आरोग्य-प्रकाशरक्तविकार (खून-खराबी)

रक्तविकार (खूनखराबी)

11 मिनट का पाठ

रक्त मनुष्य का जीवन है। प्राण के साथ ही रक्त भी शरीर से बिदा हो जाता है। शुद्ध हवा फेफड़े में जाकर रक्त के दूषित अंश को अपने में मिलाकर वापस लौटती है। शुद्ध हवा के अभाव में या कब्ज आदि के कारण जब रक्त दूषित हो जाता है, तब अनेक रक्तज रोग पैदा कर देता है। फोड़ा, फुंसी, लाल-लाल गोल चकत्ते (मंडल), कोढ़, खाज, खुजली आदि रक्तविकार पैदा हो जाते हैं।

आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ तीन दोष हैं। कुछ आचार्य रक्त को भी दोष मानते हैं। यूनानी (हिकमत) तो रक्त को भी दोष मानती है। सारांश यह है कि रक्त दूसरी धातुओं को विकृत करके रोग पैदा करता है तथा स्वयं भी वात-पित्त-कफ द्वारा दूषित होकर रोग पैदा करता है। इन रोगों में प्रधान रोग गलित कुष्ठ है, जो भारत में ४० लाख से अधिक मनुष्यों को कष्ट दे रहा है। प्रारम्भ में कुछ मालूम नहीं होता, जब मालूम हो जाता है तब भी बहुत-से रोगी घर में ही रहकर रोग को फैलाते रहते हैं। बच्चों को खिलाते हैं, मुँह में मुँह देते हैं। घर के स्वस्थ लोगों के बिस्तरों पर सोते हैं, साथ खाते हैं, रहते हैं, इसलिए रोग फैल रहा है। कुष्ठ का ज्ञान होते ही रोगी को कुष्ठाश्रम में चला जाना चाहिए। कुष्ठाश्रम में रोग आरोग्य होने पर फिर घर में रहना उचित है। गलित कुष्ठ का प्रधान लक्षण शून्यता है। शून्यता पैर, हाथ आदि में होती है, नाक और कान के नीचे वाला भाग विवर्ण हो जाता है। वैद्य, डॉक्टर से रोग निर्णय कराके रोगी को कुष्ठाश्रम में भेज दें। यदि घर में रखकर ही चिकित्सा करें तो रोगी का निवास स्थान सबसे अलग हो। "खदिरः कुष्ठघ्नानाम्" — खैर कुष्ठ की सर्वश्रेष्ठ दवा है। इसके काष्ठ के चूर्ण के निरन्तर सेवन से लाभ होता है। आयुर्वेद तथा यूनानी में रक्तशुद्धि की बहुत अच्छी दवाएँ हैं। दवा एक-दो वर्ष खाये बिना पूरा लाभ नहीं होता। लम्बा इलाज है। कुष्ठ के रोगी को बहुत समय तक औषध सेवन करना चाहिए। इस समय सभी कुष्ठाश्रमों में डॉक्टरी दवाओं का व्यवहार हो रहा है। आयुर्वेद और यूनानी में गलितकुष्ठ की चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ है। दुर्भाग्यवश वैद्य-हकीम कुष्ठ को पाप रोग मानकर इलाज नहीं करते। यह देशी चिकित्सा तथा रोगियों के प्रति बड़ा भारी अन्याय है। चित्रकूट के जंगल में निर्गुण्डी (सम्हालू) की जड़ में हल्दी रंग का पराश्रयी कन्द होता है। कुष्ठ के सैकड़ों रोगियों पर अनुभूत है। ५-७ रोगी तो इस कन्द से मैंने स्वयं ठीक किये हैं। खदिर के अतिरिक्त शुद्ध तबकिया हरिताल से भी निरोग हुए रोगी मैंने देखे हैं। रसमाणिक्य बहुत लाभ करता है। पंचकर्म करके कुष्ठरोगी की विधिवत् चिकित्सा की जाय तो अवश्य लाभ होता है।

चरक संहिता में नीचे लिखे रोगों को रक्तविकार बतलाया गया है:--

मुखपाक (मुँह में छाले होना), आँख का लाल होना, नाक से बदबू आना, मुख से दुर्गन्ध आना, गुल्म, उपकुश (मसूड़ों में दाह-पाक), विसर्प, रक्तपित्त, प्रमीलक, विद्रधि, रक्तमेह, प्रदर, वातरक्त, विवर्णता, अग्निसाद, पिपासा, शरीर का भारीपन, ज्वर, अत्यधिक दुर्बलता, अरुचि, शिरःशूल, अन्नपान के बाद पेट में दाह (जलन) होना, तिक्त-अम्ल डकारों का आना, थकान (क्लम), अत्यधिक क्रोध, संमोह, मुख का नमकीन रहना, पसीना अधिक आना, शरीर से दुर्गन्ध आना, मद या नशा, कम्प, स्वरक्षय, तन्द्रा, अतिनिद्रा, कई बार आँखों के आगे अँधेरा आना, खुजली, अरुषिका (फुंसियाँ), कोठ (चकत्ते), पिड़का, कुष्ठ, चर्मदल (छाजन-उकौता)। आजकल एलर्जी (allergy) नाम से जो लक्षण-समूह मिलता है उसका समावेश रक्तविकारों में ही किया जाता है।

चरक ने रक्तविकार है कि नहीं इसे जाँचने के लिए एक श्लोक दिया है, जिसके अनुसार जो साध्य विकार शीतोपचार, उष्णोपचार, स्निग्धोपचार, रूक्षोपचार आदि उपचारों से ठीक न हों वे रक्तज विकार होते हैं:

शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैरुपक्रान्ताश्च ये गदाः।
सम्यक् साध्या न सिध्यन्ति रक्तजांस्तान् विभावयेत्॥
— च० सं० सू० स्था० अ० २४

चिकित्सा

समस्त रक्तविकारों की चिकित्सा में रक्तपित्तहर क्रिया, विरेचन (जुलाब), उपवास तथा रक्तमोक्षण करना होता है, इनसे रक्त शुद्ध होता है और रक्तविकार दूर होते हैं।

रक्तशुद्धि के लिए जुलाब प्रधान दवा है; क्योंकि जब आँतों में मल-संचय हो जाता है तब आहारतत्व को चूसने वाली छोटी-छोटी नाड़ियाँ उसी खराब रक्त को चूस कर रक्त के भाग में मिला देती हैं। फलस्वरूप अनेक प्रकार के रक्तविकार उत्पन्न हो जाते हैं। गाजबाँ ६ ग्राम, मुनक्का १० दाने, गुलाब फूल ६ ग्राम, मुलेठी ६ ग्राम, सौंफ की जड़ ६ ग्राम, अफ़्तीमून ३ ग्राम, बेदअंजीर की जड़ की छाल ९ ग्राम, मकोय खुश्क ४ ग्राम—इन्हें आधा सेर पानी में रात को भिगो दें। सुबह आधा पानी जलाएँ और छानकर २३.२ ग्राम गुलकन्द के साथ खाएँ। यह बढ़िया मुन्जिज है। पहले मुन्जिज लेकर मल फुला देना चाहिए। फिर कब्जियत अधिकार में लिखित औषध सेवन करके पेट को एकदम साफ कर देना चाहिए। सात दिन मुन्जिज और सात या तीन दिन जुलाब लेने से प्रायः सभी तरह के रक्तविकार शान्त हो जाते हैं।

सौंफ, गाजबाँ, गुलाब के फूल और मुलेठी—सब मिलाकर २९ ग्राम लें और आधा सेर पानी में डालकर काढ़ा करें। जब २३३ ग्राम शेष रह जाय तब २३.२ ग्राम मिश्री मिलाकर सुबह के समय पीएँ। यह भी मुन्जिज है। खिचड़ी खाएँ। फिर रक्त शुद्धिकारक दवा का सेवन करें तो रोग एकदम निर्मूल हो जायगा।

(१) हरड़, बहेड़ा, आँवला, उशबा, नीम की छाल, कुटकी, मजीठ, गोरखमुण्डी, चोपचीनी और गिलोय—ये दस दवाइयाँ २३३ ग्राम और अनन्तमूल ताजा २ कि.ग्रा., १८.६६ किलो जल में १२ घंटे भिगोकर ५ बोतल अर्क निकाल लें और ५८.३२ ग्राम अर्क सुबह-शाम सेवन करें। यह रक्तशुद्धि के लिए रामबाण है। यह खून की वृद्धि करता एवं आतशक और अशुद्ध पारे के दोष को समूल नष्ट करता है। इसके बराबर सेवन से कोढ़ तक अच्छा हो सकता है। खूब परीक्षित है।

इस अर्क की प्रत्येक बोतल में ६ ग्राम पोटाश आयोडाइड और २८ मि.ली. एक्सट्रैक्ट जमैका सारसापरिला मिलाने से बहुत उत्तम सालसा हो जायगा। इसकी खुराक २९ ग्राम की होनी चाहिए। इसके सेवन से खून खूब बढ़ता है और दुबला-पतला मनुष्य मोटा-ताजा हो जाता है।

(२) पंचतिक्त घृत गुग्गुलु -- नीम की अन्तरछाल, गिलोय, अडूसा पंचांग, पटोलपत्र, कंटकारी की जड़ ५८३.६४ ग्राम लेकर जौकुट करके ३० किलो जल में काढ़ा करें, अष्टमांश ३.७३ किलो जल शेष रहने पर छानकर उसमें २९१.३२ ग्राम शुद्ध गुग्गुलु और ९३३ ग्राम घृत तथा पाठा, वायविडंग, देवदारु, गजपीपल, सज्जीक्षार, यवक्षार, सोंठ, हरिद्रा, सौंफ, चव्य, कूठ, मालकांगनी (तेजोबल), काली मिर्च, इन्द्रजौ, जीरा, चित्रक छाल, कुटकी, शुद्ध भिलावा, वच, पीपलामूल, मजीठ, अतीस, हरड़, बहेड़ा, आँवला, अजवाइन—ये सब २३.२ ग्राम लेकर इन्हें चूर्ण रूप कर जल के साथ कल्क बनाकर उपरोक्त घृत तथा काढ़े में डालकर पका लें। केवल घृत शेष रहने पर उसे छानकर मर्तबान में रख लें।

मात्रा और अनुपान -- ६ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक दूध के साथ। यह रक्तशुद्धि की बहुत अच्छी दवा है। एग्जीमा (विचर्चिका) रोग जो वर्षों तक मनुष्य को भयानक कष्ट देता है, इस घृत के सेवन से पूर्ण लाभ हो जाता है। मैंने अनुभव करके देखा कि अनेक दवा लगाने तथा खाने पर भी जो एग्जीमा ठीक नहीं हुआ, वह इससे निश्चित रूप से और पूर्ण रूप से अच्छा हुआ है।

(३) रसमाणिक्य -- वंशपत्री (तबकिया हरताल) को कुम्हड़े के रस और दही के पानी में सात-सात दिन घोंटें। फिर ऊपर-नीचे अभ्रक का पत्र देकर बेर के पत्तों के कल्क से सन्धिरोध करके सुखाकर अंगार पर तपाएँ। लाल-सुर्ख रंग होते ही तैयार हुआ समझें। इसे २४३ मि.ग्रा. की मात्रा में घी और शहद के साथ चाटें। इससे भयानक रक्तविकार शान्त होता है। शास्त्र के लेखानुसार गलित कुष्ठ भी इसके सेवन से अच्छा हो जाता है। यह वातरक्त की परीक्षित दवा है।

(४) मरिचादि तैल -- कड़वा तेल (सरसों का तेल) ३.७३ किलो, गोमूत्र १५ किलो, मरिच, तबकिया हरताल, मैनसिल, नागरमोथा, आक का दूध, कनेर की जड़, निशोथ, गोबर का रस, इन्द्रायण-मूल, कूठ, दारूहल्दी, हल्दी, देवदारु, लालचन्दन—इन १४ दवाओं के प्रत्येक ९२.८ ग्राम एवं तेलिया-मीठा विष ११६.६४ ग्राम—इन दवाओं का कल्क बना लें और तेल पाक विधि से तेल तैयार करें। इसका नाम मरिचादि तैल है। यह खाज, खुजली, कोढ़ आदि रक्तविकार में लाभ करता है।

(५) तुवरक तेल (लैटिन नाम: Hydnocarpus wightiana) -- भारतवर्ष के पश्चिमी समुद्र के किनारे जंगल में चालमोगरा के वृक्ष होते हैं। बरसात के आरम्भ में इसके फल पकते हैं, उस समय इनको लाकर उनके अन्दर का मगज निकालकर सुखा लें और कोल्हू में पेरकर तेल निकाल लें अथवा चूर्ण कर जल में पकावें। जब तेल ऊपर आ जाय तब उसे ऊपर-ऊपर से युक्तिपूर्वक निकालकर दूसरी कड़ाही में पकाएँ। पानी जल जाने पर छान लें।

सेवन विधि -- सवेरे-शाम यह तैल ५ बूँद से आरम्भ कर प्रति चौथे दिन ५ बूँद की मात्रा बढ़ाकर ६० बूँद तक गाय के ताजे मक्खन या मलाई में मिलाकर दें। रोगी जितनी मात्रा सहन कर सके, उतनी बढ़ाते जाएँ। जब मात्रा बर्दाश्त नहीं होती, तब जी मिचलाने लगता है और उल्टी हो जाती है। जब ऐसा लगे तब तेल की मात्रा घटा दें। अधिक से अधिक रोगी जितनी मात्रा में सहन कर सके उतनी ही बढ़ाएँ। इसको छः महीना या जब तक रोग आराम न हो, देते रहें। यह तैल खाने और लगाने दोनों काम में आता है। इसकी मालिश से चमड़े पर जलन मालूम हो, तो इसको मक्खन या नीम के तेल में मिलाकर मालिश करनी चाहिए।

पथ्यापथ्य -- यदि रोगी केवल दूध, मौसमी, मीठा नीबू, अनार, सेब, केला, मीठा अंगूर आदि मीठे फल खाकर इसका प्रयोग करे, तो विशेष और शीघ्र लाभ होता है। यदि इस पथ्य पर न रह सके तो पुराने चावल का भात, जौ, गेहूँ की रोटी, थोड़ा घी लगाकर दूध के साथ खाने को दें। खट्टे, नमक वाले तथा कड़वे पदार्थ नहीं खाने चाहिए।

गुण -- सब प्रकार के रक्तविकार, कुष्ठ, महाकुष्ठ, दाद, खाज, खुजली, व्रण, वातरक्त, कण्ठमाला आदि रोगों में खाने और लगाने से खूब लाभ होता है। इस तेल में कपड़े को भिगोकर व्रण पर रखने से व्रण शीघ्र भर जाता है। रक्तशोधन के लिए इसका प्रयोग अति उत्तम है। केवल दो भाग यह तेल, एक भाग बाकुची तैल, एक भाग चन्दन का तैल मिलाकर लगाने से खाज, खुजली, एक्जिमा और सफेद कुष्ठ आदि चर्मरोग में अच्छा फायदा होता है।

(६) गन्धक रसायन -- गाय के दूध से तीन बार शुद्ध किये हुए गन्धक (आँवलासार) को पीसकर उसमें चातुर्जात (दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर समान भाग मिलाकर), गिलोय, हरड़, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, भृंगराज—इन सबके स्वरस या क्वाथ में पृथक्-पृथक् आठ बार भावना दें, फिर सुखाकर चूर्ण कर लें। जितना यह चूर्ण हो उतना ही मिश्री का चूर्ण इसमें मिलाकर रख लें। वमन और विरेचन से देह शुद्धि करके सुबह-शाम डेढ़ ग्राम की मात्रा में ठंडे जल के साथ इसे सेवन करने से धातुक्षय, प्रमेह, अग्निमान्द्य, शूल, कोष्ठगत रोग, अठारह प्रकार के कुष्ठ रोग में बड़ा अच्छा लाभ होता है। इसके सेवन काल में नमकीन और खट्टे पदार्थ, शाक, दालें इनको नहीं खाना चाहिए तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। रक्तशुद्धि के लिये यह प्रसिद्ध एवं सुपरीक्षित योग है।

-- आयु० प्र०

वक्तव्य -- आयु० प्र० में इसकी मात्रा १ कर्ष अर्थात् ११.६६ ग्राम की लिखी है, किन्तु वर्तमान समय के अल्पबल वाले मनुष्यों के लिये सुबह-शाम डेढ़ ग्राम की मात्रा में सेवन करना ही पर्याप्त है।

(७) सारिवादि हिम -- अनन्तमूल, उशबा, चोपचीनी, मजीठ, गिलोय, धमासा, लालचन्दन, गुलबनफ़्शा, खस, गोरखमुण्डी, शाहतरा, कमल के फूल, गुलाब के फूल, गूमा, पद्माख, शंखाहुली—प्रत्येक समभाग ले, सबको मिलाकर मोटा-मोटा चूर्ण करके रख लें। इसमें से ११.६६ ग्राम चूर्ण को रात में ७० ग्राम गरम जल में मिट्टी के या काँच के पात्र में भिगोकर ढक कर रख दें। सबेरे हाथ से मसलकर कपड़े से छानकर रोगी को पिलाएँ। फिर उसी हिम के छाने हुए फोक में ५८.३२ ग्राम गरम जल डालकर रख दें। शाम को हाथ से मसलकर कपड़े से छानकर पिलाएँ। दूसरे दिन फिर नया चूर्ण लेकर इसी प्रकार बनाकर सुबह-शाम पिलाएँ। रोग शान्त होने तक प्रयोग करना चाहिए।

सब प्रकार के रक्तविकार, कण्डू, पामा, हाथ-पाँव की जलन, अम्लपित्त, जीर्णज्वर, पित्त और रक्तदुष्टि प्रधान रोगों में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक है। रसरक्तादि विकृत धातुओं और पित्त का शोधन कर यह शरीर को नीरोग बना देता है। यह सुपरीक्षित योग है।

(८) सारिवाद्यासव -- श्यामलता, नागरमोथा, लोध, वट की छाल, पीपल की छाल, कचूर, अनन्तमूल, पद्माख, नेत्रवाला, पाठा, आँवला, गिलोय, खस, सफेद चन्दन, अजवायन, कुटकी, तेजपत्ता, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, कूठ, स्वर्णपत्री (सनाय), बड़ी हरड़—इन २३ दवाओं में प्रत्येक का चूर्ण २३३ ग्राम, जल ३० किलो, गुड़ १७.५ किलो (३ तुला), धाय के फूल ५८३.०६४ ग्राम, मुनक्का ३.२७ किलो—इन सब चीजों को मिट्टी के बड़े बर्तन में बन्द करके एक महीना रखें और इसे बाद में छानकर बोतल में भर लें। इसका नाम 'सारिवाद्यासव' है। मात्रा—२९ से ५८.३२ ग्राम तक है। इसके सेवन से सब तरह के रक्तविकार (खून की खराबी), पारे का दोष, आतशक (गर्मी) का विष आदि नष्ट होते हैं। यह रक्तशुद्धि और रक्तवृद्धि करता है।

-- भै० र०

पथ्यापथ्य

खुजली की तरह पालन करना चाहिए।