आरोग्य-प्रकाश
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आरोग्य-प्रकाशउपदंश (आतशक)

उपदंश (आतशक)

8 मिनट का पाठ

सूजाक की तरह आतशक भी मनुष्य के पापों का ही फल है। आतशक या सूजाक होने से मनुष्य जीवन का आनन्द ही चला जाता है। यह रोग जहाँ एक बार लगा कि जन्म भर इसका जहर बना रहता है। आतशक या सूजाक का फल बेटे-पोते तक को भोगना पड़ता है। किसी कुष्ठाश्रम के रोगियों की जाँच कीजिये, तो मालूम होगा कि कोढ़ अधिकतर आतशक के कारण ही पैदा होता है। यदि मनुष्य क्षणिक सुख के लोभ को रोक सके, तो इस महाव्याधि से सुरक्षित रह सकता है।

आतशक वाली स्त्री के साथ सम्भोग करने से पुरुष को और आतशक वाले पुरुष के साथ सम्भोग करने से स्त्री को यह रोग लग जाता है। कई ऐसे वज्रमूर्ख पुरुष भी देखे गये हैं, जो आतशक या सूजाक होने पर बिना रोग वाली स्त्री के साथ इस खयाल से सम्भोग करते हैं कि रोग आराम हो जायगा। परन्तु फल बिल्कुल उल्टा होता है। विषय-भोग करने से गर्मी और सूजाक के घाव फटकर जो भयानक यन्त्रणा देते हैं, उसे भुक्तभोगी ही जान सकता है। आतशक या सूजाक के रोगी का कर्त्तव्य है कि रोग आराम होने के बाद भी दो-चार महीने तक स्त्री-सम्भोग न करे, क्योंकि विषय-भोग के कारण कच्चे घावों का फटना बहुत सम्भव है।

आतशक का विष शरीर में घुसने के बाद दस दिन के भीतर ही रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। पहले मसूर जैसा दाना प्रकट होता है; फिर यह दाना तीन-चार बड़े फलों का आकार धारण करके फैल जाता है। इसके बाद इसमें मवाद उत्पन्न होकर जख्म गलने लगता है। जख्म के चारों ओर का किनारा कठिन और ऊँचा तथा मध्य भाग धीरे-धीरे गहरा होता जाय तो इसको कठिन आतशक कहते हैं। इसके विपरीत मामूली घाव हो, तो साधारण आतशक कहलाता है। आतशक के कुछ दिन बाद ही बद (बाघी) उत्पन्न हो जाती है। कठिन उपदंश के बाद की बाघी कुछ विशेष कष्ट नहीं देती, परन्तु साधारण आतशक के बाद उत्पन्न होने वाली बाघी बहुत कष्ट देती है। आतशक का जहर शरीर में फैलने से रक्त दूषित हो जाता है। सारे शरीर में खुजली और ताँबे के रंग की छोटी-छोटी फुंसियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। शरीर की सन्धि-सन्धि (जोड़-जोड़) में दर्द और सूजन हो जाती है, जिसको सन्धिवात या गठियावात कहते हैं। हाथ, पैर और आँखों में जलन, गले या नाक में घाव, सिर के बालों का उड़ना, ज्वर, राजयक्ष्मा आदि अनेक उपद्रव होते हैं।

चिकित्सा

वैद्यक शास्त्र के अनुसार पारा इस रोग की महौषध है। वर्तमान समय में पारे के विषय में बहुत-से लोगों में भ्रम फैला हुआ है, जिसे डॉक्टरों ने स्वार्थवश फैलाया है। परन्तु किसी सज्जन डॉक्टर से पूछा जाय, तो वह तुरन्त बतलायेगा कि पारा इस रोग की बढ़िया दवा है। इंजेक्शनों के इस जमाने में भी आतशक के रोगी को खाने की दवा में सभी डॉक्टर पारा देते हैं। हाँ, अशुद्ध पारा बहुत खराबी करता है, कोढ़ तक कर देता है, यह बात सत्य है। बहुत-से लोग स्वार्थवश आतशक के खास चिकित्सक बन बैठते हैं। मैं खुद दो-चार आतशक के प्रसिद्ध चिकित्सकों को जानता हूँ, जो लिखना भी नहीं जानते, परन्तु इस रोग से खासी आमदनी कर लेते हैं। यह सत्य है कि ये मूर्ख वैद्य अशुद्ध पारा ही रोगी को खिलाते हैं। दुर्भाग्यवश आतशक के अधिकांश रोगी ऐसे ही वैद्यराजों की चिकित्सा में जाते भी हैं, क्योंकि लोगों में अभी तक इस रोग के प्रति काफी घृणा है। इसलिए लज्जावश चुपचाप इलाज कराना अधिक पसन्द करते हैं। आतशक होना सचमुच लज्जा की बात है; परन्तु आतशक होने पर लज्जा करना मूर्खता है। अतः इसका इलाज योग्य चिकित्सक से ही कराना चाहिए। शुद्ध पारे के खिलाने से कुछ भी खराबी नहीं होती, बल्कि अमृत के समान लाभ होता है। शुद्ध पारा कुष्ठ रोग को भी नष्ट करने की शक्ति रखता है। इसलिए आतशक के रोगी को बिना किसी संकोच के शुद्ध पारे का सेवन नीचे लिखी विधि से करना चाहिए। शुद्ध पारा का सेवन इस रोग में अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होता है।

आतशक के रोगी को पहले जुलाब देकर पेट साफ कर देना चाहिए। दवा के बीच में भी जुलाब देना उचित है। आतशक होते ही जननेन्द्रिय के मुण्ड का चर्म उलट देना चाहिए। प्रायः देखा गया है कि गर्मी के कारण जननेन्द्रिय-मुण्ड फूल जाता है और इस हालत में चर्म उलटा नहीं जा सकता। फलतः घाव भीतर ही भीतर सड़कर गलने लगता है। यदि चर्म उलटा गया हो और सूजन आ गई हो, तो त्रिफला के गुनगुने काढ़े में जननेन्द्रिय को डुबाकर रखना चाहिए। त्रिफला के गुनगुने काढ़े में जननेन्द्रिय को डुबाकर रखने से शोथ कम हो जाता है। शोथ कम होते ही मुण्ड की टोपी उलट देनी चाहिए। यदि इससे भी ठीक न हो तो चर्म कटवा देना चाहिए।

आतशक के घावों को त्रिफला के काढ़े या नीम के पत्ते के पानी से प्रतिदिन दो बार धो देना उचित है। गर्म पानी में जरा-सा पोटैशियम परमैंगनेट मिलाकर धोना भी अच्छा है। आतशक के घाव में लगाने वाला मलहम ऐसा न हो कि उतारने पर न उतरे। सबसे उत्तम विधि यह है कि घाव को अच्छी तरह धोकर रसकपूर घी या वैसलीन में मिलाकर लगा दें। इससे घाव अच्छे हो जाते हैं।

इसमें दवाओं का सेवन परम लाभकारी है। नीचे लिखी दवाओं का प्रयोग करें:--

(१) अमीर रस -- २९१ ग्राम सेंधा नमक को खूब महीन पीसें। इसमें से १७५ ग्राम नमक लेकर एक तवे पर ४ इंच गोलाकार में डालें। उस नमक पर सच्चे गोटे (चाँदी) का तार ५.८३ ग्राम रखकर फिर उस पर रसकपूर ११.६६ ग्राम, रूमी शिंगरफ ११.६६ ग्राम, दालचिकना ११.६६ ग्राम—इन तीनों के छोटे-छोटे टुकड़े करके डाल दें। फिर उसके ऊपर गोटे का तार ५.८३ ग्राम डालकर चीनी मिट्टी के बड़े प्याले से ढँक दें और पूर्व शेष ११६.६४ ग्राम सेंधा नमक में कतीरा गोंद २९ ग्राम मिलाकर पानी से पीसकर संधिरोध कर दें। इस तवे को चूल्हे पर रखकर तीन पहर अग्नि लगाएँ। प्याले के ऊपर वाले भाग पर भीगे हुए कपड़े रखकर ठंडा रखें। शीतल होने पर प्याले को उलट कर दवा को ग्रहण कर लें। इसमें पारे के कुछ कण होते हैं, उनसे भय न करें। यह दवा १२१.५ या २४३ मि.ग्रा. मुनक्का में भरकर रोगी को निगलने को दें। इसे दाँत से न चबाएँ। खाने को गेहूँ की रोटी (बिना नमक) और दूध-चीनी दें या फिर भात और दूध-चीनी दें। अन्य सब चीजों से सख्त परहेज रक्खें। इससे आतशक ७ या ९ रोज में शर्तिया अच्छा हो जाता है। साथ ही आतशक के कारण होने वाली गठियावात शर्तिया आराम हो जाती है। आतशक के कारण सारे शरीर में फोड़े होकर यदि बहने लग गये हों, तो इससे शीघ्र आराम होगा। दवा खाने से मुँह आ जाय तो कीकर (बबूल) की छाल के काढ़े से कुल्ला करें या घावों पर पपरिया कत्था डालें, आराम हो जायगा। आतशक की यह बहुत बार की परीक्षित दवा है। यह बहुत जल्द फायदा करता है। अमीर रस को बनाते समय ११.६६ ग्राम संखिया भी डाल दिया जाय तो दवा अधिक लाभ करने वाली हो जाती है। हम अमीर रस में संखिया डालते हैं।

-- सि० भै० म० मा०

(२) तीन ग्राम रूमी शिंगरफ के ६ भाग करें और एक भाग में तम्बाकू का जरदा मिलाकर हुक्का (गुड़गुड़ी) की तरह पीएँ। इस प्रकार सुबह और शाम करके ३ दिन में सबको पी डालें।

पथ्य -- बिना नमक गेहूँ की रोटी या दलिया अथवा भुने हुए चने के सिवाय और सब चीजें निषेध हैं। गुड़, तेल, लाल मिर्च, खट्टा, मिठाई आदि ६ महीने तक न खानी चाहिए। इससे भयानक से भयानक आतशक भी शर्तिया अच्छा हो जाता है। दवा खाने के बाद शुद्ध गन्धक या रक्त शुद्धिकारक अर्क का सेवन करना चाहिए।

(३) शिंगरफ ११.६६ ग्राम, रसकपूर ६ ग्राम, तूतिया २३.२ ग्राम और मुरदासंख २३.२ ग्राम—इन चार दवाओं को महीन पीसकर ४०८ ग्राम मोम गलाकर उसमें मिला दें। फिर उसमें कपड़े की सात बत्तियाँ डालकर मोमबत्ती के आकार में बना लें। रोगी को बेंत वाली कुर्सी पर नंगा बैठाकर कुर्सी के नीचे अंगारों पर उक्त बत्ती रखकर शरीर को मोटे कपड़े से ढक दें, सिर्फ गर्दन खुली रहने दें। जननेन्द्रिय को धुआँ लगना चाहिए। अन्दाज एक घण्टे में यह बत्ती धुआँ देकर खत्म हो जायगी। इससे बहुत पसीना बहेगा। यह चमत्कारी दवा है। भयानक उपदंश भी इस धुएँ से आराम हो जाता है। भोजन के लिए ताजा दूध और भात देना चाहिए।

(४) रसकपूर ५.८३ ग्राम बहुत महीन चूर्ण करके ५८.३२ ग्राम घी या ५६ मि.ली. वैसलीन में मिला दें। यह आतशक के घाव का शर्तिया मलहम है। रसकपूर की जगह कैलोमेल (Calomel) भी डाल सकते हैं। विषय-भोग के बाद इस मलहम को जननेन्द्रिय पर अच्छी तरह लगा दिया जाय, तो आतशक होने का भय नहीं रहता है। आतशक के कीटाणु बड़े सख्त होते हैं, सहज में मरते नहीं। इसलिए मलहम अच्छी तरह लगा लेना उचित है।

पथ्यापथ्य

साथ में ज्वर होने से रोगी को दूध आदि का पथ्य देना चाहिए। जब तक घाव अच्छा न हो जाय, तब तक मछली और मीठा खाना मना है। रोगावस्था में स्त्री-सम्भोग की इच्छा न करनी चाहिए, क्योंकि इससे जननेन्द्रिय के उत्तेजित होकर पुनः घाव होने का भय रहता है।