व्रण, फोड़े-फुंसी और घाव
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शरीर में रक्त विकार के कारण छोटी-छोटी फुंसियाँ और बड़े-बड़े फोड़े हो जाते हैं। कभी वे पककर बह जाते हैं और कभी घाव का आकार धारण कर लेते हैं। चोट लगने, कट जाने या जल जाने आदि से भी घाव हो जाता है। उपयुक्त उपचार न होने के कारण यह घाव नासूर (नाड़ी-व्रण) का रूप धारण कर लेता है। प्राकृतिक नियम है कि मवाद (पूय) जिस स्थान में उत्पन्न होता है, यदि उस स्थान को साफ न रखा जाय तो आस-पास भी सड़न पैदा कर देता है। भीतर ही भीतर जब बहुत दूर तक सड़न हो जाती है, तब नासूर हो जाता है। एक तरह का भयानक फोड़ा पीठ पर होता है, उसे अदृष्ट व्रण या कारबंकल कहते हैं। यह बत्तख के अंडे जैसा या संतरे जैसा होता है। प्रायः ४० वर्ष की अवस्था के बाद यह होता है। मधुमेह के रोगी को तो यह घाव होने से प्रायः मृत्यु ही हो जाती है।
चिकित्सा
शरीर के किसी भी भाग में बड़े फोड़े के उठते ही नीम के पत्तों या तीसी की गरम-गरम पुल्टिस बाँधने से वे पककर खुद बह जाएँगे या शस्त्र से कटाकर बहा दें। फोड़े को बैठाने की चेष्टा न करनी चाहिए, क्योंकि जिस खराब जहर को प्रकृति फोड़े के द्वारा बाहर निकालने की चेष्टा करती है, उसे अन्दर ही रोकना बुद्धिमानी नहीं है। नीम के पत्तों को पानी में डालकर गरम कर लें, इस पानी से दो बार घाव को धोकर साफ करें और खूब सूख जाने पर टिंचर आयोडीन लगाकर कपड़ा बाँध दें। यदि घाव गहरा हो तो आयोडोफार्म की रूई बाँध दें। पुराने और सड़े हुए तथा फैलने वाले घाव को गरम पानी में जरा-सा पोटैशियम परमैंगनेट डालकर दोनों समय साफ करें तो बहुत लाभ होता है। कोई चिपकने वाली दवा मत लगाएँ। इससे घाव का मुँह बन्द होकर नासूर हो जाता है। घाव आप ही आप भरता है। दवा की सहायता से घाव जल्दी भर जाता है, यह भ्रम है। घाव को खूब स्वच्छ रखें तो वह खुद जल्दी अच्छा हो जायगा। घाव में धूल, तिनका, कंकड़ आदि न गिरे, इसलिए उस पर कपड़ा रखें। घाव को आरोग्य करने की यह सर्वोत्तम विधि है। मदयन्त्यादि चूर्ण (११९), काला मलहम (१२५), बिरोजे का लाल मलहम (१२६), श्वेत मलहम (१२७), लिनिमेन्ट रेवन्दचीनी (१२९) — सि० यो० सं० देखें।
(१) महात्मा प्रदत्त मलहम -- उत्तम राल ११६.६४ ग्राम का खूब महीन कपड़छान चूर्ण करें और ५.८३ ग्राम पारा को २९ ग्राम तूतिया के साथ खूब घोंट कर राल के चूर्ण में मिला दें। फिर घी डालकर पत्थर की सिल-लोढ़ी से भाँग की तरह ६ घण्टे तक मेहनत से घोंटें। घी इस अन्दाज से डालें जिससे दवा रोटी बनाने के लिए जल मिले आटे की तरह हो जाय। घोंटने के लिए बलवान आदमी की जरूरत है; क्योंकि मलहम पत्थर से बहुत चिपक जाता है। तैयार होने पर इसे टीन के डिब्बे में रख दें। फिर कपड़े को गोलाकार काटकर बीच में जरा-सा छेद रहने दें और मलहम को उस कपड़े पर लगाकर अग्नि की सहायता से जरा तपाकर फोड़े पर चिपका दें। बहुत जल्दी फोड़ा पककर बह जायगा। यदि मामूली सूजन ही होगी तो बैठ जायगा। यह बहुत सुन्दर चमत्कारिक दवा है। बतलाने वाले महात्माजी का कथन है कि इसको बेचना धर्मविरुद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को धर्मार्थ ही बाँटना चाहिए। अगर यह मलहम न हो तो सिर्फ गन्धा-बिरोजा को भी इसी तरह लगा दें, बहुत लाभ करता है।
(२) व्रणराक्षस तैल -- पारा, गन्धक, हरताल, सिन्दूर, मैनसिल, लहसुन, सिंगिया मोहरा विष, ताँबे का चूर्ण—प्रत्येक ११.६६ ग्राम लेकर, महीन चूर्ण करके २३३ ग्राम सरसों के तेल में मिलाकर तेज धूप में ३ दिन तक रहने दें। तीन दिन के बाद इसको बोतल में भरकर रख दें। यह तैल घाव व नासूर में बहुत फायदेमंद है। खाज, खुजली, फोड़े, फुंसी, मांसवृद्धि, विचर्चिका (Eczema) आदि में भी यह अत्यन्त लाभकारी है।
(३) घाव का तेल -- हरड़, बहेड़ा, आँवला प्रत्येक ५८.३२ ग्राम; नीम की पत्ती ३५० ग्राम, निर्गुण्डी की पत्ती १७५ ग्राम—सबको ४.६७ किलो जल में डाल कर क्वाथ करें। चतुर्थांश (१.१६ किलो) जल शेष रहने पर छान लें, फिर इसको ९३३ ग्राम तिल के तेल में डालकर उसमें गुग्गुलु, राल, शिलारस, गन्धा-बिरोजा और मोम प्रत्येक ५८.३२ ग्राम डालकर मन्दाग्नि से पकावें। तेल तैयार होने पर उतार कर छान लें। बाद में कार्बोलिक एसिड २९ ग्राम और कपूर ५८.३२ ग्राम मिलाकर बोतल में भर लें। जब दोनों मिलकर जलवत् हो जाय तो तैल में मिला दें। यह सब प्रकार के घाव की उत्तम दवा है। चोट लगना, छूरा, चाकू आदि से घाव हो जाने पर रक्त का निकलना, मोच आ जाना, अग्नि से जलना, गर्मी के कारण पैदा हुई फुंसियाँ, कान से मवाद का बहना एवं सब प्रकार के सड़े-गले घाव आदि की यह सबसे अच्छी दवा है। यह व्रण को शुद्ध करता एवं सड़ते हुए मांस को रोककर घाव को भर देता है।
(४) घाव का उत्तम मलहम -- मुरदाशंख, सुहागा, तूतिया, कत्था, कबीला, मरिच, अजवायन—ये ७ चीजें ३५ ग्राम, कपूर ९ ग्राम, सफेद काजल (जो जयपुर में बहुत मिलता है) १७.५ ग्राम, सुपारी ४ नग एवं पीली कौड़ी ४ नग लें।
बनाने की विधि -- मरिच, अजवायन और सुपारी इन तीनों को अधजली कर लें, पीली कौड़ी की भस्म कर लें। फिर सबको कपड़छान चूर्ण करके गो-घृत में मिला दें। यह मलहम सब तरह के घाव में फायदा करता है। नीम के पत्ते के पानी से घाव को अच्छी तरह धोकर दो बार मलहम को लगाएँ, इससे सड़े और पुराने घाव भी अच्छे हो जाते हैं।
बिरोजे का लाल मलहर
गन्ध बिरोजा ४६७ ग्राम और हिंगुल ११·६६ ग्राम लें।
पहले बिरोजे को कड़ाही में डाल मन्द आग पर गरम करें। बीच-बीच में इसमें से चाकू या चम्मच से १-२ बूंद पानी में डाल कर देखते रहें कि यह कब मलहर बनाने योग्य हो जाता है। जब वैसा हो जाय तो कपड़े से छान लें। अब इसमें बारीक पीसा हुआ हिंगुल थोड़ा थोड़ा डाल बार बार तब तक चलाते रहें जब तक वह ठण्डा न हो जाय। बिना चलाए हिंगुल भारी होने से नीचे बैठ जाता है। इसे भरकर रख लें। यह मलहर घाव को शुद्ध करने और भरने के काम आता है। प्लूरिसी में पसली में दर्द होने पर या अन्यत्र कहीं भी दर्द होने पर इसे लगाते हैं।
लगाने की तरकीब यह है कि एक मोटे कपड़े या लिंट को बिछा लें फिर स्पेच्युला या चाकू को गरम करें उसकी सहायता से मलहर कपड़े पर फैला दें फिर इसे थोड़ी आग दिखा कर सुहाता सुहाता दर्द के स्थान पर चिपका दें। चिपकाने के पूर्व बालों को उस्तरे से साफ करवा दें ताकि पट्टी हटाते समय कष्ट न हो।