आरोग्य-प्रकाशस्वच्छता (सफाई)

स्वास्थ्य-साधन - २ स्वच्छता (सफाई)

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भोजन, विश्राम और ब्रह्मचर्य के तीन मूल आधारों से जो पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होता है, वह व्यायाम द्वारा परिपुष्ट होता है और स्वच्छता के नियम-पालन से उसकी सुरक्षा होती है। इस प्रकार स्वास्थ्य-साधन में स्वच्छता का अपरिहार्य महत्त्व है। इसलिए हर व्यक्ति को स्वच्छता के विषय में अधिक से अधिक जानकारी रखनी चाहिए और उसको अधिक से अधिक व्यवहार में लाना चाहिए।

स्वच्छता - विषय को दो भागों में बाँटकर विचार किया जाता है, एक व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene) और दूसरा सामूहिक स्वच्छता (Public Hygiene)।

व्यक्तिगत स्वच्छता

मानसिक स्वच्छता

जैसे स्वास्थ्य-प्रसंग में सबसे पहले मानसिक स्वास्थ्य पर विचार किया गया वैसे ही स्वच्छता के विषय में भी सर्वप्रथम मानसिक स्वच्छता के विषय में समझना आवश्यक है। मन से स्वच्छ व्यक्ति ही शरीर से स्वच्छ रह सकता है। यदि मन ही साफ-सुथरा नहीं तो अनायास ही ऐसे आचरण होंगे जिनसे अपना शरीर तो गंदा और रोगी बनेगा ही, बुरे आचरणों का प्रभाव सामूहिक स्वास्थ्य पर भी निश्चित पड़ेगा और समूह की हानि होगी।

आयुर्वेद के मतानुसार सर्व रोगों की जड़ प्रज्ञापराध होता है। वह प्रज्ञा-पराध मानसिक अस्वच्छता के कारण ही होता है। मन स्वच्छ रहे तो बुद्धि में विकृति होगी ही नहीं।

मानसिक स्वच्छता का अर्थ है, हमारा मन और आत्मा दोष रहित हो, स्वच्छ, सन्तोषी, श्रमशील, सचेत और निर्विकार हों। अर्थात् काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या आदि विकारों से मन विकृत न हो। ऐसा होने से मनुष्य स्वाभाविक ही उच्च चरित्र का धनी, आदर्श सफलता वाला, प्रतिष्ठित, सम्पन्न, स्वस्थ और जीवन की हर दिशा में यशस्वी होता है।

मानसिक स्वच्छता के साधन रूप में प्राचीन भारतीय परम्पराएँ ही अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होती हैं। संध्यावन्दन, अग्निहोत्र, ध्यान, जप, साधना और स्वाध्याय आदि क्रियाओं से मानसिक स्वच्छता होती है।

सन्ध्यावन्दन से मनुष्य का मानसिक विश्वास जाग्रत होता है और उसमें धैर्य एवं संयम की भावना का उदय होता है। अग्निहोत्र से बाहर के वातावरण की शुद्धि तो होती ही है, भीतर एक आत्मिक तेज प्रस्फुटित होता है। ध्यान और जप से मन में एकाग्रता बढ़ती है तथा मन शक्तिशाली एवं सहिष्णु बनता है। आधुनिक लोग पूर्ण एवं निश्चित सफलता के हेतु कान्सेन्ट्रेशन (Concentration) नाम के जिस अभ्यास को उपयोगी मानते हैं वह भारतीय विधि से ध्यान करने में सहज सुलभ होती है।

स्वाध्याय से अज्ञान दूर होता है और मनुष्य अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरूक होता है। इसी प्रकार दान के अभ्यास से मनुष्य में दूसरे के प्रति क्रियात्मकरूप से सहानुभूति, संवेदना एवं सेवाभाव की स्थापना होती है और संग्रहीत द्रव्य की शुद्धि एवं सदुपयोग होता है।

इन सबसे मनुष्य में 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' की भावना बलवती होकर, अन्यों को भी अपने समान ही समझने की सुबुद्धि आती है और वह सहजगति से सदाचारानुगामी बनता है। आधुनिक काल में साधन - बहुलता की आकांक्षा और निःसीम काम-इच्छाओं की दुष्प्रवृत्तिवश जो नैतिक हीनता, विभ्रम एवं उन्माद आदि विकार बढ़ रहे हैं, उनके निराकरण हेतु भी मानसिक स्वच्छता के उपरोक्त उपाय सर्वथा उपयोगी हो सकते हैं।

मन को स्वच्छ और सन्तोषी बनाने के लिए उपासना सबसे उत्तम साधन है। उससे मन के सम्पूर्ण विकार धुलते हैं और मनुष्य की शक्ति का विकास होता है।

युवावस्था में चंचलतावश ऐसी धारणा बन जाती हैं कि उपासना केवल ढोंग है और उससे कुछ नहीं होता, यह धारणा सर्वथा असत्य है। मन की अस्वच्छता का सबसे प्रधान कारण निःसीम कामना है। कामना की पूर्ति न हो तो क्रोध बढ़ता है और उसकी पूर्ति हो जावे तो लोभ बढ़ता है। ये दोनों मन को अस्वच्छ करनेवाले हैं। ऐसी स्थिति में कामना को सीमित और संतुलित रखना ही हितकर है। धन और काम-वासना को सीमा में रखना ही धर्म का प्रधान लक्षण है। यह धर्म धारणा और उपासना से प्राप्त होता है। उपासना उच्चजीवन का सुदृढ़ आधार है।

उपासना के लिए भावना में आस्तिकता होनी चाहिए। कर्म का तदनुरूप फल मिलता है। परलोक है और पुनर्जन्म भी है इस विश्वास को ही आस्तिकता कहा है। कर्म-फल को ही लीजिए, मनुष्य कितनी ही गुप्त योजना पूर्वक बुरा काम करे, अन्तत: उसका बुरा फल उसको किसी न किसी प्रकार भोगना ही पड़ता है। अदालत से एक बार छूट भी जावे, अपराधी को उसकी अन्तरात्मा अवश्य दण्ड देती है, क्योंकि प्रत्येक बुरा कार्य अन्तरात्मा के विरुद्ध ही होता है। आस्तिकता में विश्वास रखनेवाला उपासक अन्तरात्मा के विरुद्ध कार्य नहीं करता, काम और लोभ को सीमित रखता है, इसीलिए उसका मन सदा निर्मल और वह सदा प्रसन्न रहता है।

संसार के सभी वर्ग आज यह स्वीकार करते हैं कि शारीरिक बल से भी अधिक श्रेष्ठ मनोबल होता है। वह मनोबल उपासना से निश्चित बढ़ता है। पाश्चात्य लोग जो वैज्ञानिक ढंग से शारीरिक एवं मानसिक शक्ति बढ़ाते हैं, वह कल्याणकर न होकर अहंभाव पूर्ण होती है। मनुष्यकृत शक्ति से उठने वालों में निहित स्वार्थ के विभिन्न वर्ग बन जाते हैं जो ईर्ष्यावश एक दूसरे को नष्ट करने में अधिक सक्रिय होते हैं।

वैज्ञानिक शक्ति-अर्जन का उद्देश्य ही दूसरे को नष्ट करना हो गया है। वैसी शक्ति से मन निर्मल होने की अपेक्षा, अधिकाधिक विकारग्रस्त ही होता है। इसलिए अध्यात्म-साधन से शक्ति संचय अधिक श्रेयस्कर है। हमारे देश में शक्ति-संचय का लक्ष्य, अशक्तों की रक्षा और सबका भला करना रहता है। स्वयं को और दूसरों को समभाव से उठाने की सहअस्तित्वभावना आस्तिकता और उपासना से ही मिलती है।

आयुर्वेद की शिक्षा मन पर अधिकार करने की प्रेरणा देती है। हमें मन के अनुकूल नहीं बल्कि मन को हमारी इच्छा से चलना चाहिए। ऐसे अभ्यास में मन को बांधना असंभव नहीं है। उसमें कठिनाई अवश्य होती है। संसार में महत्वपूर्ण जीवन बनाने के लिए यह आवश्यक भी है। वह कठिनाई ऐसी भी नहीं जिससे शरीर या मन को दुःख भोगना पड़े। केवल नियमित अभ्यास होना चाहिए। वह अभ्यास उपासना क्रम के साथ सुगमता से प्राप्त हो सकता है।

उपासना मनमाने ढंग से यथार्थ फलवाली नहीं हो सकती। उसके लिए नियमित समय, नियमित स्थान, नियमित साधन-विधि, नियमित भोजन आदि को अपनाना वांछनीय होता है। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई सभी धर्मवाले इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि कोई एक उत्कृष्ट शक्ति अवश्य है; जो संसार के अणु-अणु में व्याप्त है, जो हमें गति देती है, हमारे प्रत्येक कर्म को देखती है और हमारे कर्म का यथोचित फल हमें देती है।

वही परमशक्ति परमात्मा, जिसकी कृपा के बिना हमारा जीवन आनन्दमय नहीं हो सकता। यह मान्यता ही अध्यात्म है। मन को निर्मल और सशक्त बनाने के लिए इसी अध्यात्म भावना के साथ आस्तिकता पूर्वक परमात्मा के जिस स्वरूप को भी आप मानते हैं उसकी नियमित उपासना अवश्य करें। उससे मन के सम्पूर्ण विकार दूर होंगे। मानसिक स्वच्छता का इससे उत्तम दूसरा कोई साधन नहीं है।

शारीरिक स्वच्छता

शरीरांगों की सफाई को ही आधुनिक विज्ञान में व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene) कहा जाता है। इस प्रसंग को भी हमें दो भागों में बाटना चाहिए। एक भीतरी सफाई, दूसरी बाहरी सफाई।

शरीर की भीतरी सफाई

मनुष्य शरीर के भीतरी अवयवों की स्वच्छता ही भीतरी सफाई है। यह मानव-शरीर एक ऐंजिन के समान है। कोयले और पानी से ऐंजिन को शक्ति प्राप्त होती है किन्तु उसमें सारहीन पदार्थ राख को निकालना पड़ता है। यदि उस सारहीन पदार्थ को ऐंजिन में ही पड़ा रहने दें तो ऐंजिन बहुत जल्द खराब हो जायगा। इसी प्रकार मनुष्य जो अन्न-पानी खाता-पीता है उसका सार तत्व खून बनकर शरीर के विभिन्न अवयवों में पहुँच जाता है और निःसार पदार्थ पेट में पड़ा रह जाता है।

शरीर के भीतर से निःसार मल पदार्थ को मल-मूत्र - पसीना आदि के रूप में बाहर निकलना आवश्यक होता है। यदि इन सारहीन पदार्थों को बाहर न निकाला जाय तो शरीर रूपी ऐंजिन खराब हो जायगा और कुछ ही दिनों के भीतर जीवन - गाड़ी का चलना रुक जायगा।

शरीर की स्वचालित मशीन अपना हर काम नियमित ढंग से स्वयं करती है। यदि उसकी गति में बाधा न पड़े तो वह अपनी सफाई अपने आप कर देती है। परन्तु आजकल हर मनुष्य को अपने कार्य उद्योग और व्यस्त समय की सुविधा के अधीन ही शरीर को चलाना पड़ता है, यही कारण है कि भीतरी सफाई से सम्बन्धित शारीरिक क्रियाओं के विषय में भिन्न-भिन्न मनुष्यों के विभिन्न समय और प्रकार चल पड़े हैं। अतएव इनकी जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हैं।

शरीर की मशीन अपने भीतरी अंग-प्रत्यंगों की सफाई का काम अपने आप करती ही है, इसलिए हमें क्या करना? ऐसा सोचना उचित नहीं। हमारी अनियमितताओं के कारण, या रोगी होने पर शरीर की मशीन अपना नियमित काम विधिवत् नहीं कर पाती जब कि हम शरीर को उसकी निश्चित अवस्था और नियमित गति से नहीं चलने देते, और अपनी सुविधा से ही चलाते हैं, तो हमारा यह भी कर्तव्य हो जाता है कि उसकी भीतरी - बाहरी सफाई के लिए हम उचित उपक्रम करके उसकी सहायता करें।

हमारी चेष्टा से जिन भीतरी शरीरांगों की सफाई हो सकती हैं, उसमें आंतें (मलाशय) गुर्दे, और फेफड़े मुख्य हैं। इन अंगों की सफाई का ध्यान न रखने से शरीर को भयंकर हानि और रोग का होना निश्चित है।

मल-त्याग

हम जो कुछ खाते-पीते हैं, वह पहले आमाशय में पहुँचता है, फिर छोटी आँत में और उसके बाद बड़ी आँत (पक्वाशय) में। यहाँ तक पहुँचने से पहले ही भोजन का सारभाग प्रचूषित हो चुकता है। बड़ी आँत में केवल सारहीन पदार्थ पहुँचता है। उसमें मल और विषैले तत्त्व होते हैं, जिनके नित्य-नियमित शरीर के बाहर निकलने से आँतों की सफाई होती है।

शौच क्रिया (पाखाना जाना) आँतों की सफाई के लिए सबसे सहज और प्राकृतिक तरीका है। इसलिए बचपन से ही नियमित रूप से नियमित समय पर पाखाना जाने की आदत डालनी चाहिए।

दिन-रात में कम से कम दो बार पाखाना अवश्य जाना चाहिए। यदि तीन बार भी जावें तो कोई हानि नहीं। मल का रोकना और दो-दो दिन तक पाखाना न जाने की आदत बहुत ही हानिकारक है। मल यदि चौबीस घण्टे से अधिक आंतों में रह जावे तो उसके सड़ने से जो विषैले द्रव्य और गैस आदि उत्पन्न होते हैं, वह रक्त में मिलकर अनेक भयंकर रोग उत्पन्न करते हैं।

शौच का समय नियमित होना चाहिए। कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी शाम और कभी रात को शौच जाना - ऐसी प्रवृत्ति हानिकारक है। किसी कारण नियत समय पर पाखाना न उतरता हो, तो भी शौच जाना चाहिए कुछ दिन नियमित समय पाखाना जाते रहने से उसी समय शौच होने लगता है। ऐसा कुछ दिन करने से अभ्यास हो जायगा और नियत समय पाखाना उतरने लगेगा। छोटे बच्चों को आरम्भ से ही ऐसी आदत डालनी चाहिए।

यदि एक ही बार शौच जाना हो तो उसके लिए प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। विद्यार्थियों को विशेष कर सुबह सोकर उठते ही सबसे पहले शौच जाना चाहिए। दो बार जाना पड़े तो सुबह-शाम जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त जब भी शौच जाने की इच्छा हो तो उसे दबाना नहीं चाहिए। नियत समय पर या इच्छा होने पर शौच न जाने से कोष्ठबद्धता, कब्जियत, मंदाग्नि और गैस बनना आदि रोग हो जाया करते हैं। कब्ज होने से जीभ पर मैला फफूड़न छा जाता है, भूख मर जाती है, सिर में दर्द होने लगता है, स्वभाव रूखा-चिड़चिड़ा और खिन्न हो जाता है। तब मन का उत्साह मर जाता है।

पाखाना फिरने के लिये पुराने लोग खुले मैदान को पसन्द करते थे। अब गाँवों तक में जगह नहीं रही इसलिये नये ढंग से पाखाना बनाना आवश्यक हो गया है। नये ढंग में फ्लश का संडास सर्वश्रेष्ठ होता है। जहाँ फ्लश के पानी बहने के लिये जमीन के नीचे गटर न हो वहाँ दो होज बनाने से दुर्गन्ध रहित शौचालय बन जाता है। पुराने कस्बे या शहरों के शौचालय तो नरक का दृश्य उपस्थित करते हैं।

ये रोगाणुओं के भन्डार होते हैं। भयानक दुर्गन्ध सारे घर का वातावरण दूषित कर देती है। यूरोप अमेरिका में तो सोने के स्थान से भी स्वच्छ शौचालय बनाते हैं। इसलिये वे लोग स्वस्थ भी हैं। अब भारतवासी भी स्वास्थ्य पर विचार करके स्वच्छ शौचालय बनाने लगे है। पुराने और दुर्गन्धयुक्त शौचालय में फिनाइल ब्लीचिंग पाउडर, चूना या राख नियमित रूप से छिड़क कर सफाई की जाय तो वे भी अच्छे रह सकते हैं।

देहातों में स्त्रियों को पाखाना फिरने का बहुत कष्ट है अब सभी जगह ग्राम पंचायते हो गयी हैं उनको प्रत्येक गांव में इनके लिये उचित प्रबन्ध अवश्य करना चाहिये स्वच्छ पेय जल तथा स्वच्छ शौचालय स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक हैं।

संडास हों या मैदान, शौच का स्थान ऐसा होना चाहिये जिससे मन सुस्थिर और सहज प्रसन्न रह सके। मन की सुस्थिर और एकाग्र अवस्था में ही शौचक्रिया ठीक प्रकार से होती है। आजकल के नये पढ़े-लिखे लोगों को शौच में बैठकर कुछ पढ़ने या सोचने की आदत पड़ गई है। यह आदत अत्यन्त बुरी है। शौच के समय सारा ध्यान केवल मल त्यागने की और ही केन्द्रित रहना चाहिए, तभी पाखाना साफ होता है।

शौच क्रिया के लिए पाश्चात्य सभ्यता का कमोड वाला ढंग हमारे लिए अच्छा नहीं है। खुड्डी पर उकडुं बैठकर ही पाखाना करना चाहिए। इससे जांघों का जोर पेट और मलाशय पर पड़ता है, उस दबाव से मल शीघ्र और आसानी से उतर जाता है।

मल त्यागते समय बहुत जोर नहीं लगाना चाहिए। बार-बार काँखने से आँतों पर अनुचित भार पड़ता है, गुदा को भी हानि होती है और बवासीर आदि रोग उत्पन्न होते हैं। मल त्यागते समय पेट को भीतरी ओर संकुचित करने से आसानी से मल बाहर निकल जाता है।

जिन्हें प्रातःकाल उठते ही दस्त साफ न होता हो, उन्हें बिस्तर से उठते ही तत्काल खूब कुल्ला करके प्रकृति के अनुकूल ठंडा या गर्म पानी, एक गिलास पीना चाहिए। थोड़ा टहलना चाहिए। पानी से आँत साफ होंगी, मल पर दबाव पड़ेगा और मल की खुश्की (कठोरता) दूर होगी। टहलने से शौच का वेग उत्पन्न होकर दस्त साफ हो जायगा।

खुश्की और कोष्ठबद्धता से पीड़ित लोगों को भोजन में चिकनाई के पदार्थ अत्यावश्यक होने पर लेने चाहिए और बीच-बीच में एनिमा लेकर आँतों को साफ करते रहना चाहिए। भोजन में चोकर सहित आटे की रोटी और हरे शाकों की उबली हुई सब्जी लेने से दस्त साफ होता है। पपीता, अमरुद, नीबू आदि फलों का सेवन भी कब्जियत दूर कर दस्त साफ लाता है। साल्ट लेने से स्वाभाविक हाजमा खराब हो जाता है। अधिक कब्ज रहता हो तो ईसबगोल या त्रिफला को प्रकृति के अनुसार जो अनुकूल हो उनका सेवन करना चाहिये। रात को सोते समय एक चम्मच शुद्ध कैस्टर ऑयल (एरण्ड तैल) लेने से पुरानी कोष्ठबद्धता दूर होती है।

मूत्र त्याग

शरीर के भीतरी अंगों की सफाई का दूसरा साधन मूत्र त्याग है। पिया हुआ पानी, शरीर के भीतरी अंगों को धोकर तथा उनके मैल और विषों को वटोर कर मूत्र के रूप में बाहर निकाल देता है। मूत्र का सम्बन्ध गुर्दों से होता है। मूत्र जब गुर्दों में पहुँचकर छनता है तब वे उसका सारहीन पदार्थ और मैल अलग निकालते हैं। मैल और शरीर के जलीय अंश का योग ही मूत्र होता है। खाये-पिये पदार्थों का आवश्यक तरल अंश गुर्दों द्वारा छनकर बस्ति में एकत्र होता है और समय-समय पर मूत्र मार्ग द्वारा बाहर निकलता है। उचित मात्रा में पेशाब होते रहने से शरीर का जहर और रक्त के विजातीय तत्व बाहर निकलते हैं।

चौबीस घण्टों में लगभग डेढ़ सेर पेशाव उतरना चाहिए। इससे अधिक और बार-बार थोड़ी-थोड़ी देर में भी पेशाब उतरना हानिकर एवं रोग का लक्षण है। इसी प्रकार बहुत कम पेशाब होना भी उचित नहीं।

स्वस्थ अवस्था में पेशाब का रंग हल्के पीले रंग का होता है। यह जब हल्दी जैसा पीला, लाल या मटमैला हो तो विकार समझना चाहिए। पेशाब कम होता हो और उसका रंग अस्वाभाविक हो तो अधिक मात्रा में पानी पीने से पेशाब साफ और उचित परिणाम में होने लगता है। प्रतिदिन लगभग ढाई किलो पानी पीने से उचित पेशाब उतरकर गुर्दों और बस्ति की नियमित सफाई होती रहती है।

पसीना

भीतर सफाई का तीसरा प्राकृतिक साधन पसीना है। रक्त सारे शरीर में घूमकर जो मैल एवं विषैले पदार्थ इकट्ठा करता है, उसको बाहर निकलने का दोहरा प्रबंध है। एक तो गुर्दों में छनकर रक्त का मैल पेशाब द्वारा बाहर निकलता है दूसरा पसीना द्वारा। सम्पूर्ण शरीर में बहुत छोटे-छोटे छिद्र बने हैं जिनमें रोयें कहे जाने वाले महीन बाल उगे हैं। इन छोटे छिद्रों से सदा ही रक्त का विजातीय तत्त्व और शरीर का मैल पसीना के रूप में बाहर निकलता रहता है।

पसीना निकलने से शरीर के भीतर की अनुचित गर्मी बाहर निकल जाती है। इसी कारण ज्वर में पसीना आ जाने पर ज्वर उतर जाता है या हल्का हो जाता है।

ग्रीष्म ऋतु में तो खूब पसीना निकलता है, जिसे हम प्रत्यक्ष देखते हैं। पसीना जाड़ों में भी निकलता है, परन्तु इतना कम कि उसे देख या अनुभव नहीं कर पाते। बहुत अधिक मात्रा में पसीना निकलना शरीर को कुछ अशक्त करता है।

पसीना द्वारा रक्त और शरीर की भीतरी सफाई निर्बाध होती रहे इसके लिए रोम छिद्रों को सदा साफ रखना चाहिए जिससे त्वचा पर मैल की कोई तह न रहे, रोम छिद्र खुले रहें और पसीना निकलने में रुकावट न हो।

स्वाभाविक रूप से उचित मात्रा में पसीना न निकलता हो तो व्यायाम या अन्य खेल-कूद अथवा शारीरिक परिश्रम करके पसीना निकलने का उपक्रम करना चाहिए। शारीरिक श्रम में रक्त में गर्मी आती है और वह गर्मी मल-सहित पसीना द्वारा शरीर के बाहर निकलती है।

श्वास-प्रश्वास

भीतरी सफाई का चौथा साधन श्वास-प्रश्वास है। इससे बहुत अन्तः शुद्धि होती है। फेफड़ों की सफाई का साधन श्वास-प्रश्वास ही तो है। शरीर से बाहर निकलने वाली प्रश्वास की हवा के साथ प्रांगार द्विजाय (कार्बन डाइऑक्साइड) और फेफड़ों में एकमात्र रक्त का विषाक्त मैल अहर्निश बाहर निकलता है।

जल्दी-जल्दी और गहरी सांस लेने से फेफड़ों और रक्त की अच्छी सफाई होती है। खुली हवा में दीर्घ श्वास लेने के अतिरिक्त प्राणायाम द्वारा सांस का व्यायाम भी इसके लिए उपयोगी है।

शरीर की बाहरी सफाई

शरीर के भीतरी अंगों की सफाई तो शरीर की स्वचालित मशीन स्वयं भी कर लेती है, परन्तु बाहरी अंग-प्रत्यंगों की सफाई की पूरी जिम्मेदारी केवल मात्र स्वयं हम पर होती है।

शरीर के जो भाग अधिकांश खुले रहते हैं उन पर वायु के साथ उड़नेवाले धूलिकण और अन्य मैल अहर्निश जमते रहते हैं। उन्हें साफ न करने से शरीर का रोगी होना निश्चित है। कुछ अंग तो इतने महत्त्वपूर्ण है कि उनकी सफाई और सुरक्षा के लिए विशेष रूप से तत्पर रहना आवश्यक हैं। जिनमें आंख, जीभ, कान, नाक, दाँत और गुप्त इन्द्रियाँ विशिष्ट रहती हैं।

आँखों की सफाई और सुरक्षा

आँखें हमारे शरीर का अत्यन्त ही मूल्यवान अंग है। उनके बिना जीवन सूना और व्यर्थ हो जाता है। इसलिए आँखों की सफाई और सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

रात को सोने की स्थिति में आँखों का मैल कीचड़ के रूप में उभर कर पलकों की बरोनियों में इकट्ठा हो जाता है। इसको साफ करने के लिए नित्य प्रातः आँखों को शुद्ध और ठंडे जल से धोना उत्तम तरीका है। दातून के समय भोजन के पूर्व या बाद में जब भी मुंह धोया जाय तब साथ में आँखें भी धोना चाहिए। आंखों पर ठंडे जल के छींटे मारना और स्नान के उपरान्त स्वच्छ एवं गीले वस्त्र से कुछ देर आँखों को सहलाना हितकर होता है।

आंखों की सफाई के लिए सुरमा या काजल का उपयोग भी अच्छा होता है। यह भीतर का मैल काटकर बाहर निकालने के साथ ही आंखों को शीतलता देते हैं। इनको सुबह-शाम ठंडक के समय ही लगाना चाहिए। बाजारू और अविश्वस्त सुरमा नहीं लगाना चाहिए। काजल तो घर में ही बन जाता है। इसी प्रकार त्रिफला के पानी या फिटकरी मिश्रित गुलाब जल से आंखों को साफ धोकर साफ करना भी अच्छा घरेलू प्रयोग है।

हमारा देश उष्ण जलवायु वाला है। यहाँ सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, इसलिए गर्मी अधिक होती है। आँख सदा ही तरलता में रहने वाला बहुत कोमल अंग है। गर्मी और सूर्य की तेज किरणें आंखों की स्वाभाविक तरलता को सोखती हैं। इसी कारण आँखों के रोग अधिकतर गर्मी के मौसम में ही होते हैं। इसलिए कभी भी यदि सामने की ओर सूर्य हो तो आंखों पर छाया रखनी चाहिए।

विशेष कर ग्रीष्म ऋतु में हल्के रंग का चश्मा या छायादार हैट (टोप) पहनकर चलना चाहिए। गर्मी की गर्म हवायें, तेज धूप और धूल आंखों को सबसे अधिक खराब करते हैं। इन्ही दिनों प्रायः आँखें आती हैं और धूप एवं धूलिकणों के प्रभाव से उनमें दाने या रोहे हो जाया करते हैं। आई आँख की चिकित्सा बहुत सावधानी से करनी चाहिए अन्यथा असावधानी से आँख छोटी हो जाती है, दृष्टि शक्ति कम हो जाती है या अन्य कोई स्थायी रोग हो जाता है अथवा सदा के लिए आँख मारी जाती है।

किसी वस्तु को देर तक या बिना पलक झपके देखना आँखें खराब करता है। सिनेमा देखना इसलिए हानिकर हैं। आँखें गड़ाकर कोई दूर की या महीन चीज देखने से आँखों पर खिचाव पड़ता है और हानि होती है। हर दशा में पुस्तक को एक फुट दूर रखकर पढ़ना चाहिए और बहुत बारीक अक्षरों की लिखावट को बड़ा दिखने वाले काँच की सहायता के बिना नहीं पढ़ना चाहिए।

रेल या मोटर में चलते समय जब कभी आँख में धूल या कोयले का कण चला जावें, तो तत्काल ही आंखों को मलना नहीं चाहिए। ऐसा करने से आँख, में घाव हो जाने का भय रहता है। जब ऐसा हो जाय तब पलकों को बार-बार खोलने मूंदने से भीतर गया कण आंसुओं के साथ स्वयमेव बाहर निकल आता है। न निकलें तो धैर्यपूर्वक गिलास में पानी भर कर, उसमें आंख डुबोकर पलक खोलने-मूँदने से आँख धुल जाती है और कचरा या धूलिकण बाहर निकल जाता है। माता का दूध डालने से यही काम अच्छा होता है।

आंखों की सुरक्षा के लिए भोजन में पर्याप्त पौष्टिक तत्त्व विशेषतः घी लेना आवश्यक है। पौष्टिक तत्त्वों के अभाव से ही आँखों की दृष्टि कमजोर होती है। मस्तक में शीतल प्रभाववाले तेलों की मालिश, नित्य प्रातः नाक से पानी पीना, नियत समय पर रात को सोना और पूरी नींद लेकर प्रातः काल उठना-यह नेत्रों के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी उपक्रम है। रात्रि में पढ़ने से और अधिक सिनेमा देखने से तथा अधिक धूम्रपान से निश्चित आँखें खराब होती है अतएव, बिड़ी तम्बाकू नहीं पीना चाहिए। अधिक धूम्रपान तथा अतिसूक्ष्म अक्षरों के पढ़ने से भी आंखें खराब होती हैं।

दाँतों की सफाई और सुरक्षा

नित्य प्रातः भलीभाँति दातुन करना, दांतों की सफाई का सबसे उत्तम साधन है। नीम, बबूल, मौलश्री और कचनार की ताजी दातून की कूँची अच्छी बनती है जो दाँतों और मसूड़ों पर कोई आघात नहीं करती और दांतों की सन्धियों में से मैल निकाल कर खूब सफाई करती है। नीम की दातून कीटाणु नाशक होती है और बबूल की दातून में मसूढ़ों को चिपकाने एवं दांतों की जड़ों को मजबूत करनेवाला टैनिक एसिड नामक एक विशेष पदार्थ होता है।

शहरों में तो अब दातुन का जैसे रिवाज ही उठ गया है। उसके अभाव में पेस्ट या पाउडर का प्रयोग भी बुरा नहीं। बहुत कड़े बालों का ब्रुश मसूड़ों पर आघात कर सकता है, इसलिए सामान्य कड़े बालों का ऐसा ब्रुश उपयोग करना चाहिए, जिनकी बनावट अर्द्ध चन्द्राकार हो जो दंतपंक्ति को सीधा-स्पर्श करे। ब्रश को दाँतों पर सीधा रगड़कर ऊपर-नीचे की ओर घुमाकर प्रयोग करना चाहिए। उपयोग के पूर्व ब्रश को खौलते पानी में डाल लेना चाहिए जिससे उसमें बसे कीटाणु मर जावें। किसी दूसरे के उपयोग किये गये ब्रश से कदापि दाँत साफ नहीं करना चाहिए।

मँहगे पेस्ट और पाउडरों के स्थान पर अच्छे घरेलू मंजन भी बनाए जा सकते हैं। सबसे साधारण प्रयोग यह है कि स्वच्छ लकड़ी के कोयले को खूब महीन पीसकर कपड़छन करके उसमें बारीक पीसा नमक मिलाकर मंजन के उपयोग में लाया जा सकता है।

नाश्ता या भोजनोपरान्त अथवा जब कभी भी कुछ खावें तब दाँतों को अंगुली से रगड़कर पानी से भरपूर कुल्ला करना चाहिए। अन्न या खाद्य पदार्थ के कण दाँतों की सन्धियों में रह जाते हैं तो वे धीरे-धीरे सड़कर दाँतों में विकार उत्पन्न करते हैं और अन्त में कीड़ा लगने का अथवा पायरिया (पीव आने) जैसे भयंकर रोगों के कारण बन जाते हैं।

दाँतों की अच्छाई-बुराई पर पूरे शरीर का स्वास्थ्य निर्भर करता है। यदि दाँत नहीं होंगे तो भोजन चबाया न जा सकेगा, न लार बनेगी, इस कारण खाया हुआ भोजन शीघ्र पचने योग्य अवस्था में पेट को नहीं मिलेगा। दाँतों और पेट का बहुत निकटतम सम्बन्ध है। जिसका पेट खराब होगा, उसके दांत निश्चित रूप से खराब हो जावेंगे। इसी प्रकार जिसके दाँत रोगी होंगे उसकी पाचनक्रिया अवश्य खराब हो जावेगी। दाँत के रोगी कब्जियत, बदहजमी, भूख की कमी आदि उदर रोगों के मरीज हो जाया करते हैं। इससे यह स्पष्ट हैं कि स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए दाँतों को स्वच्छ और मजबूत रखना कितना अनिवार्य है।

आजकल दाँत कमजोर होने का कारण यह भी है कि केवल नर्म चीजें खाते रहने के अभ्यास से दाँतों का व्यायाम बन्द हो गया है। यदा कदा चना चबेना खाकर दाँतों को उचित व्यायाम देते रहने से उनको कार्यशक्ति बढ़ती है और वे मजबूत भी रहते हैं।

अधिक पान खाना दाँतों को हानि पहुँचाता है; इसी प्रकार बर्फ मिश्रित बहुत ठंडा या बहुत गर्म पानी भी दांतों की जड़ों को कमजोर बनाता है। यदि दाँत कमजोर हो जावें, हिलते या दुखते हों तो जब तक बिलकुल ही विवशता न हो जावें, तब तक दाँतों को नहीं उखड़वाना चाहिए। कीड़ा लगने से दाँत में पोल हो जाने पर लोग उसमें चाँदी आदि धातु भरवा लेते हैं, यह प्रयोग बुरा नहीं है।

दाँतों में मवाद आता हो तो दिन में दो-तीन बार मुख्यतया खाने के उपरान्त सरसों के तेल में बारीक पिसा नमक मिलाकर दाँतों पर मलना चाहिए। पीनेवाली देशी तम्बाखू का बारीक चूर्ण दाँतों पर मलने से भी पायरिया से बचाव होता है।

जीभ की सफाई

रात में सोते समय शरीर के भीतर का काफी मैल जीभ पर आकर जम जाता है; यह मैल खाद्य पदार्थ के साथ फिर भीतर चला जाये तो निश्चित ही बड़ी हानि करता है। इसलिए सुबह उठते ही खूब कुल्ला करके जीभ को साफ करना चाहिए। दातून के समय दातीन को चीर कर बनाई फांक से अथवा धातु की बनी जीभी से खरोंच कर जीभ का मैल निकाल देना चाहिए।

जीभ हमारे भोजन के स्वाद का परीक्षक और रुचि का आश्रय है। जीभ की स्वच्छता का, भोजन में रुचि और पाचन स्थिति से गहरा सम्बन्ध है। इसलिए सदा ही जीभ को साफ रखने पर ध्यान देना चाहिए।

नाक-कान की सफाई

शरीर के भीतर का कुछ मैल प्रश्वास के साथ भाप रूप में बाहर आता है जो प्रायः कफ के रूप में नथुनों में एकत्र हो जाता है। उसको साफ न किया जाय तो श्वास-प्रश्वास की क्रिया में बाधा होती है। इसलिए नित्य प्रातः ठंडे पानी से नाक की सफाई करनी चाहिए।

नाक में जमे मैल को अंगुली से नहीं खरोचना चाहिए, बल्कि पानी से गीला करके आसानी से निकाल लेना चाहिए। नाक में अंगुली डालने की आदत बहुत बुरी होती है।

नाक के भीतर के बालों को तोड़ना या काटना नहीं चाहिए क्योंकि नाक द्वारा भीतर जानेवाली श्वास की हवा इन बालों से ही छनकर भीतर जाती है। ये बाल हवा के साथ किसी मैल को भीतर जाने से रोकते हैं।

नाक की सफाई और सुरक्षा में लापरवाही करने से पीनस रोग हो जाया करता है। तेज गंध वाले पदार्थ, चाहे वे सुगन्धित हो या दुर्गन्धित, उन्हें सूंघने से नाक को हानि होती हैं। सरसों का तेल सूंघना हितकर होता है और यदाकदा नस्य लेना भी नाक को स्वस्थ रखता है।

कानों की सफाई आवश्यक है। कान की मंझली नली के पास जो पीला पदार्थ होता है, वह साफ न होने से; जमकर और सूखकर कुछ पीले-से रंग का मैल बन जाता है। यदा-कदा सुदर्शन की पत्ती का रस या लहसुन पकाया अथवा सादा तेल गुनगुना करके कान में डालना हितकर होता है। हाइड्रोजन पराक्साइड नामक तरल द्रव्य की बूंदें कानों में डालने से उनका मैल उफन कर बाहर आ जाता है।

बाजारु कान साफ करने वालों से कभी कान साफ नहीं कराना चाहिए। ये लोग कानों को बहुत खराब करते हैं। कोई नुकीली चीज या कड़ी सींक डालकर कान कुरेदने से कानों के पर्दों में घाव होने का भय रहता है।

यदि कान बहने लगे या पीव पड़ जाय तो शीघ्र ही योग्य चिकित्सक से इलाज कराना चाहिए अन्यथा वह स्थायी रोग हो जाता है और सदा के लिए बहरापन गले पड़ जाता है।

नाखूनों की सफाई

हाथों और पैरों की अंगुलियों के नाखून थोड़े-थोड़े नित्य बढ़ते हैं। समय-समय पर उन्हें काटते रहना आवश्यक हैं। हाथ की अंगुलियों के बढ़े नाखूनों की तली (दरारों) में जो मैल भर जाता है, वह बड़ा विषाक्त होता है और भोजन के साथ भीतर पहुँचकर उसमें भरे कीटाणु पेट में कीड़ों को जन्म देते हैं; ऐसा वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है। मैल भरे हुए नाखूनों से बदन खुजलाने से खुजली, फोड़ा-फुंसी और अन्य चर्म रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिए नाखूनों को अवश्य काटते रहना चाहिए और अंगुलियों के सिरों को सदा साफ रखना चाहिए।

केश (बालों) की सफाई

हाथ की हथेली और पैर के तलवों को छोड़कर मनुष्य के सारे शरीर में बाल होते हैं। सिर और दाढ़ी-मूंछ के अलावा सब जगह के बाल मुलायम और छोटे होते हैं, जिन्हें हम रोंये कहते हैं।

विशेषकर सिर के बड़े बालों को सदा साफ-सुथरा और स्निग्ध रखना आवश्यक है। यदा-कदा आंवला, शिकाकाई या रीठा के पानी से बाल धोये जावें तो उनकी जड़ों का मैल साफ होता रहता है।

सिर धोने के लिए गर्म पानी का उपयोग नहीं करना चाहिए। सामान्य साबुनों का अति प्रयोग भी बालों को हानि पहुँचाता है। बढ़िया किस्म का ग्लिसरिन युक्त साबुन का उपयोग किया जा सकता है; उससे अन्य साबुनों की भाँति बालों की जड़ों की स्निग्धता नष्ट नहीं होती। बालों की जड़ों को तरल एवं स्निग्ध रखने के लिये ही बालों में तेल डाला जाता है। तेज खुशबू वाले बने हुए तेल बालों को हानि पहुँचाते हैं।

सादा तिल, सरसों या नारियल का शुद्ध और ताजा तेल ही बालों में डालना चाहिए। महिलाओं के लिए नारियल का तेल उपयोगी होता है। बालों की नियमित सफाई न करने से उसमें जूं या लीख उत्पन्न हो जाते हैं और बालों की जड़ों के छिद्र बन्द हो जाते हैं, जिससे मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

त्वचा की सफाई

त्वचा की सफाई का अर्थ है सम्पूर्ण बाह्य शरीर की सफाई। इसके लिए नियमित स्नान सर्वोपरि साधन है। मौसम के अनुसार दिन में एक-दो बार अवश्य स्नान करना चाहिए। स्नान के समय गीले-खरदरे कपडे या रूयेदार तौलिया से रगड़कर त्वचा की अच्छी सफाई होती है। स्नान का उद्देश्य प्रधानतः त्वचा की सफाई ही है।

त्वचा में करोड़ों की संख्या में जो रोम छिद्र हैं, वे पसीने के कारण सदा-तरल रहते हैं, बाहर से धूलिकण पसीने में मिलकर मैल के रूप में रोमछिद्रों पर जम जाते हैं। जिससे रोमछिद्र बन्द हो जाने के कारण भीतर से पसीना बाहर निकलना रुक जाता है। इसका स्वास्थ्य पर बहुत दुःखद प्रभाव पड़ता है। इसलिए स्नान द्वारा इन रोमछिद्रों को साफ और खुला रखना स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

स्नान के लिए स्वच्छ और ठंडा जल सर्वथा उपयुक्त होता है। शीतल स्नान से त्वचा और रोमछिद्रों की सफाई के अतिरिक्त शरीर में एकदम नई और सहज स्फूर्ति आती है तथा मन प्रसन्न हो जाता है। सर्द हवा से डरना उचित हैं, लेकिन सर्द (ठंडे) पानी से डरना उचित नहीं, वह तो बलप्रद होता है। जाड़ों की ऋतु में आवश्यक होने पर गुनगुने जल से भी नहाया जा सकता है। परन्तु मस्तक पर गर्म जल नहीं डालना चाहिए। उससे मस्तिष्क के स्नायुओं पर हानिकर प्रभाव पड़ता है।

स्वस्थ व्यक्तियों के लिए तो प्रतिदिन स्नान करना आवश्यक है ही; रोगियों के लिए भी स्थिति के अनुसार स्नान करना रोग मुक्ति में सहायक होता है। रोगी को गुनगुने जल से ही स्नान करना चाहिए। यदि रोगी स्नान करने लायक स्थिति में न हो तो गीले कपडे से उसके बदन को रगड़कर त्वचा की सफाई अवश्य कर देनी चाहिए।

स्नान के पूर्व शरीर पर भली प्रकार तेल मालिश करना बड़ा उपयोगी होता है। उससे त्वचा की स्निग्धता सुरक्षित रहती है और तौलिया से अंगों को पोछने पर त्वचा का मैल भी शीघ्र साफ होता है।

दो-चार लोटा पानी बदन पर डाल लेने को स्नान करना नहीं कहा जा सकता। घर में ही स्नान करें तो काफी पानी से बदन को खूब मल-मल कर नहाना चाहिए। नदी या स्वच्छ तालाब का स्नान बढ़िया होता है। तैरना एक अच्छी कला और उपयोगी कसरत है। इसलिए नदी या तालाब में स्नान करने से त्वचा की भरपूर सफाई के अतिरिक्त व्यायाम भी हो जाता है।

परन्तु गन्दे और कीटाणु युक्त पानी के तालाब में भूलकर भी स्नान नहीं करना चाहिए। उससे निश्चित चर्म रोग होते हैं। और तैरते समय थोड़ा भी कीटाणु युक्त पानी पेट में चला जाय तो भयंकर उदर रोगों का कारण बनता है। अपरिचित नदी में भी स्नान नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार वावडी में स्नान करना अहितकर होता है।

नहाने में साबुन का उपयोग न करना ही अच्छा है क्योंकि उससे त्वचा की स्वाभाविक स्निग्धता नष्ट होती है।

भोजन के तुरन्त बाद अथवा व्यायाम के तत्काल पश्चात स्नान नहीं करना चाहिए। साधारणतः किसी भी परिश्रम के काम के अनन्तर एकाध घण्टा रुककर ही स्नान करना चाहिए।

स्नान करने के लिए प्रायः हर ऋतु में प्रातःकाल का ही समय सर्वोपरि होता है। अधिक शीत में जब प्रातः स्नान कठिन हो, तब दोपहर में भी स्नान किया जा सकता है और हवा के झोंके से बचाना चाहिये। स्नान का स्थान निर्वात हो तो उत्तम है।