कर्ण रोग (कान के रोग)
3 मिनट का पाठ
कान की ठीक-ठीक संभाल न करने से, कान में धूल, रेत जमा होने से, कान के मल (गीड़) के अधिक संग्रह से, छोटे जन्तु के प्रवेश से, कान कुरेदने से तथा फुंसी होने से नीचे लिखे रोग पैदा हो जाते हैं:
कान का प्रदाह
जिसमें कान के भीतर अत्यन्त वेदना, सूजन व लाल वर्ण हो जाता है। साथ-साथ ज्वर भी हो जाता है।
कर्णशूल
जो ठंड लगने, चोट या चेचक के बाद होता है। इसमें कान के भीतर भयानक दर्द होता है।
कर्णनाद
इसमें कान में सन-सन, फस-फस या सों-सों आदि नाना तरह की आवाजें होती हैं।
कान का बहना (कर्णस्राव)
चेचक या बुखार के बाद या गण्डमालाग्रस्त बच्चों को तथा अन्दर घाव होने से कान से मवाद आने लगती है। अधिक अवस्था के रोगी का कान बहने लगे तो बधिरता का पूर्ण लक्षण समझना चाहिए।
बहरापन (बधिरता)
जिसमें सुनाई नहीं देता।
बाँस की पतली चरपट पर रुई लपेटकर कान को साफ करके आगे लिखी दवा डालें।
चिकित्सा
कर्ण-प्रदाह में गोमूत्र को जरा गर्म करके डालना या बच को नीबू के रस और जल के साथ घिसकर डालना लाभकारी है। कर्णशूल के लिए भी गोमूत्र गरम करके डालना फायदेमन्द है। कर्णशूल के लिए सरसों का तेल या सुदर्शन के पत्ते के रस से कान को पूर्ण करना हितकारक है। कर्ण-व्रण में चन्दन का तेल या बिरोजे का तेल डालना परम हितकारी है। कर्णनाद में दिमाग को पुष्ट करने की दवा करनी चाहिए। कान के बहने पर गर्म जल से पिचकारी द्वारा धोकर जरा-सा बोरिक एसिड कान में डाल देना चाहिए। नियमपूर्वक कान को साफ करते रहना चाहिए। नीम के पत्तों का रस समभाग शहद मिलाकर कान में डालने से कान का मवाद बन्द हो जाता है। बिरोजे का तेल डालने से कान का बहना बन्द हो जाता है। केले के पत्तों के रस में समुद्र-फेन मिलाकर कान में डालने से कान का बहना और कान का दर्द शान्त हो जाता है। अपामार्ग के क्षार के जल से और अपामार्ग के कल्क से सिद्ध किया हुआ तैल बहरापन, कर्णस्राव, कर्णनाद आदि को दूर करता है। अदरक के रस में शहद और तेल तथा जरा-सा सेंधा नमक मिलाकर कान में डालने से कर्णशूल, कर्णनाद और बहरापन में लाभ होता है।
(१) बिल्व तेल -- तिल तेल ३.७३ किलो, गोमूत्र में पीसी हुई बेलगिरी ९३३ ग्राम (कल्क), बकरी का दूध १५ किलो। इस सबको तैल-पाक विधि से पका लें। इस तेल को कान में डालने से कान का दर्द, बहरापन आदि अच्छा होता है।
(२) जलकुम्भी तेल -- जलकुम्भी कल्क २३३ ग्राम, इसी का स्वरस ३.७३ किलो, तिल तेल ९३३ ग्राम में डालकर पकावें। जब तेल मात्र शेष रहे तब छानकर कान में डालें। इससे कान का दर्द, पकना और बहना ठीक होता है। — भै० र०
(३) दशमूल तेल -- इसके प्रयोग से कर्णरोग मात्र में लाभ होता है।
(४) क्षार तेल -- मूलीक्षार, यवक्षार, सज्जीक्षार, सेंधा नमक, सौवर्चल नमक, विड् नमक, समुद्र नमक, हींग, सहजन की छाल, सोंठ, देवदारु, बच, कूठ, सौंफ, रसोत, पीपलामूल, नागरमोथा — ये प्रत्येक द्रव्य ११.६६ ग्राम लेकर कल्क बनावें। सरसों का मूर्च्छित तैल ७४६.४ ग्राम, केले की जड़ का स्वरस, बिजौरा नीबू का रस, मधुसूक्त — ये प्रत्येक ३॥ किलो डालकर पकावें। तेल मात्र शेष रहने पर छानकर बोतल में भर लें। कान को साफ करके डालने से कान का बहना, कर्णनाद, कर्णशूल, बधिरता आदि में लाभ होता है।