रात्रिचर्या
2 मिनट का पाठ
संध्याकाल
दैनिक जीविका कार्य या पढ़ाई से निबट कर एक बार शाम को भी शौच जाना चाहिए। शौच के अनन्तर हाथ-पैरों और मुंह की सफाई तो सर्वकालों में आवश्यक है ही, ग्रीष्म ऋतु में संध्या को स्नान करना भी अच्छा होता है। सूर्यास्त के बाद थोड़ी देर भगवान का स्मरण करना चाहिए। विद्यार्थी संध्या को थोड़ा नाश्ता करके खेल-कूद में जाया करें।
रात्रि-भोजन
रात को ७-८ बजे के बीच रात्रि का भोजन कर लेना चाहिए। यह समय बारहों मास के लिए ठीक है। भोजन के अनन्तर थोड़ी देर टहलना चाहिए फिर कुछ देर घर में बच्चों से विनोद-वार्ता करनी चाहिए।
शयन
रात्रि के ९-१० बजे भगवन्नाम स्मरण करते हुए सो जाना चाहिए। नित्य निश्चित समय पर सो जाना स्वास्थ्य के लिए परम हितकर अभ्यास होता है। बहुधा लोग रात्रि में मित्र गोष्ठियों या सिनेमा क्लब आदि में समय गँवाते हैं और देर में सोते हैं। यह आदत स्वास्थ्य-नाश करनेवाली है। जो विद्यार्थी रात में देर तक पढ़ते हैं और फिर सुबह देर तक सोते रहते हैं, वे स्वास्थ्य के प्रति तो अनाचार करते ही हैं, पढ़ना भी व्यर्थ करते हैं।
क्योंकि रात में नींद के समय की उस पढ़ाई में ज्ञानार्जन का रत्ती भर लाभ नहीं होता, रात में ठीक समय पर सोयें और सुबह तड़के उठकर पढ़ें तो वह निश्चित ही उपयोगी होता है। सुबह का एक बार का ही पढ़ा बहुत दिनों तक याद रहता है, क्योंकि प्रात: काल की स्मरण शक्ति तीव्र होती है। भारत में छात्रों में प्राचीन जीवनचर्या के विरुद्ध चलने की आदत आजकल पनप रही है वह स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद है।
विद्यार्थी को रात में ९-१० बजे सोकर सुबह ४-५ बजे उठने से, सात घण्टे की नींद पूरी हो जाती है जो स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त और उत्तम है। छोटे बच्चे स्वभावतः अधिक समय तक सोते हैं। इसलिये उनको भी रात में जल्दी सुलाकर सुबह तड़के उठने का अभ्यास आरम्भ से ही कराना चाहिए।