आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशचेचक

चेचक (Small pox)

5 मिनट का पाठ

चेचक या शीतला भयानक छुआछूत का रोग है। रोगी को छूने से या उसके कपड़े आदि पहनने से चेचक एक से दूसरे को हो जाती है। चेचक की फुंसियों के खुरण्ड हवा द्वारा इधर-उधर उड़कर रोग फैलाते हैं। इसलिए इस रोग से बचने का प्रबन्ध होना चाहिए।

चेचक जीवन में प्रायः एक ही बार निकलती है। बूढ़ों और जवानों को यह कम होती है, बालकों को अधिक होती है। ठंडे देश के निवासी गोरों तथा आदिवासियों को चेचक सबसे ज्यादा तकलीफ देती है। चेचक होने पर गोरे तथा आदिवासी बहुत कम बचते हैं। यह रोग अधिकतर बसन्त ऋतु यानी फरवरी-मार्च में फैलता है।

लक्षण

रोगी को कम्प लगकर बड़े जोर का बुखार होता है। बुखार के साथ उल्टी, उबकाई, सिरदर्द, बेचैनी आदि लक्षण वर्तमान रहते हैं। तीसरे या चौथे दिन शरीर पर लाल-लाल निशान दिखलाई देते हैं। ये निशान सबसे पहले माथा, गर्दन, छाती आदि में दीखते हैं; बाद में समूचे शरीर में निकल आते हैं। भयानक चेचक होने से नाक, आँख, जीभ आदि जगहों में भी फुंसियाँ निकल आती हैं। ये फुंसियाँ ४८ घण्टे के भीतर पहले द्रव पदार्थ से भरकर उभरे हुए छालों की तरह हो जाती हैं। फिर ४८ घण्टे के भीतर पीब पैदा हो जाती है। यह भयानक कष्ट का समय होता है। जब रोग आराम होने लगता है, तो प्रायः ११वें दिन फुंसियाँ सूखकर खुरण्ड पैदा होने लगते हैं और रोग के सब लक्षण कम हो जाते हैं तथा रोगी ३-४ दिन के भीतर ही बिल्कुल ठीक हो जाता है। लेकिन जब रोग चढ़ाव पर होता है तो बुखार बढ़ जाता है, रोगी प्रलाप करने लगता है, शरीर काँपता है और अन्त में रोगी प्राण त्याग देता है। चेचक के कारण अक्सर खाँसी, निमोनिया, आँख में फूली, अन्धापन आदि उपद्रव पैदा हो जाते हैं। चेचक आराम होने पर मनुष्य को कुरूप कर देती है। चेचक के दाग जिन्दगी-भर बने रहते हैं। इस प्रकार चेचक अपना प्रमाण जीवन भर के लिए छोड़ जाती है।

चिकित्सा

सभी प्रान्तों के रहने वाले हिन्दू चेचक को रोग न मानकर शीतला नामक देवी का प्रकोप मानते हैं। इसलिए चेचक की दवा न करके झाड़-फूँक ही अधिकतर कराते हैं। लेकिन चेचक छूत से लगनेवाला रोग है, इसमें चिकित्साशास्त्र के सिद्धान्तानुसार सन्देह करने का कोई कारण नहीं है।

यह रोग अपने-आप अच्छा होनेवाला है। चेचक में दवा देने की जरूरत बहुत कम होती है। रोगी के विश्वास के लिए मामूली दवा देनी चाहिए। जिस दिन चेचक के दाने निकलें उस दिन रोगी को ५-७ दाने मुनक्का के बीज निकालकर खिला देने चाहिए या दूध में जरा-सी केशर मिलाकर पिला देनी चाहिए, जिससे चेचक का जहर खून से निकलकर फुंसियों में आ जाय। घर के द्वार या खिड़कियों पर जिधर से धूप आती हो उधर लाल रंग का कपड़ा लटका देना चाहिए। प्यास की अधिकता हो तो ज्वरोक्त 'षडंग पानी' पीने को देना चाहिए। निमोनिया, खाँसी आदि उपद्रवों के होने पर उनकी चिकित्सा सावधानी से करनी चाहिए। जरूरत होने पर चेचक में दवा देने से कोई नुकसान नहीं होता। आँखों की सफाई और रक्षा पर पूरा ध्यान देना चाहिए। नीम के पत्ते चारपाई पर बिछाना तथा नीम की टहनी से मक्खी हटाना चाहिए।

(१) ब्राह्मी वटी -- अभ्रक भस्म, संगेयशब की भस्म या पिष्टी, अकीक की भस्म या पिष्टी, माणिक्य की भस्म या पिष्टी, चन्द्रोदय, प्रवाल की भस्म या पिष्टी, कहरवा की पिष्टी, स्वर्ण भस्म या वरक, मोती की भस्म या पिष्टी — प्रत्येक ६-६ ग्राम; जायफल, लौंग, सोंठ, जावित्री, स्याह जीरा, छोटी पीपल, दालचीनी, अनीसून, असगन्ध, अकरकरा, धनिया, वंशलोचन, छोटी इलायची के बीज, शंखाहुली, श्वेत चन्दन, सौंफ, तेजपात, नागकेशर, रूमीमस्तगी, पीपलामूल, चित्रकमूल की छाल और कुलिंजन — प्रत्येक ४-४ ग्राम; कस्तूरी, अम्बर, ब्राह्मी, निशोथ, अगर और केशर — प्रत्येक १६.५० ग्राम लें। प्रथम केशर, कस्तूरी और अम्बर को खूब महीन पीस, उसमें अन्य भस्में और पिष्टियाँ मिला, सोने के वरक एक-एक करके मिलावें। पीछे अन्य द्रव्यों का कपड़छान चूर्ण मिला १ दिन ब्राह्मी के स्वरस में मर्दन कर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना छाया में सुखाकर शीशी में भर लें। — सि० यो० सं०

मात्रा -- १-२ गोली, दिन में २-३ बार आवश्यकतानुसार दें।

अनुपान और उपयोग -- सन्निपात ज्वर में प्रलाप हो तो तगरादि क्वाथ के अनुपान से, अपतन्त्रक और आक्षेपक में मांस्यादि क्वाथ के अनुपान से, सतत ज्वर में शहद मिलाकर, वात रोग में दशमूल-क्वाथ के अनुपान से, हृदय की दुर्बलता में खमीरा गावजबान के साथ मिलाकर, और भ्रम (सिर में चक्कर आने) में द्राक्षादि चूर्ण के साथ इसका प्रयोग करें। दिल और दिमाग की कमजोरी और उनसे होनेवाले लक्षणों में इससे अच्छा लाभ होता है।

चेचक से बचने के उपाय

चेचक से बचने का एकमात्र निश्चित उपाय टीका लगवाना है। बच्चे को जन्म के १ महीने बाद ही टीका अवश्य लगवा देना चाहिए। बच्चे को टीका लगवा देने पर चेचक बिल्कुल नहीं होती या होती भी है, तो बहुत मामूली। टीके का प्रभाव तीन वर्ष तक रहता है, अतः तीन वर्ष के बाद पुनः टीका लगाना जरूरी है। बसन्त ऋतु के आरम्भ में प्रायः चेचक फैलती है, इसलिए उस समय घर के सब लोगों को टीका लगवा लेना चाहिए।

घर में चेचक होने पर सब लोगों को खूब सावधान रहना चाहिए। रोगी को छूने पर साबुन लगाकर हाथ धोना आवश्यक है। रोगी के कमरे में किसी बच्चे को न घुसने देना चाहिए।

घर में बड़े लोगों को भी बिना आवश्यकता के रोगी के पास न जाना चाहिए। रोगी के बिस्तरे व कपड़े किसी को व्यवहार में न लाने चाहिए। घर-भर में दो बार धूप (गुग्गुल/नीम की धूप) देना उचित है। हर तरह सफाई का ध्यान रखने से रोग फैलने नहीं पाता। बिना सावधानी के घर में एक बच्चे को यह रोग हो जाने से सब बच्चों में फैलते हुए देखा गया है। रोगी बालक को चेचक के खुरण्ड भी नहीं नोंचने देने चाहिए।