आरोग्य-प्रकाशऋतुचर्या

ऋतु - चर्या

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विभिन्न ऋतुओं की प्रकृति और प्रभाव भिन्नता के आधार पर किस ऋतु में किस प्रकार का आहार-विहार रखना चाहिए, इसका ज्ञान रखना प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी है। यूरोप आदि देशों में तो प्रायः पूरे वर्ष शीतऋतु जैसा एक-सा ही वातावरण रहता है, परन्तु हमारे देश में विभिन्न ऋतुयें होती हैं और उनके वातावरण में एकदम भिन्नता रहती है।

वैसे प्राचीन ऋषियों ने जलवायु की भिन्नता के विचार से, पूरे वर्ष को दो-दो माह की छे ऋतुओं में विभाजित किया है, किन्तु सर्वसाधारण के लिए मौसम के हिसाब से मुख्यतः शीत, ग्रीष्म और वर्षा -- इन तीन ऋतुओं के विषय में जानकारी रखनी चाहिए।

शीत ऋतु (सर्दी)

हेमन्त और शिशिर ऋतुओं को सर्दी का मौसम माना जाता है। अगहन से फाल्गुन (नवम्बर से फरवरी) तक का यह मौसम स्वास्थ्य निर्माण हेतु सर्वाधिक उपयोगी है। इस मौसम में पाचक अग्नि बढ़ जाती है, इसलिए भोजन में अधिकतर पौष्टिक पदार्थ लिए जा सकते हैं। रातें बड़ी होने से रात्रिभोजन को पचने का काफी समय मिल जाता है।

इस ऋतु में सुबह नाश्ते में हलुवा, लड्डू, ताजी जलेबी या पौष्टिक पाक खाकर ऊपर से दूध पीना चाहिए। अतिरिक्त पौष्टिक पदार्थ खाने से अग्नि मन्द न हो जाये इसलिए विशेषकर प्रातः टहलना, सूर्यनमस्कार, दण्ड-बैठक और कुश्ती आदि का व्यायाम यथाशक्ति अवश्य करना चाहिए। प्रातःकालीन धूप में नियमित तेल की मालिश विशेष लाभदायक होती है।

शीत ऋतु में गेहूँ, उडद, दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे, घी, रबड़ी, मलाई, खोवा, छैना, पनीर, पेड़ा, रसगुल्ला आदि और तिल के तेल का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए। खान-पान में ठंडी चीजों की अपेक्षा शरीर को गर्मी पहुँचानेवाली वस्तुओं का सेवन ही इस ऋतु में योग्य है।

बहुधा लोग ठंड से बचने के विचार से इन दिनों में अधिक मद्यपान करते हैं और गर्म चाय अधिक पीते हैं। ये दोनों प्रयोग हितकर नहीं। चाय और मद्य शरीर को थोड़ी गर्मी अवश्य पहुंचाते हैं, परन्तु आमाशय और यकृत् को बहुत हानि करते हैं। शरीर में निरापद और वास्तविक गर्मी पहुंचाने के लिए घी तेल और अण्डा मांस का आहार उपयोगी है। इनमें भी घी सबसे उत्तम है क्योंकि घी में शरीर को गर्मी देने की सबसे अधिक शक्ति होती हैं और पोषण करके शरीर विकास करने में तो घी अद्वितीय है ही।

इस मौसम में शीत के कुप्रभाव से बचने के लिए हलके वजन के गर्म (ऊनी) कपड़े अथवा रुई भरे वस्त्र पहनना चाहिए। आयुर्वेद के साथ आधुनिक वैज्ञानिकों का भी मत है कि ठंड सिर से न लगकर बहुधा पैरों से ही लगती है। इसलिए इस ऋतु में कभी नंगे पैर नहीं चलना चाहिए। पैरों में मोजे पहनना हितकर है।

जब बहुत अधिक ठंड हो तब आवश्यकता होने पर सिगडी आदि जलाकर कमरे को गर्म रखने का प्रयत्न करना चाहिए, परन्तु हवा एकदम बन्द नहीं करनी चाहिए। रात को सोते समय भी कमरे में हवा आने के लिए एकाध खिड़की अवश्य खुली रखनी चाहिए और कपड़ों से मुंह ढककर कभी नहीं सोना चाहिए।

प्रायः लोग जाड़ों में स्नान करना छोड़ देते हैं, यह दोषपूर्ण है। बारहों मास ठण्डे जल से नित्य नहाने के अभ्यासियों को जाड़े में भी शीतल किन्तु ताजे जल का स्नान कोई हानि नहीं करता। फिर भी वह अनुकूल न पड़े तो गुनगुने जल से नहाया जा सकता है। जाड़ों में भी प्रातःकाल को स्नान कर लेने से दिन भर शरीर को शीत का अनुभव नहीं होता और स्फूर्ति बनी रहती है।

ग्रीष्म ऋतु (गर्मी)

सर्दी समाप्त होते ही बसन्त ऋतु आती है, जिसमें थोड़ी सर्दी और थोड़ी गर्मी का वातावरण रहता है। ऋतु परिवर्तन का यह काल कफकारक होने से इन दिनों कफ के रोग उत्पन्न होते हैं। दिन में सोने से कफ बढ़ता है इसलिए दिन में नहीं सोना चाहिए और पैदल टहलने जैसे सात्म्य व्यायाम करना चाहिए।

बसन्त के दिन बीतते ही गर्मी आती है और सूर्य की किरणें तेज होकर मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पती और पृथ्वी सभी की तरलता को सोखने लगती है इसलिए इस ऋतु में मनुष्यों की शक्ति निर्बल होने लगती है।

गर्मी, भारत का सबसे बड़ा अर्थात् अधिक दिनों तक रहनेवाला मौसम है यहाँ कई स्थानों पर ८-१० महीनों तक गर्मी का मौसम रहता है वैसे ऋतु विभाग के विचार से चैत्र से आषाढ़ (अप्रेल से जुलाई) तक का काल गर्मी का मौसम माना जाता है। मैदानी इलाके में मई-जून में बहुत ही तेज गर्मी पड़ती है।

गर्मी का मौसम स्वास्थ्य पर सबसे अधिक हानिकारक प्रभाव डालता है, इसलिए इसके विषय में अधिक ज्ञान करना चाहिए।

गर्मी के दिनों में पाचक अग्नि एकदम कमजोर हो जाती है, प्रातः भोजन में गरिष्ठ और अजीर्णकारक पदार्थ कदापि नहीं लेना चाहिए। हल्के, सुपाच्य एवं शीतल प्रभाववाले पदार्थ परिमित मात्रा में खाना चाहिए। सामान्य भोजन की मात्रा भी कम रखनी चाहिए और मांस यथासंभव बिल्कुल नहीं खाना चाहिये।

सुबह नित्यकर्म से निवृत्त होकर एक गिलास अच्छी ठंडाई, दूध या दही की लस्सी, अथवा जौ या चने का सत्तू पानी में घोलकर मीठा मिलाकर पी लेना चाहिए। खश या चन्दन का शर्वत भी पी सकते हैं जो सुगन्धि और गुण दोनों में उत्तम होते हैं। आधा पाव खश या चन्दन का बुरादा एक सेर जल में बारह घण्टे तक भिगोकर फिर खूब मलकर छान लें। छने घोल में तीन सेर शक्कर या मिश्री और आवश्यकतानुसार जल मिलालें, इसका चार बोतल शरबत घर में ही बन सकता है। यह कच्चा शर्बत १०-१५ दिन तक खराब नहीं होता।

प्रातःकालीन पेयों में नीरा (ताड़ या खजूर से निकलनेवाला ताजा रस) बहुत स्वास्थ्यप्रद होता है। नारिकेल का जल, गन्ने या सन्तरा आदि फलों का ताजा रस भी उत्कृष्ट पेय है। राजस्थान में लोग जौ के आटे को मट्ठा में मिलाकर बार्ली की भाँति बहुत पतली बनाते हैं; फिर दूसरे दिन वासी होने पर मट्ठा के ही साथ पीते हैं। यह पेय भी ग्रीष्म-प्रभाव से बचने के लिए अच्छा है।

मद्रास में लोग सुबह के भोजन में ठंडा भात (चावल) और इमली को जल गलाकर तैयार किया तरल लेते हैं। बासी भात और इमली का नित्य भोजन यद्यपि स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है, फिर भी गर्मी से बचाव के लिए यह प्रयोग भी बुरा नहीं है।

ग्रीष्मकालीन मध्याह्न भोजन में उत्तम चावल, पतली दाल या पतली कढ़ी, दही अथवा मट्ठा अवश्य लेना चाहिए। जो केवल चावल पर न रह सकें वे जौ या गेहूँ की रोटी थोड़ी मात्रा में ले सकते हैं।

दिन बड़े होने से, दोपहर बाद इन दिनों कुछ भूख लगती है तब भुने हुए जौ और चने खा कर ठंडा जल पीना हितकर होता है। समर्थ लोग फल या फलों का ताजा रस ले सकते हैं।

रात्रि के भोजन में रोटी, हरे प्याज, पुदीना या धनियां की चटनी होनी चाहिए। गर्मी में कच्चा प्याज खाना बहुत लाभदायक होता है। हमारे देश के श्रमशील किसान केवल कच्चा प्याज और रोटी खाकर धूप में काम करके भी निरोग रहते हैं।

इन दिनों ऋतुफल आम का सेवन बड़ा उपयोगी है। कलमी आमों में गूदा अधिक होने से वह देर में पचता है; परन्तु छोटे बीजू आमों में रस अधिक होता है। जो हाजमा बढ़ाकर शरीर को पुष्ट करता है। दूध के साथ आम का रस लेना शरीर का वजन और शक्ति बढ़ाता है।

ग्रीष्म ऋतु में चाय का उपयोग स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त हानिकारक है। यदि अनिवार्य हो तो बहुत कम पीना चाहिये। इन दिनों दूध भी ठंढा करके पीना चाहिए। परन्तु दूध को ठंढा करने हेतु स्वच्छ पात्र में कपड़े से मुँह बांध कर रखना चाहिए। जिससे उसमें दूषित कीटाणु न मिलने पायें।

गर्मी में स्नायुमण्डल बहुत कमजोर रहता है इसलिए मद्यपान कतई नहीं करना चाहिए, क्योंकि मद्य स्नायुमण्डल पर बुरा प्रभाव डालती है। बिना पिये जिसका काम ही न चले उन्हें गर्मी में अधिक पानी मिलाकर अल्पमात्रा में मद्य लेना चाहिए, अन्यथा सूजन, सुस्ती और बेहोशी हो जाती हैं तथा कभी कभी स्नायुमण्डल पर घातक प्रभाव हो जाता है। इन दिनों स्त्री - प्रसंग भी निश्चित रूप से अति हानिकारक है। उससे शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की निर्बलता बढ़ती है।

आयुर्वेद-मतानुसार ग्रीष्मऋतु में दोपहर के समय दो-तीन घण्टा सोना स्वास्थ्य के लिए हितकर होता है। इस ऋतु में दैनिक कार्यों का समय ऐसा ही रखना चाहिए कि दोपहर में विश्राम के लिए अवकाश रहे।

अंग्रेजों ने अपने राज्यकाल में यूरोप की भांति हमारे देश में भी, दैनिक काम के लिए सब मौसमों में प्रायः एक-सा समय प्रचलित कर दिया। प्रातः १० बजे से शाम के ४-५ बजे तक दोपहरी भर काम करना गर्मी के मौसम में कदापि अच्छा नहीं। ग्रीष्म काल ही क्या हमारे देश की जलवायु को देखते हुए 1 मार्च से अक्टूबर तक वर्ष में ८ महीने दैनिक कार्य का समय विभाजन प्रातः ७-११ तक काम, मध्याह्न भोजनोपरान्त ३ बजे तक विश्राम फिर संध्या ४ से ८ तक काम—इस प्रकार का समय-विभाजन ही विशेष कर ग्रीष्म ऋतु में भारतीय जनता के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक और अनुकूल हो सकता है। हमारी राष्ट्रीय सरकार को इस दिशा में ध्यान देकर सुधार करना चाहिए।

ग्रीष्म के स्वाभाविक प्रभाव से एकदम बचना भी हितकर नहीं। प्राकृतिक दृष्टि से मौसम की थोड़ी अनुभूति होनी ही चाहिए। ग्रीष्म के आरम्भ होते ही जो लोग शीतल स्थानों में चले जाते हैं या घर पर ही प्रबन्ध करके चौबीस घण्टे शीतल वातावरण में रहते हैं, वे भी स्वास्थ्य के अनुकूल कार्य नहीं करते।

इन दिनों अधिकतर शहरी नागरिक बर्फ का बहुत प्रयोग करते हैं। बर्फ पीने में तत्काल तो ठंडक देती है, परन्तु उसकी ठंडक स्थायी नहीं होती। अधिक बर्फ खाने-पीने से दांतों की जड़ें कमजोर होती हैं, हाजमा खराब होता है और गला खराब होता है। विशेष कर बच्चों को आइसक्रीम आदि बर्फ के पदार्थों से बचाना चाहिए।

गर्मी की ऋतु में आंखों की बहुत रक्षा करनी चाहिए। बहुधा इन्हीं दिनों आंख आया करती है। सर्वाधिक बचाव लू से करना चाहिए। थोड़ी-सी ही असावधानी से लू लगना प्राणघातक हो जाता है। यथासंभव तेज धूप में कदापि बाहर न निकलना चाहिए। निकलना ही पड़े तो काफी पानी पीकर चलना चाहिए। गर्मी में बहुत महीन कपड़ा पहनकर धूप में फिरना हानिकर है। सफेद-मोटे कपड़े से शरीर को ढककर चलने से भी लू से बचाव होता है।

गर्मी में चुश्त कपड़ा नहीं पहनना चाहिए। गहरे रंगों के कपड़े भी सूर्य की किरणों को आकर्षित करते हैं, इसलिए गर्मी में सफेद कपड़ा पहनना सर्वोत्तम होता है।

वर्षाऋतु (बरसात)

वर्ष का तीसरा विभाग वर्षाऋतु है। सामान्यतः जुलाई से अक्टूबर तक वर्षाकाल होता है, तथापि विशेष वर्षा मध्य के दो महीनों में होती है। शुरू-शुरू में आकाश मेघों से घिरा रहता और हवा प्रायः बन्द रहती है, इससे सड़ी गर्मी पड़ती है और पसीना अधिक आता है। स्वास्थ्य के विचार से वर्षा का आरम्भ और अन्त दोनों ही काल बहुत कष्टकर होते हैं।

इस ऋतु में अधिकांशतः पेट खराब रहता है, अतएव भोजन में हल्के पदार्थ और सूखे साग ही लेना चाहिए। हरी सब्जी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। खटाई, नमक और चिकनाई पर्याप्त लेना चाहिए। भोजन के साथ, सोंठ, पीपल पीपलामूल, चव्य और चित्रक इस पंचकोल का चूर्ण लेना हितकर होता है। वर्षाऋतु में नदी, तालाब का पानी तो भूलकर नहीं पीना चाहिए। कुएँ का पानी भी कपड़े की दो तहों में छानकर पीना चाहिए। यदि हैजा आदि कोई संक्रामक रोग फैल जाय तो पानी को उबालकर, ठंडा करके पीना चाहिए।

आकाश से गिरनेवाला पानी यदि ऊपर के ऊपर किसी पात्र में एकत्र किया जा सके तो वह इन दिनों पीने के लिए सर्वोपरि होता है।

वर्षाऋतु में कागजी नीबू का प्रयोग बड़ा हितकर होता है। नीबू की दो फांकें बनाकर उनमें यथेष्ट काली मिर्च और काला या सेंधा नमक भरकर अंगारों पर गर्म करके चूसना बड़ा फायदेमंद होता है। साग-दाल में नीबू का रस लेना ओर नीबू की मीठी शिकंजी पीना भी वर्षा में उपयोगी होता है।

वर्षाऋतु के अन्त और शरद् के आरंभ का काल बहुत खराब होता है। वर्षा के कारण चारों ओर सड़ांद-सीलन से वातावरण दूषित हो जाता है। इस कारण पेट के विकार और मलेरिया आदि कष्टकारक ज्वर इन्हीं दिनों होते हैं। जुकाम, खाँसी दस्त और आंव आदि बीमारियां भी इन दिनों हो जाया करती हैं। इसलिए इस काल में विशेषकर खान-पान के विषय में अत्यन्त सावधान रहना चाहिए। थोड़ा भूखा रहना अच्छा परन्तु हाजमा नहीं बिगड़ने देना चाहिए। स्वच्छता के नियमों का भी इन दिनों कड़ाई के साथ प्रयोग करना चाहिए।