आरोग्य-प्रकाशब्रह्मचर्य रक्षा के सरल उपाय

ब्रह्मचर्य रक्षा के सरल उपाय

12 मिनट का पाठ

१- ईश्वर-परायणता

ईश्वर-परायणता से हम ब्रह्मचर्य का पालन बहुत आसानी से कर सकते हैं। ईश्वर सर्वव्यापक है। मन से इसका चिन्तन करें। वाणी से इसका वर्णन करें। शरीर से भी इसी के लिए कर्म करें तो विषय-वासनाओं के लिए सोचने का, बात करने का और प्रयत्न करने का अवसर ही नहीं मिलता। हर समय ईश्वर की व्यापकता सामने रहती है। 'उससे हम भला या बुरा कोई कर्म छिपा नहीं सकते' यह भावना दृढ़ होती है।

ईश्वर की व्यापकता में पूर्ण विश्वास होने के बाद हम स्वयं ही सब पापों से निवृत्त हो जाते हैं। इस प्रकार ईश्वर-परायणता से हम बड़ी आसानी से संयमी, सुखी और स्वस्थ हो जाते हैं। जिस प्रकार ईश्वर-परायणता है, उसी प्रकार ईश्वर भक्ति, मोक्ष प्राप्ति, आत्म-ज्ञान आदि महान् ध्येय हैं, जिसकी सिद्धि में लगकर आसानी से ब्रह्मचर्य का पालन और स्वास्थ्य लाभ कर सकते हैं। पारलोकिक कार्यों में लगने की अभिरुचि जिनमें नहीं, ऐसे लोग विद्या प्राप्ति, देश-सेवा, परोपकार, महत्वपूर्ण नई खोज आदि विषयों को ब्रह्मचर्य व्रत का लक्ष्य बना सकते हैं। उससे आसानी से इन्द्रिय संयम करके वे स्वस्थ बन सकते हैं।

२- राम नाम का जप

गांधीजी लिखते हैं कि "विषय वासना को जीतने के लिए राम बाण तो राम नाम का जप है।" इसी प्रकार का कोई भी मन्त्र जपा जा सकता है। मन की शुद्धि के लिए गायत्री मन्त्र का जप बहुत श्रेष्ठ है। जो श्रद्धा भक्तिपूर्वक तन्मयता से किसी मन्त्र का जप करता है, उसको सिद्धि अवश्य होती है। मन्त्र के जप से मन स्वस्थ होता है। मन के स्वास्थ्य से शरीर भी स्वस्थ होता है। आजकल की मानसिक चिकित्सा और योगशास्त्र के प्रयोगों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि मन्त्र जप से ब्रह्मचर्य में आसानी होती है; उनसे मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य से शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है।

३- सात्त्विक भोजन

शारीरिक और मानसिक उत्तेजना तथा तज्जन्य विकारों को नष्ट करने के लिए सात्त्विक भोजन का अति महत्त्व है। मन आहार से बनता है। आहार की शुद्धि से मन की शुद्धि होती है। दूध, फल, जौ, गेहूं, मूंग, चावल और सांवक आदि हल्के और सौम्य अन्न शुद्ध और सात्त्विक गिने जाते हैं। इसका अधिगम प्राप्ति का मार्ग अर्थात् कमाई का रास्ता भी शुद्ध और सात्त्विक होना चाहिए।

अन्यथा यही अन्न अशुद्ध-तामस हो जायेगे। जुआ, चोरी, हिंसा आदि पापकर्म से आये हुए सात्त्विक अन्न भी तामस हो जाते हैं। जैसे देर तक अग्नि पर पकाया हुआ दूध गाढ़ा और भारी हो जाता है। अन्न से ही मन बनता है; जैसा अन्न होगा, वैसा मन बनेगा। "अन्नमयं हि सोम्य मनः " जो लोग अन्न की स्वच्छता इसलिए चाहते हैं कि संयमी जीवन व्यतीत करके सुखी, स्वस्थ और विजयी बनें; उन्हें सात्त्विक कमाई से पैदा किया हुआ सात्त्विक अन्न खाना चाहिए। उससे संयम में सरलता हो जाती है। संयम से शरीर स्वस्थ होता है।

४- सदा स्वस्थ रहने की दृढ़ कामना

दृढ़ कामना--उत्कट इच्छा से बड़े काम भी आसान लगते हैं। दृढ़ कामना सतत प्रवृत्ति का मूल है। सतत प्रवृत्ति से सिद्धि होती है। यदि हम आरम्भ से सदा स्वस्थ रहने की दृढ़ कामना कर लें तो ब्रह्मचर्य बड़ा आसान लगने लग जाय। स्वस्थ रहने की दृढकामना से मनुष्य सात्त्विक भोजन, व्यायाम और अपनी शक्ति को सुरक्षित रखने का सदा ध्यान रखता है; क्योंकि वह जानता है कि शक्ति का संचय किये विना स्वास्थ्य-रक्षा नहीं हो सकती, ठीक उसी प्रकार जैसे हृदय को नष्ट करके जीवन-रक्षा नहीं हो सकती। इस प्रकार स्वस्थ रहने की दृढ़ कामना से ब्रह्मचर्य पालन आसान लगने लगता है।

५ - महान ध्येय

किसी महान् ध्येय; जैसे विद्या प्राप्ति, देश की उन्नति, समाज का उत्थान, महत्त्वपूर्ण विषय की नई खोज, नया निर्माण, आत्म-प्राप्ति, ईश्वराधिगम आदि लौकिक और पारलौकिक महान कार्यों में से किसी एक को सिद्ध करने में यदि हम तन-मन से जुट जायें तो हमारा मन किसी दूसरी ओर जायगा ही नहीं। तब हम आपही ब्रह्मचारी हो जायेंगे। विषय-भोग की इच्छाएँ उन्हीं के मन में पैदा होती है, जिनके सामने किसी महान् ध्येय की पूर्ति का प्रश्न नहीं रहता। ब्रह्मचर्य को सरल बनाने का यह सबसे आसान और सुपरीक्षित उपाय है कि तन-मन से विद्याध्ययन, देशोन्नति और समाजोत्थान आदि लौकिक अथवा आत्म-प्राप्ति और ईश्वराधिगम जैसे अलौकिक कार्यों में जुट जाएँ।

६ - विद्या प्राप्ति एक महान् ध्येय है

विद्या प्राप्ति एक ऐसा अत्यावश्यक महान् कार्य है कि छोटी अवस्था से ही इसमें सभी को लगना पड़ता है। किन्तु इतने आवश्यक कार्य में भी गिने-चुने ही क्यों सफल होते हैं? जो इसे पूर्ण ध्येय मानकर मन का पूरा योग उसमें देते हैं, वे अवश्य सफल होते हैं ऐसे लोग ही आगे ऊंचे कार्य करने योग्य बनते हैं। इस ध्येय से जैसे और अच्छे कार्यों में सफलता है। इसलिए हमें सबसे पहले विद्या प्राप्ति को ही अपना महान् ध्येय बनाना चाहिए।

७- कार्य - व्यस्तता

मन बड़ा शैतान है; किन्तु हर समय अच्छे कामों में लगाये रहने से वह देवता हो जाता है। सुना है, देवता सदा स्वस्थ और अमर होते हैं। यदि आप सदा स्वस्थ और पूर्ण आयु चाहते हैं तो हर समय अपने मन को कार्य व्यस्त अर्थात् अच्छे कामों में लगाये रखें। फिर मन कोई बुरा चिन्तन नहीं करेगा, अर्थात् ब्रह्मचारी हो जायगा। तब उसकी शक्ति कायम रहेगी। यही सदा स्वस्थ और अमर होने का सरल उपाय है।

८- सादगी से रहना

आप जितने सादे रहेंगे, उतना ही आपका मन सरल और शुद्ध रहेगा। अतः सादा भोजन करें; सादे कपड़े पहनें, रहने के मकान को स्वच्छ और सादा रखें तो विषय-वासना एकाध बार आकर भी लौट जायगी; जैसे-- भिक्षा न मिलने पर मकान से भिखारी लौट जाता है और बार-बार निराश हो लौटने से फिर आता ही नहीं। इसी प्रकार विषय-वासना सादगी के कारण स्वयं नष्ट हो जायगी। इसी को पूर्ण ब्रह्मचर्य कहते हैं।

हमारी वर्तमान स्थिति

वर्तमान समय में हम भारतीय लोगों की स्थिति बड़ी विचित्र हो रही है। हजारों वर्ष की गुलामी के कारण हमारे श्रेष्ठ गुण सब नष्ट हो गये हैं। इतनी लम्बी गुलामी में यह स्वाभाविक ही था। गुलाम को श्रेष्ठ गुण सिखाकर कौन अपने पैरों में अपने हाथों कुल्हाड़ी मारे? दुनिया के सामने बुद्धू कौन बने? किन्तु ईश्वर - कृपासे, हमारे त्यागी और तपस्वी नेताओं के सतत प्रयत्न से यह कुल्हाड़ी लगनी ही थी। दुनिया की दृष्टि में उन्हें बुद्धू बनना ही था।

परन्तु हमें जिस दशा में हमारे दोस्त छोड़ गये हैं, वह दशा अति दयनीय है। स्वास्थ्य, विद्या, आविष्कार, उत्पादन, व्यापार, रक्षा, वैदेशिक सम्बन्ध --गर्ज यह कि वे हमें सब दिशाओं में निर्बल करके छोड़ गये हैं। हाँ विषयभोग में हम बहुत प्रगति कर गये हैं। विषयों का अधिक उपभोग ही सारे दोषों का मूल है। विषयभोगी मनुष्य अत्यन्त दरिद्र के समान सदा नित-नई आवश्यकताओं से घिरा रहता है। परमार्थ में लगने का उसे अवसर नहीं मिलता। इसके बिना संतोष, सुख और शान्ति कहाँ? वे स्वयं इन सब दोषों के शिकार थे। किन्तु जिन गुणो में वह अग्रगण्य थे, उनमें से हमें एक भी नहीं सिखा गये।

विषयभोगी पुरुष शूर-वीर नहीं हो सकता - यह व्यापारी हो सकता है, धनी हो सकता है, किसी हद तक ईमानदार हो सकता है, त्यागी हो सकता है; पर शूर-वीर नहीं हो सकता। शूर-वीर होने का तो वह ढोंग भी नहीं निभा सकता। वह निर्बुद्धि, निस्तेज, निरुत्साह और निर्वीर्य होता है। स्वतन्त्रता के क्षेत्र में उसके पैर सदा डगमगाते रहते हैं, क्योंकि वह स्वस्थ और सबल नहीं होता, इसलिए तथा चिकित्सा शास्त्र की परम्परा के अनुरोध से भी सद्गुणों के मूल कारण 'स्वास्थ्य' को ही अपने विचार का लक्ष्य बनाया है।

हमारे भारतीय आयुर्वेद में स्वास्थ्य के तीन स्तम्भ बताये गये हैं--आहार, स्वप्न और ब्रह्मचर्य। इनमें एक स्तम्भ हमें आवश्यक प्रतीत हुआ - - व्यायाम। जिस समय हमारे आयुर्वेद संहिता ग्रन्थों की रचना हुई, सम्भव है तब इस स्तम्भ के उपदेश की इतनी आवश्यकता न हो। सभी लोग परिश्रमी होते थे। परिश्रमी के लिये व्यायाम के उपदेश का उतना ही महत्त्व है जितना जंगल में रहने वाले किसी तपस्वी के लिए खुली हवा में रहने का उपदेश।

परन्तु आज जब बड़े-बड़े नगरों की संख्या बढ़ गई है, तब व्यायाम को भी स्वास्थ्य का एक अत्यावश्यक अंग स्वीकार करना ही पड़ेगा। यह देखकर स्वास्थ्य के तीन अंगों के साथ एक चौथा अंग व्यायाम भी हमने जोड़ दिया है।

महत्त्वपूर्ण सभी दृष्टियों से इस समय हमें शरीर में स्वस्थ सबल और बुद्धि में गम्भीर होने की अत्यन्त आवश्यकता है। इसके लिए एकमात्र ब्रह्मचर्य ही श्रेष्ठ उपाय है, ऐसा हमारा मत है। यद्यपि आहार और व्यायाम भी महत्त्व रखते हैं, किन्तु आहार की दशा सुधारने में हमारी सरकार तेजी के साथ काम कर रही है। ब्रह्मचर्य, व्यायाम और उचित निद्रा के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हाँ ब्रह्मचर्य के बाधक सिनेमा, रेडिओ तथा विलास की अत्यधिक सामग्री पर प्रतिबन्ध लगाने का ध्यान सरकार को अवश्य देना है; जिससे हमारे देश की निर्बल जनता ब्रह्मचर्य का पालन करके सबल बन सके।

कुछ लोग शायद इस प्रयत्न का यह अर्थ लगावें कि हम सब के हाथ में दण्ड-कमण्डल देकर सब को बाबाजी ही बनाना चाहते हैं। गृहस्थ आश्रम के सुख को नष्ट ही कर देना चाहते हैं। यह सर्वथा भ्रान्त धारणा होगी। हमारा वैसा अभिप्राय कदापि नहीं। हम तो गृहस्थाश्रमरूपी सुन्दर महल की नींव को पुख्ता रखना चाहते हैं, जिससे उस सुन्दर महल को कोई शत्रु क्षति न पहुँचा सके।

किसी महल की नींव को पुख्ता करनेवाले पर उस मकान को उखाड़ फेंकने का मिथ्या आरोप कितना अन्यायपूर्ण होगा, यह आरोप करनेवाले स्वयं सोचें। विद्यार्थी अवस्था के कठोर ब्रह्मचर्य से गृहस्थाश्रम की सुख-समृद्धि बढ़ती है। सुख-समृद्धि से पागल होकर उसे लुटा देना या लूटने देना हमें अभिप्रेत नहीं; उसका उचित उपभोग हो, यही हम चाहते हैं।

हमने ब्रह्मचर्य के दो रूप बताये हैं--पहला विद्यार्थी अवस्था का ब्रह्मचर्य दूसरा गृहस्थ अवस्था का ब्रह्मचयं। पहले में अष्टविध मैथुन का निषेध किया है; किन्तु दूसरे में स्त्री सम्भोग का निषेध नहीं है। केवल अनियमित स्त्री-सम्भोग का निषेध है। उसका अभिप्राय भी अपने स्वास्थ्य की रक्षा के साथ ही अपनी स्त्री के स्वास्थ्य की रक्षा और अपने बच्चे के स्वास्थ्य की रक्षा है। २०-२५ वर्ष से पहले पुरुष और १५-१६ वर्ष से पहले स्त्री-सम्भोग योग्य नहीं होता।

उस समय दोनों का वीर्य कच्चा होता है। उससे स्वस्थ सन्तान उत्पन्न नहीं होती; इसलिए उस समय कठोर ब्रह्मचर्य रखना ही श्रेयस्कर है। इसके अतिरिक्त जब स्त्री-पुरुष दोनों या दोनों में से कोई बीमार हो, अत्यन्त कृश हो, अप्रसन्न हो, अन्यमनस्क हो, क्रुद्ध, उद्विग्न, भयभीत शोकाकुल हो या अत्यन्त अशक्त हो, स्त्री गर्भिणी हो, रजस्वला हो, बालक उसका दूध पीता हो, १६ वर्ष से कम और पचास वर्ष से अधिक हो, औपसर्गिक रोग से पीडित हो, जननेन्द्रिय के रोग से ग्रस्त हो, ऐसे ही पुरुष भी २५ वर्ष से कम हो, छूत के रोग से पीड़ित हो अथवा उपदंश आदि जननेन्द्रिय के रोग से ग्रस्त हो तो गृहस्थ को भी सम्भोग नहीं करना चाहिए।

भोजन के बाद जब तक भोजन का परिपाक न हो, सम्भोग नहीं करना चाहिए। ऐसे कुअवसर में ही गृहस्थ को स्त्री सम्भोग का निषेध किया है। इसके अतिरिक्त जब दोनों स्वस्थ हों, समय अनुकूल हो बाजीकरण औषधियों के सेवन से शरीर में वीर्य की खूब वृद्धि हो तो गृहस्थ को स्त्री-सम्भोग अवश्य करना चाहिए।

इस प्रकार ब्रह्मचारी और गृहस्थों के लिए अलग-अलग प्रकार का ब्रह्मचर्य हमने यहाँ बताया है। इसका पालन करने से स्त्री-पुरुष और बच्चे सभी स्वस्थ - सुखी रह सकेंगे और तभी राष्ट्र तथा समाज का कल्याण होकर भारत सुख-समृद्धि से पूर्ण होगा।

स्त्री-संगम के लिये आयुर्वेद नियम

१. पुरुष को २५ वर्ष से कम अवस्था में* और स्त्री को १६ वर्ष से कम अवस्था में सम्भोग न करना चाहिए।

* शास्त्र की आज्ञा तो २५ वर्ष की है। लेकिन २५ वर्ष तक किसी से ब्रह्मचर्य पालन न हों, तो कम से कम २० वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन अवश्य करना ही चाहिये।

२. निम्नलिखित स्त्रियों से सम्भोग न करना चाहिए : - १. वेश्या, २. रजस्वला, ३. अपने मन पसन्द न हो ४. इच्छा के विरुद्ध आचरण करनेवाली, ५. दुष्ट और संकीर्ण योनिवाली, ६. बहुत मोटी, ७. बहुत पतली, ८. बच्चे होने के बाद छ: महीने तक, ९. गर्भवती, १०. दूसरे की स्त्री, ११. संन्यासिनी, १२. अन्य जाति की और १३. अधिक उम्रवाली -- इन स्त्रियों से विषयभोग करने से मनुष्य की आरोग्यता नष्ट होती है।

३. निम्नलिखित स्थान में विषयभोग नहीं करना चाहिये।

१. गुरु, व राजा के स्थान में, २. श्मशान घाट में, ३. चौराहे में, ४. जल के ऊपर या भीतर, ५. त्यौहार के दिन, ६. दिन में, ७. किसी के देखे जानेवाले स्थान में।

४. निम्नलिखित पुरुष को भोग न करना चाहिये :-- १. भूखा, २. प्यासा, ३. बिना धैर्यवाला, ४. ज्यादा खाया हुआ, ५. बेचैनी हालतवाला, ६. कम उम्र वाला, ७. बूढ़ा, ८. किसी वेग से पीड़ित जैसे पेशाब, टट्टी आदि का वेगवाला रोगी।

५. १. शीतकाल में वीर्यवर्द्धक भोजन और औषधि सेवन करके मनुष्य को इच्छानुसार स्त्री- सम्भोग करना चाहिए।

२. बसन्त में और शरद ऋतु ३ दिन छोड़कर स्त्री- सम्भोग करना चाहिए।

३. गर्मी के मौसम में स्त्री-सम्भोग न करना चाहिए। अत्यावश्यक होने पर १५ दिन में स्त्री-सम्भोग करना उचित है।

६. नियम-विरुद्ध या अधिक सम्भोग करने से निम्नलिखित रोग उत्पन्न होते हैं : -- १. भ्रम, २. थकावट, ३. पैरों की कमजोरी, ४. बल का क्षय, ५. धातु का क्षय, ६. इन्द्रियों का क्षय, ७. अकाल मृत्यु।

७. स्त्री सम्भोग में संयम रखनेवाले या नियमानुसार संगम करने वालों को निम्नलिखित लाभ होते हैं-- १. स्मृति की वृद्धि २. मेधा की वृद्धि, ३. आरोग्यता की वृद्धि, ४. आयु की वृद्धि, ५. शरीर की पुष्टता, ६. इन्द्रियों की कार्यक्षमता, ७. यश की वृद्धि, ८. बल की वृद्धि, ९. बुढ़ापे का न आना।

(८) विषय के बाद पालन करने योग्य नियम :-- १. कामेन्द्रियों का ताजा जल से साफ करना, २ . सम्भव हो तो स्नान करना, ३ . सुगन्धित द्रव्य चन्दनादि का लेप करना, ४ . ठण्डा जल पीना, ५. पान खाना, ६. दूध पीना, ७. मांस या रस पीना, ८. उत्तम मद्य पीना, ९ शान्तिपूर्वक सो जाना।