स्वास्थ्य-साधन - ३ सदाचार
7 मिनट का पाठ
जिस प्रकार आहार-निद्रा- ब्रह्मचर्य पूर्ण स्वास्थ्य के आधार और व्यायाम तथा स्वच्छता उनके साधन हैं; उसी प्रकार सदाचार अर्थात् अच्छे आचरण, पूर्ण स्वास्थ्य के आधारों एवं साधनों के भी साधन हैं।
सदाचार से हमारे दैनिक जीवन में नियम-संयम का ऐसा अभ्यास बनता है, जिससे स्वास्थ्य के मूल आधारों को सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। और इन्द्रियों पर अधिकार होता है जिससे इच्छायें निःसीम नहीं होने पातीं। फिर कोई ऐसी भूल-चूक (प्रज्ञापराध) होती ही नहीं, जिससे स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन हो और रोग का कारण बने।
'आत्मनः प्रतिकूलानि न परेषां समाचरेत्' अर्थात् जो बात या व्यवहार स्वयं को बुरा लगता है, वह दूसरे को भी बुरा लगना निश्चित है अतएव स्वयं के प्रति होने पर खटकने वाला आचरण व्यवहार दूसरों के प्रति हमें कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसा दृढ़ निश्चय रखने वाला व्यक्ति सबसे बडा सदाचारी होता है और स्वास्थ्य की दृष्टि से जीवन पर्यन्त समृद्ध रहता है।
यहाँ हम आयुर्वेद के सद्वृत्त में निर्देशित सदाचार की कुछ व्यावहारिक बातों का उल्लेख कर रहे हैं; इनका पालन करनेवाला व्यक्ति तन-मन से कभी दुःखी नहीं रहता और पूर्ण स्वास्थ्य पाकर दीर्घजीवी होता है।
उत्तम आचरण के नियम
१. अपने मान्य धर्म और कुलपरम्परा का अवश्य ही पालन करना चाहिए।
२. कभी किसी से कड़वे बोल, झूठी बात और असम्बद्ध (बेमतलब के) वचन नहीं बोलना चाहिए।
३. शरीर, मन और वाणी से कभी दूसरे के प्रति घृणा नहीं करनी चाहिए और दूसरे को पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिए।
४. हिंसा, चोरी और चुगली की कुप्रवृत्ति से सदा दूर रहना चाहिए।
५. माता, पिता और गुरु तथा आयु, विद्या - बुद्धि या पद में अपने से बड़ों और अपने शुभचिंतकों की भक्तिपूर्वक सेवा करनी चाहिए। अशुभ चाहने वालों की भी विपत्ति में यथाशक्ति सहायता करनी चाहिए।
६. रोगी, पीड़ित, शोकग्रस्त और बेकार प्राणी की यथा सामर्थ्य सहायता करनी चाहिए। किसी भी प्रकार की सहायता चाहने वाले को यथाशक्ति विमुख न करके, उसको अपमानित, झूठा कलंकित नहीं करना चाहिए।
७. सम्पत्ति और विपत्ति में एक समान धैर्यशाली रहना चाहिए।
८. 'हेतो ईयेत् फले न तु' के अनुसार दूसरे की सफलता देखकर उसकी उन्नति से डाह न करके जिन कारणों से वह उन्नत हुआ हो उन कारणों में स्पर्द्धा करनी चाहिए।
९. केवल अपने को ही सुखी रखने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। और सदा ही अपने साथ सबके सुखी होने की कामना रखनी चाहिए।
१०. अकारण किसी को अपना शत्रु अथवा अपने को किसी का शत्रु नहीं समझना चाहिए।
११. अपने प्रति स्वामी की अप्रीति या अपमान को किसी पर प्रकट नहीं करना चाहिए।
१२. सब पर आँख मींच कर विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही सब पर अकारण अविश्वास करना चाहिए।
१३. दूसरे का आशय समझ कर शक्ति भर उसके अनुकूल आचरण करके दूसरे को प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। यही दूसरे का स्नेह पाने की कुंजी हैं।
१४. अधिक बोलने से शक्ति क्षीण और मन दूषित होता है, अतएव सदा ही थोड़ा, मधुर और समयानुकूल बोलना चाहिए।
१५. न तो इन्द्रियों के वश में होना चाहिए और न ही उसका एकदम कठिन दमन ही करना चाहिए। केवल मोक्ष की इच्छा करके जीवन को धर्म, अर्थ और काम से एकदम शून्य नहीं बनाना चाहिए।
१६. मन को सदा कोमल और दयापूर्ण रखना चाहिए। स्वभाव को सहिष्णु और क्षमाशील बनाना चाहिए। 'स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तं इति सद्व्रतं' के अनुसार परार्थ भी अपना स्वार्थ (कर्तव्य) मानकर करना चाहिए।
१७. नित्य इस बात का विचार करना चाहिए कि आज का दिन बेकार बर्बाद तो नहीं हुआ या कोई बुरा काम तो हमने नहीं किया? पढ़ने-लिखने, नौकरी या व्यवसाय का जो भी काम करते हैं, उसको हमने पूरी ईमानदारी से किया है या नहीं? कहीं भूल ज्ञात होने पर उसको सुधारना कर्त्तव्य हो जाता है।
१८. लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह और पर- निन्दा की इच्छा -- ये जब भी मन में आवें तब शान्तचित्त होकर तत्काल इनका निवारण करना चाहिए।
१९. अपान वायु, शौच (पाखाना) की हाजत, पेशाब की हाजत, छींक जम्भाई, आँसू, कै (उल्टी), खांसी, दमा, थकावट, प्यास, भूख, नींद और मैथुन की इच्छा -- इनका जब वेग हो तो उसको रोकना नहीं चाहिए।
२०. मुंह, नाक, नाखून, अंगुली या शरीर के अन्य किसी भी अंग से व्यर्थ का बाजा नहीं बजाना चाहिए।
२१. सिर पर शक्ति से विशेष बोझा नहीं उठाना चाहिए। 'प्राक् श्रमाद् विनिवर्तयेत्' के अनुसार शारीरिक श्रम, बात-चीत, या मानसिक सोच-विचार, थकावट आने के पहले ही बन्द कर देना चाहिए।
२२. अपरिचित नदी में नहीं तैरना चाहिए, आग की लपटों के निकट नहीं जाना चाहिए और संदिग्ध पशु या वाहन की सवारी नहीं करना चाहिए।
२३. अकारण नाक खुजलाने, दाँतों से नाखून काटने या अंगुली चबाने, अथवा पैर की अंगुलियों से जमीन खोंटने की बुरी आदतें त्याग देनी चाहिए।
२४. भंग, अफीम, गांजा, बीडी, सिगरेट और शराब इत्यादि मादक द्रव्यों के सेवन की आदत कदापि नहीं डालनी चाहिए।
२५. हँसना, छींकना और जम्भाई लेना -- ये तीनों करते समय मुंह नहीं बन्द रखना चाहिए।
२६. सूर्य की ओर, अत्यन्त महीन वस्तु, तेज और स्थिर प्रकाश तथा अप्रिय दृश्य की ओर आंख गडाकर नहीं देखना चाहिए।
२७. नाक, कान, आंख और गुदा आदि मल निकलने वाले अंगों की दैनिक सफाई करनी चाहिए।
२८. नियमित रूप से कम से कम हर पांचवें दिन हजामत बनानी चाहिए।
२९. सदा ही साफसुथरे, बिना भड़कदार, सादा कपड़े पहनना चाहिए। आवश्यक होने पर सुगन्धित द्रव्यों (इत्र तैलादि) का कम ही उपयोग करना चाहिए कड़ी और तेज सुगंध का कभी उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि घ्राणेन्द्रिय पर कडी सुगन्ध का कुप्रभाव भी दुर्गन्ध के समान ही होता है।
बुरी आदतें
अनायास ही मनुष्य के स्वभाव में कुछ बुरी आदतों का समावेश हो जाता है जो व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकर होती है। नीचे लिखी आदतों को प्रयत्नपूर्वक त्यागना चाहिए।
१. सोते समय कपड़े से मुंह ढकना या कमरे की सब खिड़कियाँ दरवाजे बन्द करके सोना।
२. निश्चित स्थान छोड़कर चाहे जहां थूक देना, पीक डालना, नाक करना या पेशाब करना अथवा कुआँ, तालाब या नदी के निकट शौच या पानी को गन्दा करना।
३. बिना हाथ मुंह धोये भोजन करना और कुछ खाने के बाद भली-भांति कुल्ला न करना।
४. किसी के मुंह का उगला या जूठा किया हुआ पदार्थ खाना अथवा मक्खियों या अन्य जन्तुओं से छुआ हुआ पदार्थ खाना।
५. बिना भली-भाँति चबाये जल्दी-जल्दी भोजन खाना अथवा स्वादवश भूख से अधिक खा जाना।
६. सोना, खाना और शौच क्रिया-इन तीनों कामों को दैनिक और नियमित समय पर न करना।
७. सिनेमा थियेटर आदि दृष्टिनाशक और मनोद्दीपक दृश्य अधिक देखना और यौन विकृतियों पर आधारित काम वासना उभारने वाले कथा-कहानी-उपन्यासादि अधिक पढ़ना।
८. अधिक विषय भोग करना और चित्त में निरन्तर विषय - कामना बनाये रहना।
९. बहुत चिन्ता करना, दुःखी, अस्त-व्यस्त और भयातुर रहना।
१०. मैले, गीले या तंग (चुस्त) कपड़े पहनना या सदा उघाड़े बदन रहना।
११. नाक को अंगुली या कान को सींक आदि नुकीली चीजों से कुरेदना। अथवा तिनका, कलम या पेंसिल को दाँतों से चबाना।
१२. शौकवश, आंख ठीक होते हुए भी देखा देखी चष्मा लगाना।
१३. शक्ति से अधिक परिश्रम या व्यायाम करना अथवा आय से अधिक खर्च करना।
१४. सामने आये काम को फिर करेंगे ऐसा सोचकर टालना और कोई काम उचित समय पर न करना।
१५. बीड़ी, तम्बाकू, भांग, शराब और चाय आदि मादक एवं हानिकर द्रव्यों को आदतन पीना।