आरोग्य-प्रकाशआकस्मिक घटनाएँ और प्राथमिक उपचार

आकस्मिक घटनाएँ और प्राथमिक उपचार

17 मिनट का पाठ

जीवन में अकस्मात ही कभी-कभी ऐसी घटनायें हो जाया करती हैं, जिनसे शरीर को आघात पहुँचता है । अधिकांश आकस्मिक घटनायें मनुष्यों की जल्द-बाजी और सावधान न रहने की आदत के कारण होती है ।

आकस्मिक घटनाओं से होने वाले अपघातों (एक्सीडेन्ट) में कर्तव्याकर्तव्य का ज्ञान न होने से, मनुष्य घबराहट में कोई ऐसा काम कर जाते, जिसका अनिष्टकर परिणाम हों। सभी अस्पतालों में तत्काल प्राथमिक उपचार ( फर्स्टएड) बड़ा हितकारी होता है । अपघात में तत्काल प्राथमिक उपचार न होने से, जब तक वैद्य डाक्टर आता है या रोगी को अस्पताल पहुंचाया जाता है, तब तब प्रायः रोगी मृत्यु के मुख में पड़ जाता है । अतएव हम यहाँ कुछ मुख्य आकस्मिक अपघातों के तत्काल उपचार का विवरण दे रहे हैं ।

चोट आना

चोट बहुत कारणों से लगती है । सड़कों पर सावधानी पूर्वक इधर-उधर देखकर न चलने से, तांगा, ठेला, गाड़ी, मोटर, ट्रक आदि किसी भी वाहन से टकराने से, कहीं ठोकर लगने से, खेलों में कूद-फांद से, ऊँचाई से गिरने से अथवा मार-पीट या अन्य किसी तरह वदन पर किसी चीज का आघात लगने से-- इस प्रकार कई तरह से चोट लगती है ।

कोई चोट ऐसी लगती है जिसमें खून निकलता है, और कोई ऐसी जिसमें खून तो नहीं निकलता, परन्तु भीतरी हड्डी टूट जाती है अथवा नसें या छोटी-छोटी रक्त वाहिनी शिरायें फट जाती हैं । इसी कारण बन्द चोट लगने पर आहत स्थान का रक्त भीतर ही जमता जाता है और वह स्थान नीला या काला-सा दीखने लगता है ।

जब कोई खून बहने वालीं चोट लगे तो सबसे पहले रक्त का बहना बन्द करना चाहिए, ताकि अधिक रक्त निकलने से आहत व्यक्ति अशक्त न हो जावें । तत्काल ठंडे पानी में भिगे साफ कपड़े की पट्टी बाँधने से, या चोट पर बर्फ का टुकड़ा रख देने से रक्त का बहना कम हो जाता है ।

यदि हड्डी टूट गई हो तो चोट के स्थान पर यथास्थिति में ही तत्काल कपड़े की पट्टी खूब कसकर बांध देनी चाहिए । हड्डी टूटी हैं या नहीं, इसकी सामान्य पहचान यह है कि आघात स्थल पर तुरन्त असह्य पीड़ा होती है । बहुत लोग हड्डी टूट जाने पर स्थानीय नाई या मालिश वाले अनाड़ी लोगों से खींच-तान कराते हैं । ऐसा करना बहुत हानिकर हैं । इसलिए हड्डी टूटने पर अस्पताल में ही दिखाना चाहिए ।

चोट से खून निकलने पर तत्काल प्राथमिक उपचार करके यथाशीघ्र घायल को अस्पताल ले जाकर बेंडेज करा लेनी चाहिए ; और हड्डी टूटने पर तत्काल तो कपड़े का बन्दन काफी है फिर यथाशीघ्र, यदि हड्डी टूटना संदिग्ध हो तो घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाकर एक्स-रे परीक्षा करा लेनी चाहिए और टूटी हड्डी पर प्लास्टर चढ़वा देना चाहिए ।

बच्चों को खेल कूद में बहुत चोटें लगती है । कभी खून निकलता है; कभी बन्द चोट लगती है । कभी-कभी कोई कोल या नुकीला कंकड़ ही पैरों में धस जाता है । लोहे की कील में यदि थोड़ी-सी भी जंग लगी हो तो उसका घाव सेप्टिक होकर पक जाने का तथा टिटेनस (धनुर्वात) का बड़ा भय रहता है । साधारण खरोंच या अन्य चोट के घावों में धूल पड़ने से पकने का डर रहता है । ऐसी दशा में घायल को एन्टी टिटेनस का इन्जेक्शन लगवा देना चाहिए, जिससे चोट या कील के घाव के पक जाने का अन्देशा न रहे । खरोंच या कील लगने पर तत्काल ही टिचर आयोडीन या स्प्रिंट-पेट्रोल या नर मूत्र लगा देने से सेप्टिक होने का डर कम रहता है ।

किसी अंग के भारी चीज से कुचल जाने या अन्य प्रकार से बन्द चोट लगने पर जब कि खून न निकला हो और चोट की जगह भीतर ही खून जम गया हो तो आहत स्थान पर कुछ देर बर्फ रखने से या शीतल जल की पट्टी बांध देने से भावी अनिष्ट की आशंका नहीं रहती ।

बन्द चोटों और हाथ-पैरों में मोच आ जाने पर कुछ समय बाद मालिश और सेक करना बहुत उपयोगी हैं । इन दोनों क्रियाओं से पीड़ा (दर्द) में तो तत्काल शान्ति होती है । चोट में टूटे स्नायुओं से जमा खून को पिघला कर यथावत् बनाने और मोच में अस्त व्यस्त हुए स्नायुओं को सुधारने में मालिश और सेक के प्रयोग बड़े हितकारक होते हैं ।

बन्द चोट-मोच में प्याज, आमा हल्दी, और थोड़ा-सा नमक, तिल-या खली इन सब को कुचल कर तिल्ली के तेल में गर्म कर उनकी पोटली से सेक करना और आहत स्थान पर उनको ही बांधना बहुत लाभकर होता है ।

आग से जलना

स्टोव, गैसबत्ती या चूल्हा आदि जलाते समय अक्सर असावधानी से, पहने हुए कपड़ों में आग लग जाती है । विशेषकर नगरों में आजकल महिलायें जो नायलन के कपड़े पहनती हैं, उनमें बड़ी जल्द आग लगती है । नायलन के कपड़े आग पकड़ते ही बदन से चिपकने लगते हैं । चौका-चूल्हा का काम करने वाली स्त्रियों के अलावा बच्चों को भी आग लग जाती है । घरों में बच्चे प्रायः आग का खेल किया करते हैं । बहुत बीड़ी-सिगरेट पीने के अभ्यासियों को भी, रात में सोते-सोते बीड़ी पीने के कारण कई बार आग लगते देखा गया है ।

पहने हुए कपड़ों में आग लगते ही तत्काल कपड़ों को चाकू, छुरी या ब्लेड से चीर कर देह से अलग कर देना चाहिए । आग बुझाने का सबसे अच्छा सा लिहाफ, तरीका यह है कि जिसको आग लगी हो, उसके ऊपर बड़ा-कम्बल, मोटा चद्दर या त्रिपाल डालकर चारों तरफ से इस तरह ढक दें कि तत्काल हवा एकदम बन्द हो जावे हवा बन्द होते ही आग एकदम बुझ जाती है और अग्नि पीड़ित व्यक्ति अनिष्ट से बच जाता है । वस्तुत: आग में जलने की शक्ति हवा से ही तो आती है । यदि कतई हवा बन्द हो तो आग एक क्षण भी नहीं जल सकती । इसलिए अग्निपीड़ित के जलते हुए कपड़ों की आग बुझाने के लिए उसको ढक कर हवा रोकना हितकर है ।

आग लगते ही उस पर रेत या मिट्टी डालने से भी आग बुझ जाती है । जिस व्यक्ति के कपड़ों में आग लग जाय तो हड़बड़ाहट में उस पर जल्दी से पानी नहीं डालना चाहिए अत्यधिक आग पकड़ने पर ही पानी डालना उचित है क्योंकि पानी डालने से आग तो बुझ जाती है, परन्तु जले हुए अंगों पर किरोमिन (मिट्टी का तेल) छिड़कने से और उससे भीगे कपड़े को लपेट दें और फिर उसको किरोसिन तेल से भिगोता रहे या पानी गिरने से अनिष्ट की सम्भावना होती है । फफोले पड़कर कष्टदायक जख्म हो जाते हैं ।

आग लगी हो वह व्यक्ति आग लगते ही तुरन्त भूमि पर लेट कर धूल में गुलाटें ( जल्दी-जल्दी करवटें ) ले ले तो भी कपड़ों में लगी आग बुझ जाती है ।

जले हुए स्थान पर नारियल के तेल में चूने का पानी मिला कर शीघ्र लगा देना चाहिए और हवा से बचने के लिए दग्ध अंगों को रुई से ढक देना चाहिए जिससे फफोले पैदा होने का डर न रहे । अलसी शहद या घी- कुवांर का रस लगाने से भी उत्तम फल होता है । जले घावों पर टॅनिक एसिड को ग्लीसरिन में मिलाकर लगाने से घाव शीघ्र अच्छे होते हैं । अधिक जल गया हो तो यथा-शीघ्र दग्ध व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाना चाहिए ।

आग लगने से बचाव के लिए विशेषकर गर्मी की ऋतु में बहुत सावधान रहना चाहिए । स्टोव आदि जलाते समय कपड़ों को समेट कर काम करना चाहिए । यदि कहीं मकान में आग लग जावे तो बिना पूर्ण सुरक्षा प्रबन्ध के कदापि लपटों में नहीं जाना चाहिए ।

जल में डबना

पानी में डूबने से मनुष्य के पेट में पानी भर जाता है और श्वास रुक जाती है । ऐसी स्थिति में सबसे पहले, जल से निकाले व्यक्ति को पैर पकड़ कर उलटा करके मुख से भीतरी पानी और लार निकाल देना चाहिए । औंधा लिटा-कर पेट का भाग मल-मल कर दबाने से भी पेट में भरा पानी बाहर निकल आता है ।

पेट का पानी शीघ्रतापूर्वक निकाल कर जल्दी ही रुकी हुई सांस को फिर से चलाने का यत्न करना चाहिए । नाक में तेज सुँघनी सुघाना और स्मेलिंग साल्ट या गोल मिर्च का चूर्ण कागज की नली में भरकर नाक में फूंक देने से रुकी सांस चलने में सहायता मिलती है । चूना में नौसादर मिलाकर सुंघाने से भी तीव्र नस्य लगता है । इससे भी श्वास-प्रश्वास न आवे तो रोगी को चित्त लिटाकर पीठ के नीचे तकिया आदि लगाकर छाती का भाग ऊँचा करें फिर कुहनी और कलाई के बीच के भाग को पकड़ कर दोनों हाथ झटके से ऊपर उठावें, फिर दोनों हाथों को छाती पर धीरे-धीरे दृढ़ रूप से दबायें । इस प्रकार की क्रिया एक मिनट में अठारह बार के हिसाब से करें या फेफड़ा दो भागों में विभक्त है; डूबे हुए व्यक्ति को चित लिटाकर हाथ की हथेली से क्रमश: एक-एक फेफड़ा को छोड़ने और दबाने से भी श्वास चलने लगता है । यह कृत्रिम श्वास-संचालन क्रिया है और इससे रोगी का श्वास-प्रश्वास पुनः जारी होना संभव है । श्वास-प्रश्वास चलने लगे तब रोगी को पानी में मिलाकर थोड़ी ब्राण्डी या अन्य उत्तम मद्य पिलाने से हृदय को उत्तेजना मिलती है और रोगी को शक्ति मालूम होती है । रोगी आराम से सो जावे, ऐसा यत्न करना चाहिए । फिर आवश्यकता हो तो किसी योग्य चिकित्सक को दिखा लेना चाहिए ।

जल में डूबे हुए का यह प्राथमिक उपचार भी तब सार्थक होता है जबकि जल में डूबे व्यक्ति को बाहर निकालने पर उसका शरीर गर्म और हाथ-पैर शिथिल न हो गये हों ।

डूबते हुए व्यक्ति को जल से निकालने का काम भी बड़ी सतर्कतापूर्वक करना चाहिए । स्वयं हाथ से पकड़ने या डूबते व्यक्ति को गोदी में भरने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए । कभी-कभी डूबता हुआ व्यक्ति घबराहट में बचाने वाले को भी इस तरह जकड़ लेता है कि बचाने वाला भी डूब जाता है इसलिए या तो डूबते हुए व्यक्ति को फेंक कर रस्सी या कपड़ा पकड़ाकर खींच लेना चाहिए या फिर ठेल कर उसे किनारे लाना चाहिए । डूबते हुए व्यक्ति से सट कर उपक्रम नहीं करना चाहिए । उसमें स्वयं डूब जाने का खतरा रहता है।

श्वास-प्रश्वास का रुकना, पानी में डूबने के अतिरिक्त गले में फांसी लगाने या अन्य प्रकार से गला भिचने के कारण भी होता है । वैसी स्थिति में पुनः श्वास-प्रश्वास-संचालन करने के लिए उपरोक्त प्रकार से कृत्रिम श्वास किया लाने का उपक्रम करना चाहिए । हर दशा में रोगी के आस-पास लोगों की भीड़ इकठ्ठा न हो, इसका ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उससे रोगी को पर्याप्त शुद्ध वायु मिलने में बाधा पड़ जाती है ।

कोट-दंश

बहुधा वरें (ततइया) हड्डा, बिच्छू आदि के डंक मारने की आकस्मिक घटनायें होती हैं, जिनमें तत्काल प्राथमिक उपचार न होने से कष्ट होता है । जब कोई ऐसा कीड़ा काटे तो सबसे पहला काम यह करना चाहिए कि दंश स्थान को सुई, चाकू या सूआ (सूजा) से कुरेद कर डंक बाहर निकालें । फिर उस पर तम्बाखू या प्याज कुचल कर बाँध दें । असली अर्क कपूर या थोड़ा-सा कार्बोलिक एसिड लगा देने से शीघ्र लाभ होता है, परन्तु कार्बोलिक एसिड बहुत सावधानी से लगाना चाहिए, क्योंकि अधिक लग जाने से फफोले पड़ जाने की संभावना रहती है ।

बिच्छू के डंक स्थान पर डंक निकालने के बाद तारपीन का तेल या पत्थर का कोयला घिस कर लगाने से भी काफी लाभ होता है । बिच्छू के दंशस्थान से जहाँ तक वेदना का अनुभव होता हो उस स्थान बांधकर ताजा पानी की धारा डालते रहें और गुड़ का शरबत पिला दें ।

कान खजूरे के काटने पर गूलर के पत्ते पीसकर लगाने से लाभ होता है । पागल कुत्ता या स्यार काट ले तो शीघ्र ही चेष्टापूर्वक उपचार और चिकित्सा करानी चाहिए । सबसे पहले यह पता लगा लेना चाहिए कि काटने वाला कुत्ता पागल तो नहीं है । पागल कुत्ते के काटने से कुछ दिनों बाद शरीर में भीषण जहर फैलता है । इसलिए कुत्ते के काटे क्षतों (घावों) को तत्काल ही टिचर, स्प्रिंट या पेट्रोल से धो डालना चाहिए । और अस्पताल जाकर इन्जेक्शन लगवा लेना चाहिए ।

पागल कुत्ते के काटने से उत्पन्न रोग संक्रामक होता है । यदि कुत्ता-दंश से दूषित व्यक्ति किसी दूसरे स्वस्थ व्यक्ति को काट ले या नोंच ले तो उसमें भी वैसे ही रोग का संक्रमण हो जाता है । उसके शरीर में भी जहर फैल जाता है ।

साँप का काटना

कीट - देशों में साँप का काटना सर्वाधिक घातक होता है । साँप काटने से भारत में प्रतिवर्ष काफी संख्या में लोग मरते हैं । इस विषय में विशेष ध्यान देने की बात यह है कि सभी सर्प विषैले नहीं होते हैं और सभी साँपों के काटने से मृत्यु नहीं होती ।

फिर भी साँप के काटे का ऐसा आतंक मनुष्य के मन पर बैठा हुआ है कि बहुत से साँप काटे मनुष्य डर के मारे ही बेहोश हो जाया करते हैं और दिल कमजोर होने से मर तक जाते हैं ।

साँप स्वभाव से बहुत डरपोक जन्तु है । वह अपने आप कभी मनुष्य पर आक्रमण नहीं करता । जब मनुष्य उस पर प्रहार करता है, या मनुष्य के पैर से कुचल जाता है, तब वह अवश्य ही काटता है ।

काटे हुए स्थान से खून बहना, जलन और पीड़ा होना, सूजन आजाना, शून्यता होना और दंश स्थान पर हरा नीलापन आ जाना -- ये लक्षण जहरीले साँप के काटने पर होते हैं ।

साँप काटे पर सबसे प्राथमिक उपचार यह है कि अति शीघ्रता पूर्वक दंश स्थान से चार-छं अंगुल ऊपर खूब कड़ा बंधन बांध कर रक्त का संचालन रोक देना चाहिए । बंधन यदि रबर का हो तो सबसे अच्छा, अन्यथा रस्सी या कपड़ा जो भी तत्काल मिल जावे, उससे ही बंधन बांध देना चाहिए । ऐसा करने से सांप का जहर खून से मिलकर सारे शरीर में नहीं फैल पाता । काटने के बाद जल्दी से जल्दी एक-दो मिनट के भीतर बंधन अवश्य बंध जाना चाहिए ।

बाँधने के बाद काटे हुए स्थान को स्प्रिट, पेट्रोल, तारपीन का तेल या शुद्ध जल से खूब धोकर दंश स्थान पर दो इंच लम्बा और आधा इंच गहरा चीरा लगाना चाहिये । चीरते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कोई नाड़ी या धमनी (नस) न कट जावे । दंश स्थान को चीर कर अंगूठों से खब दबा-दवा कर दंश स्थान का रक्त निकालना चाहिए । इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य सांप का जहर बाहर निकालना है ।

तूंबी, नली या मुख से चूस कर भी दंश स्थान से जहर निकाला जा सकता है । मुंह से चूस कर जहर को तुरन्त ही थूकते जाना चाहिए । जो व्यक्ति मुँह से जहर चसे उसके मुंह में भीतर किसी तरह का छाला या घाव नहीं होना चाहिए, अन्यथा जहर का प्रभाव चूसने वाले पर भी तत्काल हो जायेगा छोटी कटोरी या कांच के छोटे गिलास में स्प्रिट जलाकर उसको दंश स्थान पर औंधा रखने से भी जहर बाहर आता है ।

जहर निकाल कर सांप काटे व्यक्ति को, नीम की पत्ती खिलाने से यदि उसका स्वाद कड़वा लगे तो समझना चाहिए कि जहर निकल गया और उसका प्रभाव शरीर में अन्यत्र नहीं पड़ा है ।

विष-मोक्षण की उपरोक्त क्रिया के अनन्तर चीरे हुए स्थान पर पोटाशियम परमेगनेट (पिनकी अर्थात् पानी में डालने की लाल दवा) के दाने खूब मलना चाहिये । पिचकारी या किसी अन्य साधन से पिनकी का घोल दंश स्थान में आधा इंच गहराई तक खूब भरना चाहिए ।

रोगी को सोने नहीं देना चाहिए और पूर्ण स्वस्थ न होने तक अन्न न खिलाकर केवल दूध में घी मिलाकर पिलाना चाहिए । रोगी को बहलाना चाहिए और भरपूर यह विश्वास दिलाना चाहिए कि उसका कोई अनिष्ट नहीं होगा और वह शीघ्र अच्छा हो जायगा जिससे डर या घबराहट के मारे उसका दिल न बैठने पावे ।

यथाशीघ्र जहर चूसने का प्राथमिक उपचार करके रोगी को अस्पताल अथवा सुयोग्य चिकित्सक के पास पहुँचाकर चिकित्सा करनी चाहिए ।

विष-भक्षण

कभी भूल से या जान बूझ कर अफीम, शृंगीविष, कुचला, संखिया, धतूरा आदि जहर अथवा अन्य विषैली चीज खाने से मनुष्य का जीवन खतरे में पड़ जाता है । जव ऐसी घटना हो तो प्राथमिक उपचार हेतु तत्काल रोगी को वमन विरेचन (उल्टी-दस्त ) कराना चाहिए जिससे खाया हुआ जहर, रक्त में मिलने के पहले ही पेट के बाहर निकल आवे । आधा सेर पानी में एक छटांक नमक डाल कर रोगी को पिला देने से निश्चित रूप से कय ( उल्टी) हो जाती है । एक बार नमक पानी पिलाने से उल्टी न हो तो दुबारा पिलाना चाहिये जब तक रोगी को डाक्टरी सहायता न मिले तब तक शीघ्रतापूर्वक यदि कै-दस्त कराके रोगी का जहर निकालने का प्रयास कर लिया जाय तो से

मृत्यु बचना संभव हो जाता है ।

अंशुघात ( लू लगना)

प्राथमिक अपघातों (एक्सीडेन्टों) में लू लगना सबसे प्रमुख और मृत्युकारक है । तेज गर्मी के दिनों में लू लगने से बहुत मौतें होती हैं ।

तीव्र धूप में जबकि गर्म हवायें चलती हैं, तब खुले सर, उघारे बदन, नंगे पैर, बिना छाता के प्यासे फिरने से निश्चित रूप से लू लगती है । खस के पर्दे लगे कमरों अथवा कूलर आदि अन्य प्रकार से ठंडे किये गये स्थान से एकाएक तेज धूप में बाहर निकल पड़ने से भी लू लग जाती है ।

लू लगने का अर्थ है शरीर की तरलता और स्निग्धता का एकाएक सूख जाना । सूर्य की किरणों के आघात से शरीर का जलीय अंश शोषित हो जाना

गर्मी में लू चलते समय बाहर जाना आवश्यक हो तो सदा ही काफी पानी पीकर बाहर निकलने से और मोटे कपड़े से शरीर को ढक कर चलने से या कम से कम कान बाँध कर छाते की छाया में चलने से तेज धूप में लू लगने का भय नहीं रहता । यथासंभव तो कड़ी गर्मी और तेज धूप में घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहिए । निकलें तो पेट भर पानी पीकर निकलें ।

लू लग जाय तो तत्काल प्याज का रस निकाल कर रोगी को पिलाना चाहिए | बर्फ के टुकड़े चूसने के लिए मुंह में डालते रहना चाहिए । मस्तक पर भी बर्फ की थैली रखनी चाहिए | कच्चे आम ( कैरी) को भून कर उसका नमकीन या मीठा शर्बत रोगी को पिलाना चाहिए । चने की सूखी पत्तियों (भाजी) को पानी में गलाकर रोगी के सारे शरीर पर उसकी मालिश करना चाहिए । जो श्रमिक गर्म स्थान जैसे कोयलों की भट्टी में कार्य करता हो उसको गर्मी के ऋतु में नमक अधिक खाना चाहिए अत्यधिक पसीना निकलने से जो शारीरिक हानि होती है इससे उसकी पूर्ति हो जाती है ।