आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशबालरोग (बच्चों की बीमारियाँ)

बालरोग (बच्चों की बीमारियाँ)

15 मिनट का पाठ

बच्चे के जन्म के समय चतुर धाय का प्रबन्ध करना चाहिए। जो स्त्रियाँ शारीरिक परिश्रम यथेष्ट करती रहती हैं, उनको प्रसवकाल में कुछ कष्ट नहीं होता, परन्तु शहरों में रहने वाली निकम्मी स्त्रियों — विशेषकर पर्दे के बुरे जाल में घिरी हुई स्त्रियों का प्रथम प्रसव मृत्यु से कम कष्टदायक नहीं होता। जिस स्थान को सूतिका-गृह बनाना हो वह स्वच्छ, हवादार एवं प्रकाशयुक्त होना चाहिए। अभी तक बहुत-से स्थानों में अँधियारे और बन्द कमरे में सूतिका-गृह बनाने का रिवाज है। यह रिवाज माता और बालक दोनों के लिए अनिष्टकारक है।

बालक के पैदा होने पर चतुर धाय से नाल कटानी चाहिए। जिस चाकू या छुरी से नाल काटी जाय उसको स्पिरिट या उबले हुए पानी से जरूर साफ कर लेना चाहिए। अनेक बेवकूफ धाइयाँ मैले शस्त्र से नाल काट देती हैं, जिससे नाभि पककर विरूप हो जाती है और जच्चा तथा बच्चे को धनुर्वात हो जाता है। बच्चे की नाल काटकर और स्नान कराकर अजवायन और हर्रे घिसकर जल के साथ पिलाना चाहिए अथवा गर्म दूध में समभाग जल मिलाकर जरा गुनगुना ही पिलाना चाहिए। इसके बाद बच्चे के स्वस्थ होने पर उसे माता के स्तन का दूध पिलाना चाहिए।

बच्चे को पुष्ट होने के लिए नींद की बहुत आवश्यकता है। इसी से जन्म के बाद कुछ दिनों तक बच्चा बहुत सोता है। यह सोना उसके लिए परम हितकारी है। बच्चे को जन्म-दिन से २१ दिन तक कभी चित्त न सुलाना चाहिए। बायीं करवट सुलाना बहुत अच्छा है। बच्चा जब सोये तब उसके पैरों को कपड़े से ढँक देना चाहिए। पाँच-सात वर्ष की अवस्था तक बच्चे को अधिक सुलाने की चेष्टा रखनी चाहिए। जो बालक जितना अधिक सोयेगा वह उतना ही अधिक पुष्ट होगा। शीतकाल में सरसों का तेल मलकर धूप में सुलाना बहुत अच्छा है। बच्चे को कड़ी धूप और कड़ी सर्दी से बचाना चाहिए। बिल्कुल कमजोर बच्चे को जरा गुनगुने पानी में स्नान कराना चाहिए। कुछ सबल होते ही ठंडे पानी से स्नान कराने की आदत डालनी चाहिए, ताकि सर्दी-खाँसी होने की उतनी आशंका न रहे। पहले सिर पर कुछ जल देकर फिर सम्पूर्ण शरीर पर पानी डालना बहुत अच्छा है। बन्द मकान में बच्चे को स्नान कराके साफ कपड़े पहना देने चाहिए। साबुन लगाकर या साधारण जल से ही बच्चे के पहनने के कपड़े रोज धो देना उचित है। बिछौना भी साफ रहना चाहिए।

बालक को माता का दूध पिलाना सर्वोत्तम है। यदि किसी कारणवश धाय का दूध पिलाया जाय, तो धाय तन्दुरुस्त होनी चाहिए। यदि माता और धाय के दूध से बच्चे की उदरपूर्ति न हो, तो बकरी या गाय का दूध पिलाना चाहिए। डेढ़-दो महीने का बच्चा गाय का दूध हजम कर सकता है। बकरी का दूध उतना पुष्टिकारक नहीं है, जितना कि गाय का। दूध में आधा पानी मिलाकर तथा उचित मीठा मिलाकर पहले-पहल बच्चे को पिलाना चाहिए। हजम होने पर बिना जल मिला हुआ दूध दिया जा सकता है। दूध को अधिक गर्म करने से वह भारी हो जाता है एवं उसके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। इसलिए सिर्फ एक उफान आ जाने तक ही औटाना चाहिए। अधिक दूध एक बार न पिलाना चाहिए। सोते हुए बच्चे को जगाकर तुरन्त दूध न पिलाना चाहिए। बिना भूख के जबर्दस्ती दूध न पिलाना चाहिए। अच्छा हो कि बच्चे को दूध पिलाने का समय नियत कर दिया जाय। बिल्कुल कम उम्र के बालक को दो-तीन घण्टे बाद और साल भर के बालक को तीन-चार घण्टे के अन्तर से दूध पिलाना उचित है।

माता या धाय को ठंडा खाना, असमय खाना, अधिक खट्टा या मीठा खाना, क्रोध, शोक, भय आदि से परहेज रखना चाहिए। माता या धाय की अनियमितता के कारण ही प्रायः बच्चों को बीमारियाँ होती हैं। बच्चे का लालन-पालन उचित ढंग से होने पर आठ-नौ महीने में बालक हाथ-पैर के सहारे रेंगने लगता है और एक वर्ष की अवस्था में पैरों से चलने लग जाता है। यदि पन्द्रह महीने तक भी न चल सके, तो समझना चाहिए कि बालक रोगी है। उस हालत में उचित चिकित्सा करानी चाहिए।

बच्चों के दाँत प्रायः ६ से १० मास के अन्दर निकलने लग जाते हैं। उस समय बुखार, दस्त, कै, अनिद्रा और कब्जियत आदि उपद्रव हो जाते हैं। दाँत निकल आने पर ये उपद्रव स्वतः शान्त हो जाते हैं। सुहागे का लावा शहद में मिलाकर मसूड़ों पर घिसने से दाँत जल्दी निकल आते हैं। यदि मसूड़ों की दृढ़ता के कारण दाँत न निकल सकें, तो मसूढ़ा थोड़ा चीर देते ही दाँत निकल आते हैं। दाँत उगने पर गर्म भात में जरा-सा घी देकर बच्चों को खिलाना चाहिए।

बालक को अति पुष्ट करने की लालसा से बार-बार अत्यधिक खिलाना महा हानिकारक है। बहुत-से माता-पिता बालकों को इतना दूध पिला देते हैं कि बच्चा कै कर देता है; परन्तु कै होने पर भी तुरन्त फिर पिला देते हैं। इस प्रकार जबर्दस्ती खिलाने से बच्चे का हाजमा खराब हो जाता है और पुष्ट होने की जगह वह दिन-दिन क्षीण होने लग जाता है। बच्चे को नीरोग और पुष्ट करने की सीधी-सी विधि यह है कि बच्चे को समय पर विशुद्ध खाद्य दिया जाय, समय पर पाखाना फिराया जाय, साफ-सुथरा रखा जाय, खुली हवा में आनन्दपूर्वक उछल-कूद करने दिया जाय और साधारण आरोग्यदायक नियमों का पालन कराया जाय। खोमचे की चटपटी चीजें, बाजार की मिठाइयाँ, अचार, मसालेदार चीजें, तेल, खटाई आदि खाने की आदत बालकों में न डालनी चाहिए। बाजार की मिठाई को जहर से कम न समझना चाहिए। जो माँ-बाप बच्चे को बाजार की मिठाई खिलाने की आदत डालते हैं, उनकी किन शब्दों में निन्दा की जाय, सो मुझे मालूम नहीं। बाजारू या घरेलू मिठाई अधिक खाने के कारण बच्चों का लीवर खराब हो जाता है। फिर वे जन्म भर रोगों के फन्दे में फँसे रहते हैं। इसलिए बुद्धिमान माता-पिता का पवित्र कर्त्तव्य है कि बालक को जन्म से ही पूर्ण नीरोग बनावें।

बच्चा अगर अधिक रोवे तो समझना चाहिए कि इसे कुछ बीमारी हो गई है। भोजन न मिलने के कारण या चींटी आदि के काटने से भी बच्चा रोने लग जाता है। बच्चा किस कारण से रोता है इसका ख्याल करना चाहिए। रोते समय बार-बार मुख में अँगुली डाले तो दाँतों की तकलीफ, कान पर हाथ रखने से कान की बीमारी, घुटनों को उठाकर पेट पर रखने से पेट की बीमारी और खाँस-खाँसकर रोने से फेफड़ों की बीमारी समझनी चाहिए।

चिकित्सा

बालकों को नीरोग रखने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें कब्जियत न रहे, क्योंकि पहले कब्ज, फिर दस्त और बाद में अनेक रोगों का होना निश्चित है। माता का कर्त्तव्य है कि बालक को सुबह और शाम दोनों समय नियम से दस्त फिराने की आदत डालें। खाने में शीघ्र पचनेवाला और बलकारक भोजन दें। नींद और खेलने पर अच्छी तरह दृष्टि रखें। इस पर भी कब्जियत की शिकायत हो तो बड़ी हरड़ (जो साधारण बड़ी हरड़ से बहुत बड़ी होती है और जिसे लोग काबुली हरड़ भी कहते हैं) जरा-सी घिसकर पिला दें। बहुत-से लोग शुद्ध रेंडी का तेल ५-१० बूँद पिलाने का उपदेश देते हैं, परन्तु हरड़ उससे बहुत उत्तम और फायदेमंद है। इसमें जरा-सा काला नमक मिला दिया जाय, तो बहुत ही उत्तम पाचक हो जाता है। हरड़ के सेवन से बालकों के साधारण रोग शीघ्र ही आराम हो जाते हैं। बालक की अग्नि दुर्बल हो, जुकाम, कफ, खाँसी या सर्दी हो गई हो, तो हरड़ में जरा-सा सुहागे का लावा मिला देना चाहिए। इससे बालक बहुत जल्द आरोग्य हो जायगा।

यदि बालक का यकृत् खराब हो गया हो या पुष्ट न होता हो अथवा दूध फेंकता हो, तो जरा-सा चूने का पानी पिलाना अत्यन्त लाभदायक है। बोतल-भर साफ पानी में २९ ग्राम पत्थर का सूखा चूना डालकर हिलाकर रख दें। ६ घण्टे बाद चूना तलभाग में बैठ जायगा और स्वच्छ पानी ऊपर रह जायगा। इसी को चूने का पानी या Lime water कहते हैं। बालकों के लिए यह अमृत-समान गुणकारी है। दो-तीन बार दूध के साथ इसे ३ ग्राम तक अवस्था के अनुसार पिलाएँ। कुछ समय बाद बच्चे नीरोग और पुष्ट हो जाएँगे।

सेंधा नमक, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, काकड़ासिंगी, पाठा और कदम्ब की छाल का चूर्ण शहद और घी के साथ चटाने से भी बालक पुष्ट हो जाता है।

बालक को जन्म से एक वर्ष के भीतर ही चेचक का टीका लगा देना चाहिए, जिससे चेचक होने का भय न रहे।

ठंड लग जाने से बालकों को प्रायः सर्दी-खाँसी हो जाया करती है और कुछ समय बाद वह खुद ही अच्छी हो जाती है। अगर किसी कारणवश अच्छी न हो तो अजवायन, पीपल, सोंठ, जायफल और काला नमक अवस्था के अनुसार उचित मात्रा में लेकर जल के साथ पीसें। फिर जरा-सा गर्म करके छानकर पिला दें। इससे बच्चे का बुखार एवं कफ, खाँसी शीघ्र आराम हो जायगी। यदि जरूरत समझें, तो जरा-सा सुहागे का लावा भी डाल दें। कब्ज हो तो जरा-सी हरड़ घिसकर मिला दें। वंशलोचन ४८६ मि.ग्रा. चूर्ण करके उसमें मकरध्वज १२१.५० मि.ग्रा. मिला दें। इसकी ५ से १० खुराक बनाकर शहद के साथ बच्चों को चटाएँ। इससे कफ, खाँसी, सर्दी, जुकाम आदि शीघ्र अच्छे हो जाते हैं। सुहागा या फिटकरी को फुलाकर शहद में चटाना भी उपकारी है। मात्रा अवस्था के अनुसार देनी चाहिए।

बच्चे को अक्सर पतले दस्त हो जाते हैं, इसके लिए अतीस १ ग्राम जल से घिसकर देना बहुत फायदेमंद है। सोंठ और जायफल के पानी के साथ संजीवनी वटी देना परम लाभकारी है। कभी-कभी अधिक सर्दी से बच्चों को निमोनिया हो जाता है, जिसको स्त्रियाँ प्रायः डब्बा की बीमारी कहती हैं। इससे निमोनिया के लक्षण प्रकट होते हैं। इसका इलाज भी निमोनिया की तरह ही करना चाहिए। अभ्रक भस्म में समभाग सुहागे का लावा मिलाकर शहद के साथ चटाना अति लाभदायक है। उत्तम शराब (ह्विस्की या ब्रॉण्डी) भी जरा-सी देना परम हितकारी होता है। इस रोग में असली गोरोचन १२१.५० मि.ग्रा. माता के दूध या पान के रस में देना भी बड़ा उपकारी है। माता का स्तन न चूस सके तो बालक को भयानक बीमारी हुई समझना चाहिए। बालकों का इलाज बड़े पुरुषों की तरह ही किया जाना चाहिए; परन्तु मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है। विषैली दवा भूलकर भी न देनी चाहिए।

बालचातुर्भद्र चूर्ण

नागरमोथा, छोटी पीपल, अतीस और काकड़ासिंगी — प्रत्येक द्रव्य को समभाग लेकर कपड़छान चूर्ण बना शीशी में सुरक्षित रख लें। — सि० यो० सं०

मात्रा और अनुपान -- २४३ मि.ग्रा. से १ ग्राम तक चूर्ण को शहद में मिलाकर दिन में तीन-चार बार दें।

गुण और उपयोग -- इस चूर्ण के सेवन से बच्चों के ज्वर, अतिसार, खाँसी, वमन (दूध डालना) आदि ठीक होते हैं।

वक्तव्य -- इसमें एक भाग शुद्ध सुहागे का चूर्ण भी मिलाने से विशेष लाभदायक बन जाता है। (अतीस कड़वा तथा नया लेना आवश्यक है।)

सुधाषट्क योग

प्रवाल भस्म १ भाग, सीप की भस्म २ भाग, शंख भस्म ३ भाग, कौड़ी की भस्म ४ भाग, कछुए की पीठ की भस्म ५ भाग, गोदन्ती भस्म ६ भाग — सबको मिलाकर नीबू के रस की ३ भावनाएँ दें, सुखाकर शीशी में भर लें।

मात्रा और अनुपान -- २४३ मि.ग्रा. से १ ग्राम दवा को दूध के साथ सबेरे-शाम दें।

गुण -- बालशोष (सूखारोग) और मृद्वस्थि रोग (Rickets) में इसके प्रयोग से बड़ा अच्छा लाभ होता है। शरीर में सुधांश (Calcium) की कमी से होने वाले रोगों में इस दवा का प्रयोग उत्तम गुणकारी है।

(१) बालजीवन वटी -- गोरोचन ३ ग्राम, एलवा (मुसब्बर) ६ ग्राम; उसारे-रेवन्द, केशर, कटेरी-पुष्प का जीरा, यवक्षार, सत्यानाशी के बीज — प्रत्येक ११.६६ ग्राम लेकर महीन चूर्ण कर अदरक के रस में ६ घण्टे घोंटकर छाया में सुखाकर मूँग के बराबर गोली बना लें।

मात्रा -- १ गोली आवश्यकतानुसार माता के दूध या शहद के साथ दें। यह बच्चों के पसली (डब्बा) रोग, कब्जियत, अफारा, श्वास, कास, पेशाब का रुकना आदि को दूर कर बच्चों को नीरोग बना देती है। — धन्वन्तरि

(२) बालघोर कासन -- काली तम्बाकू के पत्तों से अलग किए हुए साफ डंठल २३३ ग्राम लेकर छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर मिट्टी के बर्तन में रखकर जला दें। निर्धूम होने पर ऊपर से ढक्कन लगा दें। डंठल के कोयले ही रहने चाहिए, राख न होने पावे। बाद में २३३ ग्राम सेंधा नमक मिलाकर बारीक कपड़छान चूर्ण कर शीशी में भरकर मजबूत कार्क लगा दें। इसको १२१.५० से ३६४ मि.ग्रा. तक दिन में ३ बार देने से बालकों के श्वास, ज्वर, काली खाँसी, अतिसार, हरे रंग का दस्त होना आदि रोग बहुत जल्द आराम हो जाते हैं।

अनुपान -- खाँसी में पका पान का पत्ता १ नग और इलायची २ नग लेकर जल में पीसकर छान लें। थोड़ा गर्म कर उसमें दवा देकर २-३ बार पिलावें। श्वास एवं अतिसार में इलायची की जगह अजवायन १२१.५० से २४३ मि.ग्रा. देकर उपर्युक्त विधि से खिलाना चाहिए। बच्चों की कुकुरखाँसी की यह अच्छी दवा है।

(३) मुक्तादि वटी -- मोती २३.२ ग्राम, सोने का वरक ५.८ ग्राम, चाँदी का वरक ११.६६ ग्राम, नागकेशर २३.२ ग्राम, कमल के फूलों के अन्दर का केशर ११.६६ ग्राम, गुलाब के पुष्प का केशर ११.६६ ग्राम, केशर ५.८ ग्राम, कपूर २.९ ग्राम, कहरबा ११.६६ ग्राम, जहरमोहरा खताई ११.६६ ग्राम, संगेयशब ११.६६ ग्राम, गोरोचन ११.६६ ग्राम और गोदन्ती भस्म ११.६६ ग्राम लें। दोनों वरकों को छोड़ सबका कपड़छान चूर्ण करके पीछे एक-एक करके उसमें वरक मिलावें। इसके बाद अच्छे गुलाब के अर्क में आठ दिन मर्दन कर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना, सुखाकर शीशी में भर लें।

मात्रा -- आधी गोली से २ गोली तक गाय के या माता के दूध में मिलाकर दें। बालकों का जीर्ण ज्वर, बालशोष (सूखा), पाण्डुरोग, दूध न पचकर दस्त या उल्टी होना, खाँसी आदि रोगों में इसके सेवन से रोग दूर होकर बालक हृष्ट-पुष्ट हो जाता है। — सि० यो० सं०

(४) जन्मघूँटी -- सौंफ, सौंफ की जड़, वायविडंग, अमलतास का गूदा, सनाय, छोटी हरड़, बड़ी हरड़, बच, अंजीर, अजवायन, गुलाब के फूल, ढाक के बीज, मुनक्का, उन्नाव, गुड़ और सुहागा — इन १६ दवाओं का बालक की अवस्था के अनुसार ३ से ६ ग्राम तक काढ़ा बनाकर दें। इसमें जरा-सा काला नमक मिला दें। इसके सेवन से बुखार, कफ, खाँसी, अजीर्ण आदि समस्त बालरोग नष्ट होते हैं।

(५) कुमारकल्याण रस -- रससिन्दूर, मुक्तापिष्टी, स्वर्ण भस्म, अभ्रक भस्म, लौह भस्म और स्वर्णमाक्षिक भस्म — इन ६ दवाइयों को समभाग लेकर घीकुमारी के रस में घोंटकर मूँग के बराबर गोली बना लें। बालक की अवस्था का विचार करके एक या आधी गोली की मात्रा दूध या चीनी के साथ सेवन कराएँ। इससे बुखार, कफ, वमन, दूध न पीना, दस्त, अजीर्ण आदि नष्ट होते हैं। — भै० र०

(६) रसपीपरी -- शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक की कज्जली कर लें। फिर सोंठ, मिर्च, पीपल, अतीस, काकड़ासिंगी, नागरमोथा, मोचरस, जायफल, जावित्री, सुहागे का लावा और छोटी पीपल — इन ११ दवाओं को पारे के समान भाग लेकर महीन चूर्ण करके मिला दें। पारे का चतुर्थांश कस्तूरी मिलाकर जल के संयोग से मूँग के बराबर की गोलियाँ बना लें या महीन पीसकर कपड़छान कर रख लें। इसका नाम 'रसपीपरी' है। बिहार प्रान्त में रसपीपरी बहुत प्रसिद्ध है। उचित अनुपान के साथ सेवन करने से बालक के सर्दी-जुकाम, ज्वर, खाँसी, पतले दस्त, कफ, कमजोरी आदि समस्त बालरोग आराम होते हैं। यह रसपीपरी का असली नुस्खा है।

(७) शिवामोदक -- हरड़, भुईंआँवला, मूर्वा, सौंफ, हल्दी, दारूहल्दी, कौंच के बीज, खरेटी के बीज, बेलगिरी, लवंग, शतावरी, मुरामांसी, सोया, जटामांसी, विदारीकन्द, सोंठ, अनन्तमूल, आँवला, श्यामलता, भारंगी, गजपीपल, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, नागकेशर, मेथी, हालिम, काला जीरा, अजवायन, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, मूसली, असगन्ध, गोखरू — ये सब समान भाग, इन सबके बराबर मुनक्का और मुनक्का के बराबर मिश्री लें। मुनक्का और मिश्री को छोड़कर सब दवाओं का कपड़छान चूर्ण कर लें। फिर मुनक्का को थोड़े जल की सहायता से पीस लें और घी में सेंक लें। मिश्री की गाढ़ी चाशनी बनाकर सब चीजें मिला दें और शीतल होने पर थोड़ा शहद डालकर १ ग्राम की गोली बना लें अथवा सब चीजें खरल में पीस लें और शहद मिलाकर १-१ ग्राम की गोलियाँ बना लें।

मात्रा -- १-१ गोली दूध के साथ प्रातःकाल देनी चाहिए। इससे बालकों के सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं तथा बालक अत्यन्त पुष्ट और बलवान हो जाता है। अरुचि और मन्दाग्नि को भी यह दूर करता है। — भै० र०

(८) अरविन्दासव -- कमल के फूल, खस, केशर, गम्भारीफल, मजीठ, नीलोत्पल, बड़ी इलायची, बला (खरेटी), जटामांसी, नागरमोथा, अनन्तमूल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, बच, कर्चूर, निशोध काली, नील पंचांग, परवल का पत्ता, पित्तपापड़ा, अर्जुन की छाल, मुलेठी, महुआ के फूल, मुरामांसी — प्रत्येक समभाग ११६.६४ ग्राम, मुनक्का २.३३ किलो, धायफूल १.८७ किलो, जल ६३.५ किलो, चीनी ११.६६ किलो, शहद ५.८३ किलो — इन सब द्रव्यों को एकत्र कर मिट्टी के पात्र में सन्धान करें। १ महीने बाद छानकर प्रयोग में लावें। यह बालकों के समस्त रोगों को नाश कर बल, पुष्टि, अग्नि तथा धातु को बढ़ाता है। यह ग्रहदोष-नाशक भी है। बच्चों के सूखारोग (Rickets) की सर्वोत्तम दवा है।

मात्रा -- आवश्यकतानुसार ३ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक बराबर पानी मिलाकर देना चाहिए। — भै० र०