आरोग्य-प्रकाशहृद्रोग (छाती का दर्द)

हृद्रोग (छाती का दर्द)

6 मिनट का पाठ

शरीर के बाएँ भाग में स्तन के पास हृदय (दिल) का स्थान है। सावधानी से उस जगह हाथ रखने से हृदय धड़कता हुआ मालूम होता है। हृदय निरन्तर खुलता और बन्द होता रहता है। हृदय रक्त-संचालक यन्त्र है। हाथ की नाड़ी का हृदय से सीधा सम्बन्ध है। इसका आकार बहुत कुछ शरीफे जैसा है। अंगूठा बाहर रखकर हाथ की मुट्ठी बाँधने पर ठीक हृदय का आकार बन जाता है। इसी हृदयपिण्ड में रोग होने से छाती में दर्द और दिल का सर्वदा धुक-धुक करना होता है। यद्यपि छाती में और-और बीमारी के कारण या चोट के कारण भी दर्द उत्पन्न हो जाता है; परन्तु इसके लक्षण भिन्न हैं। थोड़ा परिश्रम करने से ही हृदय का धुक-धुक करना, बायीं पसली और हाथ में दर्द का होना, पसीना आना, मन चंचल, मृत्यु-भय, मूर्च्छा होने के लक्षण, निद्रा की कमी, पसली और छाती में दर्द तथा नाड़ी की गति तेज होना हृद्रोग के लक्षण हैं।

अधिक कसरत, भय, शोक, अत्यन्त गर्मी आदि कारणों से हृद्रोग उत्पन्न हो जाता है। हृदय की गति बन्द होने के कारण तत्काल मृत्यु हो जाती है, जिसको 'हार्टफेल' होना कहते हैं। बाज़-बाज़ समय हृद्शूल के कारण भी तत्क्षण मृत्यु हो जाती है।

चिकित्सा

हृद्रोगी को ज़रा भी परिश्रम न करने दें। यदि हृदय की दुर्बलता बहुत अधिक हो, तो बिस्तरे पर ही रखें। टट्टी-पेशाब भी बिस्तरे पर ही करने का बन्दोबस्त करें, नहीं तो रोगी की तत्काल मृत्यु हो जायगी। हृद्रोगी को सीढ़ियाँ चढ़ना और दौड़ना सख्त मना है। नीचे लिखी दवाइयाँ सेवन कराकर रोगी का हृदय मजबूत करें, फिर भय नहीं।

(१) मकरध्वज १२१.५० मि.ग्रा., स्वर्ण भस्म ३०.३ मि.ग्रा., मोती-पिष्टी १२१.५० मि.ग्रा. और कपूर ६१ मि.ग्रा. मिलाकर दिन-रात में दो बार रोगी को चटाएँ। यह हृदय के रोगों को ताकत पहुँचाने में उत्तम दवा है।

(२) मोतियों को गुलाबजल के साथ घोंटकर मोती-पिष्टी बना लें। यह मोती-पिष्टी हृदय को अच्छी ताकत पहुँचाती है। सीप की पिष्टी भी मोती से ज़रा ही कम गुण करती है।

(३) हृदय रोग से होने वाले छाती के दर्द में बारहसिंगा या हरिण के सींग की भस्म शहद के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है।

(४) २३३ ग्राम दूध में २३३ ग्राम पानी मिलाकर ११.६६ ग्राम अर्जुन की छाल डाल दें। औंटाने से जब दूधमात्र शेष रह जाय, तब छानकर मिश्री मिलाकर पिलाएँ। यह हृद्रोग में लाभकारी है।

(५) अर्जुन घृत और च्यवनप्राश का सेवन भी गुणकारी है।

(६) अर्जुनारिष्ट -- अर्जुन की छाल ५.८३ किलो, मुनक्का २.९२ किलो, महुए का फूल १.१७ किलो -- इन सबको कूटकर ६० किलो जल में क्वाथ करें और चतुर्थांश शेष रहने पर छान लें। इस क्वाथ को एक घड़े में भरकर १.१७ किलो धाय के फूल और ५.८३ किलो गुड़ मिलाकर मुँह बन्द कर दें और एक महीने तक पड़ा रहने दें। बाद में छानकर इसे बोतल में भर लें। यह 'अर्जुनारिष्ट' हृदय रोग में बहुत अधिक लाभदायक है। -- भै० र०

(७) खमीरा गावजवान (अम्बरी) -- गुलाब के फूल, श्वेत चन्दन, बालछड़ (जटामांसी), उस्तखुददूस, आबरेशम, नीलोफर, छरीला प्रत्येक ११.६६ ग्राम, बादरंजबूया १७.५० ग्राम, गावजवान के फूल ९३ ग्राम -- इन सब द्रव्यों को ४६७ ग्राम गुलाब अर्क (गुलाबजल) में रात को भिगो दें और प्रातः मन्द आँच पर पकाएँ। जब एक-तृतीयांश द्रव शेष रहे तब नीचे उतार शीतल होने पर हाथ से मसलकर कपड़े से छान लें। पश्चात् उसमें चीनी ५८३.६४ ग्राम डालकर मन्द अग्नि पर अवलेह जैसा पकाएँ। जब अवलेह शीतल हो जाय तब उसमें कपूर १.५ ग्राम, अम्बर १.५ ग्राम, केशर ३ ग्राम -- इन सबको गुलाबजल में पीसकर मिला दें और लकड़ी के घोटने (कलछे) से इतना घोटें कि अवलेह की चाशनी सफेद मायल (श्वेताभ) हो जाय। पश्चात् काँच की बरनी में भरकर रख लें। -- सि० यो० सं०

मात्रा और अनुपान -- ३ से ६ ग्राम तक आवश्यकतानुसार दिन में २-३ बार चाटकर अनुपान में गो-दुग्ध पिएँ।

गुण और उपयोग -- यह खमीरा हृदय, मस्तिष्क और पाचक-संस्थान को बल देता है। हृदय रोग, मस्तिष्क की कमजोरी, भ्रम-रोग, अनिद्रा आदि में उत्तम गुणकारी है।

(८) खमीरा गावजवान (सादा) -- गावजवान का पत्ता ४०.७६ ग्राम, गावजवान का फूल, छिली हुई शुष्क धनिया (कश्नीज खुश्क मुकश्शर), सफेद बहमन, बहमन लाल, श्वेत चन्दन, आबरेशम कतरा हुआ, बालंगू बीज, फरंजमुश्क (राम तुलसी के बीज), बिल्ली लोटन (बादरंजबूया) प्रत्येक ११.६६ ग्राम लेकर इनको रात को १.८३ किलो जल में भिगोकर प्रातः क्वाथ करें। जब तृतीयांश जल शेष रहे तब उतारकर ठंडा होने पर मसल छानकर ९३३ ग्राम चीनी और २३३ ग्राम मधु मिलाकर चार तार की चाशनी बनाकर लकड़ी के डंडे से घोंटकर ठंडी होने पर बरनी में भरकर रख लें। -- यू० सि० यो० सं०

मात्रा और अनुपान -- इस खमीरे में से ११.६६ ग्राम लेकर उसमें चाँदी का वर्क १ नग मिलाकर खाकर ऊपर से १४० ग्राम अर्क गावजवान या ताजा जल पिएँ।

गुण और उपयोग -- यह खमीरा दिल और दिमाग को पुष्ट बनाता है। दृष्टि को लाभ पहुँचाता है और वहशत (घबराहट/बेचैनी) को नष्ट करता है।

(९) नागार्जुनाभ्र रस -- वज्राभ्रक भस्म सहस्रपुटी को अर्जुन वृक्ष की छाल के स्वरस या क्वाथ से ७ दिन तक घोंटकर १२१.५० मि.ग्रा. परिमाण की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखाकर रख लें। यह हृद्रोग और अम्लपित्त में विशेष गुणकारी है। -- भै० र०

मात्रा और अनुपान -- एक-एक गोली सुबह-शाम मधु में मिलाकर चाटें, पश्चात् अर्जुन छाल ३ ग्राम को जौकुट कर ११६.६४ ग्राम दूध व ११६.६४ ग्राम जल में पकाकर दूधमात्र शेष रहने पर छानकर पिएँ।

(१०) प्रभाकर वटी -- स्वर्णमाक्षिक भस्म, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, वंशलोचन, शुद्ध शिलाजीत -- इन सबको समान भाग लेकर खरल में डालकर अर्जुन छाल के क्वाथ से भावना देकर घोंटकर ३६४.५० मि.ग्रा. परिमाण की गोलियाँ बनाकर, सुखाकर रख लें। सब प्रकार के हृदय रोगों में उत्तम लाभदायक है।

मात्रा और अनुपान -- एक-एक गोली सुबह-शाम मधु में मिलाकर चाटना चाहिए अथवा अर्जुन छाल क्वाथ के साथ लेना चाहिए।

(११) असली मोती को गुलाबजल में घोंटकर १२१.५० मि.ग्रा. मात्रा में लेने से बहुत लाभ होता है तथा जवाहिर मोहरा भी स्थायी लाभ करता है।

पथ्यापथ्य

हृदय रोग में हलका सुपाच्य भोजन देना चाहिए। घी के स्थान पर तैल का प्रयोग आजकल बहुत होता है। परिश्रम बन्द, आराम अधिक तथा वातशामक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।