नासारोग
1 मिनट का पाठ
अत्यधिक होने के कारण सर्दी-जुकाम तो पहले लिखा गया है। नासारोग में दुष्ट प्रतिश्याय या पीनस महानगरवासियों में बहुत होता है। इसमें (Sinuses में) नाक झरता रहता है और सर्दी-जुकाम के लक्षण होते हैं। विशेष करके सिरदर्द बहुत होता है। नाक के भीतर शोथ और क्षत हो जाता है। रोग पुराना होने पर कृमि भी हो जाते हैं।
चिकित्सा
(१) देवदारु, गूलर, अर्जुन और कुरैया (कुटज) की छाल का काढ़ा बनाकर नाक को धोना तथा इनका ही कल्क तथा क्वाथ का घी बनाकर लगाना चाहिए और खाना भी चाहिए।
(२) महालक्ष्मीविलास वटी (भै० र० शिरोरोग) -- लौह भस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध बच्छनाग, नागरमोथा, हर्रे, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, मिर्च, पीपल, शुद्ध धतूरा बीज, शुद्ध भाँग, छोटा और बड़ा गोखरू और पीपलामूल — इनका चूर्ण करके धतूरे के स्वरस में सात भावना दें। धतूरा स्वरस का बहुत महत्त्व है, इसलिए शरद ऋतु में बनावें जब धतूरा बहुत मिलता है। भावना देकर २४३ मि.ग्रा. की वटी बना लें। यह वटी बिगड़े हुए जुकाम, दुष्ट प्रतिश्याय या पीनस की बहुत अच्छी दवा है। Sinuses में इससे बहुत लाभ होता है।
(३) षड्बिन्दु तेल -- एरण्ड की जड़, तगर, सौंफ, जीवन्ती, रास्ना, सेंधा नमक, दालचीनी, वायविडंग, मुलेठी और सोंठ — इनका महीन चूर्ण २३३ ग्राम बकरी के दूध में भिगोकर तथा पीसकर तिल तेल, बकरी का दूध, भांगरे का रस प्रत्येक १.८७ किलो, सबको तेल-पाक विधि से पकाकर तथा छानकर बोतलों में भर दें। इसकी ६-६ बूँदें एक-एक नथुने (नासा) में डालें तो पुराना जुकाम, प्रतिश्याय और पीनस में लाभ होता है। — भै० र०