जल (पानी)
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पानी जीवन और शरीर का प्राणवायु के पश्चात् अत्यन्त अनिवार्य घटक है। शरीर का तीन चौथाई भाग पानी ही है। पीने तथा शरीर, सामान और स्थानों की स्वच्छता में तो पानी का अनिवार्य उपयोग है ही, आजकल उद्योगों का भी यह एक आवश्यक साधन हो गया है।
स्वास्थ्य-प्रसंग में पीने और नहाने-धोने के काम आने वाले पानी के विषय में विशेष ज्ञान करना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। हमारे देश में लगभग ८० प्रतिशत पेट के रोग, चमड़ी के और अन्य कई संक्रामक रोग पानी के दोषों से फैलते हैं। विकृत जल के दोषों के प्रति अज्ञानता और असावधानी इन रोगों का प्रमुख कारण है।
पानी का उपयोग
पीने के लिए पानी की मात्रा मौसम के अनुसार घटती-बढ़ती है। सामान्यतः मनुष्य-शरीर के भीतर चौबीस घण्टों में तीन से चार सेर तक पानी की आवश्यकता होती है। इसमें लगभग तीस प्रतिशत खाद्य द्रव्यों द्वारा भीतर पहुँचता है, आठ प्रतिशत पाचन क्रिया से भीतर ही उत्पादित होता है। शेष मात्रा की पूर्ति ऊपर से पानी और अन्य पेय पदार्थों से होती है। जितना पानी शरीर के भीतर पहुँचता है, लगभग उतना ही बाहर निकलता है। ३५ प्रतिशत त्वचा द्वारा, २० प्रतिशत प्रश्वास द्वारा, ३ प्रतिशत मल और थूक द्वारा और ४० प्रतिशत मूत्र (पेशाब) द्वारा। यह अनुपात सामान्य स्वस्थ स्थिति का है।
जल की सहायता से शरीर के भीतर पाचन प्रचूषण होता है। भीतरी कोष्ठों की सफाई होती है और मल बाहर निकलता है। रक्त तरल रहता है। रसोत्पादक ग्रन्थियाँ जल की मदद से ही अपना काम करती हैं, इस प्रकार पीने के पानी का स्वास्थ्य के साथ बड़ा महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध है।
अनुपान द्रव्यों में भी स्वच्छ जल सर्वोत्तम होता है। अधिक गर्म या अधिक ठंडा पानी भीतरी शरीरांगों को हानि पहुँचाता है। बर्फ मिश्रित पानी से आंतों और आमाशय को तो हानि होती ही है; गला भी खराब होता है और दाँतों की जड़े कमजोर होती हैं। उससे प्यास की यथार्थ शान्ति भी नहीं होती।
सामान्यतः दिन-रात में जब भी प्यास लगे तब पानी पीना चाहिए। जब खूब भूख लगी हो, तब पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन के मध्य भी थोड़ा ही पानी पीना चाहिए। भोजनोपरान्त एक दो घण्टा बाद जब प्यास लगती है तब यथेच्छ पानी पिया जा सकता है सदा ही पानी घूंट-घूंट करके धीरे-धीरे शान्त भाव से पीना चाहिए। इससे पानी के साथ मुंह का लार-रस मिल जाने से वह पाचक और स्वादिष्ट बन जाता है, तथा यथार्थ प्यास बुझती है।
नहाने-धोने, कपड़े, बर्तन और घर आदि की सफाई में भी पानी का बहुत उपयोग होता है। बर्तन व कपड़े धोने और नहाने के लिए विशेष रूप से स्वच्छ एवं कीटाणुरहित पानी का ही उपयोग करना चाहिए। गन्दे पानी में स्नान से चमड़ी के रोग होते हैं।
पीने का पानी
पीने के लिए बिल्कुल शुद्ध और स्वच्छ जल का ही प्रयोग करना चाहिए सर्वथा शुद्ध जल में कोई गंध, रंग या स्वाद नहीं होता। उसमें एक विशेष प्रकार की चमक होती है और वह पारदर्शक होता है जिसमें से एक ओर से दूसरी ओर की हर वस्तु एकदम साफ दिखाई देती है। जिसमें ठोस पदार्थों की मात्रा अधिक न हो, भूयाति (नाइट्रोजन) मिश्रित सेन्द्रिय पदार्थ, क्ण रेशें या जीवाणु कतई न हों - ऐसा पानी पीने के योग्य होता है।
अपने उपयोग के लिए हम मुख्यतः तीन साधनों से पानी प्राप्त करते हैं-आकाश से वर्षा द्वारा, पृथ्वी पर नदी तालाब या बांधों द्वारा और भूमि के भीतर से झरनों और कुओं द्वारा। पीने के विचार से आकाश से प्राप्त जल सर्वोत्तम, भूमि तल से प्राप्त मध्यम और पृथ्वी से ऊपर का जल निकृष्ट होता है।
वर्षा का जल
वर्षा से प्राप्त जल निर्मल, हल्का, पथ्यकर और वायु मिश्रित होने से रुचिकर होता है। वैसे सब जगह का वर्षाजल एक-सा ही होता है, परन्तु वायु मण्डल की स्थिति के अनुसार उसमें कभी-कभी, कहीं-कहीं कुछ अन्तर हो जाता है।
जहाँ अधिक कल-कारखाने, मिले अथवा गुम्मे या चूने के भट्ठे होते हैं वहाँ के आकाशी वातावरण (वायुमण्डल) में व्याप्त भाप, धूलिकण, रेशे और जहरीली गैसें, पहले-पहल बरसने वाले वर्षा जल में मिल जाती हैं। इसलिए कभी भी आकाश से बरसने वाले पानी के प्रारंभिक अंश को पीने के काम में नहीं लेना चाहिए। एटम बम तथा हाइड्रोजन बम के विस्फोट के कारण वातावरण बहुत दूषित हो जाता है।
वर्षाजल की सर्वोपरि शुद्धता की विशेषता उसमें तब तक ही रहती है जब तक कि वह भूमि पर नहीं बिखरता। मकानों के छप्पर और छतों पर गिरते ही वर्षाजल में भी धूल कूड़ा-कर्कट और मैल मिल जाता है। उसको ऊपर ही ऊपर खुले स्थान में कोई पात्र रखकर एकत्र किया जा सके तो वह अमृत समान होता है। राजस्थान के मरुभूमि एवं जलाभाव वाले अन्य क्षेत्रों में कुछ लोग साफ छतों का वर्षा का पानी भूमितल में पक्का कुण्ड बनाकर एकत्र करके पीने के उपयोग में लाते हैं।
परन्तु ऐसा करना सर्वत्र व्यावहारिक नहीं, इसलिए वर्षा का जल अधिकांश बहकर तालाबों और नदियों में इकठ्ठा हो जाता है। पीने के बजाय घरों में वर्षा-जल ऋतुकाल में नहाने धोने मात्र के उपयोग में आता है।
नदी-तालाब का जल
पृथ्वी पर बहने वाली नदियां, तालाब, बांध या अन्य जलागार, जल प्राप्ति का दूसरा सदासुलभ साधन हैं।
तालाबों में प्रवाह नहीं होता और खुले रहने से उनमें धूल, कूड़ा, मैल मिलता रहता है। स्वस्थ और रोगी, सब तरह के स्त्री-पुरुष- बच्चे तालाब के पानी में नहाते हैं, गन्दे कपड़े धोते हैं जिनका विषैला मैल तालाब में ही मिलता रहता है। किनारे शौच करके लोग गन्दे हाथ भी तालाबों में धोते हैं। पशुओं को पानी पिलाने और नहलाने में भी तालाबों का उपयोग होता है। वर्षा के दिनों में आस-पास का सारा मैल पानी के बहाव से तालाबों में एकत्र होता है। ऐसे कितने ही कारणों से तालाबों का पानी गन्दा और विषैला होता है जिसके पीने से कई तरह के रोग फैलना निश्चित है।
यही स्थिति नदियों के पानी की है। तालाबों की भांति नदी - जल को भी लोग गन्दा करते हैं। अधिकतर श्मशान नदियों के किनारे होते हैं जिनसे मुर्दों की राख और कभी-कभी जानवरों तथा मनुष्यों की लाशें तक नदी में प्रवाहित की जाती हैं जो उसमें ही सड़गल जाती हैं। आस-पास के गांववाले सर्वत्र ही नदी किनारे शौच कर उसी के पानी में आबदस्त लेते हैं। वर्षा में जब नदियों में अधिक पानी उमड़ता है तब किनारों का मल, कूड़ा-कर्कट और घास-फूस बहकर नदी में ही सिमट आता है।
बड़ी-बड़ी नदियों में तेल और भाप की नावें चलने से उनका पानी गन्दा होता रहता है। नदियों के किनारे बसे नगरों के मल-मूत्र के नाले और कल-कारखानों के कचरे भी नदियों में ही छोड़े जाते हैं।
इस प्रकार छोटी बड़ी सभी नदियों का पानी उपरोक्त विभिन्न कारणों से अत्यधिक गन्दा होता है; जो बिना साफ किये कदापि पीने लायक नहीं होता। नगरों में नदियों का पानी ही बाँधों और जलागारों में इकट्ठा करके नलों द्वारा मुहल्लों और घरों तक पहुँचाया जाता है, नलों का पानी रासायनिक या यान्त्रिक क्रिया से साफ करके भेजा जाता है, इसलिए पीने के लिए वह निरापद होता है।
ऐसी नदी जो अधिकांश पहाड़ों और पथरीले मार्ग में होकर बहती हो, जिसमें बारहों मास प्रवाह रहता हो और जिसके किनारे बस्तियाँ न हों उसका पानी पीने के काम में लाया जा सकता है।
झरने और कुएँ का पानी
जल प्राप्ति का तीसरा साधन भूमि के गर्भ से निकलने वाले स्रोत, झरने, प्रपात और भूमि पर खोदे हुए कुएँ है।
गहराई से निकलने वाले झरने का पानी साफ और चमकीला होता है। भूमि के भीतर विभिन्न खनिज स्थिति होने से कहीं झरनों का जल भारी, कहीं हल्का होता है। पथरीले क्षेत्र के झरने के जल में पत्थर के बहुत महीन कण मिले रहते हैं, जिसे पीने से पेट के रोग होते हैं। बद्रीनाथ आदि पर्वतीय तीर्थों के यात्री वहाँ के झरनों का जल पीने से इसी कारण उदर रोग से बहुधा पीडित हो जाते हैं। सामान्यतः झरनों का जल दूषित नहीं होता और भारी न हो तो पीने के लिए बड़ा उपयोगी है। परन्तु वह सर्वत्र सब के लिए, सदा सुलभ नहीं होता।
कुएँ का पानी हमारे देश की बहुसंख्यक जनता पीती है। यद्यपि वह शुद्ध और स्वास्थ्यकर नहीं होता है। कम गहरे, कच्चे तथा खुले कुओं का पानी तो बहुत कम पीने योग्य होता है। बावड़ी का पानी भी पीने के काम में नहीं लेना चाहिए। ऊपर से घास-पत्ती, पक्षी आदि गिरने से कुआँ गन्दा होता है। प्राय, कुएँ से पानी भरने वाले अपने बर्तन कुएँ के पनघट पर ही मांजते हैं, इससे कुएँ का पानी गन्दा होता रहता है।
पीने के पानी का कुआँ पक्का और चारों ओर से ऊँचे घाट वाला होना चाहिए, जिससे बाहर का गन्दा पानी या छींटे कुएँ में न गिर सकें। वह भीतर से भी सीमेंट की चिकनी छाब से पक्का होना चाहिए जिससे आसपास का गन्दा पानी रिसकर उसमें न आवे। भीतर कहीं छेद, आले या ऐसी सन्धियाँ नहीं होनी चाहिए जिनमें पक्षी घोंसले बनाकर बसेरा करें। ऐसा होने से पक्षी कुएँ में ही बीट करते हैं, घोंसलों की घास बिखरती है, अण्डे गिरते हैं और कभी-कभी पक्षी भी मर कर कुएँ में गिरते और सड़ते हैं।
इनसे पानी विषाक्त होता है। ऊपर से टीन या सीमेंट के सायबान से कुआँ छायादार होना चाहिए और कुएँ के आस-पास कोई गन्दा नाला, पोखर या पानी इकट्ठा होने का गड्ढा नहीं होना चाहिए। ऐसे कुएँ का जल स्वच्छ और पीने योग्य हो सकता है। उसे छान कर पीना चाहिए।
पेय जल - एक समस्या
हमारे देश में पीने के लिए जनता को सर्वत्र शुद्ध पानी मिलने का प्रबन्ध निश्चय ही एक बड़ी समस्या है। नगरों में तो अधिकांश व्यवस्था हो गई है, परन्तु गाँवों में अभी कुछ नहीं हुआ है।
प्राणिज विकृत अर्थात् रोगाणुयुक्त जल सबसे अधिक खराब होता है और अभाग्यवश वही हमारे देश की अधिकांश जनता को पीना पड़ता है। परिणामतः जल-दोष से आन्त्रिक और पेट के रोग भारत में बहुतायत से होते हैं। विशेषकर अमीबिक प्रवाहिका रोग बहुत खराब होता है और आयुर्वेद की लम्बी चिकित्सा से जाता है। इसलिए जन-रक्षा हेतु शुद्ध पेयजल का सर्वत्र उपयोग अत्यन्त वांछनीय है। हमारी सरकार पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में विशाल पैमाने पर यह प्रयास कर रही है कि सर्वत्र शहरी और ग्रामीण जनता को शुद्ध पेयजल दिया जा सके। इस पुण्य कार्य में सरकार के साथ जन-जन को अधिकाधिक सहयोग करना चाहिए, जिससे शुद्ध पेयजल की राष्ट्रीय समस्या यथाशीघ्र हल हो सके।
हर गाँव में ग्रामवासियों को मिलकर ऊपर बताये हुए प्रकार का एक-एक पक्का छायादार बड़ा कुआँ अवश्य बनाना चाहिए। आवश्यकतानुसार एक से अधिक बन सकें तो उपयुक्त होगा। इस तरह जब तक सरकारी योजना पूर्ण नहीं होती, तब तक काम चलाया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त हर नागरिक को तालाब और नदियों के पानी को छानने, फिल्टर करने या रासायनिक क्रिया से शुद्ध करने पर ही उपयोग में लाने का अनिवार्य अभ्यास बना लेना चाहिए। शुद्ध पेयजल की राष्ट्रव्यापी समस्या का यह सर्वोपरि व्यावहारिक हल है।
दूषित पानी
दूषित जल के तीन प्रकार हैं; खनिज वानस्पतिक और प्राणिज। खनिज दूषित, अर्थात् चूना पत्थर, लोहा, अभ्रक आदि के कण मिला हुआ जल रंग-रूप में शुद्ध जल जैसा ही होता है, परन्तु स्वाद में थोड़ा भिन्न अवगत होता है। इससे प्रवाहिका, मलावरोध और अग्निमांद्य आदि रोग होते हैं।
वनस्पति से दूषित अर्थात् घास-फूस, पत्ते, वनस्पति, काई-सीवार आदि से विकृत जल रंग-रूप में कुछ हरा या मटमैला होता है। सड़ने से उसका स्वाद बदबूदार होता है। इससे मितली, वमन, प्रवाहिका और मरोड़ आदि रोग होते हैं।
प्राणिज दूषित जल सबसे अधिक घातक और दुःखदायी रोगों का कारण होता है। इसमें दिखने, न दिखने वाले छोटे-छोटे रोगाणु, तृणाणु या कृमि के अण्डे मिले रहते हैं। ऐसा पानी पीने से अतिसार, संग्रहणी, आंत्रिक रोग विसूचिका विविध कृमि रोग और भयंकर संक्रामक रोग उत्पन्न होते हैं और फैलते हैं। जल में प्राणिज दूष्यता, अधिकांशतः रोगियों के मल-मूत्र सने या अन्य कपड़े धोने से, जल में ही या उसके किनारे मल-मूत्र त्यागने, थूकने, रोगी मनुष्य या जानवरों को नहलाने आदि से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार थोड़े से लोगों की नादानी और अज्ञान कभी-कभी जनपद-विध्वंसक रोगों का कारण बन जाता है।
जल-शुद्धि के उपाय
यद्यपि सूर्य की किरणों, हवा, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और प्रवाहगति के नैसर्गिक साधनों से जल स्वयं शुद्ध होता रहता है। परन्तु जलशुद्धि के नैसर्गिक साधनों की अपेक्षा, प्राणियों द्वारा पानी को गन्दा करने की स्थिति अधिक है। इसलिए, सर्वत्र बिल्कुल शुद्ध पानी मिलना प्रायः असम्भव ही मानना चाहिए और यदि कुएँ या नदी का पानी ही पीना पड़े तो, उसको शुद्ध करके ही पीना चाहिए अन्यथा रोगी होने की पूरी आशंका है।
पानी को कपड़े की दो तहों में छानकर पीना जलशुद्धि का सबसे सहज उपाय है। अति प्राचीनकाल से जैनधर्मावलम्बी सदा ही छानकर पानी पीने की परम्परा अपनाये हुए हैं। वे इसे धार्मिक कृत्य मानते हैं। वस्तुतः स्वास्थ्य के लिए यह अभ्यास सब के लिए अत्युपयोगी है।
पानी को दोष-रहित बनाने के अनेक उपाय हैं, जिनमें कुछ बहुत मँहगे हैं, कुछ सुलभ भी हैं। एक तिपाई फिल्टर का ढंग गृहस्थों के लिए अच्छा है। इनमें चार खाने वाली लकड़ी की तिपाई बनायी जाती है। सबसे नीचे खाने में खाली घड़ा उससे ऊपरवाले में बालू से भरा घड़ा, उससे भी ऊपर वाले खाने में कोयला का चूरा भरा घड़ा और सबसे ऊपरवाले खाने में पानी भरकर घड़ा रक्खा जाता है।
ऊपर के तीन अर्थात् पानी, कोयले का चूरा और बालू भरे घड़ों की तली में छोटे-छोटे छेद किये जाते हैं, जिनसे पानी छनकर चूता रहे। सबसे ऊपर के घड़े में भरा पानी, कोयले का चूरा और बालू भरे दो घड़ों में से छनकर सबसे नीचे के खाली घडे में एकत्र हो जाता है। पानी की सब अशुद्धियां बालू और कोयले में रह जाती हैं, और कैसा भी अशुद्ध जल इस तरह फिल्टर करने से पीने लायक शुद्ध हो जाता है। कुछ वर्ष तक इस तरह की तिपाइयां छोटे स्टेशनों पर रक्खी दिखाई देती थीं।
कुछ रासायनिक तत्त्वों के मिश्रण से पानी शुद्ध किया जाता है। इनमें फिट-करी डालकर पानी शुद्ध करना अच्छा है। फिटकरी से वर्षाजल या दूसरे अशुद्ध पानी के दूषित तत्त्व तली में बैठ जाते हैं। निर्मली से भी जल शुद्ध होता है। सामूहिक प्रयोग के लिए पोटेशियम परमैंगनेट (पिनकी) डालकर कुएँ का जल शुद्ध करना अच्छा है। पानी साफ करने के लिए कुओं, तालाबों और जलाशयों में पिनकी ही डाली जाती है। शहरों में नलों द्वारा जो पानी घर-घर भेजा जाता है, वह अधिकतर यान्त्रिक साधनों तथा रासायनिक द्रव्यों से शुद्ध किया जाता है।
जल शुद्धि के सभी उपायों में पानी को छानकर पीना सबसे बढ़िया है। सदा ऐसा अभ्यास रखना चाहिए। जहाँ कोई संक्रामक रोग फैला हो या फैलने की आशंका हो, वहाँ सदैव पानी को औंटाकर ही पीना चाहिए। खौला लेने से पानी हल्का और दोष रहित हो जाता है, परन्तु खौले हुए पानी का स्वाद कुछ फीका और अरुचिकर होता है। खौलाकर दूध की भांति फेटकर ठंडा कर लेने से औंटा हुआ पानी सुस्वादु हो जाता है।