल बाहर निकालने का काम प्राणवायु ही भली-भाँति करती है। वह रक्तसंचार को यथावत् रखती है और उसे शुद्ध करती है। रक्त में लाली और चमकीलापन प्राणवायु (ऑक्सीजन) से ही होता है, उसके अभाव से रक्त में कुछ मटमैलापन आ जाता है।

ज्वलनशील पदार्थ होने के कारण प्राणवायु ही जीवनदीपन को जलाने वाली है। वह पाचन क्रिया को ठीक रखती है और भूख बढ़ाती है। उससे मस्तिष्क को नयी शक्ति प्राप्त होती है। जो लोग अध्ययन या चिन्तन का काम करते हैं, उन्हें पूरी मात्रा में प्राणवायु न मिले तो उनकी स्मरण शक्ति और विचार-क्षमता कमजोर हो जाती है।

प्राणवायु प्राप्ति के साधन

पर्याप्त मात्रा में प्राणवायु प्राप्त होती रहे इसके लिए सुबह-शाम खुले मैदान में घूमना हितकर है। खुली हवा में अधिकतर गहरी सांस लेना चाहिए जिससे फेफड़े पूरी तरह फैलने - सिकुड़ने की क्रिया कर सकें। भली-भाँति साँस लेने-छोड़ने का काम फेफड़ों की सुरक्षा पर निर्भर है। इसके लिए विशेषकर भारतवासियों को अपने बैठने का ढंग सुधारना चाहिए। प्रायः थोड़ा-सा झुककर बैठा करते हैं, यह दोषपूर्ण है। बैठक ऐसी हो जिससे पीठ सीधी और सीना उभरा हुआ रहे, जिससे फेफड़े पूरी तरह फैले रहा करें और पूरी मात्रा में प्राणवायु ग्रहण किया करें।

श्वास द्वारा अच्छी मात्रा में प्राणवायु ग्रहण करना साँस लेने के ढंग पर भी निर्भर करता है। सांस सदा नाक से ही लेनी चाहिए। नाक की बनावट ऐसी है कि उसमें होकर भीतर जाने वाली हवा की गंदगी नाक में छन जाती है और कुछ गर्म होकर हवा भीतर पहुँचती है। मुँह से साँस लेने से दूषित और रोगाणुयुक्त वायु बिना साफ हुए सीधी भीतर पहुँच सकती है। कोई बहुत दिनों तक मुँह से साँस लेता रहे तो उसका चेहरा भी असुन्दर और भद्दा-सा हो जाता है। इसलिए मुँह से साँस लेने की बुरी आदत को बचपन से ही रोकना चाहिए।

रात में हवादार स्थान में सोना चाहिए। जाड़े के दिनों में भी कमरे की खिड़कियाँ और दरवाजे बिलकुल बन्द करके नहीं सोना चाहिए। किसी भी ऋतु में मुँह ढक कर कदापि नहीं सोना चाहिए। इससे हमारी निःश्वास से निकली सौगुनी अशुद्ध वायु फिर शरीर के भीतर पहुँच कर निश्चय हानि करती है। इसलिए जाड़ों में भी मुँह ढक कर नहीं सोना चाहिए। केवल गर्दन तक शरीर को कपड़ों से ढकना काफी है। यदि शीत लगने का भय हो तो सिर पर कोई वस्त्र बाँधकर या कन्टोप ओढ़कर सोना चाहिए। हर दशा में नाक खुली रखना आवश्यक है।

वायु से डरना एक प्रकार का अज्ञान है। खुले आकाश के नीचे या बरामदे में सदा सोने का अभ्यास हानि नहीं करता। रोगी को भी थोड़ी आड़ से घूमकर पहुँचने वाली सौम्य हवा कोई नुकसान नहीं पहुँचाती। रोगी को तेज हवा का झोंका सीधा न लगे, इतना ही ध्यान रखना पर्याप्त है।

वैसे तो प्रकृति ने ऐसा नियम बना रखा है कि प्रायः सर्वत्र ही आवश्यक मात्रा में प्राणवायु प्रचुर मात्रा में व्याप्त रहती है, परन्तु विभिन्न प्रकार की मनुष्यकृत गंदगी उसको अशुद्ध बना देती है। फिर भी हवादार मकान और साफ-सुथरे खुले मुहल्ले में रहें तो पर्याप्त प्राणवायु श्वास द्वारा शरीर को प्राप्त हो सकती है।

मनुष्यों की प्रश्वास से अधिकतर वायु दूषित होती है इसलिए अधिक भीड़-भाड़ वाले बन्द स्थान में ज्यादा देर नहीं ठहरना चाहिए। साधारणतः किसी भी मनुष्य से इतना सट कर नहीं बैठना चाहिए कि उसके निःश्वास से निकली हवा हमारी श्वास में मिल जावे। सटकर लेटना और सोना तो चाहिए ही नहीं, छोटे कमरे में कई लोगों को एक साथ नहीं सोना चाहिए और न ही छोटे स्थान में बहुत लोगों को बैठना-बिठाना चाहिए। स्त्री-पुरुष (दम्पत्ति) को यदि एक शय्या पर सोना हो तो मुँह विपरीत दिशा में करके सोना उचित है। सिनेमा तो निश्चय ही हानिकारक है। बहुत लोगों के निःश्वास में वायु का गन्दापन वहाँ अवश्य होता है।

रोगी मनुष्यों की प्रश्वास से उनके रोग-कीटाणु आस-पास ही हवा में फैल जाते हैं और निकट बैठे हुए लोगों की श्वास द्वारा उनके भीतर पहुँचकर उन्हें भी रोगी बना देते हैं। तपेदिक, कुकर खाँसी, जुकाम, प्रतिश्याय (इन्फ्लुएंजा) आदि इसी प्रकार निःश्वास वायु के संक्रमण से फैलते हैं। इसलिए इन रोगों से पीड़ित मनुष्यों से कम-से-कम इतना दूर अवश्य बैठना चाहिए कि उनकी निःश्वास से निकली वायु हमारी साँस में मिलकर हमारे भीतर न पहुँच जावे। जहाँ रोगी लेटा हो वह स्थान यदि खुला और बहुत हवादार नहीं है तो वहां सोना, लेटना या बैठना निश्चित हानिकर है।

चेष्टा पूर्वक श्वास द्वारा अधिक मात्रा में प्राणवायु ग्रहण करना और अशुद्ध वायु से यथासंभव दूर रहना पूर्ण स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए आवश्यक आचरण है।