आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशरसायन (वाजीकरण और पौरुष)

रसायन, वाजीकरण और पौरुष

7 मिनट का पाठ

(१) संखिया के फूल -- ११.६६ ग्राम सफेद संखिया को ३ दिन पुनर्नवा के रस में घोंटकर सुखा लें। इसे फिर डमरू-यंत्र में रखकर चार पहर नीचे अग्नि लगाएँ। ऊपर के पात्र पर भीगा हुआ कपड़ा रखकर ठंडा रखें। स्वांगशीतल होने पर ऊपर के पात्र में लगे हुए संखिया के फूल को निकाल लें। १५.२ मि.ग्रा. मलाई के साथ खाएँ। ध्यान रहे मौसम जाड़े का होना चाहिए। ऊपर से घी, मलाई, दूध आदि यथेष्ट परिमाण में खाने से नपुंसकता दूर होती है। इससे ताकत पैदा होती है। यह कम उम्र वालों के लिए योग्य नहीं है। यह ४५-५० वर्ष की अवस्था से ऊपर वालों के लिए अमृत के समान है।

(२) बृहत् चन्द्रोदय मकरध्वज -- जायफल, लौंग, कपूर और कालीमिर्च — प्रत्येक ४६.४ ग्राम, कस्तूरी १ ग्राम और मकरध्वज ११.६६ ग्राम, सबको पान के रस में घोंटकर ३६५ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। मलाई, मक्खन या पान के रस के साथ सेवन करने से नपुंसकता दूर होती है तथा बल-वीर्य की वृद्धि होती है। — भै० र०

(३) बृहत् पूर्णचन्द्र रस -- शुद्ध पारा और गन्धक २३.२ ग्राम, लौह भस्म, अभ्रक भस्म ४६.४ ग्राम, चाँदी भस्म २३.२ ग्राम, वंग भस्म २३.२ ग्राम, सोना, ताँबा और काँसा भस्म प्रत्येक ११.६६ ग्राम; जायफल, लवंग, छोटी इलायची, भृंगराज, जीरा, कपूर, प्रियंगु और नागरमोथा — ये आठ दवाएँ प्रत्येक ११.६६ ग्राम। इन सब द्रव्यों को एकत्रित करके घीकुमारी का रस, त्रिफला का काढ़ा और एरण्डमूल के रस की एक-एक भावना देकर एरण्ड के पत्ते में लपेटकर धान्य-राशि में तीन दिन तक रखें। इसकी चने के बराबर गोलियाँ बनाकर पान के रस और मधु के साथ सेवन करें। इससे नपुंसकता, प्रमेह, शीघ्रपतन, बहुमूत्र, अग्निमान्द्य आदि नष्ट होकर बल-वीर्य, कान्ति और शक्ति की वृद्धि होती है। ये गोलियाँ अत्यन्त लाभकारी हैं। बहुत बार की परीक्षित हैं।

(४) महालक्ष्मी विलास रस -- वज्राभ्रक भस्म ४६.४ ग्राम, शुद्ध गन्धक २३.२ ग्राम, वंग भस्म ११.६६ ग्राम, शुद्ध पारा ६ ग्राम, शुद्ध हरताल ६ ग्राम, ताम्र भस्म ३ ग्राम, कपूर ६ ग्राम, जावित्री और जायफल प्रत्येक ६-६ ग्राम, विधारा के बीज और धतूरा बीज प्रत्येक ११.६६ ग्राम, स्वर्ण भस्म ४ ग्राम लेकर प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली बनावें, फिर उसमें अन्य औषधें मिलाकर सबको अच्छी तरह घोंटकर २४३ मि.ग्रा. की गोलियाँ बना लें। पान का रस या अन्य उचित अनुपान के साथ इसका सेवन करने से शुक्रक्षय, प्रमेह, लिंगशैथिल्य, सन्निपात ज्वर आदि निश्चय ही आराम होते हैं। वीर्य-विकार के सम्पूर्ण रोग इससे नष्ट हो जाते हैं। मरते समय जब शरीर शीतल हो जाता है, तब इस दवा से उपकार होता है।

(५) मदनानन्द मोदक -- शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म — प्रत्येक ११.६६ ग्राम, अभ्रक भस्म ३५ ग्राम; कपूर, सेंधा नमक, जटामांसी, आँवला, छोटी इलायची, सोंठ, मिर्च, पीपल, जायफल, जावित्री, तेजपत्ता, लौंग, जीरा, स्याह जीरा, मुलेठी, बच, कूठ, हल्दी, देवदारु, हिज्जलबीज, सुहागा, नारंगी, नागकेशर, काकड़ासिंगी, तालीसपत्र, मुनक्का, चीतामूल की छाल, दन्तीमूल, बला (बरियारा), अतिबला (कंघी), दालचीनी, धनिया, शतावरी, आक की जड़, कौंच के बीज, गोखरू, विधारे के बीज, भांग के बीज — प्रत्येक ११.६६ ग्राम। इन सब द्रव्यों को शतावरी के रस में भावना देकर सुखा लें। फिर सेमल मूसली का चूर्ण १५१.६४ ग्राम और धोई हुई भांग का चूर्ण ३७३ ग्राम (घी में भूनकर डालें) एकत्रित करके बारीक दूध में पीसें। २.३४ किलो चीनी की चाशनी कर पाक होने पर ऊपरवाली सब चीजें मिला दें। पाक शेष होने पर दालचीनी, तेजपत्ता, इलायची, नागकेशर, कपूर, सेंधा नमक, कालीमिर्च और पीपल — इन दवाओं का चूर्ण ६-६ ग्राम मिला दें। ठंडा होने पर एक पाव घी और एक पाव शहद मिलाकर रख दें। इसकी ३ ग्राम से ६ ग्राम तक की मात्रा दूध के साथ सेवन करें। इससे बल-वीर्य की वृद्धि, रति-शक्ति की वृद्धि और स्तम्भन शक्ति प्राप्त होती है। यह संग्रहणी और मन्दाग्नि की दवा है। भांग का योग होने से सावधानी से प्रयोग करना चाहिए।

(६) मूसली पाक -- सफेद मूसली ९३३ ग्राम, दूध ७॥ किलो, घी ९३३ ग्राम; सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, इलायची, सौंफ, दालचीनी, तेजपत्र, हाऊबेर, शतावर, जीरा, अजमोद, चित्रकमूल, गजपीपल, अजवायन, पीपरामूल, धातकी, कपूर, गोखरू, धनिया, असगन्ध, हरड़, नागरमोथा, समुद्रशोष, लवंग, जायफल, जावित्री, नागकेशर, तालमखाना, खरेटी बीज, अतिबला, नागबला (गंगेरन), कौंच बीज, मुलेठी, सेमल गोंद, सिंघाड़ा, कमलगट्टा, वंशलोचन, सुगन्धवाला, कङ्कोल, अकरकरा, कपूर — प्रत्येक ५८.३२ ग्राम; धुले हुए तिल आधा सेर; चन्द्रोदय २९ ग्राम; लौह भस्म, अभ्रक भस्म प्रत्येक ५८.३२ ग्राम लेकर पहले काष्ठौषधियों का महीन चूर्ण कर लें।

बनाने की विधि -- पहले मूसली के चूर्ण को दूध में पकाकर गाढ़ा करें, बाद में घी डालकर भून लें। पश्चात् सबसे दुगुनी सफेद चीनी की चाशनी बनाकर उसमें उपरोक्त सब सामान डालकर पाक बना लें।

यह अत्यन्त पौष्टिक, बल-वीर्यवर्द्धक, कामशक्ति को बढ़ानेवाला तथा नपुंसकता और नामर्दी-नाशक है। इसके सेवन से धातुदौर्बल्य नष्ट होकर शरीर स्वस्थ, कान्तियुक्त एवं बलिष्ठ हो जाता है। यह स्त्री-पुरुष दोनों के सेवन करने लायक उत्तम पुष्टई है।

(७) श्रीगोपाल तेल -- तिल तेल ३.७३ किलो को खूब औटाकर संस्कार कर लें। फिर असगन्ध, चोरपुष्पी, पद्मकाष्ठ, कण्टकारी, बलामूल (बरियारा), अगर, मोथा, गन्धतृण, शिलारस, श्वेत चन्दन, लाल चन्दन, हरड़, बहेड़ा, आँवला, मूर्वामूल, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, माषपर्णी, मुद्गपर्णी, जीवन्ती, मुलेठी, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, पूतिका (खट्टासी), केशर, कस्तूरी, दालचीनी, तेजपत्ता, इलायची, नागकेशर, छरीला, नखी, नागरमोथा, मृणाल, नीलोत्पल, खस, जटामांसी, मुरामांसी, देवदारु, बच, अनार के बीज, तुम्बरु, ऋद्धि, वृद्धि, दमनक (दोना) और छोटी इलायची — इन ५२ दवाओं को प्रत्येक २९ ग्राम लेकर कल्क करें। १५ किलो जल डालकर पाक करें। फिर क्रमशः शतावरी का रस, कुम्हड़े का रस, आँवले का रस प्रत्येक ३.७३ किलो; असगन्ध, कटसरैया (पियाबाँसा) और बला (बरियारा) प्रत्येक ५.८३ किलो को १५ किलो जल में अलग-अलग काढ़ा करके ३.७३ किलो जल शेष रखें और पाक करें। तीनों का अलग-अलग काढ़ा करके पाक करना उत्तम होता है। बृहत् पंचमूल (बेल-छाल, अरणी, सोनापाठा-छाल, गम्भारी-छाल, पाटल-छाल), बड़ी कण्टकारी, गोक्षुरमूल, केवड़ा की जड़, पूतिका (नाटाकरंज) और पारिभद्र की छाल — इन १० दवाओं का प्रत्येक ५८३.३६ ग्राम लेकर १५ किलो जल से काढ़ा करें। ३.७३ किलो जल शेष रहने पर डालकर पाक करें। जब सब पाक हो जाय तब छानकर रख लें। इसकी मालिश से नपुंसकता दूर होती है तथा वायुरोग, प्रमेह, शूल आदि आराम होते हैं।

जिस प्रकार खाने की दवा से बल-वीर्य बढ़ता है, ठीक उसी तरह इस तेल के मर्दन से बल-वीर्य की वृद्धि होती है।

(८) ४६७ ग्राम कनेर वृक्ष की छाल को ४.६७ किलो दूध में औंटाएँ। फिर छाल को फेंक दें और दूध का दही बनाकर घी निकाल लें। यह घी २४३ मि.ग्रा. खाया जाय और जननेन्द्रिय पर मालिश की जाय, तो नपुंसकता दूर होती है।

(९) अश्वगन्धादि चूर्ण -- असगन्ध और विधारा समान भाग लेकर कूटकर रख लें। इसको ११.६६ ग्राम बराबर मिश्री मिलाकर गरम दूध से लेने से सब प्रकार की धातु की कमजोरी, नपुंसकता, नामर्दी, शीघ्रपतन आदि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ, बलवान् एवं कान्तियुक्त हो जाता है। इससे कामशक्ति की खूब वृद्धि होती है। बिना नशीली चीजों के स्तम्भन शक्ति पैदा करने के लिए इसका प्रयोग उत्तम है। (विदार्यादि चूर्ण के लिए सिद्धयोग संग्रह पृष्ठ १४७ देखें। — शा० ध०)

वक्तव्य

इस विषय में और बहुत-से परीक्षित नुस्खे लिखे जाते, परन्तु इस प्रकार की दवाओं से सर्वसाधारण का नुकसान ही अधिक होता है। क्योंकि कामवर्द्धक दवाइयाँ खाकर लोग विषय भोग में अधिक प्रवृत्त हो जाते हैं, जिससे स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है। वीर्यस्तम्भक दवाइयाँ जान-बूझकर नहीं लिखी गई हैं; क्योंकि रुकावट पैदा करनेवाली दवाइयाँ नशीली चीजों से तैयार होती हैं। अफीम, भांग आदि नशीली दवा के बिना कोई वीर्यस्तम्भक दवा तैयार नहीं होती। इन नशीली दवाइयों के सेवन से जो असंख्य खराबियाँ होती हैं, उनके स्मरण मात्र से हृदय काँप जाता है। बहुत-से सुन्दर नवयुवकों का जीवन इन दवाइयों से नष्ट हो गया है। प्रत्येक नवयुवक को स्मरण रखना चाहिए कि पूर्ण आरोग्ययुक्त पुरुष ही स्त्री की इच्छा तृप्त कर सकता है। बनावटीपन से कार्य नहीं चलता। अधिक विषयभोगी पुरुष से स्त्री की कामवासना शान्त नहीं होती।