परिशिष्ट
51 मिनट का पाठ
गोदन्तीमिश्रण
सामग्री:
- गोदन्ती भस्म — ८ भाग।
- जहरमोहरा पिष्टी — २ भाग।
- रसादिवटी — २ भाग।
तीनों द्रव्यों को एक साथ खरल में मर्दन करके रख लें। इसे १ माशे की मात्रा में ठण्डे जल, लाजमण्ड या ज्वरनाशक क्वाथ के साथ देते हैं।
यह मिश्रण ज्वर के वेग काल में उसे कम करने के लिए दिया जाता है। इससे सन्ताप (टैम्परेचर) घट जाता है। आजकल ज्वर का जोर घटाने के लिए जहाँ पैरासीटामोल डाक्टर लोग प्रयोग में लाते हैं, वहां यह मिश्रण भी अच्छा काम करता है। ज्वर की तेजी में दाह, तृषा, वमन, शिरःशूल आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, उन्हें भी यह मिश्रण दूर करता है। विषमज्वर में भी इसे वेगकाल में दे सकते हैं।
गोदन्ती भस्म की तैयारी: गोदन्ती के सूक्ष्म टुकड़ों को घृतकुमारी-स्वरस के साथ मिलाकर दो शरावों के सम्पुट में रखें और फूँकें। सफेद भस्म हो जाने पर उसे खरल में घोंटकर चन्दनादि अर्क की १ भावना दें और रख लें।
चन्दनादि अर्क: सफेद चन्दन, गुलाब के फूल, केवड़ा, बेदमुश्क और कमल के फूल समान भाग में लें। इनमें ८ गुना जल डालकर भपके से आधा अर्क खींच लें।
जहरमोहरा का पत्थर बाजार में मिलता है। इसे पहले कूट कपड़छान कर लेते हैं, फिर खरल में डालकर पूर्वोक्त चन्दनादि अर्क या गुलाबजल में मर्दन कर छाया में सुखा रख लेते हैं।
रसादिवटी का वर्णन मूल ग्रन्थ के ज्वर-प्रकरण में दिया गया है।
मलेरियासंहार (फार्मेसी)
कल्पनाथ (कालमेघ) सत्त्व १, सप्तपर्णत्वकसत्त्व १, कुटकीसत्त्व १, कुचलात्वक्सत्त्व १, शुद्ध करंज बीज चूर्ण ४ तथा रक्तस्फटिका ४ भाग ले एक साथ जल के साथ घोंट ३६३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। ये ६ गोली ज्वर का वेग आरम्भ होने के पहले २-२ की मात्रा में २-३ बार में ताजे पानी या दूध के साथ देते हैं। कभी-कभी तो एक ही गोली मलेरिया का जाड़ा रोक देती है।
यह दवा यकृत् को सहायता देकर रक्तकणों को नष्ट होने से बचाती है। पुराने मलेरिया के साथ यकृत् शूल होने पर भी लाभ करती है। गोवर्धन क्षेत्र में बाढ़ आ जाने पर बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन की ओर से इसका खूब वितरण किया गया था और लाभ भी सन्तोषजनक हुआ था।
मलेरिया संहार कुनैन की तरह मलेरिया नाशक महौषधि है। इससे ज्वर नष्ट हो जाता है। साथ ही कुनैन जैसे उपद्रव कानों से सुनाई न देना, आँखों से न दीखना, बाल झड़ जाना आदि नहीं होते। आधी गोली दूध के साथ देने से ज्वर (मोतीझरा और ज्वरातीसार को छोड़) के बाद की निर्बलता दूर करती है। मलेरिया के मौसम में यदि एक गोली प्रतिदिन इसका सेवन किया जाय तो मलेरिया होने का भय नहीं रहता। यह रिसर्च के द्वारा आविष्कृत योग है।
अगर रेचक औषध देकर इसे दिया जाय तो पहले दिन ही ज्वर रुक जाता है। इसके सेवन काल में पथ्य में दूध, साबूदाना तथा यवयूष (बार्लीवाटर) दे सकते हैं।
सुदर्शनमिश्रण
सुदर्शन चूर्ण ११७ ग्राम, शुद्ध सज्जी खार या सोडाबाईकार्ब २३·२ ग्राम, कुचला चूर्ण ११·६६ ग्राम, लाल फिटकरी का फूला १७·४६ ग्राम सबको पीस कर रख लें। इसकी ३ ग्राम की मात्रा जल के साथ दी जाती है। मलेरिया ज्वर या शीतपूर्वी ज्वर में यह अच्छा कार्य करता है।
सिद्धयोगसंग्रह का बिल्वादिचूर्ण
यह न केवल अतिसार में ही लाभकारी सिद्ध हुआ है अपितु प्रवाहिका और ग्रहणीरोग की भी उत्तम दवा है। इसका योग इस प्रकार है: कच्चे बेलफल की गिरी १, मोचरस १, जल में धो सुखाई भांग १, धाय के फूल १, धनिया २ तथा सौंफ ४ भाग ले लें। पहले बेलगिरी और मोचरस को सरौते से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। फिर सब दवाएँ छोटी कड़ाही में डालकर मन्द-मन्द आँच पर सेंकें। सौंफ की भीनी सुगन्ध आने लगे, तब उतार लें। ठण्डा होने पर कूट कपड़छान कर बोतल में रख लें।
इसे १ से ३ ग्राम मात्रा में ठंडे जल से या अनार के रस से अथवा छाछ के साथ दें। इसे दिन-रात में ३-३, ४-४ घण्टे के अन्तर से ४-५ बार तक दे सकते हैं।
यह चूर्ण दीपन, पाचन और दस्त बाँधने वाला है। अतिसार में अकेले या रसपर्पटी के साथ आरम्भ से लेकर किसी भी अवस्था में इसे दे सकते हैं।
प्रवाहिका या आँव खून के दस्तों में इस चूर्ण में घी या एरण्डतेल चुपड़कर सेकी हुयी छोटी काली हरड़ का चूर्ण बराबर मात्रा में मिला, अर्क सौंफ या ईसबगोल के लुआब के साथ दे सकते हैं। प्रवाहिका के लक्षण जैसे-जैसे कम होने लगें छोटी हरड़ के चूर्ण की मात्रा घटाते जाना चाहिए।
ग्रहणी रोग में यह चूर्ण पर्पटी के योगों के साथ मिला कर दे सकते हैं। स्वर्णपर्पटी, पंचामृत पर्पटी या रसपर्पटी किसी के भी साथ इसे दे सकते हैं।
अर्शोघ्नीवटी और नागकेशरयोग
अर्शोघ्नीवटी
प्रथम योग से मिलता जुलता अर्शोघ्नी वटी का नुस्खा है। यह सूखे (वातार्श) और खूनी (रक्तार्श) दोनों प्रकार के बवासीर में अच्छा काम करता है। योग इस प्रकार है: नीम की निंबोली की मींगी १, बकायन के फल की मींगी १, दमउल अखबेन या खूनखराबा १, कहरबा समई (तृणकान्तमणि) की अर्क-गुलाब या चन्दनादि अर्क में तैयार की गई पिष्टी १, शुद्ध ‘रसील’ [द्रव्य-नाम अस्पष्ट] ३ भाग लें।
पहले निंबोली और बकायन के फलों की मींगी को खूब महीन पीस लें। फिर शेष द्रव्य मिला जल में घोंट ३६३ मि.ग्रा. की गोलियां बना लें।
मात्रा: २-२ गोली दिन में ३-४ बार ठण्डे पानी के साथ दें।
नागकेशरयोग
असली नागकेशर और खूनखराबा (दमउलअखबेन) बराबर-बराबर लें। दोनों का कपड़छान चूर्ण कर लें और उसे २ माशे की मात्रा में ३-४ बार दूबस्वरस, मोसम्बी या मीठे अनार के रस के साथ या हरे धनिये की पत्ती के साथ देने से अथवा उदुम्बरसार १।। से ३ ग्राम को ५८·३० ग्राम ठण्डे जल में घोलकर इसके साथ देने से बवासीर का खून गिरना बन्द हो जाता है।
नागकेशर गट्टिफेरी वर्ग का वृक्ष है। इसे मेसुआ फेरिया कहते हैं (देखें आचार्य यादवजी कृत ‘द्रव्यगुणविज्ञान’, बैद्यनाथ प्रकाशन)। इस ग्रन्थ के अनुसार नागकेशर का वृक्ष बड़ा सुन्दर होता है। यह कुमाऊँ, नेपाल और दक्षिण कोंकण में पाया जाता है। इसे नागचम्पा भी कहते हैं। इसके पुष्प में ५ पंखुड़ियाँ होती हैं, नरकेशरों का पीले रंग का गुच्छा होता है; उसे नागकेशर कहते हैं। यही असली नागकेशर है। बाजार में जो बीज-बीज से आते हैं वह नागकेशर नहीं है।
नागकेशर १।। ग्राम, धुले काले तिल ११·६६ ग्राम, ताजे घी या मक्खन के साथ खाने से भी खून गिरना बन्द हो जाता है।
शतपत्र्यादि चूर्ण और जम्बीरार्द्रकद्रव
शतपत्र्यादि चूर्ण
नागरमोथा, जीरा सफेद, सफेद चन्दन, छोटी इलायची, सौंफ, कत्था, ‘सेलरवड़ी’ [द्रव्य-नाम अस्पष्ट], शीतलचीनी, गिलोय का सत्त्व, खस, वंशलोचन, खसखस, ईसबगोल की भूसी, गोखरू, दालचीनी, तेजपात, नागकेसर, अनन्तमूल, कमलगट्टे की मींगी, कमल और तीखुर (अरारोट) प्रत्येक १-१ भाग, गुलाब के सूखे फूल २० भाग तथा मिश्री ४० भाग लेकर कूट कपड़छान कर रखें।
मात्रा: १॥ से ३ ग्राम जल के साथ १–२ बार देने से विदग्धाजीर्ण, अम्लपित्त और पेट की खराबी से होने वाला मुखपाक (स्टोमेटाइटिस) दूर हो जाता है।
जम्बीरार्द्रकद्रव
जम्बीरी या कागजी नीबू का रस, घीकुँवार का गूदा, मूली का रस, अदरक का गर्म करके निकाला गया रस, प्याज का रस ४-४ भाग; काला नमक और अजवाइन का चूर्ण १-१ भाग; नौसादर चौथाई भाग, भुनी हींग आठवाँ भाग लें। सबको चीनी मिट्टी के पात्र में भरकर मुँह बन्द करें और ७ दिन धूप में रखें। बीच-बीच में हिलाते रहें। फिर बोतलों में भरकर रख लें।
मात्रा: ५.८ से ११·६६ ग्राम तक भोजन के बाद दोनों समय देने से खाया हुआ भोजन शीघ्र पच जाता है। पेट में गैस नहीं बनती तथा भूख समय पर लगती है। यकृत् पित्त का निर्माण खूब करता है, जिससे दस्त साफ आता है। उदरशूल, अम्लपित्त, बदहजमी और उदरगत वात और आनाह को भी शान्त करता है। आमाशय-व्रण में इसे न दें।
मुस्तादि योग
शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, नागरमोथा, पलाश बीज सेके हुए, वायविडंग छिलका रहित, अनार की जड़ या पेड़ की छाल, करंज की सेकी हुई मींगी, इन्द्रजौ सेका हुआ, कबीला, किरमानी अजवाइन २-२ भाग, अजवाइन का सत्त्व और भुनी हींग १-१ भाग।
पहले पारद गन्धक की कज्जली बना लें। फिर उसमें अन्य दवाओं का कपड़छान चूर्ण डालें, फिर अजवाइनसत और हींग डाल अनन्नास के पत्तों के रस में १ दिन मर्दन कर ४८६ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। छाया में सुखाकर प्रयोग में लावें।
मात्रा: १ से २ गोली। इसके ऊपर नीचे दिया गया क्वाथ अनुपान के रूप में पिलावें।
अनुपान का क्वाथ: नागरमोथा, मूसाकर्णी, पलाश के बीज, वायविडंग, अनार के वृक्ष की छाल, अजवाइन, दोना की पत्ती, किरमानी अजवाइन, सुपारी, देवदारु, सहजन के बीज, हरड़, बहेड़ा, आँवला, खैर की लकड़ी का बुरादा, नीम की अन्तरछाल और इन्द्रजौ बराबर-बराबर लें और सबको जौकुट करके रखें। इसमें से ११·६६ ग्राम लेकर १९७ ग्राम पानी में पकावें। ४६ ग्राम शेष रहने पर इस क्वाथ को गोलियों के ऊपर अनुपान के रूप में पिलावें।
इस प्रकार प्रयोग से पेट के सभी तरह के कृमि और कृमिजन्य उपद्रव शान्त हो जाते हैं।
इसका प्रयोग १ से ३ सप्ताह तक करना चाहिए।
पाण्डु और कामला
अधिक परिश्रम, अम्लता की वृद्धि, अधिक नमक सेवन, मद्यपान, मिट्टी खाना, तीक्ष्ण पदार्थों का सेवन, दिन में सोना आदि कारणों से रक्त दूषित हो जाता है और उनके कारण त्वचा का वर्ण पाण्डु हो जाता है। इसलिए इसे पाण्डुरोग कहा जाता है।
जब रक्त में लोहे की कमी हो जाती है तो उसकी प्राणवायु कारक शक्ति घट जाती है तथा रक्त के लाल कण फीके-फीके और छोटे हो जाते हैं।
मलेरिया के कारण लालकणों की कमी हो जाने से भी पाण्डुता आ जाती है।
कभी-कभी जब रंजक पित्त की कमी हो जाती है अथवा रंजकपित्त का आमाशय के आश्रित भाग या यकृत् का रक्त के लालकण बनाने वाला भाग क्षीण हो जाता है तब भी पाण्डुरोग बनता है, पर इसमें लालकण बड़े और अपरिपक्व होते हैं, देखने में गहरे लाल होने पर भी उनकी प्राणवायु धारकशक्ति अधिक नहीं होती।
पाण्डुरोगी जल्दी थक जाता है, उसकी कर्मशक्ति घटती चली जाती है, उसके मुख पर और नेत्रों के आसपास शोथ हो जाता है। शरीर ढीला-ढीला रहता है। आलस्य और मन्दाग्नि हो जाती है तथा मल-मूत्र पीला-सा होता है।
दोषभेद से लक्षण इस प्रकार हैं:
- वातिक — चक्कर और कम्प।
- पैत्तिक — दाह, तृष्णा और ज्वर।
- श्लैष्मिक — शोथ, तन्द्रा, आलस्य और गौरव।
- सन्निपातिक — हृल्लास, छर्दि और क्लम।
- मृज्जपाण्डु (मिट्टी खाने से होने वाला पाण्डु) — बल, वर्ण और अग्नि का नाश।
मृज्जपाण्डु के कोष्ठ में गण्डूपद कृमि पड़ जाते हैं।
रोहीतकलौह, चन्द्रकलारस और दूर्वादिघृत
रोहीतकलौह
जीर्ण विषमज्वरजन्य पाण्डुरोग होने पर जब यकृत् और प्लीहा बढ़ गये हों, शोथ हो, रक्त के लालकणों में हीमोग्लोबिन की मात्रा घट गयी हो तो रोहीतकलौह का प्रयोग बहुत लाभदायक सिद्ध होता है। योग इस प्रकार है: हरड़, बहेड़ा, आँवला, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, चित्रकमूल की छाल, नागरमोथा और वायविडंग १-१ भाग, रोहीतक वृक्ष की अन्तरछाल ८ भाग, लोहभस्म या मण्डूर भस्म ८ भाग खरल में डाल रोहीतक की अन्तर्छाल के स्वरस की ७ भावनाएँ दें। छाया में सुखाकर पीसें और रख लें।
मात्रा: ३६४ से ७२८ मि.ग्रा. दूध या छाछ के साथ दें।
अनुपान में फलत्रिकादिक्वाथ देना भी बहुत उपयोगी सिद्ध होता है, विशेष कर कामला में।
इस क्वाथ में त्रिफला, गिलोय, कुटकी, नीम की अन्तर्छाल, चिरायता और वासा समान भाग में लेकर कूटें। इस मिश्रण में से ११.६६ ग्राम लेकर १८६ ग्राम पानी में डालें और औटावें। ४६·४ ग्राम शेष रहने पर छान शहद डाल पिला दें।
चन्द्रकलारस
पाठ-संशोधन टिप्पणी: पारद का अंक ‘९’ अपुष्ट है। ‘कुटकी’ शब्द OCR में अलग शीर्षक बन गया था; उसे द्रव्य-सूची में रखा गया है।
शु. पारद ९, शु. गन्धक २, ताम्र भस्म १, अभ्रकभस्म १, मोती की पिष्टी २, कुटकी, गुडूचीसत्त्व, पित्तपापड़ा, खस, पिप्पली, चन्दन सफेद, अनन्तमूल १-१ भाग लें।
पहले पारद और गन्धक की कज्जली करें। फिर सब भस्में और पिष्टी डालकर मर्दन करें। इसके बाद काष्ठादिक द्रव्यों का कपड़छान चूर्ण मिलाएँ और मोथा, अनार, दूब, केवड़ा, कमल, सहदेवी, शतावरी, पित्तपापड़े के स्वरसों की १-१ दिन भावना देकर पके अंगूर के रस की ७ भावनाएँ दें। फिर ११·६६ ग्राम कपूर मिला चने बराबर की गोलियां बना लें। यह चन्द्रकला रस है। इसे १-२ गोली ठण्डे पानी के साथ पेठे के स्वरस के साथ अथवा उशीरासव या अशोकारिष्ट के अनुपान से देने से अन्तर्दाह या शरीर के बाह्य भागों की जलन, भ्रम (वर्टिगो), मूर्च्छा, रक्तकास (हेमोप्टाइसिस), रक्तवमन (हेमेटेमेसिस), जीर्णज्वर, असृग्दर (मेनोरेजिया) तथा सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्र (डिसयूरिया) बिना किसी संशय के नष्ट हो जाते हैं। पेशाब के मार्ग से लेकर शरीर के किसी भी भाग का दाह यह दूर करने में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।
दूर्वादिघृत
दूब, अनार के फूल, मंजीठ, कमलकेशर, गूलर का फल, खस, मोथा, चन्दन, पद्मकाष्ठ, अडूसे के फूल, केशर, गेरू, नागकेशर प्रत्येक ११.६६ ग्राम जल में पीस लें। इसमें गाय या बकरी का घी ४ गुना मिला दें और कड़ाही में डाल बकरी का दूध, पेठे के स्वरस, तण्डुलोदक और आयापान (पर्याय OCR में ‘अस्रहए’; अस्पष्ट) के पत्तों का रस घी के बराबर-बराबर प्रत्येक को डाल कर मन्द अग्नि पर पका लें। जब घृत सिद्ध हो जाय तो उतार कर ठण्डा कर शीशी में भर लें।
इस घृत को ५.८ से ११·६६ ग्राम की मात्रा में उतनी ही मिश्री मिला कर चटावें। मुख से रक्त आने पर इसे पिलावें। नाक से रक्त आने पर इसका नस्य दें, कानों से खून निकले तो कानों में डालें और अगर आँखों से रक्तस्राव हो तो आँखों में इसकी बूंदें टपकावें। गुदा, मेढ्र या योनि से रक्त आने पर इसे बस्ति द्वारा या अनुवासन बस्तिद्वारा देना चाहिए।
रसोनक्षीरयोग
एक अच्छा इकपुतिया लहसुन लेकर उसका छिलका निकाल दें। वायविडंग के २०० दाने लेकर दरदरा कूट लें। फिर दोनों को २३५ ग्राम गाय के दूध और उतने ही जल में मन्द अग्नि पर पकावें। पानी जल जाने पर नीचे उतार छान लें और चीनी और छोटी इलायची डाल कर यक्ष्मा के रोगी को पिलावें।
प्रतिदिन १ कली लहसुन और २० दाने वायविडंग बढ़ाते जाएँ। यह क्रम १५ कली लहसुन और ५०० दाने वायविडंग तक बढ़ाया जा सकता है।
वासापाक
अडूसे की जड़ की छाल २५० ग्राम २ लीटर पानी में उबाल अष्टमांश शेष रहने पर छान लें। या अडूसे के २ किलो ताजे पत्तों का पुटपाक विधि से स्वरस निकाल लें। इस क्वाथ या स्वरस में २ किलो चीनी डालकर पकावें। शहद जैसा गाढ़ा होने पर उतार ठण्डा होने पर बोतल में भरें। यह सभी प्रकार की कास में काम करता है। रक्तपित्त, राजयक्ष्मा तथा रक्तप्रदर में उपयोगी है।
शर्बत जूफा
यह वात और पित्तप्रधान खाँसियों की उत्तम दवा है।
इसके सेवन से कफ ढीला होकर खाँसने के साथ तुरन्त निकल जाता है। योग यादवजी का है जो इस प्रकार है: जूफा १०, मुनक्का ३०, ‘उत्साव’ [द्रव्य-नाम अस्पष्ट] २०, लिसोड़े २०, अंजीर २०, बेख सोसन ३०, मुलहठी २०, सौंफ की जड़ १०, करफस की जड़ १०, हंसराज १०, बीदाना ५, अनीसन ५, सौंफ ५, जौ छिले हुए ५, अलसी ५, जटामांसी ५, गावजबां ५ और खतमी के बीज ५८.३ ग्रा. लें। सबको जौकुट करके ३ गुने पानी में उबालें और रात में भिगोकर रख दें। सबेरे मन्द अग्नि पर पकाएँ। फिर उस छने हुए क्वाथ में ६ किलो चीनी डाल शहद जैसी चाशनी कर लें। ठण्डा होने पर बोतलों में भर लें।
रक्तदाब या ब्लडप्रेशर
आधुनिक चिकित्सापद्धति के विद्वानों ने शरीरक्रियाविज्ञान में बहुत उन्नति की हुई है। उन्होंने रक्त के संगठन पर व्यापक विचार किया है तथा रक्त जिन वाहिकाओं में होकर बहता है, उनकी प्राचीरों पर क्या-क्या प्रभाव पड़ता है उसका काफी अध्ययन किया है। उन्हीं प्रभावों में रक्त द्वारा अपनी वाहिकाओं की प्राचीर पर डाला गया दबाव या दाब या प्रेशर भी है जिसे ब्लडप्रेशर कहा जाता है। हृदय के प्रकुंचन काल में यह दाब रक्तनिलय में सबसे अधिक पाया जाता है जो हृदय के अनुशिथिलन काल में बड़ी सिराओं में सबमें कम हो जाता है। यह रक्तदाब चिकित्सा की दृष्टि से धमनियों का नापा जाता है। इसकी नाप २ प्रकार की होती है। एक जब हृदय संकुचित होकर अपना रक्त वाम निलय से धमनियों में भेजता है। इसे प्रकुंचनकाल कहते हैं। इस समय के रक्तदाब को सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर या प्रकुंचनदाब या प्रकुंचनकालीय दाब कहते हैं। दूसरी नाप उस समय ली जाती है जब हृदय में रक्त का भराव होने लगता है। इस समय के रक्तदाब को डायस्टोलिक ब्लडप्रैशर या अनुशिथिलन रक्तदाब कहते हैं।
धमनियों का रक्तदाब जिस यन्त्र से नापा जाता है उसे रक्तदाबमापक यन्त्र या ब्लडप्रैशर इन्स्ट्रमेंट कहा जाता है। यह २ प्रकार का होता है -- एक जिसमें पारद भरा होता है तथा दूसरा घड़ी के डायल जैसा स्प्रिंग के सहारे चलता है। पारदवाला रक्तदाब यन्त्र काँच की नली वाला होने से उसे लाने-ले जाने में टूटने का भय रहता है जब कि स्प्रिंगवाले यन्त्र को ले जाना आसान रहता है।
रक्तदाबमापक यन्त्र चाहे पारदवाला (स्फिग्मोमैनोमीटर) हो या स्प्रिंग वाला दोनों से रक्तदाब की नाप की विधि एक-सी होती है। यन्त्र में एक रबर की लम्बी थैली होती है जिस पर एक कपड़ा चढ़ा होता है उसे रोगी या स्वस्थ व्यक्ति के बाहु में कन्धे के नीचे इस प्रकार लपेटते हैं कि उस ओर की कुहनी का भाग खुला रहे। रबर की इस थैली को कपड़ों के ऊपर या नंगी बाहु पर लपेटते हैं। मोटे कपड़े उतरवा कर ही उसे लपेटना चाहिए। इस रबर की थैली से २ नलियाँ निकली रहती हैं। इनमें एक का सम्बन्ध पारद की नली के साथ या स्प्रिंग वाले भाग के साथ रहता है और दूसरी नली का सम्बन्ध रबर के एक बल्ब के साथ होता है जिसमें एक वाल्व लगा होता है।
रबर थैली को बाँह पर लपेटने के बाद इस बल्ब के वाल्व को खोल देते हैं और बल्ब को एक हाथ से दबाते हैं। दबाने से बल्ब में होकर हवा रबर की लपेटी हुई थैली में जाकर बाँह पर दबाव डालने लगती है। दूसरा हाथ नाड़ी पर उसी हाथ के ऊपर रहता है जिसकी बाँह को लपेटा गया हो। अंगुलियों से नाड़ी का स्पन्दन बराबर ज्ञात होता रहता है। बल्ब को दबा-दबा कर धीरे-धीरे हवा भरी जाती है। हवा के भरते रहने पर पारद नली में चढ़ने लगता है अथवा अगर स्प्रिंग वाला यन्त्र इस्तेमाल किया जा रहा है तो डायल की सुई घूमने लगती है। जब दूसरे हाथ के नीचे नाड़ी का स्पन्दन बन्द हो जाय तब तक हवा भरते हैं।
इस समय पारद नली में कहाँ तक पहुँचा है या डायल की सुई कहाँ तक घूमी है उसे पढ़ लेते हैं। यह प्रकुंचन दाब या सिस्टोलिक ब्लडप्रैशर है। इसे पढ़ते ही बल्ब का कपाट या बल्ब खोल कर हवा निकाल देते हैं। नाड़ी स्पन्दन अंगुली द्वारा पुनः अनुभव किया जा सकता है।
यह प्रारम्भिक नाप है; इसे कच्ची नाप माना जाता है।
पक्की नाप स्टेथोस्कोप द्वारा करनी पड़ती है।
स्टेथोस्कोप छाती या हृदय की आवाजें सुनने के लिए प्रयुक्त एक ऐसा उपकरण है जिसे हर चिकित्सक जानता है। उसे दोनों कानों में लगा कर निचले भाग को कुहनी की दूसरी ओर सामने कफोणिखात में जहाँ धमनी का स्पन्दन हो रहा हो उस पर रखते हैं और बल्ब से हवा भर कर बाहु का पीड़न करते हैं। पीड़न के साथ-साथ धमनी का शब्द कानों में पहुँचता रहता है। जब यह शब्द बन्द हो तभी पारद के स्तम्भ की ऊपरी सतह के या डायल की सुई द्वारा निर्देशित अंक पढ़ लेते हैं। यह सिस्टोलिक ब्लडप्रैशर की पक्की नाप हुई।
अब धीरे-धीरे वाल्व खोल हवा निकालते हैं। हवा ज्यों-ज्यों कम होती जाती है नाड़ी स्पन्दन का शब्द कान में आकर फिर कम होने लगता है यहाँ तक कि बन्द हो जाता है। जैसे ही आवाज कानों में आनी बन्द हो जावे पारद के कालम को या डायल पर सुई को पढ़ लेते हैं। यह डायस्टोलिक ब्लडप्रेशर या अनुशिथिलन रक्तदाब की पक्की नाप है।
अनुशिथिलन रक्तदाब बिना स्टेथोस्कोप के नापा ही नहीं जा सकता है।
स्वस्थावस्था में रक्तदाब कितना होना चाहिए, इस विषय में पुस्तकों में कुछ-न-कुछ लिखा मिलता है। यह रक्तदाब हर व्यक्ति का अलग-अलग होता है। हर ऋतु या काल में हर आयु में बदल सकता है। शरीर पर गर्मी या सर्दी का प्रभाव भी इस पर पड़ता है। मानसिक उत्तेजना और खानपान का प्रभाव भी इस पर पड़ता है।
इसलिए वैद्य का कर्तव्य है कि वह अनुमान से ही रक्तदाब का ज्ञान न करे अपितु उसे रक्तदाबमापक यन्त्र को लगा कर ही रक्तदाब का ज्ञान प्राप्त करने में आलस्य न करना चाहिए।
कुछ लोग नाड़ी देख कर ही रक्तदाब बताने लगते हैं वह प्रायः गलत निकलता है इसलिए बराबर रक्तदाब को यन्त्र द्वारा नाप कर ही वैद्य को अपना मत स्थिर करना चाहिए।
इस युग में बिना रक्तदाबमापक यन्त्र तापमापक और शब्दपरीक्षण यन्त्र के जो निदान में अपरिमित सहायता करते हैं वैद्यक व्यवसाय चलाना कठिन ही समझना चाहिए।
सामान्य रक्तदाब तालिका
पाठ-संशोधन टिप्पणी: इस तालिका में आयु, लड़के-लड़कियों तथा न्यूनतम, औसत और अधिकतम रक्तदाब के स्तम्भ OCR में मिल गए हैं। सभी पंक्तियों का सही सम्बन्ध उपलब्ध पाठ से निश्चित नहीं किया जा सकता। इसलिए नीचे मूल OCR के अंक सुरक्षित रखे गए हैं; इन्हें पुष्ट तालिका न समझें।
तालिका का अपुष्ट OCR पाठ
प्रकुंचन दाब प्रकुंचन दाब
आयु लड़का लड़की आय लड़का लड़की
लगभग ८० लगभग ८५ ११ लगभग ९६ लगभग १००
,, ८५ ८६ १२ १०२ "
" ९८ " "
,, ८९ ८९ १३ १०३
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,,, ९२ ९२ १४ १०४
33 १०६ " "
" ९५ ९३ १५ १०६
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९५ से कुछ ऊपर ९६ १६ १०७
" ११२ " "
१७ १०३
" ११२ "
१८ १०१
" ११३ "
१९ १०५
" ११७ 33 प्रकुंचन दाब (मि.मी. पारद में) अनुशिथिलन दाब (मि.मी. न्यूनतम - औसत - अधिकतम न्यूनतम - औसत -
= १०५ ११७ १२९ ७३ ७७
७ = १०८ १२० १३२ ७५ ९ १०९ १२१ १३३ ८० = ७६
= ११० १२२ १३४ ७७ ८१ = ११० १२३ १३५ ७८ ८२
१२५ १३७ ९ ८३ = ११२ ७
= ११५ १२७ १३९ ८० ८४ = ११६ १२९ १४२ ८१ ८५ = ११८ १३१ १४४ ८२ ८६ = १३४ १४७ ८३ ८७ १२१
— टैबर की सायक्लोमीडिक मेडिकल डिक्शनरी से
आसन और मापन-स्थान के अनुसार रक्तदाब
रक्तदाब के सम्बन्ध में यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि एक ही समय में हाथ और पैर की धमनियों के रक्तदाब में कुछ अन्तर आता है। एक ही व्यक्ति को लिटाने और खड़ा करने पर भी अन्तर पड़ सकता है। ‘टेक्स्टबुक ऑफ फिजियोलॉजी एण्ड बायोकेमिस्ट्री’ नामक पुस्तक में ये अन्तर इस प्रकार दिखाए गए हैं।
पाठ-संशोधन टिप्पणी: OCR में दो समूहों के शीर्षक तथा ‘अन्तर’ स्तम्भ के अंक छूट गए हैं। नीचे प्रत्येक पंक्ति में पहले बाहु और फिर पैर का उपलब्ध मान (मि.मी. पारद) दिया गया है।
पहला समूह
- रोगी लेटकर — १४०; १३८।
- खड़े होकर — १३६; २०४।
- लेटे हुए, पैर ऊपर — १२२; ७६।
- उलटे खड़े, सिर नीचे — १४८; ७०।
दूसरा समूह
- रोगी लेटकर — १२६; १२६।
- खड़े होकर — १४०; २०४।
- लेटे हुए, पैर ऊपर — १३२; ७८।
- उलटे खड़े, सिर नीचे — ११६; ४२।
इसलिये कल्पना या अनुमान के आधार पर रक्तदाब का निर्णय नहीं करना चाहिये।
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२. अगर किसी व्यक्ति का प्रकुंचनदाब १५० मि.मी. पारद से बराबर ऊपर ही रहे तो उसे खतरनाक समझना चाहिए।
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३. अगर किसी व्यक्ति का अनुशिथिलन दाब १०० मि.मी. पारद से बराबर ऊपर रहे तो उसे खतरनाक समझना चाहिए।
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४. किसी व्यक्ति के प्रकुंचन दाब अंकों में से अनुशिथिलन दाब के अंक घटा दें तो जो संख्या आवेगी वह उसका नाड़ी दाब (पल्स प्रेशर) कहलाता है। यदि किसी का प्रकुंचन दाब १३० मि.मी. पारद है और अनुशिथिलन दाब ९५ मि.मी. पारद है तो उसका नाड़ी दाब १३०-९५ = ३५ होगा।
किसी भी व्यक्ति का नाड़ीदाब ५० अंक से ऊपर होना या ३० अंक से नीचे होना रोग का द्योतक और खतरनाक होता है।
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५. अनुशिथिलन दाब से प्रकुंचनदाब प्रायः ४० अंक ऊपर होना ही चाहिए।
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६. रक्तदाब सदा आयु, लिंग, निवासस्थान के धरातल की ऊँचाई, पेशलता, हर्ष-उत्साह, शोक-विषाद, चिन्ता - मनोदैन्य के अनुसार बढ़ता घटता रहता है।
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७. सामान्यतः २० वर्ष की आयु के युवक का प्रकुंचन रक्तदाब १२० तक हो सकता है। उसके बाद हर एक वर्ष आयु की वृद्धि पर ३ मि.मी. की वृद्धि के हिसाब से यह बढ़ता है। इस प्रकार ५० वर्ष की आयु में १२० + ३÷ = १३५ मि.मी. पारद होगा।
पाठ-संशोधन टिप्पणी: आयु के अनुसार रक्तदाब-वृद्धि की दर और ऊपर की गणना परस्पर मेल नहीं खातीं। मूल पाठ की पुष्टि आवश्यक है; अनुमान से दर या गणना नहीं बदली गई है।
- ८. अनुशिथिलन दाब की सामान्य नाप ६० से ९० मि.मी. पारद मानी जाती है।
रक्तदाब के विकार
रक्तदाब के विकार २ प्रकार के होते हैं। एक रक्तदाब का अधिक होना जिसे हाईब्लडप्रैशर या हाइपरटेंशन कहा जाता है और दूसरा रक्तदाब का कम होना जिसे लोब्लडप्रैशर या हाइपोटेंशन कह सकते हैं। दोनों ही परिस्थितियाँ मनुष्य के स्वास्थ्य की दृष्टि से कष्टदायक हैं। हिन्दू विश्वविद्यालय और अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्मदाता प्रातःस्मरणीय महामना मदनमोहन मालवीय जी का ब्लडप्रेशर ८५ वर्ष की आयु तक भी सामान्य ही रहा था। एक बार एक डाक्टर ने उनसे इसका रहस्य पूछा तो मालवीयजी ने बतलाया कि वे सदा त्रिफला का सेवन किया करते हैं।
त्रिफला रसायन है — 'यज्जरा-व्याधिनाशनं तद्रसायनम्' इस परिभाषा के अनुसार मुझे जरा या बुढ़ापे का कष्ट नहीं व्यापा जिसमें रक्तदाब की वृद्धि भी एक है। उस डाक्टर ने कहा कि धमनीकाठिन्य (आर्टीरियो स्क्लेरोसिस) दूसरा रोग है। उससे भी महाराज आप पीड़ित नहीं हैं। त्रिफला की ऐसी ही महिमा है। आँवले का ताजा रस और भांगरे का स्वरस दोनों ही रक्तदाब को बढ़ने नहीं देते क्योंकि दोनों ही रसायन द्रव्य हैं।
आचार्य रघुवीरप्रसाद त्रिवेदी ने दिल्ली में इन्द्रप्रस्थीय वैद्यसभा द्वारा बुलाये गये रक्तदाब विषयक सेमिनार में इस ऐतिहासिक तथ्य का उद्घाटन किया था कि अष्टांग आयुर्वेद के २ अंग रसायन और बाजीकरण अन्य बातों के अलावा रक्तदाब को कम रखने और बढ़ाने के ही अंग हैं। जो बुढ्ढा होता जाता है उसका रक्तदाब बढ़ता जाता है। उसे रसायनद्रव्यों का और तदनुकूल आचार रसायन का सेवन करना चाहिए। जो अपनी पुंस्त्व वृद्धि करना चाहता है उसका रक्तदाब समावस्था में लाने के लिए हाइपोटेंशन को नोर्मोटेंशन में बदलने के लिए बाजीकरणतन्त्रोक्त योगों का सेवन और तदनुकूल व्यायामादि करने चाहिए।
नमक और मद्य तथा उग्रवीर्यों के सेवन से रक्तदाब बढ़ता है। इसीलिए डाक्टर लोग हाईब्लड प्रेशर से पीड़ित रोगी का सोडियमक्लोराइड (नमक) बन्द कर उसे पोटाशियम क्लोराइड खिलाते हैं या ऐसी दवाएँ देते हैं जो सोडियम आयन को मूत्र में शीघ्र निष्क्रमित कर दें। जिन लोगों का रक्तदाब कम रहता है, उन्हें नमकीन चटपटे पदार्थ अच्छी मात्रा में देने चाहिए।
श्री त्रिवेदी का यह भी कथन है कि हमारे देश का अधिकांश उष्णकटिबन्ध में आता है। यहां गर्मी बहुत पड़ती है। गर्मी से पसीना बहुत निकलता है। पसीने में नमक का अंश होता है इसलिए नमक की कमी होना या रक्तदाब कम पाया जाना अक्सर मिलता है। हाथरस में एक वर्ग के लोगों में ११० से अधिक प्रकुंचन तथा ६० से अधिक अनुशिथिलन दाब मिलता ही नहीं है। इस रक्तदाब की कमी को दूर करने के लिए ही इस देश में चाट, पकौड़े, भेल, जलजीरा नमकीन चूरन चटनी लेने की प्रथा जितनी अधिक देखी जाती है उतनी दूसरे शीतकटिबन्धीय देशों में है ही नहीं।
खानपान और आचार विचार की शुद्धता पर जो जोर दिया जाता है वह रक्तदाब को नॉर्मल रखने में बहुत सहायक होता है। हमारी सारी धार्मिक व्यवस्थाएँ भी इसी आधार पर हैं।
प्राचीन आयुर्वेदीय ग्रन्थों में उष्णवीर्य और शीतवीर्य पदार्थों की गणना के पीछे भी यही उद्देश्य है। रक्तदाबवृद्धि के लिए या उत्साह और क्रियाशक्ति वर्द्धन हेतु मृतसंजीवनीसुरा, मदिरा, कांजिक, सौवीरक, तुषोदक, वारूणी आदि का उल्लेख और सैनिकों एवं शीतक्षेत्रों में माँस मदिरा का प्रचार भी मनुष्य की धमनियों में रक्तदाब ठीक मर्यादा में बनाए रखने में महत्त्व का योगदान करते हैं। छेने की मिठाई, रसगुल्ला, खीरमोहन, चमचम आदि कम रक्तदाब को बढ़ा कर मानसिक क्षोभ दूर करते हुए शरीर को स्वस्थ रखने में अच्छा योगदान करते हैं।
भारतीय जीवनपरम्परा में क्षोभ, ईर्ष्या, डाह, द्वेष आदि मनोद्वेगों को नियन्त्रित कर रक्तदाब को हाई होने से रोकने के लिए भी मन्दिर, देव पूजन, पूजापाठ की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।
श्रमिकवर्ग, कृषकवर्ग को शारीरिक परिश्रम काफी करना पड़ता है तथा मानसिक चिन्ता से दूर मनमौजी जीवन, गीतगायन और खेल-कूद अधिक करते हैं इसलिए उन्हें उसकी उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती।
उच्च रक्तदाब और सर्पगन्धा का प्रयोग
रक्तदाब बढ़ जाने से मानव शरीर में निम्नलिखित लक्षण पाये जा सकते हैं:-
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१. यदि रोग साधारण हो तो कोई भी लक्षण काफी दिन तक नहीं मिलेगा।
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२. किसी-किसी को शिरःशूल, भ्रम या चक्कर, घबराहट (नर्वस हो जाना) तथा हृदय में धकधक बढ़ने के लक्षण सबके सब या कोई-कोई मिल सकते हैं। कभी-कभी यह जानकर कि उसे रक्तदाब बढ़ता है चिन्ता से भी ये लक्षण बन जाते हैं।
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३. किसी-किसी महिला को रजोनिवृत्तिकाल में पता चलता है कि उसका रक्तदाब बढ़ा हुआ है।
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४. प्रायः सिर में दर्द का बना रहना और सामान्य शिरःशूलनाशक दवाओं से काबू में न आना सुदम उच्च रक्तदाब का मुख्य लक्षण है।
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५. सिरदर्द के साथ सवेरे उठते ही मिचली आना या उलटी होना भी पाया जा सकता है।
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६. कुछ गंभीर स्वरूप के उच्च रक्तदाब में हृदय में धड़कन का बढ़ना, चलने या परिश्रम करने में दम फूलना, आँखों से कम दीखना तथा और गंभीर होने पर मस्तिष्क वाहिनी में घनास्र बनाकर पक्षवध या अंगघात होना भी पाया जाता है। इसी में आगे चलकर मतिभ्रम के लक्षण भी पैदा हो जाते हैं।
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७. रोगी की नींद में गड़बड़ी सबसे पहला लक्षण है जो उच्च रक्तदाब के रोगियों में मिलता है। रोगी सोते-सोते जग जाता है फिर उसे घंटों नींद नहीं आती। अनिद्रा आगे चल कर बहुत सताती है।
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८. किसी-किसी को रात के समय मूत्रत्याग करने को उठना पड़ता है। किसी-किसी में उच्च रक्तदाब के साथ-साथ मधुमेह भी मिल सकता है। उसकी जाँच भी सावधानी के साथ कर लेनी चाहिए।
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९. दुर्दम या भारात्मक उच्चरक्तदाब को एसेंशियल हाइपरटेंशन या मैलिंग्नेंट हाइपरटेंशन भी कहते हैं। इसमें उपर्युक्त सभी लक्षण अपनी तीव्रता के साथ पाये जाते हैं। सिरदर्द, सिर के पीछे के हिस्से में बहुत अधिक होता है। नींद नहीं आती, दम बहुत फूलता है, आँखों की रोशनी बहुत घट जाती हैं। पेशाब बार-बार और रात में कई बार होता है उसके कारण बार-बार तीव्रतृषा लग जाती है। हृदय के दक्षिण भाग की क्रिया फेल होने लगती है। वृक्कों में विकार हो जाने से रक्तमेह (पेशाब में खून) आने लगता है। आगे चल कर पक्षाघात तथा अन्य मस्तिष्कजन्य विकृतियाँ देखी जाती हैं।
सामान्य या सुदम उच्च रक्तदाब आहार के नियमन और रसायन द्रव्यों से जहाँ सुधर जाता है वहां दुर्दम उच्च रक्तदाब बिना औषध ठीक नहीं किया जा सकता। उच्चरक्तदाब की सर्वप्रथम औषध आयुर्वेद ने ही विश्व को दी है। इसका नाम सर्पगन्धा है जिसे वैज्ञानिक भाषा में राउल्फिया सर्पेन्टाइना कहा जाता है। अत्यन्त दुर्दम रक्तदाब में सिरावेध द्वारा रक्तमोक्षण करना भी प्राचीन आयुर्वेदीय पद्धति ही है।
सर्पगन्धा की जड़ का सेवन ज्यों का त्यों कूट कपड़छान करके कराया जाता है। डाक्टरी चिकित्सा में इसके अल्कलायड रिसर्पिन का प्रयोग प्रायः होता है पर वे भी अब समग्र सर्पगन्धा के प्रयोग में विश्वास करते प्रतीत होते हैं।
रक्तदाबमापक यन्त्र द्वारा रक्तदाब की जाँच किए बिना सर्पगन्धा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
सर्पगन्धा का चूर्ण प्रकुंचन और अनुशिथिलन दोनों प्रकार के दाबों को घटाता है तेज नाड़ी की गति को मन्द करता है। रोगी को इसके प्रयोग से आराम, और चैन मिलता है।
फार्मेकोलोजी के विद्वानों का मत है कि सर्पगन्धा या रिसर्पिन का उपयोग सुदम या मध्यम उच्चरक्तदाब पर विशेष कर जो रक्तदाब न्यूरोजिनिक (वातिक) होता है उस पर विशेष होता है। दुर्दम या भारात्मक के लिए इसके साथ गैंग्लियौन अवरोधक द्रव्यों को मिला कर देना चाहिए।
सर्पगन्धामूल के ५० मिलीग्राम चूर्ण में २ मिलीग्राम सक्रिय अल्कलायड आ जाते हैं।
पाठ-संशोधन टिप्पणी: चूर्ण और अल्कलायड का ऊपर दिया गया परिमाण OCR का अपुष्ट पाठ है। इस चूर्ण की मात्रा रक्तदाब कम करने के लिए ३०३.८० से ६०७ मि.ग्रा. निद्रा लाने के लिए ६०७ मि.ग्रा. से १.८२ ग्रा. तथा उन्माद और प्रबल अपतन्त्र (हिस्टीरिया) हटाने के लिए १ || से ३ ग्राम तक यादवजी ने लिखी हैं।
सर्पगन्धाचूर्ण ३ ग्राम, ५ छोटी इलायची का चूर्ण, ५ काली मिर्च का चूर्ण एकत्र पीस कर ५८·३२ ग्राम गुलाब जल में मिला दें। इसे ३ घंटे रखा रहने दें फिर ६ ग्राम मिश्री डाल शीशी में रख दें। इसे उच्च रक्तदाब में ६ मात्राओं में थोड़ा-थोड़ा २४ घंटे में देने से सिर दर्द और बेचैनी मिट जाती है। अनिद्रा और उन्माद में लाभ होता है।
अन्य योग इस प्रकार हैं:-
सर्पगन्धा, शंखपुष्पी और जटामांसी का योग
- सर्पगन्धा चूर्ण — १ ग्राम।
- शंखपुष्पी चूर्ण — १ ग्राम।
- जटामांसी चूर्ण — १ ग्राम।
इनकी ६ मात्राएँ करें। एक-एक मात्रा गुलाबजल के साथ ४–४ घण्टे पर दें।
सर्पगन्धाघनवटी
सर्पगन्धा चूर्ण ९.३३० किलो खुरासानी अजवायन की पत्ती या बीज १.८७ किलो। जटामांसी ९३३ ग्राम, भांग ९३३ ग्राम सबका जौकुट चूर्ण कर लें और आठ गुने पानी में पकावें। जब जल उबालते-उबालते अष्टमांश पानी शेष रहे तो उसे उतार कर छान लें। इस छने हुए पानी को स्टेनलेस स्टील या तामचीनी के बर्तन में डाल फिर औटावें और लकड़ी के खोंचे से चलाते रहें गाढ़ा होने पर नीचे उतार कर २३३ ग्राम पिप्पलीमूल चूर्ण डाल धूप में सुखा ३६४ मि.ग्रा. की गोलियां बना लें।
मात्रा: २ से ३ गोली रात में सोते समय जल या दूध से दें।
चन्द्रावलेह
पाठ-संशोधन टिप्पणी: स्वरस की मात्रा ‘३ कि. ५२ ग्रा.’ और छोटी इलायची की मात्रा ‘७४६ ग्रा.’ मूल स्कैन से पुष्ट की जानी हैं। अन्य चूर्ण-द्रव्यों के साथ लिखी मात्रा प्रत्येक की है या सामूहिक, यह भी अस्पष्ट है।
शतावरी, विदारीकन्द, पेठा, शंखपुष्पी प्रत्येक का स्वरस ३ कि. ५२ ग्रा. चीनी ४ किलो ६७० ग्रा. डाल कर मन्द अग्नि पर पाक करें। जब अवलेह जैसा गाढ़ा हो जाय तो उतार लें अब इसमें छोटी इलायची ७४६ ग्रा.; दालचीनी, तेजपात, नागकेशर, मुनक्का, श्वेतचन्दन, कमल, अनन्तमूल, नागरमोथा, पद्माख, खस, आँवला, जटामांसी, और लवंग ४६·४ ग्राम तथा सर्पगन्धा १८७ ग्राम सबका कपड़छान किया हुआ चूर्ण डाल ७४६ ग्रा. शहद डाल चीनी मिट्टी के पात्र में भर कर रख दें। यह चन्द्रावलेह ५·८ ग्राम से ११·६६ ग्राम की मात्रा में दूध या चन्दनादि अर्क के साथ सेवन करावें।
इसके सेवन से उच्च रक्तदाब के सब लक्षण शान्त हो जाते हैं तथा उन्माद, अनिद्रा, शिरोभ्रम तथा हाथ पैर के तलवों की जलन भी मिट जाती है। इसे गुलगावजबाँ केवडा या बेदमुश्क के अर्क के साथ भी दे सकते हैं।
योगेन्द्र रस
यह वातव्याधियों और हृदय के दौर्बल्य को दूर करता ही है उच्च रक्तदाब के लक्षणों को मिटाने में भी इसका कोई जवाब नहीं।
अल्परक्तदाब या हाइपोटेंशन
जिस प्रकार रक्तदाब की वृद्धि स्वास्थ्य के लिए हानिकर है वैसे ही रक्तदाब का ह्रास भी एक प्रकार का रोग ही है। जब किसी वयस्क व्यक्ति का प्रकुंचन दाब १०० मि.मी. पारद से कम हो जाता है तो उसे अल्परक्तदाब से पीड़ित माना जा सकता है। स्वतन्त्रता संग्राम के दो सेनानी महात्मा गाँधी उच्च रक्तदाब से जहाँ पीड़ित रहे वहीं सरहदी गाँधी खान अब्दुलगफ्फार खाँ अल्प रक्तदाब से ग्रसित हैं।
जब किन्ही कारण से मनुष्य के शरीर से तरल द्रव्य अधिक मात्रा में निकल जाते हैं जैसे रक्तस्राव होने पर या अतिसार होने पर तो रक्त की हृदय से निकासी घट जाती है और रक्तदाब कम हो जाता है। हैजा या दग्ध में भी निर्जलीभवन होकर अल्प दाब पाया जाता है। एडीसन के रोग में या वाहिकावागसीमूर्च्छा में दाब प्रायः कम पाया जाता है। रक्त के आयतन की कमी रक्तदाब को कम करने में महत्त्व की भूमिका का निर्वाह करती है।
रक्त की कमी हो जाने या शरीर के जलीयांश में कमी होने के कारण उत्पन्न अल्परक्तदाब में शरीर ठण्डा रहता है चिपचिपा स्वेद आता है। नाड़ी की गति तेज रहने पर भी वह काफी कमजोर मालूम पड़ती है। कभी-कभी प्रकुंचनदाब तो नापा जा सकता है पर अनुशिथिलन दाब नापना कठिन हो जाता है।
वासोवागल मूर्च्छा में नाड़ी अत्यन्त मन्द पड़ जाती है पसीना खूब आता है तथा जी अधिक मिचलाने लगता है।
क्रियासंग या शॉक में रक्तदाब की कमी अवश्य देखी जाती है। यदि क्रियासंग में रक्तदाब में सुधार न हुआ तो प्राणरक्षा कठिन हो जाती है। कभी सिर में चोट लगने और मूर्च्छा आने पर काफी समय तक रक्तदाब कम ही रहता है। वृक्कों की क्रिया में विकृति, रक्तगत यूरिया की वृद्धि तथा रक्तअम्लता हाइपरलोरीमिया पाया जा सकता है।
अल्परक्तदाब की चिकित्सा प्रत्यनीक, अर्थात् कारणानुरूप की जाती है। यदि तरलों के कम होने से या रक्तस्राव के कारण अल्प रक्तदाब हो गया है तो तरलों की पूर्ति एवं रक्ताधान तक करना पड़ सकता है। रक्ताधान तब तक करते जाते हैं जब तक प्रकुंचनदाब १०० मि.मी. पारद तक न बढ़ जावे।
उसके बाद भी कुछ रक्त और चढ़ाना पड़ सकता है ताकि रक्त का आयतन सुधारा जा सके।
आयुर्वेद में रक्तदाबवर्धक अनेक उपाय हैं, जिनका कुछ विचार पहले किया जा चुका है। नीचे कुछ योग दिये जाते हैं:-
सुवर्णसिन्दूरयोग
शुद्ध गन्धक ४६.४ ग्राम शुद्ध हिंगुलोत्थ पारद ४६.४ ग्राम दोनों को खरल में डालकर कज्जली बना लें। इसमें ११·६६ ग्राम सोने के वरक डालकर बरगद की जटा के रस में ३ घण्टे मर्दन करें। फिर घृतकुमारी के गूदे में मर्दन करके सुखा काली बोतल में भर वालुकायन्त्र में कूपीपक्व विधि से स्वर्ण सिन्दूर बना लें। बोतल के तल में पड़े स्वर्ण को अलग से घृतकुमारी-स्वरस के साथ घोंटकर टिकिया बनाएँ और कुक्कुट पुट में १० बार फूंक लें। इस प्रकार बनी स्वर्ण भस्म और स्वर्णसिन्दूर को एकत्र पीस लें।
इसमें जायफल, लोंग, कपूर ११·६६ ग्राम, कस्तूरी १ ग्राम, केशर २ ग्राम और शुद्ध कुचला ३ ग्राम तथा अभ्रक भस्म ६ ग्राम डाल खरेंटी (बला) के रस में ३ दिन मर्दन कर १२१ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना छाया में सुखा शुद्ध शीशी में रख लें।
मात्रा: १ से २ गोली पान में रख कर प्रातः सायं लें।
यह योग बलवर्धक, रक्तदाबवर्द्धक, वृष्य, वाजीकर और चैतन्य प्रदाता है।
बृहन्मकरमुष्टि
अकरकरा १२, लोहभस्म १, मकरध्वज १, कुचला शुद्ध १-१ भाग, स्वर्णभस्म १ / ८ भाग सबको एकत्र मर्दन कर रखे और २४२ से ४८६ मि.ग्रा. की मात्रा में पान के रस और शहद मिला कर सेवन करे। यह योग स्नायुदौर्बल्य को दूर कर रक्तदाब को प्राकृत करता है तथा नपुंसकता को दूर कर देता है। यह श्री राजेश्वरदत्तशास्त्री द्वारा अनुभूत योग है।
पाठ-संशोधन टिप्पणी: अकरकरा का परिमाण ‘१२’ है, जबकि आगे भागों का निर्देश है। इस अंक की मूल स्कैन से पुष्टि अपेक्षित है।
रससिन्दूर, जावित्री और अभ्रकभस्म का योग
द्विगुणबलिजारित रससिन्दूर १ भाग, जावित्री २ भाग, अभ्रकभस्म ३ भाग पान के रस में मर्दन कर शीशी में रख लें।
मात्रा: १२१ से ३६३ मि.ग्रा. तक मधु के अनुपान से दें तथा ऊपर से मृतसंजीवनी सुरा ५-८ से ११.६६ ग्राम तक जल मिला कर लेने से या केवल दुग्ध अनुपान में लेने से रक्तवाहिनियों में अपूर्व शक्ति का संचार होकर रक्तदाब में सुधार हों जाता है।
शटी पानक
शटी या कपूरकचरी का चूर्ण ११७ ग्राम लेकर ८ गुने जल में मन्द अग्नि पर पकावें। जब २३३ ग्राम शेष रह जाय तो उसे छान लें। छने हुए क्वाथ में १ किलो सिता या चीनी डाल कर शर्बत बना लें। इस शर्बत को वमन वाले रोगी को ३ ग्राम से ६ ग्राम तक २-२ घण्टे के अन्तर से देने से सब प्रकार की वमन दूर हो जाती है। लक्षणोपशम के लिए यह उत्तम योग है। वमन जिस कारण से हुई हो उसका फिर विधिवत् उपचार करना चाहिए।
पंचामृत लौह गुग्गुलु
शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, रजत भस्म, अभ्रक भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म प्रत्येक ४६.४ ग्राम, लोह भस्म ९७ ग्राम तथा साफ किया हुआ गुग्गुलु ३२२·२८ ग्राम लें।
पहले पारद गन्धक की कज्जली बना लें। फिर लोहे के इमामदस्ते में गुग्गुलु डाल थोड़े कडुए तेल के छींटे देकर कूटें। जब वह मुलायम हो जाय तो कज्जली तथा भस्में डाल ६ घंटे अच्छी तरह मर्दन कर ४८६ मि.ग्रा. की गोलियां बना लें।
मात्रा: १ से २ गोली सबेरे शाम दूध से या चोपचीनी, असगन्ध, एरण्डमूल, इन्द्रायण की जड़, उशबा, सोंठ और कडुए सुरंजान प्रत्येक समभाग के जौकुट चूर्ण में से ११·६६ ग्राम ले, १८७ ग्राम जल में उबाल चतुर्थांश शेष रहने पर छानकर इस क्वाथ के अनुपान से सेवन करने से गृध्रसी, अवबाहुक, स्नायुओं के रोग (कटिशूल, घुटने का दर्द आदि) तथा वातव्याधियों में अच्छा लाभ करता है।
खंजनिकारि रस और माजून कुचला
खंजनिकारि रस
शुद्ध कुचला का कपड़छान किया हुआ चूर्ण, मल्लसिन्दूर और रोप्य भस्म बराबर-बराबर ले कर पहले मल्लसिन्दूर को खरल में डाल, बारीक पीसें। फिर शेष दोनों द्रव्य डाल कर अर्जुनवृक्ष की छाल के स्वरस की भावनाएँ देकर मूँग बराबर गोली बना छाया में सुखाकर रखें। इसकी मात्रा १ से २ गोली गाय के दूध या दशमूल के क्वाथ के अनुपान के साथ देने से अर्दित (फेशियल पैरैलाइसिस), खञ्जवात (लैथिरिज्म) और पुराने पक्षाघात (क्रॉनिक हैमीप्लीजिया) में अच्छा लाभ करता है।
माजून कुचला
शु. कुचला १२, गुलगावजबां ८, छोटी इलायची ४, कचूर ४, शकाकुल ४, सफेद चन्दन ४, आँवला ४, हरड़ ४, अगर २, लौंग २, चिलगोजा की मींगी ६, नारियल की गिरी ६, भिलावे की गिरी ६, नागरमोथा २, शु. वत्सनाभ १, कालीमिर्च २, असगन्ध २, चोपचीनी ८, सुरंजान तलख ६, जायफल २, जावित्री २, अकरकरा ४ भाग सबका कपड़छान चूर्ण, अभ्रक भस्म २, लोहभस्म २, शु. संखिया १/८ भाग खरल में अच्छी तरह मर्दन कर ३ गुने शहद में मिला, काँच की बरनी में रखें। इसे भोजन से ३ घंटे पूर्व ३-३ ग्राम की मात्रा में गरम दूध के साथ दें। यह माजून वातरोग विशेष करके पक्षाघात, कटिशूल, जीर्ण सन्धिवात और अर्दित में लाभ करती है। उत्तम दीपन, पाचन, रसायन, वाजीकर और रक्तदाब को सुधारने वाली बलकारक (टॉनिक) है।
मञ्जिष्ठादि चूर्ण
पित्त प्रकृति वालों को तथा रक्त और पित्त के विकारों में दस्त साफ लाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। योग इस प्रकार है: - मंजीठ १, छोटी इलायची १, सौंफ २, पाषाणभेद १, कलमीसोरा २, गोखरू १, रेवन्दचीनी १, घी लगा कर भूनी हुई छोटी हरड़ २, बड़ी हरड़ गुठली रहित २, बहेड़ा गुठली रहित २, बीज रहित आँवला २, गुलाबपुष्प २, सनाय ४ भाग कूट कपड़छान चूर्ण बनावें।
मात्रा: ३ से ६ ग्राम सबेरे लें या रात में सोते समय ठण्डे या गरम पानी के साथ लें।
इसके सेवन से १ या २ दस्त आराम से हो जाते हैं। यह चूर्ण न केवल दस्त ही साफ लाता है पेशाब भी खुल कर आता है। अर्श, रक्तातिसार में उपयोगी है। रक्त को शुद्ध करता है।
याकूती और जवाहर मोहरा
याकूती
पाठ-संशोधन टिप्पणी: चन्द्रोदय से केशर तक के द्रव्यों के लिए लिखी २३·२ ग्राम मात्रा का वितरण उपलब्ध पाठ में स्पष्ट नहीं है।
माणिक्य, पन्ना, मुक्ता, प्रवाल और कहरुबा इनमें से प्रत्येक की पिष्टी २३·२ ग्राम, चन्द्रोदय, सोने के पत्र, अम्बर, कस्तूरी, आबरेशम कतरा हुआ और केशर २३·२ ग्राम, बहमन सफेद, बहमन लाल, जायफल, लौंग, सफेद मिर्च प्रत्येक ११·६६ ग्राम, पहले खरल में चन्द्रोदय डाल कर घोंटें फिर पिष्टियाँ, केशर, आबरेशम डाल दें फिर काष्ठादिक दवाओं का कपड़छान किया चूर्ण डाल उत्तम गुलाब जल में २६ दिन मर्दन कर आखिरी दिन अम्बर और कस्तूरी डाल १२१·५० मि.ग्रा. की गोलियां बना छाया में सुखा शीशी में भर लें।
यह स्वर्गीय वैद्य तिलकचन्द ताराचन्द से यादवजी को प्राप्त नुस्खे के आधार पर लिखा गया है।
मात्रा: १ गोली पोदीने के स्वरस के साथ। यह हृदय की दुर्बलता, सन्निपातज्वर की नाड़ीक्षीणता, शरीर का ठण्डा पड़ जाना, क्रियासंग, स्वेद अधिक आना, थोड़ा चलते ही दम फूल जाना, हृदय धकधक होना (हार्ट पाल्पीटेशन) आदि में अच्छा काम करता है।
जवाहर मोहरा
माणिक्यपिष्टी २, पन्नापिष्टी २, मुक्तापिष्टी २, प्रवाल पिष्टी [मात्रा OCR में उपलब्ध नहीं], संगेयशब पिष्टी ४, कहरुबा पिष्टी २, चांदी के बरक १, सोने के बरक १, दरियाई नारियल ४, आबरेशम कतरा हुआ २, मृगशृंग भस्म ४, जदबर (निर्विषी) २, कस्तूरी १, अम्बर २ तोला ले लें। पिष्टियां सिसाक पत्थर के या न घिसने वाले पत्थर में बनावें। काष्ठौषधियों का चूर्ण कर लें।
पहले पिष्टियां डालें फिर चूर्ण डाल एक-एक बरक डाल घोंटते रहें जब सब बरक मिल जायं तब अच्छे गुलाब जल में १४ दिन मर्दन करें। १५ वें दिन कस्तूरी और अम्बर डाल गुलाब जल में घोंटें और १२१·५० मि.ग्रा. की गोलियां बना छाया में सुखा लें। कुछ लोग गोलियाँ न बना कर चूर्ण रूप में ही इसे रखते हैं। इसे १२१·५० मि.ग्रा. की मात्रा में शहद या खमीरा गावजबाँ में मिला कर देते हैं ऊपर से अनुपान में दूध या अर्क केवड़ा, अर्क बेदमुश्क या अर्क गुलगावजबां देते हैं। (१ तोला = ११.६६ ग्राम)
यह जवाहर मोहरा यूनानी चिकित्सा पद्धति का सुप्रसिद्ध योग है। यह हृद्दौर्बल्य तथा मस्तिष्क दौर्बल्य दोनों को दूर करता है। जिन लोगों का दिल धड़कता हो, थोड़ा चलने से सांस फूल जाती हो (डिसप्नियां) दिल में घबराहट बढ़ती हो तो यह बहुत अच्छा काम करता है।
अश्मरीहर कषाय और क्षारयोग
अश्मरीहर कषाय
यह अश्मरी (पथरी), शर्करा (रेती) और उससे होने वाले गुर्दे और पेट के दर्द में उपयोगी और यादवजी द्वारा लिखित सिद्ध प्रयोग है। योग इस प्रकार है: पाषाणभेद, सागौन के फल, पपीते की जड़, शतावरी, गोखरू, वरुण की छाल, कुश (डाग) के मूल, कांस के मूल, धान (चावलों) की जड़, पुनर्नवामूल, गिलोय, चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़, ककड़ी (या खीरा) के बीज १-१ भाग, जटामांसी, खुरासानी अजवायन के बीज या पत्ती २-२ भाग, सब एक साथ जौकुट कर लें। ११·६६ ग्राम चूर्ण १८७.६ ग्राम पानी में उबालें, ४६.४ ग्राम शेष रहने पर छान लें। इसमें ६०७·५० मि.ग्रा. से १·२ ग्राम क्षारपर्पटी या जवाखार मिला कर पीने को दें इसे हजरुलयहूद की भस्म के साथ दें। इसे दिन में ३-४ बार पिलावें।
आचार्य यादवजी का मत है कि यवमण्ड (२३·२ ग्राम जौ को ७४६ ग्राम पानी में उबाल, चौथाई शेष रख कर कपड़े से छान कर रखें), डाभ (कच्चे नारियल) का पानी, गन्ने का रस, लौकी-पेठा, ककड़ी का रस, मकोय की पत्ती, पुनर्नवा की पत्ती, कासनी की पत्ती आदि मूत्रल शाक अश्मरी में हितकर हैं। दालें, मांस, कन्द का शाक और स्नेहपक्व अन्न न दें। गरम पानी के टब में कमर तक अवगाहन कराना लाभदायक होता है। इससे गुर्दे का दर्द तथा मूत्रकृच्छ्र की वेदना घट जाती है।
मूलीक्षारादि योग
मूलीक्षार, स्वर्जिकाक्षार और यवक्षार बराबर-बराबर लेकर ६०७·५० मि.ग्रा. की मात्रा में पानी के साथ पिलाते ही वृक्कशूल बन्द हो जाता है यह आचार्य त्रिवेदी का मत है। इसे कुलथी के क्वाथ (२३०·२ ग्राम कुलथी के बीज २३३ ग्राम पानी में उबाल ५८·३० ग्राम शेष रहने पर छान कर बनावें) में डाल कर भी दे सकते हैं।
प्रमेहहर कषाय
यह यादवजी का अनुभूत योग है इसे सभी प्रकार के प्रमेहों में अकेला या अन्य प्रमेहनाशक योगों के साथ अनुपान के रूप में दे सकते हैं। योग इस प्रकार है: -- दारूहल्दी, हल्दी, गिलोय, हरड़, बहेड़ा, आँवला, देवदारु, नागरमोथा, खस, लोध, श्वेत चन्दन, कमल के फूल, पद्माख, गोखरू, पटोलपत्र सब बराबर-बराबर लेकर जौकुट करके रख लें। इसमें से ११.६६ ग्राम द्रव्य १९६·६ ग्राम पानी में उबालें, ४६.४ ग्राम शेष रहने पर कपड़े से छान ५·८३ ग्राम शहद डाल दिन में २ बार प्रातः सायं पिलावें।
पुनर्नवाष्टक क्वाथ
पुनर्नवा की जड़, हरड़, नीम की अन्तर्छाल , दारूहल्दी, कुटकी, पटोलपंचांग, गिलोय और शुण्ठी बराबर-बराबर लेकर जौकुट कर रख लें। इसमें से ११.६६ ग्राम लेकर १८६·५६ ग्राम पानी में पकावें, ४६.४ ग्राम शेष रहने पर कपड़े से छान लें उसमें १२ या २३ ग्राम गोमूत्र मिला कर पिलावें। ऐसी २-३ मात्रा दिन में दें। यह क्वाथ यकृत और प्लीहा की वृद्धि में, शोथ (सूजन) में, उदर रोग और सन्निपात में प्रयोग किया जाता है। सर्वांगशोथ या जनरल ऐनासार्का में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।
आचार्य यादवजी अपने सुप्रसिद्ध सिद्धयोगसंग्रह (बैद्यनाथ प्रकाशन) में पुनर्नवा की जड़ और कुटकी को २-२ भाग लेने और रोहीतक वृक्ष की अन्तर्छाल शरपुंखा की जड़ तथा अफसन्तीन १-१ भाग और मिलाने के लिए लिखते हैं तथा इसका नाम पुनर्नवादि क्वाथ देते हैं। उनका कथन है कि इस क्वाथ को पुनर्नवादिमण्डूर या आरोग्यवर्धिनी के अनुपान के रूप में देना चाहिए।
सन्धिवात और आमवात में वे इसमें चोपचीनी, विधारा, उशबा, सुरंजान तलख, अण्डी की जड़, सोनापाठा की छाल, इन्द्रायण की जड़, हरमल तथा रास्ना १-२ भाग और मिलाकर शृंगभस्म १-२ ग्राम के साथ देने के लिए निर्देशित करते हैं।
बिरोजे का लाल मलहर
गन्ध बिरोजा ४६७ ग्राम और हिंगुल ११·६६ ग्राम लें।
पहले बिरोजे को कड़ाही में डाल मन्द आग पर गरम करें। बीच-बीच में इसमें से चाकू या चम्मच से १-२ बूंद पानी में डाल कर देखते रहें कि यह कब मलहर बनाने योग्य हो जाता है। जब वैसा हो जाय तो कपड़े से छान लें। अब इसमें बारीक पीसा हुआ हिंगुल थोड़ा थोड़ा डाल बार बार तब तक चलाते रहें जब तक वह ठण्डा न हो जाय। बिना चलाए हिंगुल भारी होने से नीचे बैठ जाता है। इसे भरकर रख लें। यह मलहर घाव को शुद्ध करने और भरने के काम आता है। प्लूरिसी में पसली में दर्द होने पर या अन्यत्र कहीं भी दर्द होने पर इसे लगाते हैं।
लगाने की तरकीब यह है कि एक मोटे कपड़े या लिंट को बिछा लें फिर स्पेच्युला या चाकू को गरम करें उसकी सहायता से मलहर कपड़े पर फैला दें फिर इसे थोड़ी आग दिखा कर सुहाता सुहाता दर्द के स्थान पर चिपका दें। चिपकाने के पूर्व बालों को उस्तरे से साफ करवा दें ताकि पट्टी हटाते समय कष्ट न हो।
मदयन्त्यादि योग और वर्द्धमान बाकुची योग
मदयन्त्यादि योग
छाया में सुखाये हुये मेंहदी (मदयन्ती) के बीज या पत्तियों का चूर्ण २ भाग, भांगरे के रस में शुद्ध गन्धक १ भाग- दोनों को ३ घंटे मर्दन कर शीशी में रख लें, मात्रा १ ग्राम दिन में २-३ बार जल या सारिवादिहिम (पीछे देखें) के अनुपान से दें, यह योग कण्डू, पामा, फोड़ा-फुंसी में उपयोगी है।
वर्द्धमान बाकुची योग
यह श्वेत कुष्ठ पर यादवजी का प्रयोग है। वाकुची के ५ दाना पहले दिन ल्यूकोडर्मा से पीड़ित रोगी को ठण्डे जल के साथ सबेरे निगलवा दें। फिर १-१ दाना प्रतिदिन बढ़ाते जावें जब तक संख्या २१ दानों की न हो जावे। फिर १-१ दाना करके घटाते जायँ और ५ दानों पर आवें। इस प्रकार इस वर्द्धमान वाकुची योग का प्रयोग रोग अच्छा होने तक कई बार करें। श्वित्र पर वाकुची और तुबरक तेल मिला कर चुपड़ें। इस प्रकार करने से श्वित्र या सफेद कोढ़ में बड़ा लाभ होता है।
द्राक्षादि मोदक
धोकर बीज निकाला हुआ मुनक्का और गुठली निकाली हुई हरड़ दोनों बराबर-बराबर लेकर दोनों को अलग-अलग बारीक पीस लें। फिर इनको मिला, दुगुनी मिश्री डाल कूट ११·६६ ग्राम के मोदक बना लें। १ या २ मोदक रात्रि में सोते समय गुनगुने पानी के साथ दें।
इसके सेवन से छाती और गले की जलन दूर होती है। अम्लपित्त में आराम मिलता है, रोगी आराम से सो जाता है। सबेरे दस्त साफ आता है।
शीतपित्त या अलर्जी
आजकल प्रायः यह कहते हुए सुना जाता है कि अमुक व्यक्ति को अलर्जी हो गई है। जितना आधुनिक कृत्रिम दवाओं का प्रयोग बढ़ता जा रहा है उतना ही अलर्जी का प्रकोप भी बढ़ता जाता है। शीतपित्त, उदर्द और कोठ के नाम से जो रोग आयुर्वेद शास्त्र में बतलाये गये हैं वे आजकल की अलर्जी के अन्दर ही आते हैं।
अलर्जी या शीतपित्त शरीर की एक प्रतिक्रिया है जो उन पदार्थों के खाने या छूने से उत्पन्न होती है, जो रोगी की प्रकृति के अनुकूल नहीं होते। प्रकृति के अनुकूल होने को शास्त्र में सात्म्य और प्रतिकूल होने को असात्म्य कहा जाता है।
कुछ लोगों को टेरिलीन के कपड़े पहनने से अलर्जी हो जाती है। इन लोगों को टेरिलीन का प्रयोग असात्म्य है।
एक स्त्री को बाकला की फली काटते समय शीतपित्त का दौरा हो गया -- शरीर पर लाल-लाल पित्ती उछल आई, पित्ती की पिड़काओं में खुजली चलने लगी और शरीर, आँखें और चेहरा तमतमा गया।
कुछ लोगों को स्ट्रेप्टोपेनिसिलीन का इंजेक्शन लगते ही उपर्युक्त लक्षण तो उत्पन्न हो ही जाते हैं श्वास का वेग बढ़ जाता है। नाड़ी क्षीण हो जाती है और क्रियासंग (शॉक) और घबराहट होकर मृत्यु तक हो जाती है। पेनिसिलीन या प्रोकेन पेनिसिलीन इन लोगों के लिए असात्म्य होकर मारक भी हो सकती है। डाक्टर लोग इसके लिए कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स (डैकाड्रोन, बेटनेसोल, कॉर्टीजोन) ऐविल, साइनोपेन तथा एड्रिनलीन का प्रयोग कर जीवन रक्षा करने में सचेष्ट होते हैं।
आयुर्वेद में शुरू से ही असात्म्य पदार्थ, विरुद्धाशन का निषेध किया गया है।
जिन लोगों को शीतपित्त या अलर्जी का दौरा हो उन्हें तत्काल औषध प्रयोग करना चाहिए, यदि स्वयं व्यवस्था में समर्थ न हों तो समय न खोकर अच्छे चिकित्सक या अस्पताल में भेज देने में विलम्ब न करना चाहिए।
आयुर्वेदीय औषधियाँ भी इसमें कम लाभ करती हों ऐसा नहीं है।
जो अलर्जी के रोगी पर्याप्त काल तक डाक्टरी दवाओं से ठीक नहीं होते उनका रोग सदा के लिए नीचे लिखे योग दूर कर स्थायी लाभ पहुँचाने में उपयोगी सिद्ध हुए हैं :-
मकरध्वज रस
इसे चन्द्रोदय रस भी कहते हैं। १८६·५६ ग्राम शुद्ध हिंगुलोत्थपारद में २३·२ ग्राम स्वर्ण के पत्र एक-एक करके डालें और नींबू का रस मिला खरल में घोंटें। जब ८ घण्टे बराबर मर्दन हो चुके तो उसे पानी से धो लें। इसमें ३७१ ग्राम शुद्ध गन्धक डालकर मर्दन कर कज्जली बनावें। दूसरे दिन कपास के लाल फूलों के स्वरस में घोंटें फिर घृत कुमारी के गूदे में १ दिन मर्दन कर सुखा लें। इसे, कपड़मिट्टी की हुई काली पक्की बोतल में भर वालुकायन्त्र में कूपीपक्व विधि से मध्य मन्द अग्नि लगावें। लोहे की सलाई से बोतल का मुख खोलते रहें। जब गन्धक उड़ जाय तो खड़िया की डाट लगा दें। उसे गुड़-चूने से बिल्कुल बन्द कर दें। फिर १२ घण्टे तीव्र अग्नि देकर छोड़ दें।
स्वाङ्गशीतल होने पर बोतल की गर्दन पर जमे मकरध्वज को और बोतल के तल में रखे स्वर्ण को सावधानी से निकाल लें। जो लोग कूपीपक्व विधि के ज्ञाता नहीं उन्हें इसे न बनाना चाहिए अन्यथा पारद की भाप उनके मुख को सुजा दे सकती है तथा कब डाट बन्द करें इसका ज्ञान न होने से उन्हें कुछ भी पल्ले नहीं पड़ेगा।
अब १ भाग उपर्युक्त स्वर्ण का चूर्ण, ८ भाग मकरध्वज, ८ भाग कपूर, ८ भाग लौंग, ८ भाग केशर, ८ भाग जायफल और १ भाग कस्तूरी ले लें। पहले स्वर्ण और मकरध्वज का ३ दिन मर्दन करें। फिर कस्तूरी और अन्य द्रव्यों का कपड़छान किया चूर्ण डाल १ दिन और मर्दन कर शीशी में पक्की डाट लगा रख दें।
इस मकरध्वज रस को १२१·५१ से ३६४ मि.ग्रा. की मात्रा में शहद में चटा देने से अलर्जी तत्काल दूर हो जाती है। हृदय को बल मिलता है। क्रियासंग (शॉक) मिट जाता है और रक्त का परिभ्रमण पुनः अपने प्राकृत रूप में होने लगता है। यह उत्तम रसायन, वाजीकर और बलवर्द्धक है। इसका प्रयोग अनुपान भेद से अन्य अनेक रोगों में किया जा सकता है।
हरिद्राखण्ड
पाठ-संशोधन टिप्पणी: हल्दी, निशोथ और हरड़ के साथ लिखी ३७३ ग्राम मात्रा प्रत्येक की है या कुल, यह उपलब्ध OCR में स्पष्ट नहीं है।
यह एक निर्दोष योग है जो शीतपित्त में गत कई शताब्दियों से आयुर्वेदज्ञ व्यवहार में लाते रहे हैं। ट्रॉपीकल इओसिनोफिलिया में हल्दी का प्रयोग लाभदायक सिद्ध होने से भी इस योग का महत्त्व बढ़ गया है। इसके मूल योग में यादवजी महाराज ने कुछ परिवर्तन किया है जो इस प्रकार है - हल्दी, निशोथ और गुठली रहित हरड़ ३७३ ग्राम, दारूहल्दी, नागरमोथा, अजवायन, अजमोद, चित्रक की जड़ की छाल, कुटकी, जीरा सफेद, छोटी पिप्पली, सोंठ, छोटी इलायची, दालचीनी, तेजपात, वायविडंग, गिलोय, अडूसा, कूठ कडुआ, त्रिफला, चव्य, धनिया, लोह भस्म, अभ्रक भस्म प्रत्येक ११.६६ ग्राम; चीनी या मिश्री ३·७३ किलो।
सबसे पहले तामचीनी या स्टेनलेस स्टील के बर्तन में थोड़ा पानी और चीनी डाल कर चाशनी करें, चाशनी जब बूरा बनने योग्य (२ तार की) हो जाय तब उसे उतार लें और तुरन्त सब भस्में तथा उपर्युक्त औषधों का कपड़छान किया हुआ चूर्ण मिला दें तथा कतरी ढाल लें।
मात्रा: ३ से ६ ग्राम २-३ बार गरम जल के साथ दें। शीतपित्त और अलर्जी को दूर करने में अच्छा कार्य करता है।
सर्वदोषान्तक योग
पाठ-संशोधन टिप्पणी: इस योग में शुद्ध गन्धक की मात्रा छूटी हुई है।
हल्दी ४६·४ ग्राम, सोनागेरू ११.६६ ग्राम तथा शुद्ध गन्धक [मात्रा OCR में उपलब्ध नहीं]। पहले हल्दी को भूनकर चूर्ण कर लें। फिर सब द्रव्यों को कूटकर कपड़छान करें और मिला दें। इसे पानी में घोंट ३६४ मि.ग्रा. की टिकिया बना प्रयोग करें।
मात्रा: २ से ४ टिकिया तक ३-३ घण्टे पर जल के साथ देने से शीतपित्त, उदर्द, कोठ तथा सभी अलर्जिक विकार दूर हो जाते हैं। जिस अलर्जी में मुख से रक्त तक गिरता हो उसे भी सद्यः लाभ करता है।
इस रोग में ३-४ काली मिर्च चबवा कर घी पिला कर कम्बल उढ़ा कर सुला देते हैं और आग में अजवाइन डाल धूनी देते हैं। गुड़ और अजवायन भी खिलाते हैं।
अश्वगन्धादि योग
मिश्री, असगन्ध, ‘तागोरी’ [द्रव्य-नाम अस्पष्ट] और विधारे का चूर्ण ८-८ भाग, बड़ी इलायची का चूर्ण तथा कुक्कुटाण्डकपाल चूर्ण २-२ भाग और वंगभस्म १ भाग सबको एकत्र खरल करें और शीशी में भर कर रख लें।
मात्रा: २ से ६ ग्राम गाय के दूध से देने से सफेद प्रदर निश्चित रूप से ठीक होता है।
बोलादिवटी
हीराबोल (मुरमकी) २, शुद्ध सुहागा १, कसीस १, घी में भुनी हुई हींग १, एलुआ (मुसब्बरजर्द) १ सबको जटामांसी के क्वाथ में पीस २४३ मि.ग्रा. की गोलियां बना लें।
मात्रा: २४३ मि.ग्रा. भोजन के आधे घण्टे बाद जल के साथ दें। इसके प्रयोग से स्त्रियों का रक्तप्रदर ठीक होकर मासिक-धर्म समय से ठीक मात्रा में होता है।
प्रकाशक का परिचय और आयुर्वेदीय प्रकाशन























