द्रव्य-शोधन प्रकरण
7 मिनट का पाठ
पूर्व प्रकरण का शेष अंश: मधुमेह-चिकित्सा
(३) घनसत्त्व-योग
- पलाश घनसत्त्व — २४३ मि.ग्रा.
- मामज्जक घनवटी — २४३ मि.ग्रा.
- गुडूची घन — २४३ मि.ग्रा.
इनकी ९ वटी बनावें।
पाठ-संशोधन टिप्पणी: इस अंश में वटी बनाने का वाक्य बिखरा हुआ था। ऊपर उपलब्ध द्रव्य, मात्राएँ और वटी-संख्या ज्यों की त्यों रखी गई हैं; इनके आपसी सम्बन्ध की मूल स्कैन से पुष्टि अपेक्षित है।
इसे दिन में ३ बार देने पर शर्करा की मात्रा कम हो जाती है। काल — १–४ सप्ताह।
नोट: यह अंगवेदना, सन्धिवेदना, कण्डू और तृष्णा को कम करता है।
यह मधुमेह-चिकित्सा पं० विश्वनाथजी द्विवेदी आचार्य की ‘वैद्य सहचर’ नामक पुस्तक से आज्ञा लेकर प्रकाशित की गई है।
संखिया का शोधन
संखिया को सरौते से चने जितने छोटे टुकड़ों में काटकर कपड़े में बाँधें। मिट्टी की हाँडी में दोला-यन्त्र से गाय के दूध में मन्द आँच पर तीन घण्टे पकावें। फिर कपड़े से निकालकर गरम जल से धोएँ और सुखा लें।
हरताल का शोधन
अच्छी पत्री (वरकी) हरताल लाकर उसके चने जितने छोटे टुकड़े करें। उन्हें कपड़े में बाँधकर मिट्टी की हाँडी में पेठे के स्वरस में दोला-यन्त्र से मन्द आँच पर छः घण्टे पकावें। फिर मिट्टी या काँच के बर्तन में नीबू के रस में भिगोकर रख दें। प्रतिदिन नीबू का रस बदलते रहें। इस प्रकार सात दिन नीबू के रस में रखने के बाद जल से धोकर सुखा लें।
मैनसिल का शोधन
अच्छी मैनसिल लाकर उसके चने जितने छोटे टुकड़े करें। हाँडी में भाँगरे का स्वरस भरकर उसमें दोला-यन्त्र से पकावें। फिर धोकर पत्थर के खरल में अदरक के रस की ३ भावनाएँ और अगस्त्य के फूलों के स्वरस की ३ भावनाएँ दें। इसके बाद सुखाकर रख लें।
टंकण (सुहागा) का शोधन
सुहागे का चूर्ण करके मिट्टी के तवे पर फैलाएँ और तवे को अग्नि पर रखें। जब सब सुहागा फूलकर लावा (खील) जैसा हो जाए, तब ठण्डा करके पीसें, कपड़छान करें और शीशी में भर लें।
फिटकरी का शोधन
फिटकरी का शोधन सुहागे के शोधन की तरह ही करें।
बच्छनाग का शोधन
जो बच्छनाग तोड़ने पर भीतर से ठोस और चिकना हो, उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके मिट्टी या काँच के पात्र में डालें। ऊपर से इतना गोमूत्र डालें कि सब टुकड़े डूब जाएँ। पात्र को ढककर २४ घण्टे रख छोड़ें। दूसरे दिन पहला गोमूत्र निकालकर नया गोमूत्र भरें। इस प्रकार ३ बार करें।
फिर जल से धोकर एक कपड़े में बाँधें और गाय के दूध में दोला-यन्त्र से मन्द आँच पर तीन घण्टे पकावें। कपड़े से निकालकर जल से धोएँ और सुखाकर रख लें। सूखने के बाद आवश्यकतानुसार तौलकर काम में लावें।
अफीम का शोधन
अफीम को चौगुने जल में धोकर कपड़े से छान लें। फिर मन्द आँच पर गरम करके गाढ़ा कर लें। इसके बाद अदरक के रस की सात भावनाएँ देकर सुखाएँ और काम में लावें।
धतूरे के बीज का शोधन
अच्छे पके हुए धतूरे के बीजों को कपड़े में बाँधकर दोला-यन्त्र से गाय के दूध में मन्द आँच पर ३ घण्टे पकावें। फिर गरम जल से धोकर सुखा लें। कनेर, कलिहारी, चिरमिटी (गुंजा) और विधारा-बीज आदि को भी धतूरे के बीज की तरह शुद्ध करना चाहिए।
भाँग का शोधन
भाँग को कपड़े में बाँधकर जल से धोते रहें, जब तक उससे हरा रंग निकलता रहे। फिर कपड़े से निचोड़कर छाया में सुखा लें।
कुचले का शोधन
अच्छे पुष्ट (भरे हुए) कुचले लाकर मिट्टी या काँच के पात्र में गोमूत्र में भिगो दें। दूसरे दिन वह गोमूत्र निकालकर नया गोमूत्र भरें। इस प्रकार सात दिन गोमूत्र में भिगोएँ। आठवें दिन चाकू से कुचले का ऊपरी छिलका तथा दो दलों के अन्दर की जीभ निकाल दें।
फिर कपड़े में बाँधकर गाय के दूध में दोला-यन्त्र से पकावें। कपड़े से निकालकर गरम जल से धो लें। कुचले को योगों में डालना हो तो उसी समय सरौते से छोटे-छोटे टुकड़े करके पीस लें; सूखने के बाद उसका चूर्ण बड़ी कठिनाई से होता है।
भिलावे का शोधन
अच्छे पके और पुष्ट भिलावों को १ दिन गोमूत्र में तथा ३ दिन गाय के दूध में भिगोकर रखें। प्रतिदिन जल से अच्छी तरह धोकर नए दूध में भिगोएँ। फिर कपड़छान किए हुए ईंट के चूर्ण से अच्छी तरह मसलें और जल से धोकर सुखा लें। इस प्रकार शुद्ध किए हुए भिलावों को खाने के प्रयोग में लाएँ।
जमालगोटे का शोधन
पहले जमालगोटे को भैंस के गोबर में मिलाकर ६–७ दिन रख दें। गोबर में थोड़ा जल मिला देना चाहिए। फिर गोबर से निकालकर गरम जल से धोएँ। ऊपर के छिलके उतारें और चाकू से चीरकर अन्दर की पत्तियाँ निकाल लें। इसके बाद एक पहर तक दूध में पकाएँ।
फिर नीबू के रस में घोंटकर किसी कोरे घड़े पर, जिसमें जल आदि न डाला गया हो, लेप करें और धूप में सुखाएँ। इसी तरह नीबू के रस में घोंट-घोंटकर नए घड़ों पर लेप करके सुखाते रहें। जब घड़े पर चिकनाहट आना बन्द हो जाए, तब जमालगोटा शुद्ध हो जाता है। प्रत्येक बार घड़ा नया होना चाहिए।
अब इसे योगों में व्यवहार करने से दस्त तो आएँगे, पर पेट में मरोड़ और जी मिचलाना आदि उपद्रव नहीं होंगे।
गूगल का शोधन
गिलोय अथवा त्रिफला के क्वाथ में या दूध में गूगल डालकर मन्द-मन्द आँच पर पकाएँ। जब गूगल गल जाए, तब धीरे-धीरे ऊपर का द्रव भाग छान लें और नीचे का कूड़ा-कर्कट छोड़ दें। फिर छने हुए द्रव को पकाकर खूब गाढ़ा कर लें। पकाते समय थोड़ा घी डाल देना चाहिए, जिससे गूगल जलने न पाए।
खर्पर का शोधन
खपरिये का सूक्ष्म चूर्ण करके मिट्टी या काँच के पात्र में डालें। ऊपर से पात्र को गोमूत्र से भर दें। प्रतिदिन गोमूत्र बदलते रहें। इस प्रकार सात बार गोमूत्र में भिगोने के बाद जल से धोकर सुखाएँ और रख लें।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग में जो खपरिया बिकता है, वह ठीक है; उसे काम में लाना चाहिए। खर्पर के स्थान पर जस्ते की भस्म का व्यवहार करना भी अच्छा है।
हिंगुल का शोधन
हिंगुल का चूर्ण करके एक पहर तक गाय के दूध में मर्दन करें। फिर नीबू के रस की सात भावनाएँ देकर सुखाएँ और शीशी में भर लें।
शिलाजीत का शोधन
शिलाजीत को गोदुग्ध, त्रिफला और जलभाँगरे के क्वाथ में लोहे के पात्र में एक-एक दिन घोंटकर धूप में सुखा लेना चाहिए। इस प्रकार शिलाजीत शुद्ध हो जाता है। यदि पत्थरों से उतारा हुआ शिलाजीत हो तो पहले निखालिस पानी में औटाएँ। फिर पानी को नितारकर दोबारा आग पर चढ़ाएँ और गाढ़ा कर लें। इसके बाद उपर्युक्त विधि से शुद्ध करें।
गुण: शिलाजीत तिक्त, कड़वा तथा सूजन, उदररोग, अर्श और मूत्राशय के सम्पूर्ण रोगों को अच्छा करता है। यह अपूर्व ताकतवर है। ‘सुश्रुत संहिता’ में लिखा है कि दुनिया में ऐसा कोई रोग नहीं जो शिलाजीत के सेवन से दूर न हो।
पारद शोधन
पारद के सोलहवें भाग के बराबर हल्दी का चूर्ण लेकर घृतकुमारी (ग्वारपाठा) के रस के साथ पारद को एक दिन घोंटें। फिर तिर्यक्-पातन करें और एक दिन नीबू के रस से घोंटें। इससे पारद अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है।
धूर्त व्यापारियों द्वारा लोभवश पारे में मिलाई गई राँगा, सीसा, जस्ता आदि सस्ती धातुएँ इस विधि से शोधन करने पर तिर्यक्-पातन में नीचे के भाग में ही रह जाती हैं। विशुद्ध पारा उड़कर यन्त्र की नलिका द्वारा दूसरे पात्र में जाकर इकट्ठा हो जाता है।
गन्धक शोधन
मिट्टी के चौड़े मुँह वाले पात्र में गन्धक से चौगुना दूध डालकर उसके मुँह पर महीन कपड़ा बाँध दें। फिर लोहे की छोटी कड़ाही में कुछ घी और गन्धक डालकर आग पर पिघलाएँ। पिघल जाने पर इसे कपड़ा बँधे दूध के पात्र में डाल दें। कुछ देर बाद दूध से गन्धक निकालकर गरम जल से धोएँ, सुखाएँ और पीसकर रख लें।