आरोग्य-प्रकाश
पुस्तक के बारे में
आरोग्य-प्रकाशसुजाक

सूजाक

7 मिनट का पाठ

विचारपूर्वक देखा जाय तो रोगमात्र मनुष्य के आहार-आचारादि दोषों से उत्पन्न होते हैं; परन्तु सूजाक और आतशक रोग तो मनुष्य खुद खरीदता है। यदि मनुष्य अपने मन को वश में रख सके तो इन रोगों से होने वाले कष्टों से बच सकता है। सूजाक वाली स्त्री के साथ सम्भोग करने से पुरुष को तथा सूजाक वाले पुरुष के साथ सम्भोग करने से स्त्री को यह रोग उत्पन्न हो जाता है। कड़ी धूप में घूमने या तेल, अचार आदि अत्युष्ण पदार्थ के अधिक खाने से पेशाब में जलन पैदा हो जाती है और सूजाक के लक्षण देखे जाते हैं; परन्तु यह जलन आप ही आप शान्त हो जाती है। बहुत-से धूर्त रोगी इसी तरह के कारण बतलाकर चिकित्सक को भ्रम में डालने की चेष्टा करते हैं, परन्तु उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि मामूली कारणों से उत्पन्न हुए सूजाक और आतशक बिना दवा के भी अच्छे हो जाते हैं, किन्तु सूजाक का जहर शरीर में घुसने के २-३ दिन बाद ही रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। शुरू-शुरू में मूत्रनली का मुँह सुरसुराता और खुजलाता है। पेशाब लाल और गर्म होता है। पेशाब में थोड़ी जलन और कुछ मवाद भी आने लगती है। इसके बाद सूजाक की असली अवस्था उत्पन्न होती है, और पेशाब करते समय भयानक यन्त्रणा होने लगती है। सफेद, पीला या हरा मवाद भी बहुत आने लगता है। रात को सोते समय जननेन्द्रिय उत्तेजित हो जाती है, जिसके कारण रोगी को अत्यन्त कष्ट होता है। जननेन्द्रिय के मुण्ड में सूजन, अण्डकोषों और बस्ति-ग्रन्थि में प्रदाह आरम्भ हो जाता है। ७ से १४ दिन के भीतर रोग के सब लक्षण घटकर सूजाक पुराना आकार धारण कर लेता है। पुराने सूजाक में पेशाब की जलन बहुत कम हो जाती या बिल्कुल नहीं होती है। सिर्फ पीला या सफेद पीप कम तादाद में निकलता रहता है। कभी-कभी मूत्रनली के संकोच के कारण पेशाब पतली धार से या रुक-रुककर होता है। मवाद के कारण मार्ग रुक जाने से बाज समय पेशाब एकदम बन्द हो जाता है।

मूत्रमार्ग की कफ की पतली झिल्ली में प्रदाह होकर घाव हो जाता है जिससे मवाद आता रहता है। सूजाक के प्रदाह से बाघी (बद) भी हो जाती है। प्रायः देखा जाता है कि सूजाक या आतशक जब भयानक न होकर मामूली रूप से प्रकट होता है तब बाघी होती है। रोग का बचा हुआ जहर वात के रूप में प्रकट हो जाता है। सूजाक या आतशक होने के बाद गठियावात का होना बहुत सम्भव है। लोगों का विचार है कि सूजाक या आतशक में ठण्डी चीजों के व्यवहार से गठियावात हो जाती है, परन्तु असल में ऐसी बात नहीं है। गठियावात सूजाक या आतशक के जहर से ही उत्पन्न होती है। सूजाक और आतशक भयानक बीमारी है। एक-दो महीने के भीतर इलाज करने से तो यह ठीक हो जाता है; किन्तु ज्यादा पुराना हो जाने पर इसके कीड़े बहुत भीतर चले जाते हैं तब किसी तरह की चिकित्सा से लाभ नहीं होता। फलस्वरूप रोगी का जीवन नष्ट हो जाता है।

चिकित्सा

सूजाक के रोगी को मामूली जुलाब देकर पेट साफ कर देना चाहिए। सूजाक की पहली या दूसरी अवस्था में पेशाब का जुलाब देना चाहिए। मूत्रस्तम्भ में लिखा नुस्खा नं० ६ बहुत फायदेमंद है। कच्चे दूध में समभाग जल मिलाकर लस्सी बनाकर भरपेट पीएँ, इससे पेशाब का जुलाब होगा। दही की लस्सी में जवाखार मिलाकर पीने से भी बहुत पेशाब उतरता है।

ककड़ी के बीज ३ ग्राम और कलमीशोरा १.५ ग्राम फाँक कर ऊपर से लस्सी पीना मूत्ररेचक है। कबाबचीनी का चूर्ण १.५ ग्राम ३-४ बार ताजा जल या लस्सी के साथ पीने से खूब पेशाब उतरता है। मूत्राघात और मूत्रस्तम्भ के नुस्खे भी लाभदायक हैं।

(१) ताजा गिलोय (गुरूच) ११.६६ ग्राम को २३३ ग्राम पानी में रात को भिगो दें। सुबह मल-छान कर ५८.३२ ग्राम शहद मिलाकर पीएँ। उससे पेशाब की जलन और मवाद निश्चय बन्द हो जायगा। १ गोली चन्द्रप्रभा वटी खाकर ऊपर से यह पानी पीया जाय तो शर्तिया आराम हो जाता है।

(२) गन्धा-बिरोजा का तेल, कबाबचीनी का तेल और असली चन्दन का तेल—तीनों तेल समभाग मिलाकर १० से २० बूँद तक चीनी या मिश्री के शर्बत के साथ सेवन करें। इससे सूजाक में शर्तिया लाभ होता है। खाली चन्दन का तेल भी पुराने सूजाक में अच्छा फायदा करता है।

(३) राल (धूना) का चूर्ण १.५ ग्राम तक ४६७ ग्राम मट्ठा या जल के साथ सेवन करने से सूजाक में अच्छा लाभ करता है।

(४) सत्यानासी (चोक) की जड़ की छाल ६ ग्राम से ११.६६ ग्राम तक पीसकर जल के साथ लेने से सूजाक में लाभ होता है तथा दस्त भी साफ होता है।

(५) वंशलोचन, माजूफल, गन्धा-बिरोजा का सत्त और सफेद कत्था को समभाग लेकर चन्दन के तेल के साथ एक-एक ग्राम की गोलियाँ बना लें। इसको मिश्री के शर्बत या जल के साथ सेवन करने से सूजाक में लाभ होता है।

(६) शिलाजीत, कबाबचीनी, रेवन्दचीनी, जवाखार, पकाया हुआ शोरा, कतीरे का गोंद, गेरू, फूली हुई फिटकरी, वंशलोचन, राल, चन्दन का बुरादा, गिलोय का सत्त और बिरोजे का सत्त—ये १४ दवाएँ समभाग लेकर चूर्ण बना लें और ६ ग्राम की मात्रा में दूध या जल के साथ लें। यह सूजाक में रामबाण की तरह लाभ पहुँचाता है। यह योग धातुपुष्टि के लिए भी लाभदायक है।

(७) सेमल की जड़ (मूसली) का स्वरस या केले के खम्भों का स्वरस ११.६६ से २३.२ ग्राम तक पीने से सूजाक में अच्छा फायदा होता है।

(८) सूजाक में सोते समय जननेन्द्रिय उत्तेजित होकर बहुत कष्ट देती है। इसके लिये जननेन्द्रिय के मार्ग में जरा-सा कपूर या अफीम रख देने से उत्तेजना नहीं होती है।

(९) सूजाक में भीतर घाव हो जाता है, इसलिये पिचकारी द्वारा मूत्रमार्ग से उस घाव को प्रतिदिन दोनों समय या कम-से-कम एक बार तो जरूर धोना चाहिए। गुनगुने पानी में जरा-सा पोटैशियम परमैंगनेट मिलाकर या त्रिफला के काढ़े से धोना उत्तम है।

(१०) चन्दनासव -- सफेद चन्दन, सुगन्धवाला, नागरमोथा, गम्भारी की छाल, नीलोफर, प्रियंगु, पद्माख, लोध्र छाल, मजीठ, लाल चन्दन, पाठा, चिरायता, वट की छाल, पीपल की छाल, कचूर, पित्तपापड़ा, मुलेठी, रास्ना, परवल का पत्ता, कचनार की छाल, आम की छाल, मोचरस—प्रत्येक दवा ५८.३२ ग्राम; धाय के फूल ९३३ ग्राम, मुनक्का १.१६ किलो—इन सबको लेकर ३० किलो जल में चीनी ५.८३ किलो, गुड़ ३ किलो मिलाकर काष्ठादि दवाओं को डालकर मृत्तिका पात्र में १ मास पर्यन्त बन्द कर रखें। बाद में छानकर इसे प्रयोग में लावें। इसकी १४ ग्राम से २९ ग्राम तक की मात्रा में बराबर जल मिलाकर भोजन के बाद या आवश्यकतानुसार सेवन करें। यह बीसों प्रकार के प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, सूजाक (गनोरिया) आदि को नष्ट कर बल और कान्ति को बढ़ाता तथा अग्नि को प्रदीप्त करता है। यह पुराने सूजाक और प्रमेह की उत्तम दवा है!

-- भै० र०

(११) चन्दनादि वटी -- सि० यो० सं० में देखें।

पथ्यापथ्य

गुड़, तेल, लाल मिर्च, अचार, मसाला आदि न खाना चाहिए। इसमें नर्म बिस्तरे पर सोना, स्त्री-सम्भोग, घूमना, कसरत करना तथा साइकिल या घोड़े की सवारी एकदम मना है। यदि साथ में ज्वर हो, तो दूध-साबूदाना लेना चाहिए। हलका और पुष्टिकारक भोजन करना चाहिए। रोटी, भात, दाल, साग, फल, दूध आदि पथ्य हैं। शराब या ब्राण्डी ५६ मि.ली. पीने पर भी सूजाक न उभरे तो समझना चाहिए कि रोग जड़ से आराम हो गया।

सूजाक से बचने का उपाय

सूजाक के रोगी के साथ विषय-भोग न करना ही इससे बचना है। लेकिन पुराना सूजाक ऐसी हालत में आ जाता है कि उसकी पहचान मुश्किल से होती है, इसलिये विषय-भोग के बाद तत्काल पेशाब से मूत्रनली को धो डालना चाहिए। जननेन्द्रिय के चमड़े को खींचकर बन्द करके पेशाब करें ताकि थैली की तरह पेशाब जमा हो जाय, फिर एक मिनट बाद छोड़ दें। इस तरह ३-४ बार करें। पेशाब में तेजाब होता है, उससे सूजाक के कोमल कीटाणु तत्काल मर जाते हैं। विषय-भोग के कुछ समय बाद वे सूजाक के कीड़े भीतर जाकर अपना स्थान बना लेते हैं, फिर तो वे बिना तेज दवा के मरते ही नहीं। इसलिये विषय-भोग के बाद तत्काल यह क्रिया कर लेनी चाहिए, ताकि सूजाक होने का भय न रहे।