आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशनेत्र रोग (आँखों की बीमारियाँ)

नेत्र रोग (आँखों की बीमारियाँ)

6 मिनट का पाठ

आँख आना (नेत्राभिष्यन्द)

आँखों में धूप, शीतल हवा, धुआँ, तेज प्रकाश लगने से और चेचक या सूजाक के बाद आँखें आ जाती हैं। जहाँ वर्षा कम होकर गर्मी या शीत अधिक होती है, वहाँ के निवासियों की आँखें आश्विन या चैत्र मास में आ जाती हैं। आँखें आ जाने पर नेत्र का सफेद भाग लाल हो जाता है। आँखों में जल या कीच का निकलना, आँखों की पलकों का जुट जाना, शोथ, दर्द, बालू गिरने या काँटा चुभने जैसा दर्द, प्रकाश असह्य होना आदि लक्षण होते हैं।

आँख आने पर उसको सावधानीपूर्वक साफ रखें। जल में जरा-सा बोरिक एसिड मिलाकर दो बार धोएँ या त्रिफला के काढ़े से आँखों को साफ करें। नीम के पत्तों का ऊपरी भाग सिर पर इस तरह से बाँधें जिससे आई हुई आँख ढँक जाय। उन्हीं पत्तों के अन्दर से देखें। बीच-बीच में ठंडे पानी से पत्तों को तर करते रहें। इससे पीड़ा शान्त होगी और रोग उग्र रूप धारण न कर सकेगा। वर्तमान समय में आँख आने पर धूप से बचने वाले हरे रंग के मामूली चश्मे लोग लगा लेते हैं; परन्तु उनकी जगह नीम के पत्तों का व्यवहार अत्यन्त लाभदायक है। बबूल के कच्चे पत्तों को पीसकर टिकिया बना लें। रात को सोते समय यह टिकिया बाँधकर सो जाएँ। इससे आँखों में ठंडक पहुँचेगी। बढ़िया गुलाबजल ५८.३२ ग्राम में फिटकरी का लावा तीन ग्राम मिलाकर गाढ़े कपड़े से छान लें और दिन में तीन बार इसी जल को आँखों में डालें। इससे आँखों का आना शीघ्र शान्त हो जायगा। स्त्री के दूध में रसांजन घिसकर लगाने से बहुत फायदा होता है। दारूहल्दी को १६ गुना पानी में औटाकर जब अष्टमांश पानी रहे तब छानकर आँख में डालें, यह आँख आने की सर्वश्रेष्ठ दवा है। इसी से रसांजन यानी रसोत भी बनता है। सेंधा नमक, दारूहल्दी, हर्रे तथा रसांजन (रसोत) जल के साथ पीसकर आँख के चारों तरफ लेप करने से आँखों का दर्द और सूजन दूर हो जाती है। हल्का जुलाब देकर पेट साफ कर दें, सिर में ठंडा तेल लगाएँ और हालिम ११.६६ ग्राम में समभाग चीनी मिलाकर खिलाएँ। इससे आँखों का आना शीघ्र शान्त हो जाता है। आँखें आ जाने पर देहाती लोग गुलाबी रंग आँख में डालते हैं, इससे भी अच्छा फायदा होता है।

दृष्टि-शक्ति की कमी

अति सूक्ष्म या अति तेज पदार्थ को अधिक समय तक देखने, बिजली की रोशनी में अधिक काम करने, अति मात्रा में मादक पदार्थों का सेवन करने तथा अधिक अनिद्रा या रजोरोध से देखने में कमी आ जाती है। इसके लिए मकरध्वज आदि पौष्टिक दवा खाना, नारायण तैल आदि शीतल तेल सिर में लगाना तथा चन्द्रोदय वर्ति का लगाना लाभदायक है। मालकांगनी (ज्योतिष्मती) का पाताल-यंत्र से तेल निकालकर १ से ५ बूँद मक्खन में मिलाकर चाटने से आँख की ज्योति अवश्य बढ़ती है। ताजा आँवले का रस, नीबू का रस भी नेत्र-ज्योति को बढ़ाता है।

चिकित्सा

(१) सप्तामृत लौह -- हरड़, बहेड़ा, आँवला, मुलेठी, लौह भस्म — सब समान भाग लेकर जल से पीसकर सुखाकर रख लें। इसका १ ग्राम प्रमाण विषम भाग घी और मधु के साथ सेवन करने से नेत्ररोगों में अच्छा फायदा होता है। दृष्टि की कमी तथा शिरोरोगों में लाभ करता है।

(२) चन्द्रोदय वर्ति -- हर्रे, बच, कूठ, पीपल, मिर्च, बहेड़े की गुठली का गूदा, शंखनाभि और मनःशिला — इन ८ दवाइयों को बकरी के दूध के साथ पीसकर छोटी-छोटी बत्तियाँ बना लें। इसे शहद के साथ घिसकर आँख में लगाएँ। इससे दृष्टि-शक्ति बढ़ेगी एवं आँखों की फूली, आँखों में मांस का बढ़ना (अर्म) और रोहे आदि आराम होंगे।

(३) नेत्रामृत सुरमा -- २३३ ग्राम सुरमे को ३ दिन नीम के पत्तों के रस में घोंटें। फिर २३३ ग्राम शंखनाभि को गर्म करके नीबू के रस में ७ बार बुझाएँ। फिर दोनों वस्तुओं को खूब महीन पीसें। अन्त में ५८.३२ ग्राम भीमसेनी कपूर और ११.६६ ग्राम फूल पिपरमिण्ट मिलाकर शीशियों में भर लें। इसके नित्य व्यवहार से आँखों की रोशनी बनी रहेगी और नेत्र में रोग न होंगे। विकारयुक्त पानी बहकर आँखें ठंडी हो जाएँगी।

(४) उत्तम आश्च्योतन -- गुलाबजल २३३ ग्राम, केशर ६ ग्राम और भीमसेनी कपूर ६ ग्राम। इन तीनों को एकत्र घोंट व छानकर शीशी में भर लें। यह आँखों के लिए बहुत लाभकारी है। कलकत्ते में एक धनी सज्जन इसका मुफ्त वितरण करते हैं। इससे आँखों की सभी बीमारियाँ दूर होती हैं।

(५) भीमसेनी कपूर -- कपूर ९३ ग्राम, इलायची के बीज २३.२ ग्राम, लाल चन्दन, समुद्रफेन, निर्मली के बीज, रसोत, नागरमोथा — प्रत्येक का चूर्ण ११.६६ ग्राम लेकर दूध में पीसकर गुँथे हुए आटे के समान पिण्ड बना लें। फिर इसे एक पात्र में रखकर उसके ऊपर दूसरा पात्र रखकर कपड़मिट्टी से सन्धि बन्द कर दें। फिर किसी बन्द कमरे में चूल्हे पर रखकर नीचे से घी का चिराग जलाएँ और ऊपर से पानी में भिगोया हुआ कपड़ा गरम होते ही दूसरा बदलें; अर्थात् बराबर कटोरे को तर रखें ताकि कपूर उड़कर ऊपरवाले कटोरे में जमकर पुनः पिघलकर नीचे न गिरे। इस तरह एक प्रहर या तीन घण्टा आँच देने के बाद उतारकर ठंडा होने पर खोलकर ऊपर कटोरे में लगा हुआ स्वच्छ कपूर निकाल लें। यही भीमसेनी कपूर है। कितने लोगों के मत से कपूर-वृक्ष से जो रस निकलता है और उसे बिना पकाए जो कपूर बनता है, उसे भीमसेनी कपूर कहते हैं। प्रयोग में दोनों उत्तम हैं।

गुण -- यह अत्यन्त शीतल, दाहघ्न, तृषा-निवारक, नेत्रों के लिए हितकारी और दुर्गन्ध-नाशक है। इसको गुलाबजल में मिलाकर आँखों में डालने से दाह, जलन, पानी का गिरना एवं आँखों के आने पर अच्छा फायदा होता है। भीमसेनी कपूर आँखों के लिए बहुत मुफीद है। भीमसेनी कपूर के योग से कई तरह के सुरमे बनते हैं, जो आँखों के लिए बहुत उत्तम हैं। नेत्रामृत एवं हिमालय सुरमा आदि के योगों में भीमसेनी कपूर डाला जाता है। इससे नेत्ररोग में अच्छा फायदा होता है।

फूली

आँख आने पर ठीक चिकित्सा न होने से आँख में फूली हो जाती है। शंख को शहद के साथ घिसकर लगाना इसकी उत्तम दवा है। कैलोमल या योग्य चिकित्सक से कास्टिक लगवाना भी उत्तम है।

मोतियाबिन्द

इसके होने पर धीरे-धीरे अन्धापन हो जाता है। इसमें कोई दवा न डालें, पकने पर डॉक्टर से ऑपरेशन कराकर निकलवा दें। जो व्यक्ति जीवनपर्यन्त दृष्टि चाहता है वह प्रतिदिन आधा ताजा नीबू जल के साथ ले, रात्रि में कम-से-कम पढ़े, सिर में सुगन्धित बाजारू तेल न लगावे।