अम्लपित्त
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यह बिल्कुल मन्दाग्नि का ही भेद है। यह पित्त की विदग्धता से पैदा होता है। जब भोजन का परिपाक अच्छी तरह नहीं होता, तब यह रोग उत्पन्न होता है। इस रोग में भोजन का अपरिपाक, आलस्य, भोजन के दो-एक घण्टा बाद अम्ल (खट्टी) कै, छाती और गले में जलन, कब्जियत, पेट में दर्द, अरुचि आदि लक्षण प्रकट होते हैं। भोजन के बाद छाती और गले में जलन तथा खट्टी डकारों के साथ खट्टे पानी से मुँह भर जाना और अम्ल वमन होना इस रोग के खास लक्षण हैं। बिहार और बंगाल आदि प्रान्तों में यह रोग बहुत होता है। मन्दाग्नि के जो कारण बतलाये गये हैं, उन्हीं कारणों से अम्लपित्त भी पैदा होता है। मन्दाग्नि और अम्लपित्त की चिकित्सा में भेद होने के कारण ही ये दो जगह लिखे गये हैं।
चिकित्सा
मन्दाग्नि की तरह ही इस रोग की भी चिकित्सा करनी चाहिए। नीचे लिखी दवाएँ इस रोग में विशेष लाभकारी हैं। संग्रहणी रोग में लिखा हुआ नम्बर १ नुस्खा तथा नम्बर ८ (स्वर्ण-पर्पटी) का सेवन अत्यन्त लाभकारी है। इसके साथ-साथ नीचे लिखी दवाएँ भी परीक्षित हैं:--
(१) अविपत्तिकर चूर्ण -- सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, मोथा, विड् नमक, वायविडंग, छोटी इलायची और तेजपत्ता—इन ११ दवाओं का प्रत्येक ११.६६ ग्राम, लौंग चूर्ण १२८.३० ग्राम, त्रिवृत् मूल (निशोथ) चूर्ण ५१३.४ ग्राम और चीनी ७७० ग्राम—इन सबों का चूर्ण कर लें। भोजन के आदि और मध्य में ३-३ और ६-६ ग्राम इसका सेवन करें। इससे अम्लपित्त में विशेष लाभ होता है। अग्नि की वृद्धि होती है और दस्त साफ होता है।
-- भै० र०
(२) वृहत् पिप्पलीखण्ड -- पीपल का चूर्ण ४६७ ग्राम, घी ९३३ ग्राम, चीनी १.८७ किलो, शतावर ९३३ ग्राम, आँवले का रस १.८७ किलो और दूध ३.७३ किलो—एकत्रित औटाकर गाढ़ा करें। फिर इसमें दालचीनी, तेजपत्ता, छोटी इलायची, हरड़, काला जीरा, धनिया, नागरमोथा, वंशलोचन, आँवला—ये ९ दवाएँ प्रत्येक २३.२ ग्राम; जीरा, कूठ, सोंठ और नागकेशर—ये चार दवाएँ प्रत्येक ११.६६ ग्राम; जायफल और कालीमिर्च प्रत्येक ५.८३ ग्राम—इन सबका चूर्ण करके मिला दें। ठंडा होने पर इसमें २७९.४ ग्राम शहद भी मिला दें। ५.८३ ग्राम गर्म दूध के साथ सेवन करने से अम्लपित्त में बहुत अच्छा फायदा होता है। वमन, जलन, अग्निमान्द्य, कास, श्वास, अरुचि आदि को नष्ट करने की यह परीक्षित दवा है।
-- भै० र०
(३) धात्री लौह -- आँवले का चूर्ण ३.७३ किलो, लोह भस्म ९३३ ग्राम और मुलेठी ९३३ ग्राम—इन सबको गिलोय रस या काढ़े की सात भावना देकर तीन-तीन ग्राम की गोलियाँ बना लें। एक गोली को सुबह जल में भिगो दें और भोजन के समय उसका तीन भाग करके भोजन के आदि, मध्य और अन्त में लें। आँवले का रस ११.६६ ग्राम और शहद ११.६६ ग्राम खाते समय और मिला लेना चाहिए। यह अम्लपित्त रोग की परीक्षित दवा है।
-- भै० र०
(४) लीलाविलास रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रक भस्म, ताम्र भस्म, लोह भस्म—ये पाँचों दवा समभाग लेकर ताजे आँवले और बहेड़े के रस में ३ दिन तक इन्हें घोंटकर एक भावना भृंगराज के रस की देकर २४३ से ३६४ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। दूध, चीनी, आँवला या कुम्हड़े के रस के अनुपान से अम्लपित्त के रोगी को खिलाएँ। छाती की जलन, खट्टा वमन, पेट दर्द आदि अम्लपित्त के लक्षणों में बहुत लाभ करता है। यह अम्लपित्त रोग की उत्तम दवा है।
-- भै० र०
(५) सूतशेखर रस -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागे का लावा, शुद्ध रौप्य भस्म, सुवर्ण भस्म, ताम्र भस्म, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, धतूरे का शुद्ध बीज, दालचीनी, तेजपत्र, नागकेशर, इलायची, बेलगिरी, शंख भस्म, कचूर—इन १७ औषधियों का समभाग चूर्ण कर भाँगरे के रस में २१ दिन तक घोंटकर १२१.५० मि.ग्रा. की गोलियाँ बनावें। १ से ३ गोली तक दिन में २-३ बार दूध, मिश्री, घी, शहद, बेदाना का रस अथवा रोगानुकूल अनुपान द्वारा देने से यह अम्लपित्त, वमन, शूल, सब प्रकार के गुल्म, खाँसी, संग्रहणी, अतिसार, मन्दाग्नि, पेट का फूलना, हिचकी, ज्वर आदि अनेक रोगों को आराम करता है। श्वास और क्षय में भी इसका प्रयोग लाभदायक है। खासकर पित्तविकार में तो यह सर्वोत्तम दवा है। महाराष्ट्र में इसका विशेष प्रचार है।
-- यो० र०
(६) मुनक्का, बड़ी हरड़ का बक्कल समान भाग लेकर मिश्री समान भाग के साथ ११.६६ ग्राम लेने से लाभ होता है।
(७) द्राक्षावलेह -- मुनक्का ९३३ ग्राम को जल से धोकर (बीज निकालकर) दूध के साथ सिलबट्टे पर चटनी की तरह पीस लें। पश्चात् २३३ ग्राम गाय के घृत में मन्दाग्नि पर भूनें। बाद में इसमें १.८७ किलो चीनी की चाशनी (लच्छे की) बनाकर उसमें मुनक्का को मिला दें। पश्चात् जायफल, जावित्री, छोटी इलायची, वंशलोचन, लौंग, दालचीनी, तेजपात, नागकेशर, कमलगट्टे की मींगी (जीभी निकाली हुई)—प्रत्येक द्रव्य १४.६६ ग्राम लेकर महीन चूर्ण करके मिलाएँ तथा केसर ३ ग्राम को गुलाबजल में या पानी में घोंटकर मिला दें। इसे ११.६६ से २३.३२ ग्राम तक की मात्रा में सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करें। यह अवलेह अम्लपित्त, रक्तपित्त, दाह, पाण्डु, कामला, अग्निमान्द्य तथा कोष्ठबद्धता में अच्छा लाभ करता है।
-- आयु० नि०
(८) नारिकेलखण्ड पाक -- ताजा नारियल की गिरी ३७३ ग्राम को सिलबट्टे पर पीसकर ९३.३२ ग्राम गाय के घृत में भूनें। फिर १.५ किलो नारियल के पानी में ३७३ ग्राम चीनी मिलाकर चाशनी करके उसमें उपरोक्त भुनी हुई नारियल की गिरी मिलाकर कुछ देर मन्दाग्नि पर पकाकर उतारकर ठंडा होने पर बरनी में रख लें। इसे ११.६६ से २३.२ ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गाय के दूध या जल के साथ सेवन करने से अम्लपित्त, परिणामशूल तथा सिरदर्द में उत्तम गुणकारी है।
-- बृ० यो० त०
द्राक्षादि मोदक
धोकर बीज निकाला हुआ मुनक्का और गुठली निकाली हुई हरड़ दोनों बराबर-बराबर लेकर दोनों को अलग-अलग बारीक पीस लें। फिर इनको मिला, दुगुनी मिश्री डाल कूट ११·६६ ग्राम के मोदक बना लें। १ या २ मोदक रात्रि में सोते समय गुनगुने पानी के साथ दें।
इसके सेवन से छाती और गले की जलन दूर होती है। अम्लपित्त में आराम मिलता है, रोगी आराम से सो जाता है। सबेरे दस्त साफ आता है।
पथ्यापथ्य
इसमें ठीक मन्दाग्नि की तरह आहार-विहार करना चाहिए। अम्लपित्त में मट्ठा का सेवन लाभ नहीं पहुँचाता, क्योंकि मट्ठे के सेवन से खटाई पैदा होती है। इसमें दूध का सेवन अच्छा है। कच्चे नारियल (डाभ) का पानी पीना इस रोग में उत्तम लाभ पहुँचाता है। जब प्यास लगे तब कुएँ का ताजा पानी पीना विशेष लाभकारक है। रोगी को कब्ज न रहना चाहिए। नीबू, आम, खट्टा दही आदि अम्ल वस्तु मात्र से परहेज रक्खें। नया अन्न न खाएँ। दाल बिल्कुल न खाएँ। पुराने चावल, गेहूँ की रोटी, दूध, हरी पत्ती वाले शाक एवं मीठे फल आदि खाना लाभदायक है।
शीतपित्त में हरिद्राखण्ड (सि० यो० सं० पृ० ५४) अथवा हल्दी ४६.४ ग्राम और स्वर्णगैरिक ३ ग्राम मिलाकर १ ग्राम की मात्रा में देने से लाभ होता है।
नोट -- चतुर्थ शास्त्र-चर्चा में अम्लपित्त पर बहुत विचार किया गया था, जिसे 'अम्लपित्त प्रकरण' के नाम से पृथक् छपाया गया है, उसे देखें।