ज्वर (बुखार)
66 मिनट का पाठ
शरीर की तापवृद्धि का नाम ही ज्वर है। ज्वर सब रोगों का राजा है। जन्म और मरण के समय बुखार का कुछ-न-कुछ अंश जरूर ही रहता है। शरीर के जितने भी रोग हैं, उन सबों के साथ ज्वर का होना प्रायः सम्भव है। ऐसे तो ज्वर बहुत तरह के होते हैं, पर हम इस प्रकरण में उन्हीं बुखारों तथा उनके इलाजों का वर्णन करेंगे, जो अक्सर लोगों को हुआ करते हैं।
मामूली बुखार
ठण्डा लगने, गर्म शरीर को तुरन्त ठण्डा लगने, तेज धूप में घूमने, वर्षा में भीगने, चोट लगने, ज्यादा परिश्रम करने, ज्यादा दिमागी काम करने, रात को जागने, खराब जलवायु वाले स्थानों में रहने, अनियमित भोजन करने, ज्यादा भोजन करने, अधिक उपवास करने, मादक पेय -- जैसे शराब, ताड़ी वगैरह ज्यादा पीने, किसी तरह जहर के खून में पहुँचने तथा कब्जियत आदि से साधारण ज्वर पैदा होता है। यदि पहले का संचय किया हुआ विकार शरीर में नहीं रहा तो यह मामूली बुखार दो-तीन दिन में अपने आप ही उतर जाता है, किसी दवा की जरूरत नहीं पड़ती; पर शरीर में यदि पहले से ही विकार एकत्र हो तो उसके कारण यही बुखार अपना उग्र रूप धारण कर लेता है और कभी-कभी कोई भयंकर रोग भी पैदा कर देता है; नहीं तो उपर्युक्त कारणों से होने वाला साधारण बुखार तो शरीर के और भी विकारों को दूर कर इसे नीरोग कर देता है। जब शरीर में किसी तरह का जहर व्याप्त हो जाता है, तो प्रकृति उसे निकालने की व्यवस्था स्वयं करती है, यह साधारण बुखार उसी व्यवस्था का एक स्वरूप है। मामूली बुखार १०२ डिग्री के आस-पास ही रहता है। इसमें सिर या सारे बदन में दर्द होता है, पेशाब का रंग लाल होता है और कम मात्रा में होता है, साथ ही बेचैनी रहती है तथा प्यास अधिक लगती है।
चिकित्सा
ऐसे रोगी को मुलायम बिस्तर पर लिटाकर आराम देना चाहिए। खाने को अन्न नहीं देना चाहिए। यदि भूख खूब लगी हो तो ज्वर की हालत में दूध-साबूदाना, चाय, मिश्री आदि खूब हल्की चीजें खाने को देना चाहिए। अन्न देना बिल्कुल मना है। पीने के लिए गर्म करके खूब ठण्डा किया हुआ जल जितना पी सके, उतना देना चाहिए; प्रत्येक बार गरम ही पानी पिया जाय तो दोष-पाचन होकर विशेष लाभ होता है। मिश्री का शरबत, मौसमी का रस, सोडा वाटर, बर्फ का पानी या डाभ (कच्चे नारियल का पानी) देना भी बहुत अच्छा है। ज्यादा पानी पीने से पेशाब ज्यादा होगी, जिससे शरीर का जहर निकलकर शरीर जल्दी नीरोग हो जायगा। इस बात को भूलना न चाहिए कि पेशाब के साथ, पाखाने के साथ और पसीने के साथ शरीर का जहर निकलकर शरीर को जल्दी नीरोग कर देता है। अतः इस प्रकार के बुखार में प्रायः दवाओं की जरूरत ही नहीं पड़ती। एक-दो दिन आराम करने से ही ज्वर चला जाता है।
रोगी को साफ और हवादार कमरे में लिटाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक किसी भी प्रकार की मेहनत, स्नान, स्त्री-प्रसङ्ग बिल्कुल मना है। रोगी को जब पसीना आने लगे तो उसे खादी के तौलिये से धीरे-धीरे पोंछ देना चाहिए। ऊपर लिखी हुई तरकीब हर प्रकार के बुखार में लाभदायक होती है। मामूली बुखार यदि एक-दो दिन में अच्छा होता दिखाई न पड़े, तो नीचे लिखी हुई दवा का सेवन करने से ठीक हो जायगा। यथा --
(१) पान का रस ५.८३ ग्राम, अदरक का रस ५.८३ ग्राम, शहद ५.८३ ग्राम -- ये तीनों चीजें मिलाकर सुबह-शाम दोनों समय पी लेना चाहिए। इससे बुखार बहुत जल्द दूर हो जाता है।
(२) यदि जुकाम या सर्दी-गर्मी का बुखार हो तो नीचे लिखा हुआ काढ़ा बड़ा फायदेमन्द होगा। यह काढ़ा हमारे कई बार का परीक्षित है -- गुलबनफ्शा, गाजवाँ (गोजिह्वा), मुलेठी, गिलोय और खूबकलाँ -- इन पाँचों चीजों को बराबर भाग लेकर २३.२ ग्राम वजन करके ४६७ ग्राम जल में डालकर आग पर चढ़ा देना चाहिए। जब ११६.६ ग्राम पानी रह जाय, तब छानकर उसमें ११.६६ ग्राम शहद या मिश्री मिलाकर दो बार में पी जाना चाहिए; सुबह और शाम। इससे जुकाम ठीक होकर तबीयत हल्की हो जाती है। यदि दस्त न होने की शिकायत हो तो इसी काढ़े में १०-१५ नग मुनक्का या ३ से ५ नग अंजीर और डाल देना चाहिए। इस काढ़े से बुखार या जुकाम के साथ होने वाली खाँसी भी तुरन्त अच्छी हो जाती है।
(३) सर्द-गर्म की वजह से होने वाले बुखार में २३.२ ग्राम खूबकलाँ का ऊपर लिखे मुताबिक काढ़ा बनाकर पीना बड़ा फायदेमन्द होता है।
(४) गर्मी (लू) लगकर जो बुखार हो उसमें कच्चे आम को पुटपाक की रीति से पकाकर और उसका रस ४६७ ग्राम पानी में मिलाकर पीना निहायत फायदेमन्द है। गुलबनफ्शा का शरबत पीना बड़ा गुणदायक होता है।
(५) ज्यादा परिश्रम के कारण होने वाले बुखार में खूब आराम करना और चित्त को प्रसन्न रखना ही सर्वोत्तम उपाय है।
(६) जलवायु के दोष से होने वाले बुखारों से बचने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि फिटकरी डालकर औटाया हुआ साफ जल पीना चाहिए और संयम-नियम से रहना चाहिए। ऐसे स्थान में मसहरी के भीतर सोना उत्तम है।
(७) तुलसी के पत्ते की चाय भी हर प्रकार के बुखार में फायदा करती है। बनाने की विधि यह है -- २० तुलसी के पत्ते, २० काली मिर्च, ५.८३ ग्राम अदरक और जरा-सी दालचीनी को २३३ ग्राम पानी में डालकर खूब औटाना चाहिए, उसके बाद आग से उतारकर उसे छान लेना चाहिए और ऊपर से २९.२ ग्राम मिश्री या चीनी मिलाकर गर्म-गर्म पी जाना चाहिए।
(८) बुखार में मट्ठा या दही का शरबत पीना बहुत फायदेमन्द होता है। एक पाव दही में एक पाव पानी और २९.२ ग्राम चीनी मिलाकर अच्छी तरह घोंट देने से अच्छा शरबत तैयार हो जाता है। चीनी की जगह नमक जरा-सा डाला जाय तो और भी अच्छा है। इसके पीने से पेट ठण्डा रहता है और पेशाब साफ होती है।
(९) कब्जियत या बदहजमी के कारण होने वाले बुखार में मामूली जुलाब पंचसकार चूर्ण लेकर पेट साफ करना बहुत अच्छा है।
बहुत-से नासमझ लोग बुखार के रोगी को खूब गर्म कपड़ों में लपेटकर ऐसे स्थान पर लिटाते हैं जहाँ हवा और प्रकाश का पहुँचना बड़ा कठिन होता है। ऐसी बन्द जगहों में नमी और दुर्गन्ध का होना स्वाभाविक ही है। रोगी को ऐसी जगह में लिटाकर रखने से बड़ा नुकसान होता है। यदि भला-चंगा आदमी भी ऐसे स्थान में एक दिन सो जाय तो वह बीमार हो जाय, फिर बीमार आदमी को ऐसी जगह में सुलाना कितना हानिकारक हो सकता है, इसका अनुमान सहज ही में किया जा सकता है।
हम ऊपर कह आये हैं कि शरीर में विकार जमा हो जाने पर प्रकृति खुद उसे दूर करने की चेष्टा करती है और बुखार भी उन्हीं चेष्टाओं में से एक है। अतः जब प्रकृति अपने प्रयत्न में लगी हो तो हमें उसके कामों में मदद देनी चाहिए। बन्द और गन्दे कमरे में रोगी को लिटाकर प्रकृति के कार्यों में रुकावट पैदा न करनी चाहिए। हवादार और प्रकाशमय स्थान में रोगी को लिटाने से प्रकृति को अपना काम करने में बड़ी मदद मिलती है। ऐसी जगह पर आराम से लिटाया हुआ रोगी बहुत जल्द बिना दवा के ज्वर से मुक्त हो जाता है।
आरोग्यपंचक
हरड़, कुटकी, अमलतास, निशोथ और आँवला -- इन पाँचों दवाओं को २३.२ ग्राम लेकर ४६७ ग्राम पानी में डालकर काढ़ा बनाएँ। जब ११६.६ ग्राम पानी शेष रह जाय, तब उतार और छानकर एक शीशी में भर दें। इसमें २३.२ ग्राम शहद और मिला दें। एक या दो घण्टे के अन्तर से दो-तीन बार पिलाने से दस्त होकर कोठा साफ हो जायगा और ज्वर भी उतर जायगा। मामूली बुखार की यह बहुत सुन्दर दवा है। जिसको कब्जियत हो उसके लिए तो अमृत के समान है। कब्जियत वाले रोगी को इस दवा के सेवन से दस्त साफ न हो तो दवा की मात्रा कुछ बढ़ा देनी चाहिए। अगर एक दिन में पेट अच्छी तरह साफ न हो तो दो-तीन दिन तक बराबर दवा पिलानी चाहिए। प्रायः हर तरह के बुखार में कब्जियत हो जाती है, उस हालत में इस "आरोग्यपंचक" का सेवन बहुत अच्छा है। इससे कब्जियत मिटती है और बुखार भी ठीक हो जाता है।
छोटी हरड़ के चूर्ण में काला नमक मिलाकर देने से भी पाखाना होकर पेट साफ हो जाता है।
त्रिफला के काढ़े में साफ एरण्ड (रेंडी) का तेल डालकर पिला देने से भी दो-चार दस्त हो जाते हैं।
पटोलादिक्वाथ
कड़वे परवल के पत्ते, हर्रे दल, बहेड़ा दल, आँवला दल, नीम की अन्तर-छाल, मुनक्का, इन्द्रजौ, नागरमोथा, मुलेठी, गिलोय और अडूसा -- ये सब द्रव्य समभाग लें और ११.६६ ग्राम का काढ़ा बनाकर उसमें नौसादर ६०७ मि.ग्रा. और कलमी शोरा ६०७ मि.ग्रा. डालकर दिन में ३-४ बार पीवें। केवल इसको या त्रिभुवनकीर्ति रस या ज्वरसंहार रस आदि के अनुपान में दें। सब तरह के बुखारों में लाभ करता है।
ज्वर की प्रधान दवा उपवास है। बुखार होते ही उपवास (लंघन) करना शुरू कर देना चाहिए। बालक, बूढ़े, गर्भवती स्त्री तथा क्षय, वायु, भय, क्रोध, काम, शोक, परिश्रम से होने वाले बुखार के रोगी के लिए उपवास करना अच्छा नहीं है। ऐसे रोगियों को दूध, साबूदाना, बार्ली, अरारोट, किशमिश आदि हल्का भोजन थोड़ा-थोड़ा तीन-चार बार देना चाहिए। जिसकी तन्दुरुस्ती अच्छी हो उसे पानी के अतिरिक्त और कुछ देना अच्छा नहीं, लेकिन आजकल के लोग प्रायः कमजोर ही होते हैं, इसलिए बिल्कुल निराहार रखना भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि बुखार ज्यादा दिन तक रह गया और खाने को कुछ नहीं मिला तो रोगी बहुत कमजोर हो जाता है। इसलिए अच्छी तरह सोच-विचार कर हल्का पथ्य तथा मौसमी, बेदाना आदि ताजा फल देना अच्छा है।
सारांश यह है कि यदि तन्दुरुस्ती वाले किसी मजबूत आदमी को बुखार लगे और वह दो ही चार दिन में उतर जाय तो वह निराहार भी रह सकता है, पर ज्यादा दिन का होने से ऊपर बतलाये गये हल्के पथ्य दिये जाने चाहिए और कमजोर आदमी को तो बराबर कुछ-न-कुछ खिलाना ही चाहिए, जिससे उसकी कमजोरी ज्यादा बढ़ने न पावे।
पित्तज्वर
यह बुखार वर्षा ऋतु या इसके अन्त में (भादों, आश्विन और कुछ कार्तिक तक) हुआ करता है। जिस साल वर्षा कम होती है, उस साल पित्त का बुखार भी कम और जिस साल ज्यादा बारिश होती है, उस साल ज्यादा होता है। वर्षा होने के कारण जगह-जगह जल इकट्ठा हो जाता है और उसमें घास-पत्ते आदि गिरकर सड़ने लगते हैं जिससे वहाँ मच्छर पैदा हो जाते हैं। उस दुर्गन्ध के कारण वहाँ की हवा भी खराब हो जाती है। विषैले मच्छरों के काटने तथा हवा की गन्दगी से यह बुखार पैदा होता है। ऐसी दशा में जाड़ा देकर होने वाला मलेरिया बुखार भी हो जाता है। हम मलेरिया के सम्बन्ध में आगे चलकर लिखेंगे।
आयुर्वेद शास्त्र में एक और भी युक्ति-संगत कारण लिखा है। वाग्भट्ट ने लिखा है कि ऋतुओं के नियमानुसार वर्षा ऋतु में पित्त का संचय होता है और शरद् ऋतु में पित्त कुपित होकर अनेक रोग पैदा करता है। वर्षा ऋतु में वर्षा और ठण्डी हवा के कारण लोगों के शरीर ठण्डे रहते हैं। वर्षा के जाते ही जब धूप पड़ने लगती है, तब पित्त दूषित होकर बुखार पैदा करता है। पित्त से होने वाले जितने रोग हैं उनमें बुखार सर्वप्रधान है। किसी भी तरह का बुखार हो उसमें शरीर की गर्मी बढ़ना तो जरूरी ही है। शरीर के ताप का ही नाम बुखार है। यह ताप बिना पित्त के हो नहीं सकता। अतः बिना पित्त के कुपित हुए किसी भी प्रकार का बुखार नहीं हो सकता। वायु या कफ के बुखारों में भी पित्त का कुपित होना जरूरी है। जब बुखार के साथ पित्त का इतना सम्बन्ध है, तब पित्त के मौसम में बुखार ज्यादा फैलना बिल्कुल स्वाभाविक है। यही कारण है कि पित्त के मौसम -- शरद् ऋतु में ज्यादा बुखार हुआ करता है।
इस पित्त के बुखार से बचने के लिए जुलाब लेना और कुछ रोज उपवास करना उचित है। नियमपूर्वक एक-दो नींबू को चूसने से बुखार का डर नहीं रहता। नींबू के दो टुकड़े करके उसके बीज निकाल लेने चाहिए और उसमें ऊपर से सेंधा नमक तथा काली मिर्च का चूर्ण ९७२ मि.ग्रा. से १.५ ग्राम तक डालकर कोयले की आग पर उसे गर्म कर लेना चाहिए और गर्म-गर्म चूसना चाहिए। देशी चीजों में बुखार रोकने के लिए इसकी तुलना में कोई नहीं है।
पित्तज्वर में नीचे लिखे हुए लक्षण प्रकट होते हैं -- १०३ से १०५ या १०६ डिग्री तक का जोर का बुखार, प्यास की अधिकता, कै और उसमें पित्त का निकलना, जी मिचलाना, सिर गर्म रहना, आँखें लाल रहना, पसीना अधिक आना, नींद न आना, कभी-कभी प्रलाप करना, मुँह का स्वाद कड़वा रहना, पतले दस्त का होना, बेचैनी और पेशाब का रंग पीला होना। बुखार सुबह में १०० से १०२ डिग्री तक, शाम को १०३ से १०६ डिग्री तक रहता है। बुखार की अधिकता के कारण रोगी आधी आँख बन्द किये पड़ा रहता है।
पित्त का बुखार प्रायः दसवें दिन उतरता है। रोग जब अच्छा होने को रहता है तो ७ दिन के बाद ही रोगी के लक्षण अच्छे मालूम होने लगते हैं, बेचैनी कम होने लगती है, नींद आने लगती है और शरीर का ताप कम हो जाता है। परन्तु यदि सातवें दिन से बुखार का वेग और भी बढ़ने लगे तो समझना चाहिए कि रोगी का बचना मुश्किल है। सात दिन के बाद रोग-लक्षण प्रबल होने से यह रोगी की जान लेकर ही दम लेता देखा गया है। यह बुखार २१ दिन से भी ज्यादा रह सकता है।
पित्तज्वर चिकित्सा
रोगी को साफ हवादार कमरे में लिटाकर रखना सबसे अच्छी चिकित्सा है। शास्त्र ने ७ रोज तक दवा देने का निषेध किया है। अनुभव से भी देखा गया है कि ७ दिन के भीतर दवा देने से फायदा के बदले हानि होने लगती है। लेकिन प्रायः देखा जाता है कि दो-तीन दिन के बाद ही रोगी के घर के लोग घबराकर डाक्टर-वैद्य को दिखलाकर दवा देने के लिए तंग करने लगते हैं। डाक्टर-वैद्य भी व्यापार की रक्षा के लिए अपनी जवाबदारी न समझकर कुछ-न-कुछ दवा देना शुरू कर देते हैं। होमियोपैथी में रोगी तथा उसके घर वालों के सन्तोष के लिए ऐसे मौकों पर Blank Dose (खाली साफ किये हुए जल की खुराक) देने की प्रथा है। उसी प्रकार यदि वैद्यराज जी होशियार हुए तब तो ऐसी हल्की दवा दे देते हैं, जिससे रोगी तथा उनके घर वालों को सन्तोष तो हो जाय, पर रोग पर कोई बुरा असर न पड़े। परन्तु जब 'नीम हकीम खतरे जान' कोई वैद्य रहे तो काढ़ा, चूर्ण, चटनी आदि चीजें देने लग जाते हैं जिससे रोग बढ़ जाता है। इसीलिए ऐसे रोगियों को किसी अधूरे वैद्य या डाक्टर से दिखलाने की अपेक्षा प्रकृति के ऊपर ही छोड़ देना लाख गुना अच्छा है।
रोगी को खूब हिफाजत से रखना चाहिए। अन्न बिल्कुल नहीं देना चाहिए और पीने को निम्नलिखित प्रकार से तैयार किया हुआ जल देना चाहिए -- नागरमोथा, खश, पित्तपापड़ा, लाल चन्दन, सुगन्धवाला और सोंठ -- इन छः चीजों को मिलाकर ११.६६ ग्राम वजन में ले लीजिए और १.८७ किलो पानी डालकर उसे औंटा लीजिए, आधा पानी शेष रहने पर उसे छानकर मिट्टी के बर्तन में रख दीजिए और रोगी को प्यास लगने पर उसी जल को पीने को दीजिए। इसे "षडंग पानीय" कहते हैं। इसके पीने से प्यास कम होगी, बेचैनी घटेगी, कै बन्द होगी और बुखार भी कम हो जायगा। इस पानी की गिनती दवा में नहीं होती। यदि बुखार के साथ और कोई उपद्रव हो तो उसका इलाज अवश्य करना चाहिए। कच्चे बुखार में दवा न देने का उद्देश्य यह है कि बुखार के साथ जबरदस्ती न की जाय। सात दिन के अन्दर यदि दवा देने की जरूरत हो तो नीचे लिखी दवा देनी चाहिए। इससे रोग पर कोई उल्टा असर भी नहीं होगा और रोगी तथा उसके घर वालों के चित्त को सन्तोष भी रहेगा तथा ज्वर में कुछ-न-कुछ फायदा भी अवश्य ही होता है।
गोदन्ती मिश्रण
गोदन्ती भस्म ८ भाग, जहरमोहरा पिष्टी २ भाग, रसादि वटी २ भाग मिलाकर एक जगह रख लें। इसकी मात्रा ९७२ मि.ग्रा. है; इसी का नाम "गोदन्ती मिश्रण" है। सात दिन के अन्दर यदि दवा देने की जरूरत हो तो गोदन्ती मिश्रण कम मात्रा में देना चाहिए।
आनन्दभैरव रस
शुद्ध हिंगुल, शुद्ध तेलिया (मीठा विष), सोंठ, फूला हुआ सुहागा और जायफल -- इन पाँचों चीजों को ११.६६ ग्राम, काली मिर्च और छोटी पीपल २३.२ ग्राम लेकर अलग-अलग इन्हें खूब महीन पीसकर वजन कर लेना चाहिए। पहले शुद्ध हिंगुल को खरल में डालकर खूब देर तक पीसने के बाद सभी चीजों को उसमें डालकर तथा जम्बीरी नींबू के रस में भिगोकर घोटना चाहिए। अच्छी तरह घुट जाने पर १२१.५ मि.ग्रा. की गोली बना लेनी चाहिए। इसी का नाम "आनन्दभैरव रस" है। यह आनन्दभैरव रस हर तरह के बुखार में दिया जा सकता है। मामूली बुखार में सुबह और शाम एक-एक गोली शहद के साथ चाटने से फायदा होता है।
जब बुखार बहुत जोर का हो और उसके कम न होने के कारण रोगी के अनिष्ट होने की आशंका हो तो एक गोली आनन्दभैरव रस, ११.६६ ग्राम अदरक का रस और ११.६६ ग्राम शहद मिलाकर दिन-रात में ३ बार देने से बुखार का वेग जरूर कम हो जाता है। एक खुराक से आधी डिग्री या एक डिग्री बुखार कम हो जाता है। अगर बुखार कम करने की जरूरत न हो, तो आनन्दभैरव रस को सिर्फ शहद के साथ दिन-रात में दो बार चटा देना चाहिए। इससे बुखार धीरे-धीरे पचकर उतर जाता है।
मृत्युञ्जय रस
शुद्ध हिंगुल २३.२ ग्राम, शुद्ध टंकण, शुद्ध मीठा विष, काली मिर्च, पीपल का चूर्ण और शुद्ध गन्धक प्रत्येक ११.६६ ग्राम -- इन चीजों को अलग-अलग महीन चूर्ण करके वजन कर लेना चाहिए और फिर पत्थर के खरल में रखकर आवश्यकतानुसार अदरक का रस मिलाकर उसकी मूँग के बराबर की गोलियाँ बना लेनी चाहिए। एक-एक गोली सुबह-शाम २ ग्राम शहद और ३ ग्राम पान के रस के साथ रोगी को खिलाने से बड़ा फायदा होता है। बुखार की हालत में इसके सेवन से नये उपद्रव बढ़ने की आशंका नहीं रहती और धीरे-धीरे बुखार पचकर उतर जाता है।
रसादि वटी
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, कपूर, सफेद चन्दन, जटामांसी, नेत्रवाला, नागरमोथा, खश -- ये ८ दवाइयाँ समभाग लें। बनाने की तरकीब यह है कि पारा और गन्धक को छोड़कर और सभी चीजों को अलग-अलग महीन चूर्ण करके ठीक से तौलकर रख लेना चाहिए। पहले पत्थर के खरल में पारा और गन्धक को २ घण्टे इस प्रकार घोंटना चाहिए कि पारा और गन्धक मिलकर कज्जली तैयार हो जाय। फिर उस कज्जली में सब चीजों को मिलाकर चार घण्टे तक खूब घोंटना चाहिए। गुलाब तथा चन्दन के अर्क से दो-तीन दिन तक मर्दन करें और एक साफ की हुई बोतल में भरकर अच्छी तरह डाट लगा देनी चाहिए। इसी का नाम "रसादि वटी" है। इसकी २४३ से ३६४ मि.ग्रा. की एक खुराक है। शहद के साथ दिन-रात में ३ बार चाटना चाहिए। यह वटी बासी पानी के साथ भी खाई जा सकती है। इसके सेवन से ज्वर, भयंकर प्यास, कै, बेचैनी आदि आराम होते हैं। यह पित्तज्वर की अच्छी दवा है।
गोदन्ती हरताल भस्म बराबर भाग मिलाकर रसादि वटी देने से ज्वर तत्काल कम हो जाता है। यदि बहुत जोरों का बुखार हो, श्वास लेने में तकलीफ हो, प्यास हो और रोगी बहुत बेचैन हो तो रसादि वटी के बराबर गोदन्ती हरताल भस्म मिलाकर शहद या जल के साथ खिला देना चाहिए। एक घण्टे बाद थर्मामीटर लगाकर देखने से बुखार १ से ३ डिग्री तक कम हुआ मालूम पड़ेगा। हमने इसे अनेक बार आजमाकर देखा है।
यदि समय पर ऊपर लिखे तीनों रस तैयार न मिलें तथा और भी कोई रस तैयार न मिले, तो केवल अदरक का रस ३ ग्राम और ३ ग्राम मकरध्वज के साथ सुबह-शाम देने से बुखार में बहुत फायदा होता है और वह ठीक समय पर उतर जाता है। पित्तज्वर में मकरध्वज को शहद में मिलाकर धनिये का पानी या परवल के पत्तों का रस या अनार का रस ११.६६ ग्राम डालकर देना चाहिए, इससे बहुत लाभ होता है।
यदि ७ रोज हो जायँ और बुखार का जोर कम न हो, तो नीचे लिखे काढ़े देने चाहिए। इससे तुरन्त फायदा होगा। यह बात याद रखें कि यह काढ़ा ७ दिन से कम में नहीं देना चाहिए --
(१) जवासा, पित्तपापड़ा, फूलप्रियंगु, चिरायता, कुटकी और अडूसे की जड़ की छाल -- इन छः दवाओं को समभाग लेकर २३.२ ग्राम वजन कर काढ़ा बना लेना चाहिए। ऊपर से २३.२ ग्राम मिश्री का प्रक्षेप डालकर पी जाना चाहिए। इससे पित्तज्वर, प्यास, कै, जलन आदि आराम होते हैं।
(२) मुनक्का, हरड़ की छाल, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, कुटकी, अमलतास की गिरी -- इन छः दवाओं का काढ़ा ऊपर की तरह बनाकर मिश्री मिलाकर पीने से पित्त का ज्वर, प्रलाप, बेहोशी, भ्रम, जलन, मुँह का सूखना, प्यास आदि शान्त होते हैं। इस काढ़े से दो-एक दस्त होकर जल्दी फायदा होता है। यदि ज्यादा दस्त होने लगें तो काढ़ा बन्द कर देना चाहिए।
(३) केवल पित्तपापड़े का काढ़ा भी पित्तज्वर में बहुत फायदा पहुँचाता है। यदि पित्तपापड़े के साथ लाल चन्दन, खश और सोंठ -- ये तीनों चीजें भी मिला दी जाएँ तो और विशेष लाभ होता है। इस काढ़े को मिश्री मिलाकर पीना चाहिए। यह पित्तज्वर में बहुत फायदा करता है।
(४) पित्तज्वर में वमन को रोकने के लिए धान का लावा ११.६६ ग्राम और मिश्री ५८.३ ग्राम, २३३ ग्राम गरम पानी में डालकर कुछ समय रखें। जब लावा और मिश्री पानी में गल जाय तब छानकर नींबू का रस और गुलाबजल मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाना चाहिए।
(५) ३ तोला (३५ ग्राम) पुरानी इमली को पत्थर या काँच के बर्तन में डालकर २३३ ग्राम गरम पानी में भिगो दें, कुछ देर बाद मलकर छान लें और चीनी या मिश्री मिलाकर पीने को दें, इससे कै बन्द हो जायगी।
(६) पित्तज्वर में बुखार जोर का हो जाता है, उस समय यदि उपर्युक्त दवा न मिले तो सिर्फ ५ या ७ लौंग जल के साथ घिसकर रोगी को देने से ज्वर कम हो जाता है।
(७) ठण्डा पानी या गुलाबजल में सफेद कपड़ा भिगोकर सिर पर पट्टी रखने से भी ज्वर कम हो जाता है।
मलेरिया बुखार
पहले तो यह ज्वर अधिकतर बंगाल और असम में ही हुआ करता था, परन्तु आजकल तमाम हिन्दुस्तान में फैल गया है। फिर भी और प्रान्तों की अपेक्षा बंगाल, असम और मद्रास प्रान्त में यह बुखार अधिक होता है। इस बुखार में प्लीहा और जिगर बढ़ जाता है। शरीर का खून सूखकर रोगी की आँख व चेहरा सफेद हो जाता है। बुखार प्रायः कम्प तथा जाड़ा देकर चढ़ता है, पर पुराना होने पर बिना कम्प के भी चढ़ता है, बहुत-सा पसीना आकर उतरता है। इसके आने का समय भी निश्चित होता है। यह बुखार दिन में एक-दो बार, एक या दो दिन बाद देकर आता है। रोज आने वाले बुखार को एकतरा, एक दिन बाद देकर आने वाले को तिजारी तथा दो दिन बाद देकर आने वाले को चौथिया कहते हैं।
इसके खास लक्षण ये हैं -- माथे में जोरदार जलन होना, सिर में चक्कर आना, तापमान का १०३ से १०६ डिग्री तक पहुँच जाना, प्रायः कब्जियत रहना, सिरदर्द, जी मिचलाना और कै होना, जीभ का स्वाद कड़वा हो जाना, कभी प्रलाप भी करना और हाथ-पैरों को इधर-उधर पटकना तथा कभी-कभी दस्त की बीमारी हो जाना।
आजकल के वैज्ञानिकों ने यह निश्चित रूप से सिद्ध कर दिया है कि एक खास तरह के मच्छर के काटने से ही मलेरिया बुखार पैदा होता है। एनोफ़िलीज़ मच्छर की जाति से प्लाज्मोडियम नामक रोगाणु मलेरिया को पैदा करता है। वर्षाकाल के अन्त में मच्छर अधिक होते हैं और उसी समय इस बुखार का दौरा भी अधिक होता है। इससे यह बात अनुमान से भी सिद्ध होती है कि इस बुखार का कारण मच्छर ही हो सकता है।
मलेरिया बुखार की साधारणतः तीन अवस्थाएँ होती हैं:
(१) शीतावस्था -- शीतावस्था में पहले जाड़ा और बाद में कम्प जान पड़ता है। कभी-कभी तो इतने जोर का शीत और कम्प होता है कि तीन-चार कम्बल ओढ़ने पर भी गर्मी मालूम नहीं होती। इसके साथ ही सारे शरीर में दर्द, माथे में धमक, प्यास आदि लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं।
(२) उष्णावस्था -- शीतावस्था के बाद उष्णावस्था आती है। इसमें अक्सर माथे में दर्द, चेहरा लाल, प्यास, देह का चमड़ा रूखा, साँस लेने में तकलीफ और शरीर का ताप १०१ डिग्री से १०६ डिग्री तक बढ़ जाता है। द्वितीयावस्था के प्रारम्भ होते ही शीत घट जाता है।
(३) घर्मावस्था -- कुछ देर बाद यह अवस्था आती है। इसमें खूब पसीना आता है और बुखार बिलकुल उतर जाता है।
मलेरिया चिकित्सा
मलेरिया बुखार की सबसे उत्तम दवा कुनाइन है। वास्तव में कुनाइन मलेरिया बुखार के लिए ब्रह्मास्त्र है। बहुत लोग कुनाइन की निन्दा करते हैं, परन्तु ऐसे बहुत कम लोग हैं जो कुनाइन का व्यवहार न करते हों। जब बुखार को रोकने के लिए इससे अच्छी कोई दवा ही नहीं है, तब सबको इसका प्रयोग करना ही पड़ता है। धूर्त लोग कभी लाल रंग मिलाकर कुनाइन की गोली बाँध देते हैं, तो कभी कुनाइन के अर्क को चिरायता का अर्क बतलाकर रोगियों को देते हैं। हमारी समझ में नहीं आता है कि इस प्रकार छिपाकर कुनाइन देने का मतलब क्या है? प्रायः ऐसे करने वाले लोग वे ही होते हैं, जो कुनाइन को अंग्रेजी दवा या विलायती दवा समझते हैं। यदि ऐसी बात हो तो भी विलायत के बड़े-बड़े चिकित्सक लोग आयुर्वेद का मकरध्वज, पर्पटी, लौह, ईसबगोल, कूठ, कुटज आदि खुल्लम-खुल्ला व्यवहार करते हैं, तो हमें उनकी अच्छी दवाओं का व्यवहार करने में क्या लज्जा है? कुनाइन सिनकोना नामक वृक्ष से बनता है और यह वृक्ष भारतवर्ष में दार्जिलिंग आदि जगहों में बहुत पैदा होता है।
कुनाइन का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है --
(१) कुनाइन की गोलियाँ -- ये गोलियाँ प्रायः ६४.८ मि.ग्रा. से लेकर ३२४ मि.ग्रा. तक की बनाई जाती हैं। मलेरिया रोकने के लिए ६ से १२ गोली रोज खाई जा सकती हैं। एक बार में दो से चार गोली तक खाई जाती है। यह खुराक पूरी उम्र वालों के लिए है। अवस्था के हिसाब से मात्रा कम कर देनी चाहिए।
(२) चूर्ण -- कुनाइन के चूर्ण (पाउडर) को २४३ मि.ग्रा. से ९७२ मि.ग्रा. तक दिन-रात में चार बार में ठण्डे जल के साथ देना चाहिए।
(३) अर्क -- गोली और चूर्ण की अपेक्षा अर्क विशेष लाभदायक होता है, क्योंकि गोली और चूर्ण तो पेट में जाकर पूरी तरह गलने नहीं पाते और इसीलिए ज्यादा फायदा भी नहीं मालूम होता। पर अर्क तो पेट में जाने के साथ ही फायदा करने लगता है। कुनाइन का अर्क बाजार से भी ले सकते हैं और अपने यहाँ पाउडर से भी तैयार कर सकते हैं। एक खुराक कुनाइन अर्क तैयार करने के लिए २९.२ ग्राम पानी और २५९.२ मि.ग्रा. कुनाइन सल्फेट और इसमें 'सल्फ्यूरिक एसिड डाइल्यूट' उतना ही डालना चाहिए, जिससे कुनाइन जल रूप हो जाय, यानी जल में कुनाइन की सफेदी न रहे। दवा में डालने वाले गन्धक के तेजाब (Chemically pure sulphuric acid) का एक भाग और जल ९ भाग मिलाने से 'सल्फ्यूरिक एसिड डाइल्यूट' तैयार हो जाता है। इस प्रकार तैयार की हुई खुराक दिन-रात में चार बार दी जा सकती है।
साधारणतः बुखार में कुनाइन देना मना है पर मलेरिया बुखार की चढ़ी हुई अवस्था में भी कुनाइन कुछ नुकसान नहीं पहुँचाता। कुनाइन खिलाने के थोड़ी देर बाद पसीना आकर बुखार उतर जाता है। मलेरिया को छोड़कर और बुखारों में प्रायः देखा गया है कि इस प्रकार बुखार उतरते समय पसीना अधिक आने के कारण इतनी कमजोरी बढ़ जाती है कि अगर पूरी सावधानी से काम न लिया जाय तो तुरन्त हृदय की धुकधुकी बन्द (Heart failure) होकर मिनटों में रोगी का प्राणान्त हो जाय। अतः मलेरिया बुखार के सिवाय दूसरे किसी भी बुखार की चढ़ी हुई अवस्था में कुनाइन कदापि नहीं देना चाहिए।
बुखार के उतर जाने पर थोड़ी-थोड़ी देर पर रोगी को कुनाइन की चार खुराक पिला देनी चाहिए जिससे फिर बुखार का दौरा न होने पावे। मलेरिया को जड़ से नष्ट करने के लिए कुनाइन ७.१३ ग्राम तक रोगी को खिलाना चाहिए। ७.१३ ग्राम इसकी पूर्ण मात्रा है। ७.१३ ग्राम से कम होने से यह कहा जा सकता है कि रोगी को पूर्ण मात्रा में कुनाइन नहीं दिया गया। जहाँ कुनाइन में इतना गुण है, वहाँ यह शरीर में इतनी गर्मी लाता है कि यदि गाय के दूध का काफी व्यवहार न किया जाय तो शरीर को बहुत हानि पहुँचने की सम्भावना रहती है। इसलिए बुखार के बाद एक-दो सप्ताह गाय का दूध काफी मात्रा में सेवन करना बड़ा लाभदायक है। यदि बहुत ज्यादा गर्मी हो जाय और कान साँय-साँय करने लगे, तो उस हालत में दो-तीन नींबू का रस ४६७ ग्राम पानी में डालकर ऊपर से ५८.३२ ग्राम चीनी मिलाकर पी जाना चाहिए। इससे कुनाइन की गर्मी शान्त हो जाती है।
इसके अलावा मियादी बुखार के प्रकरण में लिखे "आनन्दभैरव रस" की दो गोलियों को शहद में मिलाकर चाटने के ऊपर से निम्नलिखित विधि से तैयार किया गया पानी पी जाना चाहिए -- २० तुलसी के पत्ते और २० काली मिर्च को ११६.६४ ग्राम पानी में पकाना चाहिए और जब २९.२ ग्राम पानी शेष रह जाय तो उसमें २९.२ ग्राम मिश्री डालकर उसे पी जाना चाहिए। काली मिर्च को पीसकर पानी में डालना चाहिए। इस प्रकार तैयार किये हुए पानी को नहीं छानना चाहिए।
संखिया विष भी मलेरिया रोकने तथा यकृत और प्लीहा को ठीक करने की अक्सीर दवा है। अतः इसके संयोग से तैयार की हुई दवाएँ भी लोग प्रायः सेवन किया करते हैं, परन्तु इसमें जरा-सी भूल होने पर रोगी के प्राण जाने की शंका बनी रहती है और इसमें फायदे की अपेक्षा नुकसान होने की ही अधिक संभावना रहती है, अतः सर्वसाधारण के लिए इसका बहुत सावधानी से व्यवहार करना चाहिए। सिनकोना की छाल ११.६६ ग्राम काढ़ा करके पीने से कुनाइन जैसा लाभ होता है।
मलेरिया की रामबाण गोलियाँ
नवीन बढ़िया करंज के बीजों को लें और उनके छिलके उतारकर खूब महीन चूर्ण कर लें। यह चूर्ण ११.६६ ग्राम, कुनाइन ११.६६ ग्राम, फिटकरी ११.६६ ग्राम -- इन तीनों चीजों को खरल में डालकर पानी के संयोग से दो-तीन दिन तक खूब घोटें, फिर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। मलेरिया बुखार की यह बहुत अच्छी आजमाई हुई दवा है। दो गोली से चार गोली तक एक बार में जल के साथ देनी चाहिए। ज्वर आने के समय तक यदि रोगी के पेट में चार-पाँच बार पहुँच जाएगी तो ज्वर आने का भय नहीं रहेगा। कम्प देकर आने वाले बुखार में हमने बहुत बार परीक्षा की है। सभी समय में ये गोलियाँ तत्काल लाभ दिखाती हैं। 'करंजादि वटी' के नाम से बहुत लोग इन्हीं को बेचकर काफी लाभ उठा चुके हैं। वास्तव में ये गोलियाँ बहुत अच्छी हैं। मलेरिया बुखार के रोगी को बुखार उतरते ही दवा खिलाना शुरू कर देना चाहिए। बुखार आने के समय के चार घण्टे पहले ही रोगी के पेट में चार-पाँच खुराक दवा पहुँचा देनी चाहिए। दवा दो घण्टे से आठ घण्टे के अन्दर तक खिलानी चाहिए।
करंज वटी
करंजगिरी भुनी हुई, इन्द्रायण की जड़, बनफ्शा, अतीस कड़वा, फूली फिटकरी, पीपल, बड़ी हरड़ का बक्कल -- सब समान भाग लें। बारीक कूटकर २४३ मि.ग्रा. की गोली बना लें। २ गोली दिन में तीन बार ठण्डे जल से दें।
सप्तपर्ण वटी
सप्तपर्ण (छतिवन) के वृक्ष की ताजी अन्तर-छाल को महीन कूटकर चौगुने पानी में काढ़ा बनावें। चतुर्थांश शेष रहने पर अच्छे कपड़े से दो-तीन बार छान लें। इस काढ़े को फिर बर्तन में डालकर मन्द अग्नि से पकावें। पकते-पकते काढ़ा जब इतना गाढ़ा हो जाय कि करछी में लगने लगे तब नीचे उतार लें। उसमें उचित परिमाण में अतीस का चूर्ण मिलाकर ४८६ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ मलेरिया बुखार के लिए बहुत फायदेमन्द हैं। इससे ५०-६० प्रतिशत मलेरिया के रोगी अच्छे होते हैं। इसके साथ में दस्तावर दवा देकर रोगी का पेट साफ कर देना चाहिए। हमारा अनुभव है कि कुनाइन के अभाव की पूर्ति कुछ अंशों में सप्तपर्ण ही कर सकता है।
हरीतक्यादि वटी
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महाज्वरांकुश रस
शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष प्रत्येक ११.६६ ग्राम, शुद्ध धतूरे के बीज ३५ ग्राम, काली मिर्च, सोंठ और छोटी पीपल प्रत्येक ४६.६ ग्राम। पारद-गन्धक की कज्जली करके और शेष दवाओं का महीन चूर्ण करके खरल में डाल दें और सत्यानाशी के स्वरस की तीन भावना देकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बनावें। मलेरिया बुखार में ये गोलियाँ बहुत फायदा करती हैं। ज्वर न रहने की अवस्था में तीन-तीन घण्टे के अन्तर से जम्बीरी नींबू और अदरक के रस तीन-तीन ग्राम के साथ १ या २ गोली मिलाकर दें। इसका नाम "महाज्वरांकुश रस" है। यह मलेरिया बुखार की प्रसिद्ध दवा है।
मलेरिया रोकने की विधि
ऊपर लिखा जा चुका है कि मच्छरों के कारण यह रोग उत्पन्न होता है; इसलिए मच्छरों को नष्ट करने से ही मलेरिया से बचा जा सकता है। मच्छर केवल जल में ही उत्पन्न होते हैं और मच्छर जिस स्थान पर उत्पन्न होते हैं उस स्थान से अधिक दूर तक उड़ नहीं सकते, इसलिए जहाँ जल जमा होता हो उस जलाशय से २५-३० फीट दूर निवास करना चाहिए। घर के इर्द-गिर्द कहीं पानी तो नहीं जमा रहता, इस बात पर बराबर ध्यान रखना चाहिए। मच्छरों का स्वभाव है कि रात को अंधेरे में इधर-उधर घूमकर जीवों को काटते हैं। इसलिए मलेरिया से बचने के लिए मसहरी के अन्दर सोना चाहिए। मसहरी की जाली महीन होनी चाहिए ताकि मच्छर भीतर न घुस सकें।
सरसों का तेल समूचे शरीर पर लगाना चाहिए जिससे मलेरिया के मच्छर न काटें और काटें भी तो अधिक असर न हो। मलेरिया के दिनों में दो-तीन दिन के अन्तर से कुनाइन की एक खुराक खाने से भी मलेरिया नहीं होता।
निमोनिया या फुफ्फुसपाक
कारण व लक्षण
फेफड़ों में अकस्मात् सर्दी लगने से निमोनिया हो जाता है। निमोनिया अधिकतर कड़ी सर्दी के मौसम में पैदा होता है। बुखार, पसली में भयंकर दर्द, खाँसी तथा कष्ट से जल्दी-जल्दी श्वास लेना निमोनिया के प्रधान लक्षण हैं। एक तरफ की पसलियों में दर्द होने से एक तरफ का निमोनिया और दोनों तरफ की पसलियों में दर्द होने से दोनों तरफ का या डबल निमोनिया कठिन समझा जाता है। इस रोग में साधारणतया तीन अवस्थाएँ दिखाई पड़ती हैं --
प्रथमावस्था
इसमें फेफड़े में रक्त का संचय होता है और कम्प लगकर बुखार आता है। बुखार १०१ डिग्री से १०४ डिग्री तक बढ़ जाता है। खाँसी मामूली होती है, परन्तु खाँसने पर जरा-सा झागदार कच्चा कफ निकलता है। खाँसते समय पसली के भयानक दर्द से रोगी चिल्ला उठता है। रोग भयानक होने से साँस लेते समय भी पसलियों में दर्द होता है।
द्वितीयावस्था
इसके दो-तीन दिन बाद निमोनिया की यह अवस्था आ जाती है। इसमें खाँसने पर बहुत कठिनाई से लोहे के बुरादे जैसा या ईंट की सुर्खी जैसा कठिन और चिकना कफ निकलता है। देर तक खाँसने से जरा-सा कफ निकलता है। कभी-कभी कफ के साथ खून भी दिखाई देता है और छाती भारी मालूम होती है। सिरदर्द, तेज साँस चलना, साँस लेने में तकलीफ, नींद न आना, बेचैनी, अरुचि, जीभ का सफेद मैल से ढँका होना आदि लक्षण वर्तमान रहते हैं। नाड़ी और श्वास का प्राकृतिक अनुपात ४:१ से बदलकर ३:१ या और कम हो जाता है।
तृतीयावस्था
इसके तीन-चार दिन बाद तीसरी अवस्था आती है। यदि रोग आराम होने को होता है तो बुखार घटने लगता है, पसलियों का दर्द कम हो जाता है, खाँसते ही बिना तकलीफ से पका हुआ कफ निकलता है तथा रोगी को आराम मालूम होता है। परन्तु जब रोग बढ़ने को होता है तो दूसरी अवस्था में ही फेफड़े में मवाद पैदा हो जाता है। खाँसने से बहुत ज्यादा मात्रा में दुर्गन्धयुक्त कफ निकलता है, नाड़ी तेज और कमजोर हो जाती है तथा रोगी निर्बल और बेहोश होकर प्राणत्याग कर देता है।
रोग-परीक्षा
इस रोग की परीक्षा के लिए छाती की परीक्षा करने वाले स्टेथिस्कोप यन्त्र की सहायता लेनी चाहिए। इस यन्त्र से प्रथमावस्था में एक प्रकार का कठिन शब्द सुनाई देता है, बाद में बालों के आपस में रगड़ने जैसा शब्द सुनाई देता है। द्वितीयावस्था में फेफड़े के कठिन होने के कारण किसी तरह का शब्द सुनाई नहीं देता। तीसरी अवस्था में टप्-टप् शब्द सुनाई देता है। फेफड़े में मवाद होने पर धड़-धड़ शब्द सुनाई पड़ता है।
निमोनिया चिकित्सा
निमोनिया के कारण पसलियों में जितनी जगह दर्द हो, 'एण्टीफ्लोजेस्टीन' नाम के मलहम का लेप करें। यह मलहम किसी भी अंग्रेजी दवा बेचने वाली दुकान में मिल सकता है। लेप करने की विधि यह है कि डिब्बे को थोड़ी देर गरम पानी में रखें, इससे मलहम पतला हो जायगा। फिर चाय पीने वाले चम्मच की डण्डी के सहारे से आक्रान्त स्थान, यानी जितनी जगह पर निमोनिया का असर हो, उस पर गहरा लेप अच्छी तरह कर दें। लेप पर धुनी हुई रुई रखकर पतले कपड़े से अच्छी तरह बाँध दें। यह लेप एक रोज तक अपना असर रखता है। एक रोज में दर्द आराम न हो तो पहले वाले लेप को गर्म पानी की सहायता से धोकर पुनः लेप कर लेना चाहिए। यह इस रोग की बहुत बढ़िया दवा है और हमारी बहुत बार की परीक्षित है।
तीसी (अलसी) की पुल्टिश भी फायदेमन्द है। तीसी को महीन कूटकर गो-मूत्र के साथ अच्छी तरह पीसें, फिर मन्द आग से पकाकर हलवे जैसी पुल्टिश तैयार कर लें। जरा-जरा गर्म पुल्टिश को दर्द के स्थान पर बाँध दें। इस पुल्टिश को हर तीसरे घण्टे पर बदलें। इस तरह दिन-रात में ८ पुल्टिश देनी चाहिए। पुल्टिश बाँधते या उतारते समय रोगी को उठने-बैठने न दें, युक्तिपूर्वक रोगी को लेटे-लेटे ही बाँधें, नहीं तो उठने-बैठने के कष्ट से रोग बढ़ जायगा। पुल्टिश उतारकर उस जगह को ऐसे ही खुली न रहने दें। रुई या फलालेन के गर्म कपड़े से तुरन्त बाँध दें। निमोनिया में नीचे लिखे लेप भी फायदेमन्द हैं --
(१) अफीम २४३ मि.ग्रा., राई ९७२ मि.ग्रा., पुराना पापड़ (जो खाने के काम में आता है) ९७२ मि.ग्रा., कबूतर की विष्ठा ९७२ मि.ग्रा. -- इन चारों चीजों को गो-मूत्र के साथ बारहसिंगे के सींग से पीसकर दर्द के स्थान पर लेप करें और आग की सहायता से जल्दी सुखा दें।
(२) खाली बारहसिंगे के सींग को गो-मूत्र में पीसकर लेप करना भी अच्छा है।
(३) आक की जड़ की छाल को गो-मूत्र के साथ खूब महीन पीसकर समभाग गुड़ मिलाकर और मामूली तेल डालकर पका लें। इसकी पुल्टिश बाँधने से बहुत लाभ होता है।
खाने के लिए ऐसी दवा देनी चाहिए जिससे ज्वर नष्ट हो तथा कफ पतला होकर आसानी से निकल जाय --
(१) फिटकरी को आग पर पकाकर लावा (खील) बना लें और उसका महीन चूर्ण कर लें। ०.३५ ग्राम (३५० मि.ग्रा.) यह चूर्ण और १२१.५ मि.ग्रा. अभ्रक भस्म शहद के साथ चटावें। सुबह, दोपहर, शाम और रात को सोते समय -- इस तरह चार बार चटायें, निमोनिया में बहुत लाभ होगा। अगर कोई और दवा मिलने का मौका न मिले तो सिर्फ फिटकरी का लावा ३५० मि.ग्रा. चार बार दें और रोगी का उपचार ठीक रखें। भगवान की इच्छा से जरूर फायदा हो जायगा।
(२) अडूसा (वासक) की जड़ की छाल का रस पुटपाक रीति से निकालकर ११.६६ ग्राम लें और बराबर शहद मिलाकर रोगी को पिलावें, इससे निमोनिया में बहुत फायदा होगा।
(३) ५८.३२ ग्राम बारहसिंगा की सींग को १७५ ग्राम घृतकुमारी के लुआब में रख दें, फिर ऊपर कपड़-मिट्टी करके सुखा लें और शराव-सम्पुट करके ९.३३ किलो उपलों के बीच में रखकर फूँक दें। बारहसिंगा की अच्छी भस्म तैयार हो जायगी। यह निमोनिया की बहुत उत्तम और परीक्षित दवा है। यह भस्म २४३ मि.ग्रा. शहद के साथ तीन-चार बार चाटने से पसली का दर्द शीघ्र शान्त हो जाता है।
(४) निमोनिया का दर्द भयानक हो तो ५८.३२ ग्राम गो-मूत्र को अग्नि से लाल किये हुए कुल्हड़ में डालें और जो गो-मूत्र बाहर निकल जाय उसे रोगी को पिला दें। कुल्हड़ थाली में रखकर यह विधि करनी चाहिए। यह रोज नहीं पिलाना चाहिए, जब दर्द ज्यादा हो तभी पिलाना उचित है। इससे एक-दो दस्त भी रोगी को हो जाते हैं।
(५) द्राक्षारिष्ट २९.२ ग्राम में अपामार्ग (चिड़चिड़ा) का क्षार या कण्टकारी (कटेली) क्षार ४८६ मि.ग्रा. मिला दें -- यह एक खुराक। इस तरह की ४ खुराक दिन-रात में खिलायें। इससे कफ पतला होकर निकल जाएगा। निमोनिया की खाँसी में इससे निश्चय फायदा होगा।
(६) रोगी की कमजोरी या प्रलाप में रात को सोते समय एक गोली महालक्ष्मीविलास रस या बृहत् कस्तूरीभैरव रस या मकरध्वज एक मात्रा, पीपल का चूर्ण २४३ मि.ग्रा., शहद ३ ग्राम और वासक (अडूसा) का स्वरस ११.६६ ग्राम में देना बहुत अक्सीर है।
निमोनिया के रोगी को नीचे लिखे क्रम से दवा सेवन कराकर हमने लाभ उठाया है --
प्रातःकाल -- चन्द्रामृत रस (खाँसी रोग में लिखित) १ गोली, शहद २ ग्राम, पान का रस ३ ग्राम मिलाकर चटावें।
दिन को १० बजे और शाम को ४ बजे -- उपरोक्त द्राक्षारिष्ट एक-एक खुराक पिलायें।
रात को १० बजे -- ६१ मि.ग्रा. मकरध्वज, २४३ मि.ग्रा. बारहसिंगा की भस्म, ११.६६ ग्राम शहद और ११.६६ ग्राम वासक (अडूसा) का स्वरस मिलाकर पिलायें।
इस तरह दवा सेवन से तथा एण्टीफ्लोजेस्टीन का लेप करने और ठीक उपचार करने से निमोनिया का रोग निश्चय अच्छा हो जायगा। निमोनिया के रोगी को खाँसी बहुत तकलीफ देती है, उसके लिए अत्यन्त मुफीद और हमारी बहुत बार की परीक्षित चटनी यह है -- कायफल, पुष्करमूल, काकड़ासिंगी, पीपल -- इन चारों चीजों को बराबर परिमाण में लेकर चूर्ण करें। यह चूर्ण ११.६६ ग्राम, अभ्रक भस्म ४८७ मि.ग्रा. और शहद १४.६ ग्राम मिलाकर काँच के गिलास या एल्युमिनियम की प्याली में रख दें। दो घण्टे के अन्तर से एक अँगुली (४८७ मि.ग्रा.) भर चटावें -- बहुत लाभ होगा।
अष्टाङ्गावलेह (सन्निपात में लिखित) में अभ्रक भस्म मिलाकर चटाने से भी अच्छा फायदा करता है। रोगी को अगर कब्जियत हो तो मामूली दस्तावर दवा देकर पेट साफ कर देना उचित है।
निमोनिया में पथ्यापथ्य
भोजन के लिए साबूदाना, यवमण्ड, बकरी का दूध, मिश्री, मुनक्का आदि शीघ्र पचने वाला पथ्य देना चाहिए। रोगी को ऐसे स्वच्छ कमरे में रखें जिसमें गर्द-गुबार, भीड़-भाड़ न हो और निरन्तर ताजी हवा साँस लेने को उसे मिलती रहे, क्योंकि निमोनिया फेफड़ों का रोग है और फेफड़ों का प्रधान भोजन शुद्ध हवा है। परन्तु रोगी को ठण्ड न लग जाय इस बात का भी पूरा ध्यान रखना जरूरी है।
रोगी के पैरों को सावधानी से गर्म रखें। बदन में गर्म ऊनी कपड़ा पहनाये रखें। पीने के लिए गर्म पानी बार-बार यथेष्ट परिमाण में दें। यदि कब्ज हो तो ११.६६ ग्राम मुनक्का में ५.८ ग्राम हर्रे का चूर्ण गर्म दूध के साथ सेवन करावें। दर्द की जगह को ईंट को गर्म करके सेंकने से भी बहुत लाभ होता है। रोगी को बहुत जरूरत होने पर ही बोलना चाहिए। उठना-बैठना बिलकुल मना है। करवट भी जल्दी-जल्दी न लेनी चाहिए। रोगी को लेटे ही लेटे दस्त व पेशाब करना उचित है। रोगी को शान्त-भाव से धैर्य के साथ चुपचाप लेटे रहना चाहिए -- यही सर्वोत्तम पथ्य है। रोग की गम्भीरता का ध्यान रखकर योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
इन्फ्लुएंजा
लक्षण और प्रभाव
आयुर्वेद में इसको वातश्लेष्म ज्वर कहा गया है। विषाणुओं से वातावरण के दूषित एवं विषाक्त हो जाने के कारण यह रोग फैलता है। सबसे पहले गले में कुछ सुरसुरी-सी महसूस होती है और स्वर कुछ भारी हो जाता है, फिर नाक पर प्रभाव पड़ता है। जुकाम हो जाता है। मलेरिया की भाँति जाड़ा देकर अथवा साधारण ही ज्वर आ जाता है। कुछ समय बाद ज्वर १०४° तक बढ़ जाता है। प्यास और बेचैनी बढ़ती है। सारे शरीर में भयानक दर्द हो उठता है, सिर में तीव्र शूल होता है। भूख मर जाती है, सूखी खाँसी उठती है। रोग के विषैले तत्त्वों से श्वास-प्रणाली के प्रभावित होने पर निमोनिया भी हो जाता है। इसका ज्वर तो साधारणतः तीन दिन में चला जाता है, किन्तु रोगी रोग के प्रभाव से बहुत अशक्त और रक्तहीन हो जाता है और वह कमजोरी कई दिनों तक बनी रहती है।
इन्फ्लुएंजा का संक्रमण (प्रसार)
संक्रामक होने के कारण यह रोग शीघ्र और तीव्र गति से फैलता है। रोगी के सम्पर्क में आने से -- रोगी के छींकने-खाँसने इत्यादि से निःसृत विषाणु वायु के माध्यम द्वारा आसपास के व्यक्तियों में संक्रमित होने से यह रोग फैलता है। यह रोग जब फैल रहा हो तब सिनेमा, होटल, रेल, मोटर आदि भीड़ के स्थानों से बचना चाहिए। अधिकतर यह रोग गन्दी और घनी बस्तियों में जल्दी फैलता है। इस रोग का संचयकाल २४ से ४८ घंटे का है।
बचने के उपाय
रोग होने के पूर्व ही यदि इससे बचने के उपायों की तरफ ध्यान रखा जाय तो रोग से बचाव भली प्रकार हो सकता है। पूर्व बचाव के कुछ मुख्य उपाय निम्न प्रकार हैं --
(१) इस रोग का प्रभाव कमजोर मन वाले पर तुरन्त होता है, इसलिए जीवन-मरण को सृष्टि का क्रम समझकर और ईश्वर की कल्याणकारी शक्ति पर विश्वास रखकर मन को सदैव निडर और साहसी रखिये। विश्वास रखिये कि यह बीमारी बहुत भयंकर नहीं है और सावधानी रखने पर कभी तीव्र प्रभाव नहीं कर सकती। रोग के दिनों में अधिक श्रम की थकान से बचिये।
(२) शरीर को स्वस्थ रखने और प्रतिरोधक शक्ति को स्थायी रखने के लिए संयम और ब्रह्मचर्य का भरपूर पालन कीजिए।
(३) भोजन हल्का, सुपाच्य और कम ही कीजिए। भारीपन महसूस होने पर तुरन्त उपवास कीजिए।
(४) पेट को हल्का और साफ रखिये। कब्जियत होने पर त्रिफला चूर्ण या गुलकन्द अथवा अन्य कोई साधारण दवा लेकर पेट साफ कर लीजिए।
(५) यह रोग सर्वप्रथम गले में होता है। नाक और गले की झिल्ली प्रदाहयुक्त हो जाती है। इसके लिए दो प्रयोग सर्वोपयोगी हैं --
- गरम पानी में थोड़ा नमक डालकर गरारा (कुल्ला) करना और
- नाक में सरसों का तेल सूँघना। जिन लोगों को बार-बार सर्दी-जुकाम होता हो उन्हें हम सरसों का तेल सुंघाने का प्रयोग करते हैं। बंगाल में स्नान के पूर्व सरसों के तेल की मालिश करने और सूँघने का आम रिवाज है। दमा के रोगियों को बार-बार सर्दी-जुकाम होने पर सरसों का तेल सूँघने की आदत डाली जाती है। इन्फ्लुएंजा में यह प्रयोग नाक एवं गले की झिल्ली को सुरक्षित रखने के लिए बहुत हितकर होगा। नित्य प्रातःकाल उठकर दो बूँद सरसों का तेल सूँघना चाहिए। शुद्ध सरसों के तेल से किसी प्रकार का विकार नहीं होता, जैसा कि टीका आदि लगवाने से प्रायः हो जाता है। नाक के सामने कपड़ा रखने से देह-रक्षा होती है।
(६) यह रोग आर्द्र वातावरण से अधिक होता है, अतः बरसात में भीगने से बचना चाहिए। ओस पड़ने वाले खुले स्थान में नहीं सोना चाहिए और गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
(७) १०-१५ तुलसी पत्र तथा ५-७ काली मिर्च, जरा-सा टुकड़ा दालचीनी और अदरक कूटकर, पानी में उबालकर और शक्कर मिलाकर चाय की भाँति पीना चाहिए। रोग फैलने के समय में इसके द्वारा अच्छा बचाव होता है।
(८) रात को अधिक जागने, बाजारू मिठाई, गले हुए फल, बासी भोजन और भीड़-भाड़ के स्थानों में जाने से अपने को बचाना चाहिए।
(९) रहने के स्थान को अधिक से अधिक साफ-सुथरा रखना चाहिए। घर में नित्य नीम के पत्तों और गुग्गुल की धूनी देनी चाहिए। सर्वसाधारण जन वातावरण की शुद्धि के लिए गुग्गुल, राल, नीम की पत्ती, देवदारु इत्यादि की धूप से काम निकाल सकते हैं।
रोग हो जाने पर
उपरोक्त बचाव के नियमों का भली-भाँति पालन करने पर यह निश्चित है कि रोग नहीं होगा। बचाव के नियमों के पालन में असावधानी हो जाने से यदि रोग हो भी जाय तो कदापि उससे घबराना या भयभीत नहीं होना चाहिए। घर के किसी व्यक्ति को यदि रोग हो जावे तो शेष सब घरवालों का यह परम कर्त्तव्य है कि वे अपने को तथा पास-पड़ोस वालों को रोग से बचावें और सब प्रकार की सफाई इत्यादि की सावधानी रक्खें। निर्भय होकर विधिवत् रोगी की परिचर्या करते हुए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए --
(१) रोग होते ही रोगी को साफ और हवादार कमरे में आराम से लेटे रहना चाहिए। बच्चों को रोगी से अलग रखना चाहिए। पीने के लिए गरम पानी देना चाहिए। आधा गिलास गुनगुने जल में एक चुटकी नमक डालकर रोगी को गरारा (कुल्ला) करा देना चाहिए।
(२) ज्वर की अवस्था में रोगी को अन्न कदापि न दें। एक-दो दिन का उपवास सम्भव हो तो करायें। दूध, चाय, मौसमी का रस, या मुनक्का खिलाकर पानी पिला दें।
(३) यह बराबर ध्यान रखना चाहिए कि रोगी का गला साफ रहे। इसके लिए गले में दवा लगाना और उपरोक्त प्रकार से बार-बार गरारा करना चाहिए।
(४) अन्य लोगों को रोग न लगे इसके लिए रोगी के अधिक पास किसी को बात न करने देना चाहिए। रोगी के थूक या कै को तुरन्त राख या चूना से दबा देना चाहिए। रोगी के कपड़ों को दूसरों से अलग और साफ रखना चाहिए।
(५) रोगी से बात करते समय नाक-मुँह के सामने स्वच्छ कपड़ा रखना चाहिए।
आयुर्वेदिक दवा
इन्फ्लुएंजा में अब तक के अनुभव से आयुर्वेदीय औषधियाँ विशेष लाभकारी सिद्ध हुई हैं। इसलिए शास्त्रोक्त आयुर्वेदीय औषधियों का ही प्रयोग करना चाहिए; यथा --
(१) छोटी कटेरी, गिलोय, सोंठ और पुष्करमूल ३ ग्राम लेकर २३४ ग्राम पानी में उबालें, ५८.३२ ग्राम शेष रहने पर ११.६६ ग्राम शहद डालकर रख लें। २३.३२ ग्राम हर ४ घण्टे पर देने से इन्फ्लुएंजा, पसली का दर्द, कास और श्वास रोग ठीक होता है।
(२) त्रिभुवनकीर्ति रस अथवा लक्ष्मीविलास रस (नारदीय) की १२१.५ मि.ग्रा. की गोली, गोदन्ती हरताल भस्म २४३ मि.ग्रा. के साथ तीन ग्राम अदरक का रस मिलाकर शहद में लेना चाहिए। यह जवान आदमी के लिए पूरी खुराक है। इस प्रकार की तीन खुराक सुबह, दोपहर, शाम नित्य देनी चाहिए। बच्चों के लिए आयु के अनुसार मात्रा निश्चित करनी चाहिए।
(३) त्रिभुवनकीर्ति और नारदीय लक्ष्मीविलास रस सुलभ न हों तो संजीवनी वटी, कल्पतरु रस और आनन्दभैरव रस का भी प्रयोग किया जा सकता है।
(४) रोगी को अधिक खाँसी और जुकाम हो तो मरिचादि वटी, एलादि वटी, व्योषादि वटी -- किसी भी वटी को चूसने के लिए दिया जा सकता है। यदि कफ न निकलता हो और खाँसी ज्यादा हो तो चन्द्रामृत रस को मिश्री के साथ चूसने को देना चाहिए या गुलबनफ्शादि काढ़ा पीने को देना चाहिए।
(५) यदि रोग किसी कारण से निमोनिया में परिवर्तित हो जावे तो उसकी चिकित्सा शीघ्र किसी योग्य एवं अनुभवी चिकित्सक से करानी चाहिए। योग्य चिकित्सक जब तक न मिले तब तक शृङ्ग भस्म २४३ से ३२४ मि.ग्रा. (३-४ रत्ती) का प्रयोग किया जा सकता है।
सन्निपात ज्वर
आन्त्रिक सन्निपात ज्वर
यह सन्निपात ज्वर (टाइफाइड) बहुत भयानक होता है। हिफाजत और योग्य चिकित्सा होने पर ही इसके रोगी बच सकते हैं। इस बुखार का आक्रमण विशेषकर आँतों पर होता है, इसलिए इसका नाम 'आन्त्रिक सन्निपात ज्वर' हुआ है। इसका भोगकाल २१ दिन से ४२ दिन तक होता है। सड़ा हुआ मल, बाजार की गन्दी नालियों की बदबू, दूषित जल या दूध से एक खास प्रकार के कृमि (टाइफाइड बैसिलस) द्वारा इस रोग की उत्पत्ति होती है। उपर्युक्त कीड़े रोगी के दस्त में देखे जाते हैं, इसलिए इस रोग की गणना छूत के रोगों में की जाती है।
रोग का विष शरीर में घुसने पर सात रोज तक कुछ विशेष दुर्लक्षण प्रकट नहीं होते, सात रोज के बाद रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं -- जैसे पेट का फूलना, पेट में विशेष करके नीचे के भाग को दबाने से दर्द होना, यकृत् के नीचे वाले भाग को दबाने से एक तरह के शब्द का होना, तिल्ली और विशेषकर यकृत् का बड़ा होना आदि। बुखार बराबर बना रहता है। पहले सप्ताह में तो कुछ विशेष दुर्लक्षण दिखाई नहीं पड़ते, परन्तु दूसरा सप्ताह शुरू होते ही रोग अपना भयानक रूप धारण कर लेता है। दस्त होना, कभी-कभी (किसी रोगी की) आंत से एकदम खून गिरना, चावल का पानी या मांस धोवन जल के जैसा दस्त होना, निःश्वास के साथ दुर्गन्ध मालूम होना, माथे के अग्रभाग में दर्द, सिर घूमना, कान सों-सों करना, बेचैनी की नींद, प्रलाप, बेहोशी, अस्थिरता, चौंकना, उठकर भागने की इच्छा करना या एकदम निश्चेष्ट भाव से आधी आँखें बन्द करके पड़ा रहना आदि इसके लक्षण हैं। इस रोग में एक तरह की विशेष गन्ध आती है जिसकी सहायता से चतुर वैद्य तुरन्त इस ज्वर का निश्चय कर लेता है।
रोग का जोर होने पर क्रमशः गला, छाती, पेट, जाँघ आदि स्थानों पर चमकने वाली सफेद और छोटी-छोटी फुन्सियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिनको अनेक प्रान्त वाले मोतीझरा कहते हैं। पेशाब का रंग लाल और परिमाण में उसकी मात्रा कम हो जाती है। जीभ पहले सरक्त और रोग के बढ़ने से मैली हो जाती है। रोग जिस मात्रा में कम होता जाता है उसी मात्रा में जीभ भी अग्रभाग से साफ होने लगती है। खाँसी कभी कम और कभी किसी की ज्यादा हो जाती है, परन्तु खाँसी होना कुछ निश्चित नहीं है। रक्ताधिक्य होने से तथा निमोनिया आदि उपद्रव होने से रोगी की मृत्यु हो जाती है। आँतों को ढकने वाली झिल्ली में प्रदाह होने से पेशाब की बीमारी पैदा हो जाती है। दस्त होना अरिष्ट लक्षण है।
शरीर का ताप -- इस रोग में शरीर का ताप प्रतिदिन धीरे-धीरे बढ़ता और धीरे-धीरे घटता भी है। रोग के प्रथम सप्ताह में पाँच-छः दिन तक सायंकाल १०० डिग्री से १०२ डिग्री तक बुखार होता है, परन्तु प्रातःकाल डेढ़ डिग्री बुखार कम हो जाता है। दूसरे सप्ताह में शरीर का ताप १०३ डिग्री से १०५ डिग्री तक बढ़ जाता है, कभी-कभी १०६ डिग्री तक बढ़ा हुआ देखा गया है। तीसरे सप्ताह के आदि में बुखार का कम होना शुभ लक्षण और बुखार का बढ़ना खराब समझना चाहिए। प्रलाप करना, चौंकना, उठकर भागना आदि तीसरे सप्ताह तक वर्तमान रहते हैं।
मस्तिष्क सन्निपात ज्वर
इस ज्वर का भोगकाल या लक्षण सब ऊपर लिखे ज्वर से ही मिलते हैं। अन्तर यही है कि इस सन्निपात में दस्त या खून के दस्त बिलकुल नहीं होते। जो कुछ विकार होता है वह दिमाग में ही होता है। यह उतना कठिन नहीं है। रोगी को हिफाजत और बुद्धिमानी से रखा जाय तो बचने की पूरी आशा रहती है।
सन्निपात चिकित्सा
सन्निपात रोग भयानक है, इसलिए विद्वान् और अनुभवी वैद्य से ही चिकित्सा करावें। यदि उत्तम वैद्य या डाक्टर का प्रबन्ध न हो तो नीचे लिखे अनुसार चिकित्सा करें। भगवान् की दया से रोगी को निश्चय फायदा होगा। मूर्ख लोग वैद्यक-शास्त्र के मर्म को न जानकर बहुत अण्ट-सण्ट दवा देकर रोग को खराब कर देते हैं, इसलिए यदि समय पर दवा का प्रबन्ध नहीं हो सके तो उतनी खराबी नहीं है, जितनी खराबी अनभिज्ञ वैद्यों के इलाज से देखी जाती है।
अत्यधिक सन्निपात ज्वर में पहले आमदोष और कफ को शान्त करने की दवा देनी चाहिए। फिर बाद में पित्त और कफ का इलाज करना चाहिए। आमदोष की शान्ति के लिए पंचकोल (सोंठ, मिर्च, पीपल, पीपलामूल तथा चव्य) चूर्ण १ ग्राम के साथ ६१ मि.ग्रा. मकरध्वज शहद में चटा देना चाहिए। इसकी रोज प्रातःकाल एक खुराक दे दी जाय तो रोगी की हालत खराब न हो पायेगी।
कफ की शान्ति के लिए नीचे लिखा निष्ठीवन कराना चाहिए -- सेंधा नमक, सोंठ, काली मिर्च, पीपल -- इन चारों दवाओं का चूर्ण ११.६६ ग्राम अदरक के रस में मिलाकर रोगी के मुँह में रखवा कर थुकवा दें। निगलने न दें। इस तरह दो-तीन बार थुकवाएँ। इस तरह अवस्थानुसार तीन-चार बार थुकवाने से हृदय, पसली, माथा और गले का कफ निकल जाता है।
बड़े नींबू का रस और अदरक का रस ६ ग्राम में सेंधा, काला और समुद्री नमक -- तीनों मिलाकर एक ग्राम डालें। इसके सूँघने से कफ की शान्ति होगी।
पीपलामूल, सेंधा नमक, पीपल और महुए का फूल बराबर लेकर चूर्ण करें, फिर जितना चूर्ण हो उतना ही काली मिर्च का चूर्ण मिला दें। इसको गर्म पानी में मिलाकर सुंघाएँ। इससे बेहोशी, तन्द्रा (आधी आँखें बन्द करके पड़ा रहना), प्रलाप और माथे का भारीपन दूर होगा।
सेंधा नमक, सहजन का बीज, सफेद सरसों और कूठ -- इन चारों दवाओं का चूर्ण बकरी के मूत्र में पीसकर सुंघाएँ तो तन्द्रा दूर होगी।
सहजन का बीज, पीपल, काली मिर्च, सेंधा नमक, लहसुन, मैनसिल और वच -- इन सातों चीजों का महीन चूर्ण गो-मूत्र में पीसकर आँखों में अंजन करें तो बेहोशी नष्ट होगी।
मृत्युञ्जय रस २४३ मि.ग्रा., प्रवाल भस्म ४८६ मि.ग्रा. को शहद के साथ तीन-तीन घण्टे के अन्तर से चटाना चाहिए। इससे रोग बहुत शीघ्र शान्त हो जाता है।
अष्टाङ्गावलेह
कायफल, पुष्करमूल, काकड़ासिंगी, सोंठ, मिर्च, पीपल, जवासा, स्याह जीरी -- इन आठों दवाओं को समभाग लेकर महीन चूर्ण कर लें। इसी का नाम "अष्टाङ्गावलेह" है। यह चूर्ण १.५ ग्राम अवस्थानुसार शहद या अदरक के रस में मिलाकर दिन-रात में ३-४ बार चटाने से सन्निपात ज्वर में अच्छा फायदा होता है। -- र० र०
कस्तूरीभैरव रस
शुद्ध हिंगुल, शुद्ध विष, सुहागे का लावा, जावित्री, जायफल, काली मिर्च, पीपल, असली कस्तूरी -- इन आठों चीजों को समभाग लेकर महीन चूर्ण करें। फिर पत्थर के खरल में पान का रस दे-देकर दो रोज खूब घोटें, फिर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। इसको "कस्तूरीभैरव रस" कहते हैं। यह सन्निपातज्वर की अमोघ दवा है। रात्रि को सोते समय १ गोली ११.६६ ग्राम शहद और ११.६६ ग्राम अदरक के रस के साथ देने से तत्काल फायदा होता है।
अमरसुन्दरी वटी जो वातव्याधि-अधिकार में लिखी गयी है, सन्निपात (विशेष करके प्रलाप) में भी लाभ करती है। -- र० सा० सं०
सन्निपात भैरव रस
शुद्ध हिंगुल २३.२ ग्राम, शुद्ध गन्धक और शुद्ध वत्सनाभ प्रत्येक २३.२ ग्राम, धतूरे का बीज ३५ ग्राम, फुलाया हुआ सुहागा ११.६६ ग्राम -- इन सबके चूर्ण को जम्बीरी नींबू के रस में घोटकर १२१.५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। इसका नाम "सन्निपात भैरव रस" है। सन्निपात के प्रलाप आदि तीव्र वातविकारों में अदरक के रस के साथ १-१ गोली देने से बहुत लाभ होता है। -- भै० र०
चिकित्साक्रम
नीचे लिखे क्रमानुसार चिकित्सा करने से हमने बहुत लाभ देखा है --
- प्रातःकाल ६१ मि.ग्रा. मकरध्वज, एक ग्राम पंचकोल चूर्ण शहद के साथ;
- शाम को चार बजे एक या दो गोली मृत्युञ्जय रस शहद के साथ;
- रात को १० बजे एक गोली कस्तूरीभैरव रस अदरक के रस और शहद के साथ;
- दिन-रात में ११.६६ ग्राम अष्टाङ्गावलेह शहद या अदरक के रस के साथ दें।
सन्निपात रोगी के बुखार पर सबसे ज्यादा ध्यान रखें। १०३ डिग्री से ऊपर बुखार होते ही बरफ के टुकड़ों को रबड़ की थैली में डालकर दिमाग पर बराबर रखें। यदि बरफ और रबड़ की थैली न मिले तो ११.६६ ग्राम यू-डी-कोलोन में ११६ ग्राम पानी डालकर एक पात्र में रखें। उस पात्र में सफेद कपड़ा भिगोकर बराबर दिमाग पर रहने दें। अगर यह भी न हो सके तो कलमी शोरा ५.८ ग्राम और नौसादर ५.८ ग्राम ९३३ ग्राम पानी में डालकर रखें। फिर इसी जल में कपड़ा भिगोकर दिमाग के अग्रभाग पर रखें। स्त्री का दूध डालें या चरकोक्त दशाङ्ग चूर्ण का लेप करें। इससे शरीर का ताप निश्चय कम हो जायगा।
सन्निपातज्वर में ज्यादा जोर का बुखार रहना अनिष्ट का लक्षण है। इसलिए ऊपर वाली क्रिया से बुखार का वेग कम कर देना चाहिए। ५ से १० लौंग को जल के साथ खूब महीन पीसें फिर एक छटाँक ठण्डे जल में मिलाकर रोगी को पिला दें, आधा घण्टा बाद थर्मामीटर लगाकर देखें तो दो-तीन डिग्री बुखार कम हो जायगा।
नाड़ी के क्षीण होने पर
सन्निपातज्वर में नाड़ी कमजोर और देह शीतल होने पर, मकरध्वज १२१.५ मि.ग्रा., कस्तूरी और कपूर प्रत्येक ६१ मि.ग्रा. -- इन सबको एक जगह शहद में मिलाएँ। २३.२ ग्राम पान का रस और २३.२ ग्राम अदरक का रस मिलाकर समयानुसार तीन-चार बार रोगी को पिलाएँ। इससे फायदा होने की पूरी आशा है।
अधिक पसीना आने से कभी-कभी रोगी के अनिष्ट होने की सम्भावना रहती है, ऐसी हालत में भुनी हुई कुलथी का महीन चूर्ण (सतुआ) अथवा अबीर (गुलाल) सम्पूर्ण शरीर पर मालिश करें। चूल्हे की जली हुई मिट्टी के चूर्ण की मालिश करने से पसीना बन्द हो जाता है।
पथ्यापथ्य
सन्निपात ज्वर के रोगी के पथ्यापथ्य पर खूब ध्यान रखना चाहिए। पथ्य पर विशेष ध्यान न दिया जाय तो उत्तम चिकित्सा से कुछ भी लाभ नहीं होगा। रोगी को साफ हवादार कमरे में लिटाना चाहिए। जब तक रोग अच्छी तरह आराम न हो जाय तब तक रोगी को एकदम लेटे रहना चाहिए। दस्त-पेशाब भी लेटे ही लेटे करना चाहिए। दस्त बर्तन या 'बेडपेन' में कराना चाहिए। जहाँ तक हो सके रोगी को हिलने-डुलने न दें।
खुराक में कोई कठिन वस्तु न दें, बलकारक और जल्दी हजम होने वाली खुराक दें। दूध, साबूदाना, बार्ली आदि बिल्कुल नरम पेय दें। दूध के साथ एक चुटकी खाने का सोडा या एक चम्मच चने का पानी (देखें बालरोग) मिलाकर दें, तो बहुत उत्तम रहे। मीठा सन्तरा, मौसमी, अनार, बेदाना आदि फलों का रस दें। गुनगुने पानी से साफ तौलिये को भिगोकर सम्पूर्ण शरीर को अच्छी तरह रोज एक बार पोंछ देना चाहिए, फिर सूखे तौलिया से पोंछ डालना चाहिए।
अन्यान्य ज्वरों के परीक्षित योग
(१) गिलोय, धनिया, नीम की छाल, पद्माख, लाल चन्दन -- इन पाँचों दवाओं को २३.२ ग्राम वजन में लें और काढ़ा बनाकर पिलाएँ। इसका नाम 'गुडूच्यादि क्वाथ' है। यह सब तरह के बुखार में लाभ पहुँचाता है। इससे जलन, उबकाई, प्यास, कै, अरुचि आदि व्याधियाँ आराम होती हैं।
(२) अमलतास का गूदा, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी, बड़ी हरड़ -- इन पाँचों दवाओं को २३.२ ग्राम लेकर काढ़ा बनाएँ। इसके पीने से पेट साफ हो जाता है, एक-दो दस्त भी हो जाते हैं। पुराना बुखार भी आराम हो जाता है। यदि आँव, पेचिस और बुखार साथ हों तो इससे बहुत फायदा होता है। इसका नाम 'आरग्वधादि क्वाथ' है।
(३) गिलोय, पित्तपापड़ा, चिरायता, कुटकी, अमलतास -- इन पाँचों दवाओं का काढ़ा शहद डालकर पीने से जीर्णज्वर ठीक होता है। जो लोग बार-बार बुखार से सताये जाते हैं, वे इसके सेवन से निश्चय अच्छे हो जायेंगे। इसका सेवन ४० रोज तक करना चाहिए।
(४) हरड़, बहेड़ा, आँवला, हल्दी, दारूहल्दी, कटेली (कण्टकारी), बृहत् कण्टकारी, कचूर (सठी), सोंठ, मिर्च, पीपल, पीपलामूल, मूर्वामूल, गिलोय, धमासा, कुटकी, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, त्रायमाणा (अभाव में गुलबनफ्शा), नेत्रवाला, नीम की छाल, पुष्करमूल, मुलेठी, कूड़े की छाल (कुटज), अजवायन, इन्द्रजौ, भारङ्गी, सहजन के बीज, आग पर फुलाई फिटकरी, वच, दालचीनी, पद्माख, खश, सफेद चन्दन, अतीस, खरेंटी (बरियार), शालपर्णी, तगर, वायविडंग, चीतामूल (चित्रक), देवदारु, चव्य, पटोलपत्र, जीवक (अभाव में शतावरी), ऋषभक (अभाव में असगन्ध), लौंग, वंशलोचन, कमल, काकोली (अभाव में शकाकुल मिश्री), तेजपत्ता, तालीसपत्र और जावित्री -- इन सब दवाओं को समभाग लेकर चूर्ण कर लें। इस चूर्ण के वजन से आधा चिरायता का चूर्ण मिलाकर अच्छे बरतन में रख दें। इसका नाम 'सुदर्शन चूर्ण' है। यह सब तरह के बुखार में फायदा करता है। ३ ग्राम से ६ ग्राम तक की मात्रा जल के साथ लेनी चाहिए। कब्जियत में गर्म पानी के साथ लेना चाहिए। जिन लोगों से इसका चूर्ण न फाँका जावे, वे ११.६६ ग्राम चूर्ण का काढ़ा बनाकर या फाण्ट बनाकर ले सकते हैं। जिस तरह श्री भगवान का सुदर्शन चक्र सब दैत्यों को नष्ट करता है, उसी तरह यह सुदर्शन चूर्ण सब तरह के बुखार को नष्ट करता है। पित्त का ज्वर, वायु का ज्वर, कफ का ज्वर, पुराना से पुराना ज्वर, कुनाइन से अटका हुआ ज्वर आदि सब ज्वरों की यह प्रसिद्ध दवा है। धनी आदमियों को तो इसे धर्मार्थ बँटवाना चाहिए।
(५) गिलोय, पीपलामूल, छोटी पीपल, कुटकी, हरड़, सफेद चन्दन, नीम की अन्तर-छाल, लौंग, सोंठ -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम और चिरायता ५२ ग्राम -- इन सबको महीन चूर्ण करके ३ ग्राम से ६ ग्राम तक जल के साथ देने से सब तरह के बुखार में फायदा करता है। विशेषकर जीर्ण ज्वर में यह बहुत लाभकारी है। इसका नाम 'लघु सुदर्शन चूर्ण' है। -- यो० र०
(६) फिटकरी का लावा महीन पीसकर ४८७ से ६०७ मि.ग्रा. (४ से ५ रत्ती) की खुराक में मिश्री मिलाकर जल के साथ देने से कम्प देकर आने वाला बुखार आराम होता है। इससे खाँसी में भी अच्छा फायदा होता है।
(७) हरसिंगार के पत्ते के ११.६६ ग्राम रस में बराबर शहद मिलाकर देने से पुराना बुखार अच्छा हो जाता है। १२१.५ मि.ग्रा. मकरध्वज और मिला दिया जाय तो तत्काल फायदा होता है।
लाक्षादि तैल
मूर्च्छित किया हुआ तिल का तेल ९३३ ग्राम, सौंफ, हल्दी, मूर्वा-मूल, कूठ, रेणुका, कुटकी, मुलेठी (यष्टिमधु), रास्ना, असगन्ध, देवदारु, मोथा, सफेद चन्दन -- इन १२ द्रव्यों को १४.६ ग्राम (१ तोला) लें, उनका कल्क करके तेल में डाल दें। साथ में ३.७३ किलो दही का पानी और ३.७३ किलो पीपल की लाख का काढ़ा डालकर पकावें। जब केवल तेल शेष रह जाय तब छानकर बोतल में भर लें।
(नोट -- ३.७३ किलो पीपल की लाख में १५ किलो पानी और एक पाव सज्जीक्षार डालकर काढ़ा करें और ३.७३ किलो जल बाकी रहने पर तेल में डालें। लाख के साथ सज्जी न मिलाने से लाख का रस ठीक तरह नहीं निकलता है।)
यह जीर्णज्वर, क्षय, कास-श्वास आदि विकारों में बहुत फायदेमन्द है। यह बालकों के सूखा आदि रोगों में बहुत लाभदायक है। -- भै० र०
अमृतारिष्ट
गिलोय और दशमूल प्रत्येक ५.८३ किलो को ६० किलो पानी में औटाएँ। १५ किलो पानी रहने पर छान लें। फिर उसी काढ़े में गुड़ १७.५ किलो (३ तुला), ९३३ ग्राम काला जीरा, ११६.६ ग्राम पित्तपापड़ा, सप्तपर्ण (छतिवन-छाल), सोंठ, मिर्च, पीपल, मोथा, नागकेशर, कुटकी, अतीस और इन्द्रजौ -- ये १२ दवाइयाँ प्रत्येक ५८.३ ग्राम लेकर सबका चूर्ण करके ऊपर वाले काढ़े में मिला दें। फिर सब द्रव्यों को एक पात्र में रखकर मुँह बन्द कर दें। यह एक महीने में तैयार हो जायगा। फिर छानकर बोतल भर लें। इसी का नाम 'अमृतारिष्ट' है। यह भी सुदर्शन चूर्ण की तरह सब बुखार में फायदा करता है। इसकी मात्रा २९ ग्राम से ५८ ग्राम तक है। -- भै० र०
स्वर्णवसन्तमालती
स्वर्णभस्म ११.६६ ग्राम, मोतीपिष्टी २३.२ ग्राम, शुद्ध हिंगुल ३५ ग्राम, काली मिर्च का चूर्ण ४६.४ ग्राम, खपरिया ९२.८ ग्राम -- इन पाँचों दवाओं को बढ़िया पत्थर के खरल में डालकर बढ़िया ताजा घी से भिगो दें, फिर कागजी नींबू का रस दे-देकर पाँच-सात रोज घोटें। जब दवा से घी की चिकनाहट चली जाय तब इच्छानुसार वजन की टिकिया बना लें। इसी का नाम 'स्वर्णवसन्तमालती' है।
दो छोटी पीपल के चूर्ण और शहद के साथ १२१.५ से २४३ मि.ग्रा. तक इसकी मात्रा दी जाती है। सितोपलादि चूर्ण १ ग्राम के साथ दें। पुराने बुखार में यह जल्दी फायदा करती है। इससे मन्दाग्नि और कमजोरी भी ठीक हो जाती है। वसन्तमालती के बनाने में घी डालने का खूब ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो दवा खराब हो जायगी। दवाओं के चूर्ण में धीरे-धीरे घी इतना मिलाना चाहिए कि रोटी बनाने के जल मिले हुए आटे के समान हो जाय। वर्षा के समय वसन्तमालती बढ़िया नहीं बनती -- इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए। -- भै० र०
लघुमालिनी वसन्त
खपरिया ९२.८ ग्राम, सफेद मिर्च का चूर्ण ४६.८ ग्राम, गाय का मक्खन १४०.६६ ग्राम -- इन तीनों को मिलाकर नींबू के रस में ४ दिन तक घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। शहद, पीपल, दूध के साथ देने से सब प्रकार के ज्वर, खास करके जीर्ण ज्वर में बहुत लाभ होता है। पित्त-विकार, रक्त-विकार, नेत्ररोग आदि भी आराम होते हैं। छोटे बालक और सगर्भा स्त्री के लिए यह श्रेष्ठ दवा है। महाराष्ट्र में इसका बहुत प्रचार है।
जयमंगल रस
शुद्ध (हिंगुलोत्थ) पारा, शुद्ध गन्धक, फुलाया हुआ सुहागा, ताम्र भस्म, वंग भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म, सेंधा नमक और काली मिर्च -- ये आठों चीजें ११.६६ ग्राम; स्वर्ण भस्म २३.२ ग्राम, कान्त लौह भस्म ११.६६ ग्राम और चाँदी भस्म ११.६६ ग्राम -- इन सब दवाओं को खरल में डालकर धतूरे के पत्ते का रस, हरसिंगार के पत्ते का रस, दशमूल का काढ़ा और चिरायते के काढ़े की तीन-तीन भावना देकर इनकी २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें और जीरे का चूर्ण तथा शहद के साथ दें। इससे पुराने से पुराना बुखार निश्चय अच्छा होता है। यह बल और पुष्टि बढ़ाने में भी उत्कृष्ट औषध है। जो बुखार अन्य दवा से अच्छा न होता हो वह इससे जरूर अच्छा हो जाता है। -- भै० र०
बृहत् सर्वज्वरहर लौह
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताम्र भस्म, अभ्रक भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म, सोना भस्म, चाँदी भस्म और शुद्ध हरिताल -- ये आठ द्रव्य प्रत्येक ११.६६ ग्राम तथा कान्त लौह भस्म ४६.४ ग्राम -- सबको एकत्र कर करेले के पत्ते का रस, दशमूल का काढ़ा, पित्तपापड़ा का काढ़ा, त्रिफला का काढ़ा, गिलोय का रस, काकमाची का रस, सम्भालू (निर्गुण्डी) के पत्ते का रस, पुनर्नवा का रस और अदरक का रस -- इन चीजों की प्रत्येक की सात-सात भावना देकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। इसे पुराना गुड़ और पीपल के साथ सेवन करें। यह सब तरह के ज्वर की रामबाण दवा है। किसी तरह का ज्वर हो इससे अवश्य लाभ होता है। यकृत और प्लीहा भी ठीक होती हैं। -- भै० र०
पुटपक्व विषमज्वरान्तक लौह
शुद्ध हिंगुलोत्थ पारा और गन्धक ११.६६ ग्राम की कज्जली करके पर्पटी की तरह बना लें और सोना भस्म ३ ग्राम; लौह भस्म, अभ्रक भस्म तथा ताम्र भस्म प्रत्येक २३.२ ग्राम; वंग भस्म, गेरू मिट्टी, प्रवाल भस्म प्रत्येक ५.८३ ग्राम; मोती भस्म, शंख भस्म, सीप भस्म प्रत्येक तीन-तीन ग्राम। ये सब द्रव्य पानी में घोटकर सीप में बंद कर कपड़-मिट्टी का लेप करके सुखा लें। फिर ८-१० उपलों की आग में रखकर पुट दें।
इसकी मात्रा २४३ मि.ग्रा. तथा अनुपान -- पीपल का चूर्ण, हींग और सेंधा नमक है। इसके सेवन से सब प्रकार का ज्वर, पाण्डु, यकृत, प्लीहा, प्रमेह, संग्रहणी आदि रोग आराम होते हैं। यह पुराने और बराबर आने वाले ज्वर की उत्कृष्ट दवा है। -- भै० र०
कल्पतरु रस
शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष, शुद्ध मैनसिल, शुद्ध रौप्यमाक्षिक (विमल) और फुलाया हुआ सुहागा -- प्रत्येक ११.६६ ग्राम, सोंठ २३.२ ग्राम, पीपल २३.२ ग्राम, काली मिर्च १४० ग्राम -- सबका बारीक चूर्ण लेकर घोंटकर कपड़छान करके शीशी में रख दें। इसका नाम 'कल्पतरु रस' है। इसकी मात्रा १२१.५ मि.ग्रा. है, अदरक के रस के साथ दोनों समय लें। यह वात और कफ ज्वर के लिए बहुत उत्तम दवा है। सर्दी, मूर्च्छा में इसका नस्य भी दिया जाता है।
त्रिभुवनकीर्ति रस
शुद्ध हिंगुल, शुद्ध वत्सनाभ, सोंठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, अग्नि पर फुलाया हुआ सुहागा और पीपलामूल -- इन सात दवाओं को समभाग लेकर महीन कपड़छान कर चूर्ण को अदरक का रस, तुलसी का रस और धतूरे की पत्ती का रस -- प्रत्येक की तीन-तीन भावना देकर १२१.५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। यदि इसमें तीन भावना कागजी नींबू के रस की दें तो विशेष लाभदायक होता है। इसका नाम 'त्रिभुवनकीर्ति रस' है।
यह नये बुखार में खास करके वात और कफ के विकार (इन्फ्लुएंजा) में विशेष फायदा करता है। अदरक के रस और मधु के साथ अथवा तुलसी का रस या बिल्वपत्र के फाण्ट के साथ सुबह-शाम और रात्रि में तीन बार देने से पसीना आकर बुखार उतर जाता है। दो-तीन दिन तक त्रिभुवनकीर्ति रस के देने से भी बुखार न उतरे, तो उसे मियादी बुखार समझना चाहिए। उस हालत में मियादी बुखार का ही इलाज करना चाहिए। लक्ष्मीविलास (नारदीय) भी बहुत लाभ करता है। -- यो० र०
चन्दनादि लौह
लाल चन्दन, सुगन्धवाला, पाठा, खश, पिप्पली, बड़ी हरड़, सोंठ, नीलोत्पल, आँवला, वायविडंग, नागरमोथा और चित्रक -- ये १२ दवाइयाँ प्रत्येक ११.६६ ग्राम और लौह भस्म १४० ग्राम लें। सब मिलाकर जल के साथ खरल में घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। इसे शहद के साथ चाटने से सब तरह के बुखार अच्छे होते हैं। खास करके पुराने मन्द-ज्वर जिसमें रक्ताल्पता हो, इस दवा से बहुत लाभ होता है। यह चढ़े हुए बुखार को कम करता है। यक्ष्मा-ज्वर में भी यह लाभदायक है।
ज्वरसंहार रस
सोंठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, कुटकी, नीम की अन्तर-छाल, कूठ, नागरमोथा, पीली सरसों, इन्द्रजौ, आग पर फुलाया हुआ सुहागा, लाल चन्दन, अतीस और ममीरी (ममीरी न मिले तो काली जीरी यानी अरण्यजीरक डालें) -- ये १३ द्रव्य समभाग लेकर महीन चूर्ण कर लें। इस चूर्ण का जितना वजन हो उससे आधा रससिन्दूर या शुद्ध हिंगुल बारीक पीसकर इसमें मिला दें। फिर अदरक, तुलसी और निर्गुण्डी के रस की तीन-तीन भावना देकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें या सुखाकर चूर्ण कर लें और बोतल में भर लें। इसका नाम 'ज्वरसंहार रस' है।
यह सब प्रकार के बुखारों की प्रसिद्ध दवा है। मधु के साथ अथवा एक ग्राम गोदन्ती भस्म या किसी भी ज्वरनाशक कषाय के साथ देने से बहुत जल्दी लाभ करता है। यह तरुण और जीर्ण दोनों प्रकार के ज्वर में लाभकारी है। गोजिह्वादि क्वाथ के साथ देने से कफज्वर में कफ को पकाकर ज्वर शीघ्र उतार देता है तथा सर्दी-खाँसी भी अच्छी हो जाती है। निमोनिया में यह २४३ से ७२९ मि.ग्रा. और अभ्रक भस्म १२१.५ मि.ग्रा. दोनों को मिलाकर देने से विशेष लाभ होता है। -- सि० यो० सं०
संशमनी वटी
मोटी-ताजी और हरी गिलोय लाकर उसको जल से अच्छी तरह धो लें, पीछे चार-चार अंगुल के टुकड़े करके कूट लें। इसको चौगुने पानी में डालकर स्वच्छ लोहे की कड़ाही में या स्वच्छ कलईदार पीतल के बर्तन में क्वाथ करें। चतुर्थांश शेष रहने पर गाढ़े कपड़े से छान लें। फिर छाने हुए क्वाथ को मन्दाग्नि से तब तक पकाते रहें जब तक रस गाढ़ा सीरे (हलवा) जैसा न हो जाय। फिर उसको अग्नि से उतारकर ठण्डा कर लें और २४३ मि.ग्रा. की गोली बना लें। इसी का नाम 'संशमनी वटी' है।
५ से २० गोली दिन-रात में चार-पाँच बार जल से दें। यह सब प्रकार के ज्वरों की अत्यन्त लाभकारी औषध है। जीर्ण ज्वर, राजयक्ष्मा, रक्ताल्पता (पाण्डु), मन्दाग्नि, दौर्बल्य, प्रमेह और श्वेतप्रदर में बहुत उत्तम फल दिखाती है। यह बलकारक और रसायन गुणयुक्त है।
गिलोय घन सत्त्व ११६.६ ग्राम, लौह भस्म ११.६६ ग्राम, अभ्रक भस्म ११.६६ ग्राम और स्वर्णमाक्षिक भस्म ६ ग्राम मिलाकर भी संशमनी वटी तैयार होती है। इसका गुजरात में बहुत प्रचार है। -- सि० यो० सं०