शोथ (सूजन)
5 मिनट का पाठ
स्थानिक और सर्वांगिक भेद से दो तरह की सूजन होती है। स्थानिक शोथ—पैर, हाथ, पेट, मुख आदि शरीर के किसी एक भाग में होता है। सारे शरीर में एक साथ सूजन होने को सर्वांगिक सूजन कहते हैं। सूजन वाला स्थान प्रायः फुलावटयुक्त और पिलपिला होता है तथा हाथ से दबाने पर बैठ जाता है। सूजन की जगह जलांश विशेष संचय होकर वह स्थान फूल जाता है।
हृदय की बीमारी के कारण होने वाली सूजन पहले जाँघ और हाथों पर होती है। तिल्ली और जिगर के कारण उत्पन्न होने वाली सूजन पहले पेट पर होती है। वृक्क की बीमारी के कारण उत्पन्न होने वाली सूजन पहले मुख पर होती है। रज की खराबी के कारण उत्पन्न होने वाली स्त्रियों की सूजन पहले हाथ, पैर और मुँह पर होती है। शोथ के साथ अरुचि, प्यास, ज्वरभाव, दुर्बलता, शरीर का चमड़ा शुष्क होना आदि लक्षण वर्तमान रहते हैं।
चिकित्सा
जिस मूल रोग के कारण शोथ हो गया हो उसकी चिकित्सा से शोथ खुद आराम हो जाता है। जंगली गोयठों (उपलों) को जलाकर राख बाँधने से जलांश का शोषण होकर शोथ में लाभ होता है। इसी प्रकार वातव्याधि में लिखित विधि से पसीना निकालें, तो शोथ रोग में अवश्य लाभ होगा।
(१) जुलाब देकर पेट साफ करने से सब तरह के शोथ-रोग में लाभ होता है।
(२) गोमूत्र २९ ग्राम से ५८ ग्राम तक पीने से सूजन में फायदा होता है। यदि इसके साथ लोह भस्म भी दी जाय तो बहुत उपकार होता है।
(३) पुनर्नवा का काढ़ा पीने से और पुनर्नवा का रस लगाने से शोथ-रोग में लाभ होता है।
(४) पाण्डु रोग में लिखा पुनर्नवा मण्डूर शोथ रोग में विशेष लाभ करता है।
(५) पुनर्नवा, नीम की छाल, पटोलपत्र, सोंठ, कुटकी, गिलोय, दारूहल्दी, बड़ी हरड़—यह पुनर्नवाष्टक काढ़ा पीने से सब तरह के शोथ आराम होते हैं। पुनर्नवा और कुटकी २ भाग लें, रोहितक छाल, शरपुंखामूल, अफ़सन्तीन एक-एक भाग और मिलाकर आरोग्यवर्द्धिनी या पुनर्नवामण्डूर के साथ देने से अधिक लाभ होता है (आचार्य यादवजी)।
(६) दुग्ध वटी -- शुद्ध मीठा विष १.४६ ग्राम, अफीम १.४६ ग्राम, लोह भस्म ३०८ मि.ग्रा. और अभ्रक भस्म ७.३० ग्राम—सबको खरल में डालकर दूध के साथ घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें और दूध के साथ खाएँ। जल और भोजन की जगह दूध ही सेवन करें। अत्यावश्यक होने से भोजन में भात और पीने के लिए जरा-सा गरम पानी ले सकते हैं। रोग आराम न होने तक नमक खाना मना है। इससे शोथ, संग्रहणी, मन्दाग्नि आदि रोग आराम होते हैं।
-- भै० र०
(७) मण्डूर वटक -- हरड़, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, मिर्च, पीपल, चव्य, पीपलामूल, चित्रकमूल, देवदारु, स्वर्णमाक्षिक भस्म, दारूहल्दी, नागरमोथा, वायविडंग—ये प्रत्येक दवाएँ ११.६६ ग्राम लें। बारीक पीसा हुआ शुद्ध मण्डूर सब दवाओं से दुगुना ३२५.८ ग्राम लें।
बनाने की विधि -- पहले मण्डूर को अठगुने गोमूत्र में पकाकर गाढ़ा करें। बाद में सब दवाओं का चूर्ण डालकर १-१ ग्राम के प्रमाण की गोली बना लें। इसकी १-१ गोली मट्ठा के साथ देने से शोथ, पाण्डु और कामला रोग में आराम होता है। यकृत-प्लीहा में भी फायदेमंद है।
-- शा० सं०
(८) शोथारि मण्डूर -- गोमूत्र में ७ बार शोधी हुई मण्डूर भस्म १५३ ग्राम को निर्गुण्डी, मानकन्द, अदरख और जमीकन्द (सूरण) के रस की तीन-तीन भावना दें। १.४ किलो गोमूत्र में डालकर औटाएँ। जब वह गाढ़ा हो जाय तब उतारकर हरड़, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, मिर्च, पीपल और चव्य—ये ७ दवाइयाँ प्रत्येक ११.६६ ग्राम का चूर्ण करके ऊपर वाले मण्डूर गोमूत्र में मिला दें। ठंडा होने पर ४६.४ ग्राम शहद भी मिला दें। उचित मात्रा में पानी के साथ सेवन करने से सब तरह के शोथ रोग आराम होते हैं। किसी भी कारण से शोथ हो, इससे अवश्य लाभ होता है। परीक्षित है।
-- भै० र०
(९) महाशुष्कमूलकाद्य तैल -- तिल तैल ३.७३ किलो को खूब गरम करके संस्कार करें। फिर सोंठ, मिर्च, सेंधानमक, पुनर्नवा, काकमाची, शेलुत्वक् (चालता की छाल), पीपल, गजपीपल, कायफल, पोहकरमूल, काकड़ासिंगी, रास्ना, जवासा, काला जीरा, हल्दी, दारूहल्दी, करंज, नाटाकरंज, श्यामलता और अनन्तमूल—ये २० दवाइयाँ प्रत्येक ११६.६४ ग्राम लेकर कल्क करें। सूखी मूली का काढ़ा ३.७३ किलो, सहजने की छाल, धतूरे का पत्ता, फरहद की छाल, निर्गुण्डी, करंज, वरुण की छाल और पुनर्नवा—इन दवाओं का स्वरस या काढ़ा ३.७३ किलो और दशमूल का काढ़ा ३.७३ किलो—इन सब का यथाविधि पाक करके मालिश करने से सब तरह के शोथरोग तथा व्रण, कामला, पाण्डु और उदर रोग में आराम होता है।
-- भै० र०
(१०) मूत्रल कषाय (सि० यो० सं०) -- पुनर्नवामूल, गन्ने की जड़, बलामूल, खुरासानी अजवाइन, रक्तचन्दन, अनन्तमूल, देवदारु, सौंफ, धनिया, कुश की जड़, काश की जड़, छोटे गोखरू, सागीन के फल, मकोय, कासनी के बीज, ककड़ी या खीरा के बीज, गिलोय, पाषाणभेद, काकनज, कमल के फूल—सब बराबर-बराबर लेकर जौकुट (मोटा) कूट लें। इसमें से २३.२ ग्राम, १५ किलो पानी में औटावें। ४६.४ ग्राम शेष रहने पर छान कर ६०७.५० मि.ग्रा. से १.२१ ग्राम तक शिलाजीत या क्षारपर्पटी मिलाकर दें। दिन में २-३ बार दे सकते हैं।
यह योग अच्छा मूत्रल योग है। गुर्दे (वृक्क) के कारण सर्वाङ्गशोथ में इसका अच्छा उपयोग है। अश्मरी के कारण होने वाले दर्द में भी इस काढ़े का प्रयोग किया जाता है, उनके लिए इसमें जटामांसी २ भाग, खुरासानी अजवाइन के बीज या पत्ती २ भाग मिलाते हैं। क्वाथ में ४८६ - ९७२ मि.ग्रा. हजरुलयहूद भस्म डालने से विशेष लाभ होता है।
पथ्यापथ्य
जिस मूल रोग के कारण शोथ हो, उसका पथ्यापथ्य लेना चाहिए। शोथ मात्र में अन्न छोड़कर सिर्फ दूध का ही भोजन दिया जाय तो बहुत सुन्दर फल होता है; साथ में ताजा फल और हरे शाक दे सकते हैं। गरम पानी से स्नान और मूँग की दाल, परवल, बैंगन आदि का शाक देना अच्छा है। नमक बिल्कुल न खाएँ। शाक में पुनर्नवा और मकोय का साग दवा जैसा गुण करता है। गोमूत्र भी दवा है। दही, छाछ न लें।