आरोग्य-प्रकाशराजयक्ष्मा (तपेदिक)

राजयक्ष्मा (तपेदिक)

7 मिनट का पाठ

यह रोग संक्रामक और छुआछूत से हो जाने वाला है। एक बार राजयक्ष्मा के रोगी का बचा हुआ खाना बराबर एक कुत्ते को खिलाया गया, फलस्वरूप उस कुत्ते को भी राजयक्ष्मा हो गया। राजयक्ष्मा रोग वाली गाय का दूध पीने से भी राजयक्ष्मा होते देखा गया है। घर के एक आदमी को तपेदिक होने पर उस घर के अन्य आदमियों को दो-चार साल के बाद तक रोग प्रकट होते देखा गया है। इसलिए राजयक्ष्मा के रोगी से खूब सावधान रहना चाहिए।

क्षयरोग के कीटाणुओं (Tubercle Bacilli) के फेफड़े में पैदा होने से इस रोग की उत्पत्ति होती है। वे कीड़े रोगी के फेफड़े का भक्षण करते रहते हैं, जिससे रोगी जल्दी-जल्दी क्षय (कमजोरी व वजन की कमी) को प्राप्त होता है। पहले खुर-खुर खाँसी का होना, दिन-रात हल्का ज्वर रहना, सायंकाल में ज्वर का बढ़ना, भूख की कमी, छाती में दर्द, साँस लेने में तकलीफ, कमजोरी आदि लक्षण प्रकट होते हैं। धीरे-धीरे खाँसी का वेग बढ़ता है, पीले रंग का गाढ़ा कफ बहुतायत से आता है। किसी-किसी को कफ में खून भी आता है, छाती में दर्द अधिक होने लगता है और खाँसी होने के कारण स्वर-नली में जख्म होकर कण्ठ की आवाज बैठ जाती है। रात को पसीना आता है। रोगी के कफ या थूक में राजयक्ष्मा के कीटाणु होते हैं, जिनसे यह रोग हवा, पानी या दूध द्वारा फैलता है। उचित चिकित्सा न होने पर बहुत दिन कष्ट पाकर रोगी क्षीण होकर मृत्यु को प्राप्त होता है।

दूषित वायु एवं सीलन भरे गीले स्थान में रहना, श्वास के साथ धूल-कणों का फेफड़ों में जाना, अधिक मैथुन, अपौष्टिक भोजन, शक्ति से अधिक परिश्रम, बारम्बार सन्तान का जन्म तथा तपेदिक रोगी के साथ संसर्ग आदि कारणों से यह रोग उत्पन्न होता है।

चिकित्सा

बहुत दिनों के अनुभव से देखा गया है कि राजयक्ष्मा रोग की कोई एक ऐसी खास दवा नहीं है जिससे रोग शर्तिया आराम हो जाय। आजकल वैज्ञानिकों ने नई खोजें कर स्ट्रेप्टोमाइसिन, आइसोनिकोटिनिक एसिड हाइड्राजाइड (INH) आदि दवाएँ दी हैं जिनसे यह रोग नियन्त्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद में अवस्था के अनुसार स्वर्णवसन्तमालती, मृगांक रस, मकरध्वज, हिरण्यगर्भ पोट्टली, च्यवनप्राश, द्राक्षासव, वासावलेह, स्वर्णपर्पटी, विजयपर्पटी, सितोपलादि चूर्ण (केवल या अभ्रक भस्म संयुक्त) आदि दवाएँ किसी विद्वान् अनुभवी वैद्य की सलाह से देनी चाहिए।

(१) मृगांक रस -- शुद्ध पारा ११.६६ ग्राम, शुद्ध गन्धक २३.२ ग्राम, मोती-पिष्टी २३.२ ग्राम, स्वर्ण भस्म ११.६६ ग्राम और सुहागे का लावा ३ ग्राम -- इन पाँचों चीजों को काँजी में घोंटकर गोला बनाकर सुखा लें। फिर उस गोले को मूषा में रखकर नमक से भरे घड़े में रखें। आधा नमक नीचे रखकर बीच में मूषा रख दें और फिर आधा नमक ऊपर से डाल दें। इस घड़े को चार पहर आग पर पकाएँ। घड़ा ठण्डा होने पर दवा निकाल लें। इसी का नाम 'मृगांक रस' है। २४३ से ४८६ मि.ग्रा. मृगांक रस को १० काली मिर्च या पीपल के चूर्ण और शहद में मिलाकर चटाएँ। यह राजयक्ष्मा में परम उपकारी है। (भै. र.)

(२) हेमगर्भपोट्टली रस (हिरण्यगर्भ पोट्टली) -- स्वर्ण भस्म, ताम्र भस्म तथा गन्धक प्रत्येक ११.६६ ग्राम और रससिन्दूर ३४.८ ग्राम -- ये सब द्रव्य चित्रक-रस में दोपहर तक खरल करके कौड़ी में भरकर सुहागे से मुँह बन्द करके हाँडी में रख गजपुट में फूँक दें। ठण्डा होने पर निकालकर कौड़ियों सहित पीसकर बोतल में रख लें और २४३ मि.ग्रा. की मात्रा में सेवन करें। यह राजयक्ष्मा में बहुत फायदा करता है। (भै. र.)

(३) चन्दनबला लाक्षादि तैल -- सफेद चन्दन, खरेटी-मूल (बला), लाख, लामज्जक (उशीर) -- प्रत्येक ९३३ ग्राम १५ किलो जल में डालकर क्वाथ करें; ३.७३ किलो शेष रहने पर छान लें। गोदुग्ध ३.७३ किलो और तिल का तेल १.८७ किलो में नीचे लिखा हुआ कल्क डालकर मन्दाग्नि से पकावें।
कल्क द्रव्य: सफेद चन्दन, खश, मुलेठी, सोया, कुटकी, देवदारु, हल्दी, कूठ, मजीठ, अगर, नेत्रवाला, असगन्ध, खरेटी, दारूहल्दी, मूर्वा, नागरमोथा, मूली, छोटी इलायची, दालचीनी, नागकेशर, रास्ना, लाख, अजमोद, चम्पक, अनन्तमूल, शिलारस, सेंधा नमक और विड् नमक -- ये २८ द्रव्य मिलाकर ४६७ ग्राम लेकर कल्क कर लें। फिर तैलपाक विधि से सिद्ध करें। इस तेल की मालिश करने से रस-रक्तादि सप्त धातुओं की वृद्धि होती है। जीर्णज्वर, कास, श्वास, राजयक्ष्मा आदि रोग नष्ट होते हैं। यह तेल पित्तशामक और पुष्टिकारक है।

(४) रसोनक्षीर योग -- (सिद्धयोग संग्रह, पृ. ८४ देखें)। (यो. र.)

पथ्यापथ्य

राजयक्ष्मा के रोगी को पथ्यापथ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए, बल्कि पथ्यापथ्य को ही आधी चिकित्सा समझनी चाहिए। सूर्य का प्रकाश, स्वच्छ वायु, उचित आहार और पूर्ण विश्राम -- इन चार की सम्मिलित सहायता से ही राजयक्ष्मा नष्ट किया जा सकता है। इन चारों की सहायता न मिले तो केवल दवा के बल से कुछ भी लाभ नहीं होता।

सूर्य का प्रकाश -- यानी रोगी के सिर को बचाकर तमाम शरीर पर धूप पड़नी चाहिए। रोगी के सिर पर छाँह रखकर सारे शरीर पर, विशेषकर छाती, पीठ और पसलियों पर धूप लगनी चाहिए। गर्मी के मौसम में सुबह-शाम धूप का सेवन कराएँ, इससे बहुत फायदा होता है।

स्वच्छ वायु -- फेफड़े का प्रधान भोजन स्वच्छ वायु है और राजयक्ष्मा फेफड़े का ही रोग है, इसलिए रोगी को दिन-रात (२४ घण्टे) स्वच्छ हवा मिलती रहे, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए। कमरे की अपेक्षा बरामदे की हवा, बरामदे की अपेक्षा बाहर की, शहर की अपेक्षा गाँव और गाँव की अपेक्षा खुला मैदान तथा सबसे उत्तम समुद्र-तट की और ऊँचे पहाड़ों की हवा शुद्ध होती है। इसलिए यदि सामर्थ्य हो, तो रोगी को समुद्र के किनारे या किसी पर्वतीय स्वास्थ्यवर्धक स्थान पर भेज देना चाहिए। यदि रोगी निर्धन हो, तो उसे कम-से-कम पास के खुले देहात में तो रहना ही चाहिए, ताकि स्वच्छ हवा के सेवन से रोग अच्छा हो जाय।

उचित आहार

रोगी को जल्दी पचने वाला हल्का और पुष्टिकारक आहार देना जरूरी है। रोग के कारण रोगी भारी खुराक हजम नहीं कर सकता, इसलिए सुपाच्य पौष्टिक भोजन देना चाहिए। दूध, अण्डे, माँस-रस, मक्खन, फल, रोटी, साग, दाल, भात आदि सब तरह का भोजन रोगी की रुचि के अनुकूल देना चाहिए। भोजन थोड़ा-थोड़ा करके कई बार देना उचित है -- सुबह, दिन में १० बजे, दोपहर २ बजे, शाम को ५ बजे और रात को ८-१० बजे। भोजन में दूध का भाग जितना अधिक होगा, उतना ही ज्यादा लाभ होगा।

दूध जैसा जल्द हजम होने वाला पुष्टिकारक भोजन दूसरा नहीं है। जो रोगी माँसाहारी हों, उन्हें दूध के साथ १-२ अण्डे भी दिये जाएँ तो बहुत उत्तम होगा। मछली का तेल भी एक तरह का उत्तम पोषक है, यह राजयक्ष्मा के लिए बड़ा लाभकारी है। अगर रोगी खालिस मछली का तेल न पी सके, तो कॉड लिवर ऑयल इमल्शन देना चाहिए। फलों का सेवन भी इस रोग में बड़ा लाभदायक होता है। रोगी को अजीर्ण से बचाना अति आवश्यक है।

पूर्ण विश्राम

राजयक्ष्मा वाले रोगी को चुपचाप शान्त भाव से आराम करना चाहिए, क्योंकि जरा भी परिश्रम करने से ज्वर बढ़ जाता है। ज्वर न रहे तब रोगी बैठ सकता है और आसपास जरा-सा टहल भी सकता है, परन्तु ज्वर की हालत में तो लेटे रहना ही उचित है। रोगी में जैसे-जैसे शक्ति आती जाय, वैसे-वैसे उसे धीरे-धीरे टहलने का अभ्यास करना चाहिए। जल्दबाजी भूलकर भी न करनी चाहिए।

स्त्री-प्रसंग से और तम्बाकू पीने से सख्त परहेज करने की जरूरत है। बहुत-से रोगी तन्दुरुस्त होने पर विषय-भोग में फँसकर फिर रोगी हो जाते हैं और दुबारा राजयक्ष्मा होने पर रोगी का बचना कठिन हो जाता है। ऊपर लिखे पथ्यापथ्य पर ध्यान देने से रोगी निश्चय ही लाभान्वित होंगे।