मुखरोग (मुँह के रोग)
5 मिनट का पाठ
मुखरोग होने का मुख्य कारण खानपान के बाद मुँह को अच्छी तरह साफ न करना है। पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण करने वाले भारतीय भोजन या नाश्ता करने के बाद मुँह पोंछ लेते हैं, अनेक बार कुल्ली करके दाँतों तथा मसूड़ों के बीच में लगा भोजन का अंश नहीं निकालते; चाय पीने के बाद कुल्ली करना गँवारपन ही समझा जाता है। खटाई और चीनी से दाँत की बीमारी बहुत होती है। प्राचीन समय में पेशाब करके भी कुल्ली करते थे, यह रिवाज बहुत लाभदायक है। वर्तमान युग में नर्म-से-नर्म भोजन (जैसे डबलरोटी आदि) करने की प्रवृत्ति से दाँतों को व्यायाम नहीं होता। चना-चबेना आदि कड़ी वस्तु खाने वालों के दाँत मजबूत होते हैं। दातून के चबाने से भी दन्त-व्यायाम होता है। टूथपेस्ट लगाकर ब्रश से दाँत और मसूड़ों में लगे भोजन के अंश को निकालना अच्छा है; दाँतों को केवल उज्ज्वल बनाना ही पेस्ट का अर्थ नहीं है।
मुँह साफ न करने से तथा पेट की बीमारी के कारण दाँत और मसूड़ों के बीच में मवाद पड़कर पायरिया नामक रोग हो जाता है। पायरिया से दाँत तो गिर ही जाते हैं और कई अन्य रोग भी पैदा हो जाते हैं। इसके लिए दन्त-चिकित्सक से दाँत और मसूड़ों के मध्य जो मवाद होती है उसको साफ करवाकर प्रतिदिन बबूल का दातून करना चाहिए या आगे लिखा कण्ठ पीयूष भोजन के बाद लगाना चाहिए। दूध, दही, छाछ के न मिलने से कैल्शियम की कमी होकर दन्तरोग व दन्तक्षय हो जाता है। उसके लिए दूध-दही लेना ही सर्वोत्तम उपाय है; नहीं तो शंख, शुक्ति या प्रवाल पिष्टी का सेवन करना चाहिए।
दाँतों के ऊपर की पालिश (एनेमल) उतर जाने से ठंडे जल के स्पर्श से बड़ी पीड़ा होती है। इसके लिए वैद्यनाथ लाल दन्त मंजन लगाकर ५-१० मिनट मुँह में रखें; जब मुँह लार से भर जाय तब कुल्ली करें। इससे दाँतों का शीत-स्पर्श रोग ठीक हो जाता है। दाँत हिलने पर आजकल उनको उखाड़कर निकाल देते हैं; न हिलने वालों को भी निकाल देते हैं। कृत्रिम उज्ज्वल दाँत लगाने से शोभा बढ़ती है — ऐसी धारणा ठीक नहीं है; भोजन का प्राकृतिक स्वाद चला जाता है। भूसा खाने जैसा स्वाद होने से हाजमे पर बुरा असर होता है। इसलिए जहाँ तक हो सके दाँत-दाढ़ निकालना नहीं चाहिए। उनको स्वस्थ रखने के लिए भोजन के बाद मंजन करना और ५-७ बार कुल्ली करना आवश्यक है।
चिकित्सा
दाँत दर्द में अमृतधारा या दालचीनी का तेल लगाने से तथा सेंकने से आराम आता है। कूठ, दारूहल्दी, लोध्र, मोथा, मजीठ, पाठा, कुटकी, तेजबल और हल्दी का चूर्ण लगाने से दाँत दर्द तथा रक्तस्राव में लाभ होता है। काठ-कोयले के बहुत महीन चूर्ण से मंजन करने से दाँत निरोग रहते हैं। सोनागेरू में जरा-सा कपूर, लौंग का चूर्ण तथा जरा-सा तम्बाकू मिलाकर मंजन करना भी दाँतों को स्वस्थ रखता है। त्रिफला, बिनौले, त्रिकटु, माजूफल, मजीठ और तूतिया का मंजन बहुत ही लाभकारी है। तूतिया भूनकर डालें; दाँतों का हिलना बन्द हो जाता है।
मुखरोगों में मुँह के छाले (मुखपाक) में फूली हुई फिटकरी को गर्म जल में मिलाकर कुल्ले करें। प्रायः पेट की बीमारी से मुखपाक होता है, अतः पेट की चिकित्सा से लाभ होता है। रसमाणिक्य १२१.५ मि.ग्रा. मधु के साथ लेने से बहुत लाभ होता है। कण्ठ पीयूष लगाने से भी शीघ्र लाभ होता है। चमेली की पत्ती, अनार की पत्ती, बबूल की छाल और बेर की जड़ — इनको जौकुट करके पानी में औटाकर छान लें, उसमें फिटकरी और सुहागा मिलाकर कुल्ला करें तो मुँह के छाले, मुखपाक तथा टॉन्सिल के पकने में लाभ होता है।
(१) कण्ठ पीयूष -- माजूफल, जायफल, छोटी पीपल, सुहागा फुला हुआ, सेंधा नमक — प्रत्येक द्रव्य ११.६६ ग्राम लेकर महीन चूर्ण करें; २३३ ग्राम जल में औंटावें। ५८.३२ ग्राम शेष रहने पर छानकर फिर पकाएँ। गाढ़ा होने पर शहद ५८.३२ ग्राम मिलाकर शीशी में भर दें। यह मुखरोगों में लाभ करता है, विशेष करके टॉन्सिल में विशेष लाभदायक है।
(२) भिलावा दन्तमंजन -- मिट्टी के घड़े में २ भाग अरहर को डालकर एक भाग भिलावा डालकर, ऊपर से २ भाग अरहर डालकर मुँह पर मिट्टी का सिकोरा रखकर ७ बार कपड़मिट्टी करके सुखा लें। चूल्हे पर रखकर नीचे अग्नि दें। भिलावा जलकर भस्म हो जाय तब उसका महीन चूर्ण करके मंजन करने से दाँत स्वच्छ तथा निरोग रहते हैं। (सि० यो० सं०)
मुँह आने या सम्पूर्ण मुँह में छाले होने पर पोटाश ऑफ परमैंगनेट के हल्के घोल से कुल्ली करना अत्यन्त लाभकारी है। मुँह आने पर कब्ज हो तो मामूली जुलाब देकर पेट साफ कर देना चाहिए। घाई पत्थर (संगजराहत) और गेरू का चूर्ण लगाने से मुखपाक अच्छा हो जाता है। बबूल की छाल के काढ़े से कुल्ला करना भी लाभदायक है।
(३) इरिमेदादि तैल -- इरिमेद (विट्खदिर / दुर्गन्धित खैर) की छाल ५.८३ किलो लेकर कूटकर १५ किलो पानी में डालकर पकावें। ३.७३ किलो जल शेष रहने पर छान लें। बाद में १.८७ किलो तिल तेल का संस्कार कर उसमें उपरोक्त क्वाथ और नीचे लिखा कल्क डालकर पकावें।
कल्क द्रव्य -- मजीठ, लोध्र, मुलेठी, इरिमेद (विट्खदिर) की छाल, खैर की छाल, कायफल, लाक्षा, वट-छाल, नागरमोथा, छोटी इलायची, कपूर, अगर, पद्मकाष्ठ, लवंग, कंकोल, जायफल, पतंगकाष्ठ, गेरू, दालचीनी, नागकेशर, धाय के फूल — इन द्रव्यों का चूर्ण प्रत्येक ११.६६ ग्राम लेकर पानी में पीसकर तैल में डाल दें। तैल सिद्ध होने पर छान लें। इस तेल के प्रयोग से मुँह और मसूड़ों का पकना, मवाद आना, दाँतों का सड़ना, मुँह की दुर्गन्ध, दाँतों में कीड़े पड़ना, जीभ, तालु और ओंठ के रोग आराम होते हैं। यह मुखरोग की अत्युत्तम दवा है। — भै० र०