आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशमधुमेह पर औषधि प्रयोग

मधुमेह पर औषधि प्रयोग

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इतिहास

मधुमेह का ज्ञान भारतीयों को ईस्वी सन् से कई सौ वर्ष पूर्व हो चुका था। देश में उस समय दो सम्प्रदाय थे — चिकित्सा-कर्म में आत्रेय का सम्प्रदाय और शल्य-कर्म में धन्वन्तरि का सम्प्रदाय प्रसिद्ध था। प्राप्त साहित्य बतलाता है कि आत्रेय सम्प्रदाय में आत्रेय के बाद अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पराशर, काश्यप, चरक, वाग्भट ने अपने ग्रन्थों में इसका विवरण दिया है, जिनमें हारीत संहिता, भेल संहिता और चरक संहिता उपलब्ध हैं और उनमें विस्तारपूर्वक विवरण दिया गया है।

धन्वन्तरि सम्प्रदाय में सुश्रुत, भोज, नागार्जुन, विदेह आदि ने इस पर विशेष विवरण दिए हैं।

इन चिकित्सकों का अध्ययन इस विषय में अत्यन्त गम्भीर था। उन्हें केवल मूत्र में शर्करा आती है इतना ही ज्ञान न था, अपितु बहुमूत्र, तीव्राग्नि, पिपासा, कण्डू, अंगमर्द, संधिवेदना, मूर्च्छा, संन्यास के लक्षणों का भी अध्ययन किया था। यही नहीं, वंशपरम्परागत भी यह रोग होता है, इसका पूर्ण अध्ययन किया था। प्रमेह की उचित चिकित्सा न होने पर प्रमेह मधुमेह में बदल जाता है, यह भी वे जानते थे।

प्रमेह के लक्षणों में "प्रभूताविलमूत्रता" प्रथम लक्षण दिया गया है। जब यह प्रभूत मूत्रता बढ़ जाती है, बहुमूत्रता में परिणत होती है और तृष्णा की वृद्धि, मूत्र का अधिक त्यागना तथा शर्करा-मिश्रित मूत्र त्यागना इसके प्रधान लक्षण माने जाते हैं। यह काल ईस्वी सन् से कई सहस्र वर्ष पूर्व का है। चरक व सुश्रुत का काल ईस्वी सन् पूर्व २००० से ५०० का माना गया है, जब ये ग्रन्थ सर्वत्र प्रसिद्ध हो चुके थे।

साध्यासाध्यता

तीन प्रकार के मेहों का विवरण मिलता है जिनमें शर्करा मिलती है — इक्षुमेह, शर्करामेह और मधुमेह। प्रथम दो सुखसाध्य हैं, परन्तु तृतीय मधुमेह कृच्छ्रसाध्य व असाध्य माना गया है।

उपद्रव

सात प्रकार की पिड़काएँ (Carbuncles), दुष्टव्रण (Gangrene), मूर्च्छा और संन्यास (Coma) — ये इसके मुख्य उपद्रव बतलाए गए हैं।

आधुनिक जगत्

आधुनिक चिकित्सकों को इसका ज्ञान कब हुआ, कहना कठिन है। मिस्र (इजिप्त) के प्राचीन ग्रन्थ 'एबर्स पैपाइरस' में बहुमूत्रता का उल्लेख है। एरिटियस ऑफ कैपाडोसिया (Aretaeus of Cappadocia, लगभग १५० ई०), जो गैलेन का समकालीन था, उसने लिखा कि मूत्र में शर्करा आती है। परन्तु भारतीय चिकित्सकों ने इसका सबसे पहले पता लगाया था। उनका कथन था कि मूत्र में मधु जैसी वस्तु निकलती है, अतः इसका रूढ़ नाम 'मधुमेह' (Honey urine) पड़ा; जिसमें तृष्णा, दुर्गन्धित श्वास (Foul breath) और अत्यग्नि प्रधान लक्षण थे।

निदान

निदान के विषय में भी भारतीय चिकित्सक भली-भाँति जानते थे कि गरिष्ठ भोजन, आलस्य, दिवास्वप्न, अव्यायाम आदि इसके मुख्य हेतु हैं।

आधुनिक चिकित्सक १८वीं शताब्दी में इसे जानने लगे। १९वीं शताब्दी में इसे समझ पाए व अध्ययन किया; बीसवीं शताब्दी में पाचन एवं चयापचय (Metabolism) की दृष्टि से इसका संबंध जान सके।

भारतीय चिकित्सक केवल एक हेतु मात्र ही नहीं जानते थे। १८४९ में क्लॉड बर्नार्ड (Claude Bernard) तथा बाद में मिंकोव्स्की व वॉन मेरिंग (Minkowski & von Mering) ने अग्न्याशय (Pancreas) का संबंध समझा। १९०९ में मैककैलम (MacCallum) ने व १९१२ में कर्कब्राइड (Kirkbride) ने अग्न्याशय के ऊपर प्रयोग कर समझा कि इसके आइलेट्स सेल्स की क्षति से यह व्याधि होती है।

ऑस्ट्रेलिया में १९४८ में प्रो० मार्विन ग्रिफिथ (Mervyn Griffiths) ने ग्लूटाथायोन (Glutathione) व एलॉक्सन (Alloxan) का इंजेक्शन देकर प्राणियों में मधुमेह पैदा किया और एक सिद्धान्त बनाया।

वंशगत विवरण

मधुमेह के रोगियों में सुखी, धनी व बुद्धिजीवी (मानसिक कार्य करने वाले) व्यक्तियों की संख्या अधिक मिलती है। यह अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान और अफ्रीका में भी बहुत मिलता है। भारत में भी इसकी संख्या अब बहुत बढ़ने लगी है। बंगाल, बिहार में अधिक चावल खाने वालों में पाया जाता है। वकील, बैरिस्टर, अध्यापक, ऑफिस के बाबू लोग जो मानसिक श्रम अधिक करते हैं, उनमें इसकी संख्या अधिक है।

आक्रामक आयु और मधुमेह (Age of Onset)

  • बालक (१५ वर्ष तक): न्यून
  • नवयुवक (Young adolescent, १६-२५ वर्ष): पुरुष २.२०%, स्त्री १.२०% = ३.४०%
  • तरुण (२६-३५ वर्ष): पुरुष ९.४०%, स्त्री ३.३०% = १२.७०%
  • मध्य आयु (३६-५० वर्ष): पुरुष ३७.६०%, स्त्री ९.६५% = ४७.२५%
  • वार्धक्य (५१ वर्ष से ऊपर): पुरुष २६.२०%, स्त्री ९.८०% = ३६.००%
  • कुल: पुरुष ६५%, स्त्री ३५%

मध्य आयु (३६ से ५० वर्ष की उम्र) के लोग सबसे अधिक इसके प्रभाव में आते हैं। जोसलिन (Joslin) के ९८५३ रोगियों के अध्ययन में देखा गया कि पुरुष ५१ से ५५ वर्ष की अवस्था में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। अधिकतर धनी घरों, वकीलों, बैरिस्टरों और आराम से जीवन बिताने वालों में यह रोग अधिक मिलता है।

व्यावसायिक रूप से मधुमेह का प्रतिशत:

  • व्यापारी वर्ग : २४.३%
  • गणक वर्ग (Accountant) : १३.००%
  • जमींदार (Landlord) : १२.१%
  • वकील (Lawyer) : ११.८%
  • लेखक/लिपिक (Clerk) : ६.७%
  • चिकित्सक : ५.७%
  • इंजीनियर, उच्चाधिकारी, अध्यापक, मजदूर, विद्यार्थी, पुलिस-मिलिट्री व अन्य।

कलकत्ता में १९२९ की बनिस्बत १९३५ में संख्या दुगुनी हो गई और धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही है।

रोगियों का वर्गीकरण एवं क्लिनिकल अध्ययन

व्याधि की स्थिति के अनुसार चिकित्सा का निर्णय करने हेतु मधुमेह के २०० रोगियों के अध्ययन में तीन अवस्थाएँ पाई गईं:

(१) प्राथमिक श्रेणी:

  • मूत्र में शर्करा १-२%
  • मूत्रराशि की वृद्धि
  • मूत्र का आविलत्व (गंदलापन)
  • हल्का दौर्बल्य
  • अल्प तृषा (रोगी को ज्ञान भी नहीं होता, मूत्र परीक्षा से पता चलता है।)

(२) द्वितीय श्रेणी:

  • तृष्णा (प्यास)
  • मूत्राधिक्य
  • मूत्र में शर्करा २-४%
  • शारीरिक दौर्बल्य
  • कण्डू (खुजली)
  • सर्वांगमर्द व संधिवेदना
  • भोजनाकांक्षा तीव्र (अत्यधिक भूख)

(३) तृतीय श्रेणी:

  • मूत्र में शर्करा ४ से ८ प्रतिशत या अधिक
  • अत्यधिक तृषा
  • क्षुधा-मांद्य व मांस-दौर्बल्य
  • कान्तिहीनता, दृष्टि की कमी, संधि व कटिशूल (ये रोगी नित्य इन्सुलिन का इंजेक्शन लेते थे। छोड़ते ही स्थिति बिगड़ जाती थी और मूर्च्छा भी हो जाती थी।)

२०० में से ४१ रोगी तृतीय श्रेणी के थे, ७९ द्वितीय श्रेणी के थे और ८० प्राथमिक श्रेणी के थे। इन रोगियों में से अधिकांश धनी-मानी सद्गृहस्थ थे। तृतीय श्रेणी के २१ व्यक्ति चुने गए जिन पर आतुरालय (अस्पताल) में रखकर चिकित्सा-क्रम का प्रयोग किया गया। द्वितीय श्रेणी से १९ व्यक्ति चुने गए। प्रथम श्रेणी को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता प्रतीत न हुई। जो रोगी रोज इन्सुलिन लेते थे और भयभीत थे, वे अस्पताल में रहने को तैयार हुए।

औषधि निर्णय व प्रायोगिक क्रम

चिकित्सा प्रारंभ करने से पहले और बाद में मूत्र-परीक्षा तथा रक्त-शर्करा की परीक्षा नियमित रूप से की जाती थी।

प्रथम श्रेणी की औषधियाँ (एकौषधि प्रयोग): १. जम्बू बीज (जामुन बीज चूर्ण ३-६ ग्राम) २. गुड़मार चूर्ण (३ ग्राम) ३. पलाश क्वाथ व अर्क (३५ से ५८.३२ ग्राम) ४. सदाबहार रस प्रयोग ५. सप्तरंगी प्रयोग ६. कारवेल्लक स्वरस (करेले का रस २३.२ से ५८.३२ ग्राम)

(डॉ० भट्ट व डॉ० वसावड़ा सीनियर फिजिशियन ने इस पर रिसर्च किए। प्रारंभिक स्थिति में कारवेल्लक स्वरस से अच्छा लाभ देखा गया, गुड़मार से सामान्य लाभ और जम्बू बीज से अल्प लाभ हुआ।)

द्वितीय श्रेणी की औषधियाँ: १. पलाश क्वाथ (विशेष प्रकार से निर्मित) २. सप्तरंगी क्वाथ व चूर्ण ३. मामज्जक घन वटी

तृतीय श्रेणी की औषधियाँ: १. मामज्जक घन वटी २. सप्तरंगी क्वाथ व चूर्ण ३. सालसारादिगण भावित शिलाजतु ४. वसन्तकुसुमाकर रस (गुड़मार अनुपान)


प्रमुख औषधियों का विवरण व परिणाम

१. मामज्जक घन वटी

४८६ मि.ग्रा. की वटी।

  • मात्रा: १% शर्करा में १-२ वटी; २% पर २ वटी; ३% पर ३ वटी; ४% पर ४ वटी।
  • सेवन विधि: दिन में तीन बार — प्रातःकाल जल से तथा दोपहर व सायं भोजन से १० मिनट पहले।
  • प्रभाव: प्रथम सप्ताह में ही मूत्र शर्करा कम हो जाती है। दूसरे-तीसरे सप्ताह में बिल्कुल सामान्य हो जाती है। चौथे सप्ताह में मात्रा कम कर दी जाती है। कुछ रोगियों में ६ सप्ताह भी लग जाते हैं। यह इन्सुलिन की तरह शर्करा की मात्रा कम करती है।
  • उपद्रव व सावधानी: पित्त प्रकृति वालों में पतले दस्त हो जाते हैं। अधिक मात्रा में देने से मुँह का स्वाद कड़वा व जी मिचलाने लगता है; तब इसकी मात्रा कम कर देनी चाहिए।

२. सप्तरंगी

इसके चूर्ण व क्वाथ का प्रयोग उत्तम पाया गया। यकृत् की विकृति से उत्पन्न मधुमेह तथा यकृत्-वृद्धि में यह बहुत लाभ करती है। सप्तरंगी के पीले रंग के मूल (जड़) के चूर्ण का प्रयोग करते हैं। ताजी औषधि अधिक लाभप्रद होती है।

  • मात्रा: चूर्ण २-६ ग्राम; क्वाथ ३५ से ५८.३२ ग्राम। प्रातः, मध्याह्न व सायं तीन बार।
  • प्रभाव: यह मूत्र शर्करा व रक्त शर्करा दोनों को कम करती है।

३. पलाश अर्क

इसके निर्माण की विधि विशेष प्रकार की है — हरी ताजी पलाश की छाल के छोटे-छोटे टुकड़े करके अर्क निकाला जाता है। निकले हुए अर्क में पलाश के छिलकारहित बीज कूटकर २४ घण्टे भिगोकर रखते हैं, फिर पुनः अर्क खींचते हैं। इस प्रकार तीन बार शोधित कर द्रव एकत्र करते हैं।

  • मात्रा: ११.६६ से २३.२ ग्राम पीने व बाह्य लेप में।
  • आभ्यन्तर प्रयोग: एक सप्ताह लेने के बाद इन्सुलिन की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। मूत्र व रक्त शर्करा प्राकृत (सामान्य) हो जाती है।
  • बाह्य प्रयोग: कारबंकल (प्रमेह पिड़का) या विद्रधि पर लगाने से घाव सूख जाता है, ऑपरेशन की नौबत नहीं आती। १५ रोगियों पर प्रयोग किया गया, सभी में लाभ हुआ।

४. शिलाजतु

सुश्रुत ने मधुमेह में शिलाजतु का कल्प लिखा है। शुद्ध शिलाजीत को सालसारादि गण के क्वाथ की भावना देकर सालसारादि क्वाथ के अनुपान से दिया गया — बड़ा अच्छा लाभ रहा। जो लोग नित्य दो-दो बार इन्सुलिन लेते थे, उन्हें प्रथम सप्ताह में ही इन्सुलिन छोड़ना पड़ा और कोई उपद्रव न हुआ।

५. वसन्तकुसुमाकर रस

वसन्तकुसुमाकर २४३ से ३६४.५० मि.ग्रा. मात्रा में गुड़मार के क्वाथ के अनुपान से दिया गया। ७ गम्भीर रोगियों पर प्रयोग हुआ जो ५-७ वर्षों से इन्सुलिन पर निर्भर थे। सबका इन्सुलिन छूट गया और स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक सुधार हुआ।


चिकित्सा

प्रथमावस्था (मूत्र में १ से ३ प्रतिशत शर्करा)

नीचे लिखी दवाओं में से कोई एक दें:

(१) चन्द्रप्रभा वटी -- मात्रा २-४ वटी (१ ग्राम)। इसके सेवन से सामान्य शर्करा कम हो जाती है, मूत्र साफ होता है, दुर्बलता नष्ट होती है। अवधि: २-४ सप्ताह।

(२) मामज्जक घन वटी -- ४८६ मि.ग्रा. की १-२ वटी भोजन के १० मिनट पहले जल के साथ लें।

(३) सप्तरंगी चूर्ण -- २ से ४ ग्राम दिन में ३ बार जल या दूध के साथ लें।

(४) शिलाजतु वटी -- मात्रा २-४ वटी (४८६ से ७२९ मि.ग्रा.) दिन में ३ बार जल के साथ।

(ये चारों औषधियाँ प्रारम्भिक अवस्था में बहुत लाभ करती हैं जब मूत्र में शर्करा १ से ३ प्लस तक हो। बाद में अधिक मात्रा होने पर इनसे पूर्ण लाभ नहीं होता।)

द्वितीयावस्था (मूत्र में २ से ४ प्रतिशत या अधिक शर्करा)

रक्त परीक्षा में भी शर्करा अधिक मिले तो निम्न दवाएँ दें:

(१) मामज्जक वटी -- २ वटी दिन में ३ बार (दो बार भोजन से पहले, एक बार बीच में) जल या दूध से।

(२) सालसारादि भावित शिलाजतु -- मात्रा १ ग्राम दिन में ३ बार (प्रातः, मध्याह्न, सायं) जल या दूध के साथ।

अवधि: ४-६ सप्ताह। प्रथम सप्ताह में ही शर्करा घटकर सामान्य हो जाती है, रोगी की प्यास और भूख सामान्य होती है, बार-बार पेशाब आना बन्द हो जाता है, शरीर में स्फूर्ति आती है, पिड़काएँ ठीक होती हैं और इन्सुलिन छूट जाता है।

नोट: १. फायदा न होने पर दोनों औषधियाँ ४-४ घण्टे के अन्तर से देना विशेष लाभप्रद होता है। २. मूत्र परीक्षा प्रति सप्ताह कराते रहना चाहिए। ३. ये औषधियाँ परीक्षा करके ही देनी चाहिए। पित्त प्रकृति वालों को जी मिचलाना या दस्त हो सकते हैं।

तृतीयावस्था (गम्भीर अवस्था व उच्च शर्करा)

(१) पलाश अर्क -- ११.६६ से २३.२ ग्राम दिन में तीन बार देने पर शीघ्र ही रक्त शर्करा व मूत्र शर्करा सामान्य हो जाती है। २% शर्करा वालों को १-४ सप्ताह तथा ५% या अधिक शर्करा वालों को ३-६ सप्ताह देना चाहिए। जो नित्य २० से ६० यूनिट तक इन्सुलिन लेते हैं, उनका भी २ सप्ताह के सेवन के बाद इंजेक्शन लेना बन्द हो जाता है।

(२) पलाश घन सत्व -- शर्करा की मात्रा बहुत अधिक हो तो पलाश घन सत्व ४८६ मि.ग्रा. की मात्रा में पलाश अर्क के साथ भोजन से १० मिनट पहले या बाद में देने से उत्तम लाभ होता है।

(३) वसन्तकुसुमाकर रस -- २४३ मि.ग्रा. से ३६४.५० मि.ग्रा. गुड़मार के काढ़े या शहद के साथ प्रातः-सायं सेवन कराएँ।

पथ्यापथ्य

शर्करा बढ़ाने वाले पदार्थ आहार में बिल्कुल नहीं लेने चाहिए — जैसे चीनी, गुड़, मिठाई, चावल, आलू, अरबी, केला, अनूप देश का मांस, शराब तथा मीठे फल आदि।

पथ्य: यव (जौ), गेहूँ, चना, बाजरा और मक्के की रोटी; मूँग की दाल; परवल, करेला, मेथी, बथुआ, सहजन आदि हरी सब्जियाँ; जामुन, आँवला; कोद्रव (कोदो) धान्य का सेवन; जौ से बनी हुई वस्तुएँ तथा नियमित हल्का व्यायाम व टहलना परम हितकारी है।