आरोग्य-प्रकाशखाँसी (कास)

खाँसी (कास)

10 मिनट का पाठ

खाँसी भयानक रोग न होते हुए भी उपेक्षा योग्य नहीं है। खाँसी का कुछ दिन इलाज न कर इसी तरह रहने से फिर उसका इलाज होना मुश्किल हो जायेगा। बहुत कड़े परहेज और दवा खाने से पुरानी खाँसी आराम होती है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि खाँसी होते ही तुरन्त इलाज किया जाय।

गले की नली की खराबी, फेफड़े की जलन, यकृत की पीड़ा, सर्दी, जुकाम आदि रोगों में खाँसी मौजूद रहती है। खाँसी कोई स्वतन्त्र रोग नहीं है—दूसरे रोगों का लक्षण मात्र है। तब भी खाँसी कुछ दिन स्थायी रहने से अनेक तरह के रोग उत्पन्न कर देती है। खाँसी प्रायः दो तरह की देखी जाती है--सूखी और कफवाली। सूखी खाँसी में बहुत बल लगाने पर मुश्किल से कच्चा थूक जरा-सा निकलता है; परन्तु कफवाली तर खाँसी में जरा-सा खाँसने से ही कफ निकल जाता है। खाँसी पुरानी होने से प्रायः कफवाली हो जाती है। नयी खाँसी प्रायः सूखी होती है। एक तरह की खाँसी और भी होती है, जिसको कुकुर खाँसी या हूपिंग कफ कहते हैं। यह खाँसी २ वर्ष से १५ वर्ष तक की उम्रवालों को होती है। खाँसी के साथ लम्बी-सी आवाज आती है और मुँह खुल जाता है। एक तरह का बर्तन गिरने के जैसा खास शब्द इस खाँसी में होता है। खाँसते-खाँसते आखिर में वमन हो जाता है। यह कुकुर खाँसी बड़ी कठिन होती है, जल्दी आराम ही नहीं होती; अच्छी तरह इलाज करने पर एक-दो महीने में अच्छी होती है। गलग्रन्थि (कव्वा या टॉन्सिल) के बढ़ जाने से भी खाँसी पैदा हो जाती है। इस खाँसी में गले में कोई वस्तु छूती हुई-सी मालूम होती है। गले की सरसराहट के साथ जल्दी-जल्दी सूखी खाँसी चलती है। बहुत खाँसने से कच्चा झागदार थूक आता है, कफ बिल्कुल नहीं आता। देखने में तालु-ग्रन्थि या टॉन्सिल बढ़ी हुई मालूम होती है।

चिकित्सा

जिस कारण से खाँसी पैदा हुई हो, उसकी तरफ ख्याल करके चिकित्सा करनी चाहिए। वैद्यक शास्त्र का औषध-विधान इतना सुन्दर है कि खाँसी के निदान में आपको अधिक दिमाग खर्च करने की जरूरत नहीं होगी। खुश्क या तर खाँसी देखकर जो भी खाँसी हो उसी की दवा दीजिए, फौरन लाभ होगा। पाठकों की सुविधा के लिए हमने प्रत्येक दवा के अन्त में साफ-साफ लिख दिया है कि यह दवा सूखी या तर खाँसी में फायदा करेगी। तालु-ग्रन्थि या टॉन्सिल बढ़ जाने के कारण जो खाँसी पैदा होती है, उसमें खाने की दवा से कुछ भी लाभ नहीं होता, लगाने की दवा से आराम होता है। सुहागे को फुलाकर लावा बना लें। उस लावे का महीन चूर्ण करके शहद में मिलाकर तालु-ग्रन्थि या टॉन्सिल पर लगाने से तालु-ग्रन्थि या टॉन्सिल संकुचित होकर खाँसी आराम हो जायगी। बैद्यनाथ ग्लिसरीन या टिंचर आयोडीन लगाना भी लाभकारी है। सरसों की खली अंगारों पर डालकर उसका धुआँ तालु-ग्रन्थि से स्पर्श कराएँ। इससे खाँसी अच्छी होगी। उत्तम ब्राण्डी का फाहा कव्वे पर लगाने से वह बैठ जाता है। गर्म पानी, गर्म दूध, गर्म चाय, गरमागरम भोजन आदि गर्म चीजें कंठ में होकर जाने से तालु-ग्रन्थि या टॉन्सिल का सेक हो जाता है। इस सेक से तालु-ग्रन्थि या टॉन्सिल छोटी होकर खाँसी ठीक हो जाती है। यदि किसी उपाय से कव्वा या टॉन्सिल ठीक न हो, तो किसी योग्य चिकित्सक से कटवा डालना चाहिए।

(१) भागोत्तर गुटिका -- सिद्धयोग सं० पेज ७१ में देखें।

(२) वासावलेह -- १.८ किलो अडूसे की जड़ की छाल को १५ किलो पानी में औटावें। ३.७३ किलो पानी शेष रहने पर उसमें १ सेर चीनी डालकर चाशनी बनाएँ। गाढ़ा हो जाने पर नीचे उतारकर पीपल का चूर्ण, ताजा घी २३३ ग्राम और शहद ९३३ ग्राम मिला दें। मात्रा -- ५.८ से ११.६६ ग्राम तक। यह सब तरह की खाँसी, श्वास, रक्तपित्त, प्रदर आदि में पूर्ण लाभ पहुँचाता है। यह पुरानी कफवाली खाँसी की अचूक दवा है। इसमें छोटी कण्टकारी, अडूसे की जड़ के समान भाग मिलाने से अधिक लाभ होता है। -- भै० र०

(३) चन्द्रामृत रस -- सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, चव्य, धनियाँ, जीरा और सेंधा नमक -- ये १० दवाएँ प्रत्येक ११.६६ ग्राम, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म प्रत्येक २३ ग्राम, सुहागे का लावा ९३ ग्राम और कालीमिर्च ४६ ग्राम -- इन सब दवाओं को चूर्ण कर बकरी के दूध में पीसकर ४८६ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। -- भै० र०

अनुपान -- रक्तोत्पल का रस, नीलोत्पल का रस, अदरक का रस, बकरी का दूध, पीपल और शहद के साथ दवा खाकर ऊपर से निम्नलिखित काढ़ा पिया जाय, तो बहुत उत्तम रहे।

अडूसा, गुर्च, भारंगी, नागरमोथा और कण्टकारी -- ये सब चीजें २३ ग्राम लेकर काढ़ा बना लें, चन्द्रामृत खाकर पीवें। उपरोक्त चन्द्रामृत रस खाँसी-रोग के लिए सचमुच अमृत के समान है। ऊपर लिखी विधि से सेवन करने पर किसी तरह की खाँसी हो, तुरन्त लाभ होता है। सर्दी-जुकाम से जब नाक बहती हो और शरीर में हरारत हो तथा खाँसी का जोर हो तब चन्द्रामृत रस को मिश्री के साथ मुँह में रखकर रस चूसें; इस प्रकार दिन-रात में चार-पाँच गोलियाँ खाएँ। बहुत जल्द तबीयत ठीक हो जायगी।

(४) शृंगाराभ्र -- अभ्रक भस्म ९३ ग्राम, कपूर, जावित्री, सुगन्धवाला, गजपीपल, तेजपत्ता, लौंग, जटामांसी, तालीसपत्र, दालचीनी, नागकेशर, कूठ और धाय के फूल -- ये १२ दवाएँ प्रत्येक ५.८३ ग्राम, हरड़, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, कालीमिर्च और पीपल -- ये ६ दवाएँ प्रत्येक ३ ग्राम, इलायची, जायफल और शुद्ध गन्धक -- ये तीनों प्रत्येक ११.६६ ग्राम और शुद्ध पारा ५.८३ ग्राम -- सब चीजों को पान के रस या पानी के संयोग से भिगोकर चने के बराबर की गोलियाँ बना लें। इसी का नाम 'शृङ्गाराभ्र' है। अदरक और पान के रस के साथ दवा खाकर ऊपर से थोड़ा गुनगुना पानी पीना चाहिए। इससे सब तरह की खाँसी आराम होती है। -- भै० र०

(५) सर्वाङ्गसुन्दर रस -- शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक ११.६६ ग्राम, फूला सुहागा २३ ग्राम, मोती पिष्टी और प्रवाल भस्म ११.६६ ग्राम, शंख भस्म ११.६६ ग्राम, सुवर्णभस्म ६ ग्राम, इन सबको खरल में डालकर नीबू के रस में घोंटकर एक गोला बनाकर शराव सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूंक दें। शीतल होने पर निकाल लें। फिर लौह भस्म छः ग्राम, शुद्ध हिंगुल तीन ग्राम को उसी में मिलाकर खूब खरल करें। इसकी १२१.५ मि.ग्रा. की मात्रा शहद और अदरक के रस में मिलाकर खाने से किसी भी तरह की श्वास-कास रह नहीं सकती। पुरानी खाँसी और दमा में विशेष लाभ करता है। -- भै० र०

(६) लवंगादि बटी -- लौंग, कालीमिर्च और बहेड़े का छिलका ११.६६ ग्राम और सफेद पपरिया कत्था ३५ ग्राम को बबूल (कीकर) की छाल के काढ़े से घोंटकर चने के बराबर गोलियाँ बना लें। एक या दो गोली मुँह में रखकर चूसें। इस प्रकार दिन-रात में ८-१० गोलियाँ चूस डालें। सब तरह की खाँसी आराम होगी। -- वै० जी०

(७) मरिचादि गुटिका -- कालीमिर्च और पीपल ११.६६ ग्राम, अनार का छिलका (बहुत से वैद्य अनार के बीज-अनारदाना लेते हैं) २३ ग्राम, जवाखार ५.८३ ग्राम और पुराना गुड़ ९३ ग्राम -- सबों का अलग-अलग चूर्ण करके मिला लें। तदुपरान्त चूर्ण ही रहने दें या बेर के बराबर की गोलियाँ बना लें। एक गोली मुँह में रख लें और उसका रस धीरे-धीरे पेट में जाने दें। दिन-रात में पाँच-छः गोलियाँ चूस डालें। दोनों तरह की खाँसी में लाभ होगा। खाँसी की यह मशहूर दवा है। -- शा० ध०

(८) एलादि बटी -- बड़ी इलायची, तेजपत्ता, दालचीनी ये सब दवा ६-६ ग्राम, पीपल २३ ग्राम, मिश्री, मुलेठी, खजूर, मुनक्का -- प्रत्येक ४६ ग्राम।

बनाने की विधि यह है कि इलायची से लेकर मुलेठी तक की औषधियों को कूटकर कपड़छान कर लें और खजूर तथा मुनक्के को सिल पर पीसकर खरल में सब वस्तुओं को मिला दें और उसमें शहद अन्दाज से इतना डालें, जिससे गोली बन जाय। सुबह-शाम एक-एक गोली चूसें। ये गोलियाँ शुष्क कास में आश्चर्यजनक लाभ पहुँचाती हैं तथा रक्तपित्त और यक्ष्मा के कास की सुप्रसिद्ध दवा है। स्वरभंग में चूसें। -- भा० प्र०

(९) सीतोपलादि चूर्ण -- मिश्री १८५.४ ग्राम, वंशलोचन ९२.८ ग्राम, पीपल ४६.४ ग्राम, छोटी इलायची २३.२ ग्राम और दालचीनी ११.६६ ग्राम -- इन पाँचों दवाओं का चूर्ण कर लें। यह चूर्ण ११.६६ ग्राम, ताजा घी ११.६६ ग्राम और शहद २३.२ ग्राम में मिलाकर दिन-रात में पाँच-छः बार चाटें। यह बहुत ही गुणकारी दवा है। सब तरह की खाँसी, दमा, पुराना ज्वर, बदहजमी, अरुचि, रक्तपित्त आदि रोगों में उत्तम फल देता है। यदि अधिक जोर की खाँसी हो तो २४३ मि.ग्रा. अभ्रक भस्म मिला देने से तत्काल फायदा होता है। यह सूखी खाँसी में विशेष लाभकारी है। -- शा० ध०

(१०) लवंगादि चूर्ण -- लौंग, शुद्ध कपूर, छोटी इलायची, दालचीनी, नागकेशर, जायफल, खस, सोंठ, स्याह जीरा, अगर, वंशलोचन, जटामांसी, नीलोफर, पीपल, सफेद चन्दन, तगर, सुगन्धवाला और शीतल मिर्च -- इन १८ दवाओं का समभाग लेकर चूर्ण कर लें। इसका जितना वजन हो, उससे आधा मिश्री मिला दें।

१.५ ग्राम से ३ ग्राम तक यह चूर्ण ताजा जल के साथ खाएँ या शर्बत बनफ्शा के साथ चाटें। गर्म तबीयत वाले रोगियों की खाँसियों में तथा सूखी खाँसी में विशेष लाभ होता है। यह खाँसी, दमा, अजीर्ण, कै आदि रोगों में बहुत फायदेमंद है। गर्भिणी स्त्रियों के कै और मिचली की अक्सीर दवा है। -- शा० ध०

(११) तालीसादि चूर्ण -- तालीसपत्र ११.६६ ग्राम, कालीमिर्च २३.२ ग्राम, सोंठ ३५ ग्राम, छोटी पीपल ४६.४ ग्राम, वंशलोचन ५८ ग्राम, दालचीनी और इलायची ५.८ ग्राम लेकर चूर्ण करके २७३.१ ग्राम बढ़िया चीनी इनमें मिलाएँ। इसमें से ३ ग्राम की मात्रा में जल के साथ लेने से सब तरह की खाँसी, विशेष करके सूखी खाँसी जल्द आराम होती है। -- शा० ध०

(१२) कण्टकारी (कटेरी) और अडूसा (वासक) का काढ़ा शहद तथा पीपल का चूर्ण डालकर पीने से कफवाली पुरानी खाँसी में आराम होता है।

(१३) कायफल, पोहकरमूल, काकड़ासिंगी और पीपल -- इनका महीन चूर्ण शहद से चटाएँ। कफवाली खाँसी और दमा में अच्छा फायदा होता है। मामूली कास-श्वास तो तुरन्त अच्छा हो जाता है। यह 'कटफलादि चूर्ण' है।

(१४) गुलबनफ्शा, गाजवाँ, मुनक्का, अंजीर, लिसोड़ा, उन्नाव, मुलेठी, अडूसे की छाल, कुटकी, गिलोय, नीलोफर, कंटकारी की जड़ और बहेड़े का छिलका -- इन १३ दवाओं का काढ़ा मिश्री और शहद मिलाकर पीने से खाँसी में आशातीत लाभ होता है। जुकाम लगकर होनेवाली खाँसी की तो शायद ही इससे अच्छी दवा दूसरी हो। काढ़ा बनाकर उपरोक्त औषधियों को जल में डालकर रख दें तथा दोबारा उसी का काढ़ा बनाकर पीवें, वैसा ही लाभ होगा।

(१५) कालीमिर्च, सुहागे का लावा, फिटकरी का लावा, काकड़ासिंगी, लौंग, भारंगी, हरड़ का छिलका, पीपल और सेंधा नमक -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम और सौंफ १०४.२ ग्राम -- इनको नींबू के रस से घोंटकर जंगली बेर के बराबर की गोलियाँ बना लें और दिन-रात में तीन-चार गोलियाँ जल के साथ खाएँ। दोनों तरह की खाँसी आराम होगी। अजीर्ण या यकृत् के कारण होनेवाली खाँसी में अच्छा लाभ होता है।

(१६) सुहागे का लावा या फिटकरी का लावा २४३ मि.ग्रा. में १२१.५० मि.ग्रा. अभ्रक भस्म मिलाकर चाटने से सूखी खाँसी आराम होती है।

(१७) हल्दी ११.६६ ग्राम, सज्जीखार तीन ग्राम और पुराना गुड़ २३.२ ग्राम की बेर के बराबर गोलियाँ बना लें। इसको मुँह में रखकर चूसने से सब तरह की खाँसी विशेष करके हर वर्ष शीतकाल में होनेवाली खाँसी आराम होती है।

पथ्यापथ्य

श्वास रोग के अन्त में पढ़िए।